हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/05/2007 11:55:00 PM

बिहार में जनता की लडा़इयों की एक लंबी परंपरा रही है और इस परंपरा में जनता के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़नेवाले लेखकों, कवियों की भी. बिजेंद्र अनिल उन्हीं में से एक थे. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके गीत हमारे साथ हैं और जो जनता लड़ रही है-उसके साथ हैं. पेश है एक श्रद्धांजलि और उनके कुछ गीत.


सुधीर सुमन
थाकार-गीतकार बिजेंद्र अनिल तीन नवंबर को नहीं रहे. यह सही है कि पिछले एक दशक में उन्होंने बहुत कम लिखा पर गरीब मजदूरों और मेहनकश किसानों से उनका संवेदनात्मक रिश्ता नहीं टूटा था. तीन चार वर्ष पहले उन्होंने खेत मजदूरों के राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए पांच गीत लिखे और शिक्षक की नौकरी से रिटारमेंट के बाद इधर नये सिरे से पूरी तैयारी के साथ लिखने की योजना बना रहे थे. सामाजिक-राजनीतिक बदलाव चाहनेवालों और क्रांति के आकांक्षी तमाम लोगों के लिए उनका अचानक चले जाना बहुत बड़ा आघात है.

अब सांस्कृतिक समारोहों और विचार गोष्ठियों में जनसंघर्षों की आंच से तपा और जमीनी अनुभवों से मिली वैचारिक दृढ़तावाला वह सांवला चेहरा नजर नहीं आयेगा. पर जनता की ताकत की ऊष्मा और संवेदनशीलता से भरी उनकी मुस्कुराहट कभी भुलायी नहीं जा सकती. और न ही उनके गीत भुलाये जायेंगे. सामाजिक-राजनैतिक सरोकारवाले रचनाकारों के लिए उनका होना एक ताकत की तरह था. अब जब वे नहीं हैं, तो उनका जीवन और उनकी रचनाएं हमारे लिए प्रेरणा का काम करेंगी, उनकी कहानियां लेखकों-कलाकारों को उनका सामाजिक -राजनीतिक फर्ज समझायेंगी.
ब्रेन हेमरेज का जो खतरनाक और अकस्मात हमला था, उसे वे बेशक नहीं झेल पाये और इस देश में आम लोगों के स्वास्थ्य के ठेकेदारों ने जरूर बिना कोशिश किये हाथ खड़े कर दिये कि इतना क्षतिग्रस्त दिमाग तो अमेरिका में भी कम बचाया जा सकता है. पर बिजेंद्र अनिल तो अपने उस दिमाग का प्रतिरूप पहले ही अपने शब्दों में उतार कर चले गये हैं. वह दिमाग, जो गांव के सामंत से लेकर साम्राज्यवाद तक का निर्भीकता के साथ प्रतिरोध करता है और प्रतिरोध के लिए व्यापक जनता को संगठित करने की तैयारी करता है, उसे वे अपनों के बीच छोड़ गये हैं>.

