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नंदीग्राम : हीरक राजार देशे

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/27/2007 05:30:00 PM

रविभूषण

हान फिल्मकार सत्यजीत राय ने आठ वर्ष की उम्र में अपने पितामह उपेंद्र किशोर राय चौधरी की १९१४ में बांग्ला पत्रिका संदेश में प्रकाशित गोपी और बाघा की कहानी पढी थी. १९६८ में उन्होंने इस कहानी पर आधारित फिल्म 'गुपी गाइन, बाघा बाइन' बनायी. यह फिल्म रातोरात जनप्रिय संस्कृति का अंग बन गयी. इस फिल्म के दस वर्ष बाद सत्यजीत राय ने १९८० में 'हीरक राजार देशे' फिल्म प्रस्तुत की.

इमरजेंसी का दौर समाप्त हो चुका था. पश्र्िचम बंगाल में माकपा की सरकार थी और इस फिल्म की प्रोड्यूशर पश्र्िचम बंगाल की सरकार थी. हीरक राजा की भूमिका में उत्पल दत्त थे और सौमित्र चटर्जी स्कूल शिक्षक उदयन थे. 'अपूर संसार' में अपु की भूमिका में सौमित्र चटर्जी ने आरंभ में ही अभिनेता के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की थई. सत्यजीत राय की फिल्म 'अभिजन' में सौमित्र चटर्जी नरसिंह 'चारुलता' में अमल, 'कापुरुष-ओ-महापुरुष' में कापुरुष के रूप में अमिताभ राय, 'अरण्येर दिन रात्रि' में असीम की भूमिका में. 'अशनि संकेत' में गंगाचरण चकवर्ती, 'सोनार केला' में प्रदोष मित्तर (फेलु), 'जय बाबा फेलुनाथ' में भी प्रदोष मित्तर (फेलु) के साथ कई फिल्मों में महत्वपूर्ण अभिनय किया था.
बांग्ला सिनेमा के अभिनेताओं में सौमित्र चटर्जी की ख्याति सर्वविदित है. सत्यजीत राय ने 'हीरक राजार देशे' फिल्म को 'गुपी गाइन, बाघा बाइन' की तुलना में अधिक गंभीर माना है. उनके अनुसार 'हीरक राजार देशे' फिल्म में राजा अधिक महत्वपूर्ण है और उनके दरबारी और वैज्ञानिक उनके साथ हैं. फिल्म की फैेंटेसी के पीछे छुपे राजनीतिक विषय की पहचान आरंभ में ही कर ली गयी थी और उत्पल दत्त ने, जो इस फिल्म में राजा की भूमिका में थे, यह कहा था कि यह फिल्म पूरी तरह राजनीतिक है. इस फिल्म में राजा के सिपाही गरीबों को हटा देते हैं, जिससे आगंतुक उन्हें न देख सके. इस दृश्य को उस मसय इमरजेंसी में झुग्गी-झोपडियों को हटाने और बुलडोजर चलाने से जोड कर देखा गया था.
बांग्लादेश में टेलीविजन पर 1981 में यह फिल्म दिखाई गयी थी. इस फिल्म में सौमित्र चटर्जी उस स्कूल शिक्षक की भूमिका में थे, जो राजा के विरोधियों का नेतृत्व कर रहा था, जिसका स्कूल शिक्षा मंत्री ने बंद कर दिया था, क्योंकि वहां प्रश्र्नकर्ताओं को प्रोत्साहित किया जाता था. 'हीरक राजार देशे' में सौमित्र चटर्जी राजा और शासक वर्ग के विरोध में थे. क्या यह दुखद और आश्र्चर्यजनक नहीं है कि उन्होंने नंदीग्राम के मसले पर बुद्धदेव भट्टाचार्य का साथ दिया. अभिनय में कुछ और जीवन में कुछ. 1980 के बाद बदली स्थितियों ने कई कवियों, लेखकों, कलाकारों, अभिनेताओं, रंगकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों का मानस बदला है, पर अभी भी सत्य, नैतिकता, प्रतिरोध और संघर्ष नहीं कायम है. सौमित्र चटर्जी ने वाम मोरचा की सरकार का पक्ष लेकर अपने को अलग-थलग कर लिया है. उन्हें 'हीरक राजार देशे' के स्कूल मास्टर की याद दिलायी गयी है, पर उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा है. सौमित्र चटर्जी ने सरकार के विरोधियों से प्रश्र्न किया है कि जब भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के सदस्यों ने मापका के कैडरों पर आक्रमण किया था, तब उन्होंने कोई आवाज क्यों नहीं उठायीङ्क्ष फुटबॉल खिलाडी सुरजीत दास गुप्ता ने सौमित्र चटर्जी के इस रिमार्क को ठीक हो स्टुपिड कहा है. कोलकाता में आयोजित फिल्म समारोह के अध्यक्ष थे सौमित्र चटर्जी और उस समारोह में किसी ने भाग नहीं लिया. नंदीग्राम के समर्थन में सौमित्र चटर्जी का कथन क्या 'राजा' के दरबारियों और प्रशंसकों की तरह नहीं हैङ्क्ष क्या नंदीग्राम के साथ इस फिल्म का एक संबंध स्थापित नहीं होताङ्क्ष राजा के साथ रहना जनता के विरोध में रहना है. पश्र्िचम बंगाल की सरकार देशी-विदेशी बडे पूंजीपतियों के साथ है. उसकी विकास-संबंधी नीतियां सामान्य जनता के पक्ष में नहीं है.
नंदीग्राम में माओवादियों की उपस्थिति का तर्क भुरभुरा है. माओवादी वहां पहले क्यों नहीं थे? जहां भी गरीबी, शोषण, अत्याचार और लूटमार है, वहां माओवादी क्यों धमक जाते हैं? उनके लिए क्या शासक वर्ग ने ही ऐसी स्थितियां उत्पन्न नहीं कर दी हैं, जिनमें वे बढे-फैले. सुचित्रा भट्टाचार्य ने माओवादियों की उपस्थिति के तर्क को ठीक ही इराक पर बुश द्वारा किये गये आक्रमण-तर्क के साथ जोड कर देखा है.
पश्र्िचम बंगाल के 294 विधायकों में से गैरवामपंथी विधायकों की संख्या कम है. विरोधी राजनीतिक दल नहीं, जनता है और इस जनता के साथ बुद्धिजीवी, कवि-लेखक, अभिनेता, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी सब हैं. सौमित्र चटर्जी अकेले हैं और जहां तक बुद्धदेव भट्टाचार्य का प्रश्र्न है, उनके पास मात्र सत्ता है. पश्र्िचम बंगाल को विश्र्व पूंजीवाद के मार्ग पर ले जाने के खतरे का मात्र आरंभिक स्वर है नंदीग्राम. बुद्धदेव भट्टाचार्य विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के समर्थक हैं. इस विशेष आर्थिक क्षेत्र से क्या सामन्य जन-जीवन प्रभावित-संचालित नहीं होगाङ्क्ष किसके पक्ष व हित में भूमि-अधिग्रहण होगाङ्क्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महाजाल में फंस कर छटपटाया ही जा सकता है.
भारत का शासक वर्ग वैश्र्िवक पूंजीवाद के साथ गतिशील है. औद्योगिक पूंजी का दौर समाप्त हो चुका है और शासक वर्ग वित्तीय पूंजी की चमचमाहट से प्रन्न और गदगद है. 'इंडिया शाइनिंग' इसी से जुडा था. यह भारत का खंडित और एकांगी सच है, जिसे संपूर्ण बनाने के प्रयत्न जारी हैं. भारत का प्रत्येक राजनीतिक दल विकास की इसी पूंजीवादी धारणा के साथ है. उसके पास अपनी न कोई ष्टि है, न विजन. अमेरिका सारी दुनिया का हीरक राजार देश है, अधिसंख्य देश विकास के अमेरिकी पूंजीवादी मार्ग पर हैं. इसके वामपंथी अनुयायी और समर्थक चीन का उदाहरण देते हैं.
