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बीच सफ़हे की लड़ाई

नंदीग्राम : माकपा मार्क्सवाद को अश्लील कर रही है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/21/2007 11:16:00 PM

रविभूषण
समकालीन हिंदी कवि नवीन सागर (९ नवंबर १९४८- १४ अप्रैल २०००) के पहले
कविता संग्रह नींद से लंबी रात की एक कविता 'अच्छी सरकार' में एक साथ
सरकार द्वारा सितार बजाने और हथियार चलाने की बात कही गयी है, ' यह बहुत
अच्छी सरकार है. इसके एक हाथ में सितार, दूसरे में हथियार है. सितार
बजाने और हथियार चलाने की तजुर्बेकार है्व'
पश्र्िचम बंगाल में माकपा ने अपने कार्यकाल के आरंभ में भूमि संबंधी
कानूनों से सितार बजाने की जो शुरुआत की थी, वह कुछ समय बाद ही समाप्त हो
गयी. आर्थिक उदारीकरण ने राज्य समर्थित पूंजीवाद को तिलांजलि देकर
स्वतंत्र बाजार के पूंजीवाद को गले लगाया. माकपा ने भी यही राह पकडी.
माकपा की आर्थिक नीति और कांग्रेस-भाजपा की अर्थनीतियों में क्या कोई
अंतर हैङ्क्ष आर्थिक सुधार और उदारीकरण की वकालत कर विकास की पूंजीवादी
अवधारणा से सहमत होकर इस मार्ग पर चलना मार्क्सवाद नहीं है. आर्थिक सुधार
का सही नाम 'पूंजीवादी विकास' है. नंदीग्राम इसी पूंजीवादी विकास मार्ग
से उत्पन्न है. प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य इस मार्ग के
मार्क्सवादी पाथिक हैं.
१९७० के दशक और २००७ में अंतर है. '७० के दशक में प्रकाश करात जेएनयू
छात्र संघ के पहले अध्यक्ष चुने गये थे. इस वर्ष जेएनयू के छात्र संघ के
चुनाव में माकपा और भाकपा के छात्र संगठनों- एसएफआइ और एसएसएफ में जेएनआइ
ने- विकास के लिए नंदीग्राम की हत्याओं का पक्ष लेकर माकपा की कार्यशैली
को उचित ठहराया और वे चुनाव में बुरी तरह हारे, पहली बार जेएनयू के
इतिहास में धुर वाम छात्र संगठन आइसा (माले लिबरेशन की छात्र शाखा) ने
सारी सीटें जीतीं.
मार्च '०७ के बाद नवंबर '०७ में नंदीग्राम में जो भी घटित हुआ है, उसे
भुलाया नहीं जा सकता. मार्च में पुलिस ने ग्रामीणों पर गोलियां चलायी
थीं और नवंबर में माकपा के हथियारबंद कैडरों ने. क्या पुलिस और माकपा के
हथियारबंद कैडर भाई-बंधु हैंङ्क्ष क्या नंदीग्राम एक युद्धस्थल हैङ्क्ष
किसानों पर गोलियां चलानेवाले माकपा के कैडर किन अर्थों में मार्क्सवादी
हैंङ्क्ष माग्नुस एजेंस बर्गर की एक छोटी कविता मार्क्स पर है : मैं
देखता हूं, तुम्हें ाधेखा दिया/ तुम्हारें शिष्यों ने/ केवल तुम्हारे
शत्रु/ आज भी वही हैं, जो पहले थे.
मार्च २००७ की घटनाओं के बाद मार्क्सवादी इतिहासकार सुमित सरकार ने पहली
बार नंदीग्राम की तुलना गुजरात नरसंहार से की. क्यों अब नरेंद्र मोदी के
नाम के साथ बुद्धदेव भट्टाचार्य का नाम जोडा जाता हैङ्क्ष मोदी ने गोधरा
की प्रतिक्रिया में गुजरात नरसंहार की बात कही थी; बुद्धदेव भट्टाचार्य
के अनुसार माओवादियों को उन्हीं की शैली में जवाब देकर माकपा के कैडरों
ने सही कार्य किया है. दूसरी ओर प्रकाश करात मनमोहन सिंह को उद्धृत कर
रहे हैं- 'माओवादी राष्टीय सुरक्षा के लिए सबसे बडा खतरा हैं.'
१४ मार्च २००७ को माकपा सरकार की पुलिस ने नंदीगा्रम में निर्दोष
ग्रामीणों की हत्या की थी और अगले दिन १५ मार्च को कलकत्ता हाइकोर्ट ने
मीडिया रिपोर्ट को ध्यान में रख कर सीबीआइ को जांच के आदेश दिये थे. तब
नंदीग्राम के वासियों को राज्य सरकार सुरक्षा नहीं दे सकी थी. अब
हाइकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर अपराधियों पर केस दायर करने का आदेश दिया
है और एक महीने के भीतर रिपोर्ट जमा करने को कहा है. हाइकोर्ट ने राज्य
सरकार को घटना में मरे लोगों के परिजनों और घायलों को मुआवजा देने का भी
आदेश दिया है.