दर्जनों कहानी संग्रह और उपन्यास बिजेंद्र अनिल ने नहीं लिखे. 18 वर्ष की उम्र में आग और तूफान कविता संग्रह के प्रकाशन से उनके रचनात्मक सफर की शुरुआत हुई और विस्फोट और नयी अदालत नामक दो कहानी संग्रह ही प्रकाशित हुए. आरंभ एक भोजपुरी और दूसरा हिंदी में उपन्यास भी लिखा. उनकी इच्छा थी कि फर्ज कहानी को उपन्यास का रूप देते, पर इसका वक्त ही नहीं मिला. पिछले एक दशक से उनका तीसरा कहानी संग्रह इलाहाबाद के एक प्रकाशक ने लटकाये रखा. गजलों के प्रकाशन की योजना भी पूरी नहीं हुई. इसके बावजूद उन्हें पाठकों और लेखकों ने एक बहुत बड़े रचनाकार का दर्जा दिया और उनको आदर्शों का सम्मान किया.
बिजेंद्र अनिल वैकल्पिक जनसंस्कृति का निर्माण करनेवाले ऐसे महान रचनाकार हैं, जिन्होंने लिखने और जीने के प्रश्न को एक साथ लिया. व्यावसायिक लाभ के लिए गैरजनवादी प्रवृत्ति को प्रश्रय देनेवाली पत्रिकाओं में कुछ नहीं लिखा. लघु पत्रिका आंदोलन के जरिये वैकल्पिक मीडिया के निर्माण की कोशिशों को उनकी सृजनात्मक ऊर्जा का जबर्दस्त सहारा मिला. विजेंद्र अनिल ने सत्ता के केंद्रों की ओर नहीं देखा, चाहे वह दिल्ली में हो या पटना में. लेखन के शुरुआती दशक में ही उन्होंने अपने गांव से प्रगति पत्रिका निकाल कर अपने मंसूबे का संकेत दे दिया था.

बिजेंद्र अनिल उन लेखकों में नहीं थे, जो सिर्फ दूर की क्रांतियों और जनसंघर्षों का गान करते हैं और अपने आसपास चल रहे आंदोलनों पर सायास चुप्पी साधे रहते हैं. उन्होंने लेखक के लिए फर्ज की कसौटी गढ़ दी कि वह न केवल न्याय, समानता, आजादी और लोकतंत्र के पक्ष में संघर्षरत ताकतों की आवाज को अनियंत्रित करे बल्कि उनकी लड़ाइयों में शामिल भी हो. बिजेंद्र अनिल ने विचार और कर्म के स्तर पर इसे खुद भी साबित किया. गांव में जो उन्होंने लेखक कलाकार मंच नामक संगठन बनाया था, उसका मकसद किसान मजदूरों और अनपढ़ गरीब लोगों की चेतना को उन्नत करना था. इसके कारण उन्हें इलाके के कुख्यात सामंत से टकराना पड़ा. उन्हें प्रलोभन दिये गये कि पैसे ले लो पर ऐसे गीत न लिखो, ऐसी संस्था न चलाओ. बाद में धमकियां भी मिलने लगीं और इनका हाथ तोड़ दिया गया. मगर इन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. 1980 में उन्होंने गांव में ही प्रेमचंद पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमे कफन, पूस की रात और सवा सेर गेहूं का उनके द्वारा किया गया भोजपुरी नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया. बिहार नव जनवादी मोरचा और जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में से एक हैं बिजेंद्र अनिल.
विगत वर्ष बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान समारोह में साहित्य में किसान विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि आजकल लेखक उसी को याद कर रहा है, जिससे उसकी रोजी-रोटी चलती है, जबकि उसे मेहनतकश वर्ग और उसकी समस्याओं को ठीक से जानना-समझना चाहिए, क्योंकि उसी के बल पर दुनिया को बदला जा सकता है. हल, बैल, माल-मवेशी, विस्फोट, आग, अमन चैन, फर्ज, नयी अदालत, अपनों के बीच जैसी कहानियां लिखनेवाले बिजेंद्र अनिल के उपरोक्त विचारों पर ध्यान देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. अब ना सहिब हम गुलमिया तोहार चाहे भेजउ जेलिया हो, रउवा शासन के बडुए ना जवाब भाई जी, बदली जा देसवा के खाका, बलमु लेके ललका पताका हो जैसे जनगीतों के रचनाकार बिजेंद्र अनिल हमेशा जनता के संघर्षों के साथ रहेंगे. आइल बा वोट के जबाना हो, पिया मुखिया बन जा आज भी कितना प्रासंगिक लगता है. अस्पताल में मरीजों के प्रति संवेदनहीनता और लूट को महसूस कर उनका गीत लगातार जेहन में गूंजता रहा, केकरा से करीं अरजिया हो सगरे बटमार. बटमारों और लुटेरों की संस्कृति के खिलाफ ही उन्होंने अपनी रचनाएं लिखीं. शहीदों और आंदोलनकारियों की तरफ से लिखनेवालों को क्रांतिकारी सलाम भेजा.