1989 में चीन ने अपनी आर्थिक सुधारवादी नीति के जरिये विकास किया है. उसका आर्थिक विकास निर्यात केंद्रित है. इसी उदाहरण से यह समझाया जाता है कि भारत आर्थिक सुधारवादी/ उदारवादी नीतियों के जरिये अपना आर्थिक विकास करेगा और यह आर्थिक विकास निर्यात केंद्रित होगा. इस आर्थिक विकास के लिए जरूरी है सेज. विशेष सेज फ्री ट्रेड जोन (एफटीजेड) और एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोंस (इपीजेड) का विकसित-परिष्कृत रूप है. अपने ही देश में एक प्रकार का विदेशी क्षेत्र है सेज. ये नयी रियासतें हैं. अपने में स्वतंत्र. जाहिर है, बाद में निरंकुश भी होंगी. इनकी अपनी अदालतें होंगी, जिनमें आर्थिक अपराधों की सुनवाई होगी. बहुराष्ट्रीय कंपनियां और कॉरपोरेट घरानें भारतीय राष्ट्र-राज्य के अधीन होंगे या स्वतंत्रङ्क्ष राज्य द्वारा सुविधाएं प्राप्त कर क्या ये राज्य को कमजोर नहीं करेंगीङ्क्ष राज्य द्वारा नियंत्रित-संचालित न होकर अपनी शर्तों से राज्य को नियंत्रित-संचालित करनेवाली शक्तियों की पहचान नहीं की जानी चाहिएङ्क्ष राज्य के उत्पादन के लिए इन्हें प्रोत्साहन देगा और सेज ड्यूटी फ्री जोन होंगे. इन्हें सभी ड्यूटी और करों से मुक्ति दी जायेगी और दस वर्ष के लिए ये आयकर से भी मुक्त होंगे. ऐसी सुविधा और कहां हैङ्क्ष सुविधाएं और छूट सीमित नहीं हैं. इस क्षेत्र विशेष में पानी, बिजली किसी की कमी नहीं होगी और शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की छूट रहेगी.
पश्र्िचम बंगाल सरकार सेज का समर्थन कर किसानों और सामान्य भारतीय जनों को क्या संदेश देना चाहती हैङ्क्ष उसका मार्क्सवाद हीरेक राजार के पक्ष में है या विरोध में? क्या सेज हमारे देश में संपत्तिशालियों का, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विशेष सुरक्षित क्षेत्र नहीं होगा? राजग की सरकार ने सेज-संबंधी बिल 10 मई, 2000 को लोकसभा में पेश किया था. इस बिल पर कितनी बहसें हुईं? क्या भारतीय नागरिकों को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि इस बिल के दूरगामी नतीजों पर किन सांसदों ने गंभीरतापूर्वक विचार किया? दोनों सदनों में यह बिल 12 मई 2005 को पारित हुआ. राष्ट्रपति ने 23 जून, 2005 को इस बिल पर हस्ताक्षर किये और फरवरी 2006 तक सेज-संबंधी कानून पास हो गया.
प्रतिरोध की राजनीति घटी है, पर प्रतिरोध की संस्कृति बढ रही है. इसे दमन, भय और आतंक से कुचला नहीं जा सकता. सहयोग और समर्थन से सौमित्र चटर्जी एकाकी हो गये हैं और प्रतिरोध का सामूहिक स्वर बढ रहा है. नंदीग्राम माकपा के लिए एक सबक है. 'वार्निंग' है. 'हीरक राजार देशे' फिल्म के वास्तविक स्वर सुनने चाहिए.

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ नंदीग्राम : हीरक राजार देशे ”

  2. By बाल किशन on November 27, 2007 at 7:17 PM

    बहुत ही सुंदर और संतुलित ढंग से आपने अपनी बात कही है. और ये सही भी है पर सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ की सौमित्र चटर्जी साहब के अत्यधिक जिक्र के कारण पोस्ट कंही-कंही अपने मुद्दे से भटकती मालूम होती है.

  3. By दिलीप मंडल on December 4, 2007 at 1:52 AM

    वह एक अश्लील आम सहमति थी!

    एसईजेड पर लोकसभा में दो घंटे से कम की बहस हुई थी। उसमें भी सीपीआई के गुरुदास दासगुप्ता सभापति को घड़ी की याद दिला रहे थे। इस एक्ट के खिलाफ देश के एक भी एमपी ने वोट नहीं डाला था। किसी ने मत विभाजन की मांग भी नहीं की। एक भी संशोधन नहीं रखा गया। पूरा ब्यौरा मैं आपको जल्द भेजूंगा।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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