आज उनकी स्मृति जोरदार तरीके से हमसे कह रही है कि मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना.

बिजेंद्र अनिल के गीत

सगरे बटमार
केकरा से करीं अरजिया हो, सगरे बटमार
राजा के देखनीं, सिपहिया के देखनीं
नेता के देखनीं, उपहिया के देखनीं
पइसा प सभकर मरजिया हो, सगरे बटमार
देखनी कलट्टर के, जजो के देखनीं
राजो के देखनीं आ लाजो के देखनीं
कमवा बा सभकर फरजिया हो, सगरे बटमार
देस भइल बोफोर्स के तोप नियन सउदा
लोकतंत्र नाद भइल, संविधान हउदा
कइसे भरायी करजिया हो, सगरे बटमार
छप्पन गो छूरी से गरदन रेताइल
सांपन के दूध आउर लावा दिआइल
गाईं जा नयका तरजिया हो, सगरे बटमार
केकरा से करीं अरजिया हो, सगरे बटमार

बदलीं जा देसवा के खाका
बदलीं जा देसवा के खाका, बलमु लेई ललका पताका हो
खुरपी आ हंसुआ से कइनी इयारी
जिनमी भ सुनली मलिकवा के गारी
कबले बने के मुंहताका, बलमु लेई ललका पताका हो
ना चाहीं हमरा के कोठा-अटारी
ना चाहीं मलमल आ सिलिक के साड़ी
बन करअ दिल्ली के नाका, बलमु लेई ललका पताका हो
राजा आ रानी के उड़े जहजिया
हमनी के के हू न सुने अरजिया
जाम करअ शासन के चाका, बलमु लेई ललका पताका हो
तू बनिजा सूरज, हम बनि जाइब लाली
तू बनि जा झरना, हम बनबि हरियाली
पंजा पअ फेंकीं जा छाका, बलमु लेइ ललका पताका हो
बदली जा देसवा के खाका, बलमु लेई ललका पताका हो
15.10.1984

आइल बा वोट के जबाना
आइल बा वोट के जबाना हो, पिया मुखिया बनि जा
दाल-चाउर खूब मिली, खूब मिली चीनी
फेल होई झरिया-धनबाद के कमीनी
पाकिट में रही खजाना हो, पिया मुखिया बनि जा
जेकरा के मन करी, रासन तू दीहअ
जेकरा से मन करी, घूस लेई लीहअ
हाथ में कचहरी आ थाना हो, पिया मुखिया बनि जा
तोहरा से बेसी के करेला सेवा
जिनिगीन ओढ़त रहल टाट आउर लेवा
कबो ना मिलल नीमन खाना हो, पिया मुखिया बनि जा
अहरा आ पोखरा के लीहअ तू ठीका
कीनि दीहअ हमरा के झुमका आ टीका
गावे के फिलिमी तराना हो, पिया मुखिया बनि जा
आइल बा वोट के जबाना हो, पिया मुखिया बनि जा
02.02.1978

केकर हअ ई देश अउर के काटत बड़ुए चानी

केकर जोतल, केकर बोअल
के काटेला खेत?
केकर माई पुआ पकावे
केकर चीकन पेट?
के मरि-मरि सोना उपजावे, के बनि जाला दानी?
ताजमल के कर सिरजल हअ
केकर हअ ई ताज?
केकर ह ई माल खजाना?
करत आजु के राज?
पांकी-कांदो में के बइठल, के सेवे रजधानी?
केकरा खून-पसेना से
लउकत बड़ुए हरियाली?
के सीमा पर खून बहावे
केकरा मुंह पर लाली?
केकर अमरित के घड़ा बनावे, के पीयेला पानी?
केकर हअ ई देस अउर के काटत बड़ुए चानी?

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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