नंदीग्राम में पहले पुलिस और बाद में माकपा के कैडरों द्वारा की गयी
हत्याओं को क्या किसी प्रकार उचित और न्यायसंगत सिद्ध किया जा सकता है
ङ्क्ष माकपा के साथ अब नंदीग्राम सदैव के लिए जुड गया है. कैडरों द्वारा
नवंबर में एक सप्ताहिक हिंसा और उपद्रव जारी रखना क्या सिद्ध करता
हैङ्क्ष माकपा के कार्यकर्ताओं ने सीआरपीएफ के जवानों को नंदीग्राम जाने
नहीं दिया. कलकत्ता हाइकोर्ट ने १४ मार्च ०७ को नंदीग्राम में हुई
फायरिंग को असंवैधानिक और अनुचित कहा है ङ्क्ष क्या नवंबर में नंदीग्राम
पर कब्जा करने के लिए माकपा कैडरों द्वारा की गयी हत्या संवैधानिक और
उचित है ङ्क्ष माकपा की कार्रवाई का सबने विरोध किया है. वाम सरकार के एक
मंत्री ने तो इस्तीफे की पेशकश भी की थी. राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने
ज्योति बसु के घर जाकर उनसे नंदीग्राम में शांति कायम करने का आग्रह किया
था. माकपा के सहयोगी दलों- भाकपा, आरएसपी और फारवर्ड ब्लॉक ने उनके
नाजायज तरीकों पर आपत्ति की है. स्वयं बुद्धदेव भट्टाचार्य के अनुसार ७००
व्यक्ति रहात शिविरों में हैं. माकपा के कैडरों पर सैकडों घर जालाने,
हत्या और बलात्कार के आरोप हैं. राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी के बयान पर
माकपा की बौखलाहट के पीछे उसकी घबराहट थी.
माकपा भूल चुकी है कि लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा और राजग को
उनकी आर्थिक नीतियों के कारण सत्ता से हटा दिया था. भारतीय जनता आर्थिक
सुधार के कार्यक्रमों के खिलाफ है. यह अकारण नहीं है कि गुजरात में रतन
लाल टाटा नरेंद्र मोदी की विकास नीतियों के साथ हैं; और पश्र्िचम बंगाल
में बडे पूंजीपति बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ हैं. बुद्धदेव किसानों,
गरीबों और सामान्य व्यक्तियों के साथ नहीं हैं. हाथ से सितार छूट चुका
है.
माकपा के खिलाफ बंगाल बंद हो चुका है. १४ नवंबर को कोलकाता में कवियों,
लेखकों, कलाकारों, रंगकर्मियों, अभिनेताओं, फिल्मकारों के साथ हजारों की
संख्या में मौन जुलूस संदेश को क्या बुद्धदेव भट्टाचार्य भूल पायेंगे
ङ्क्ष माकपा के कैडर और कार्यकर्ता के सामने मृणाल सेन, गौतम घोष अपर्णा
सेन, ऋतुपर्णा घोष, जोगेन चौधुरी, शंख घोष, जय गोस्वामी, महाश्र्वेता
देवी, सुचित्रा भट्टाचार्य, विभाष चक्रवर्ती, सांवली मित्र, कौशिक सेन,
मेघा पाटेकर आदि क्या कोई अर्थ नहीं रखतेङ्क्ष १४ नवंबर को ही लोकसभा
अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने जेएनयू में जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल व्याख्यान
में नेहरू के लोकतंत्र संबंधी विचारों को उद्धृत किया था. अपने इस
व्याख्यान में सोमनाथ चटर्जी ने जनता के प्रति सरकार की एकाउंटिबिलिटी
की बात की थी. बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री से अधिक पार्टी से
जुडाव-लगाव को महत्व दे रहे हैं और अपनी पार्टी के कैडरों के
क्रियाकलापों को उचित ठहरा रहे हैं.
नंदीग्राम ने राज्य बनाम पार्टी, भारतीय संविधान और संसदीय लोकतंत्र से
जुडे कई अहम प्रश्र्न उपस्थित कर दिये हैं. राज्य और राजनीतिक दल में
सर्वोपरि कौन हैङ्क्ष संविधान की शपथ लेकर संविधान के उसूलों के खिलाफ
कार्य करना क्या सही हैङ्क्ष संसदीय लोकतंत्र के नियमों को नष्ट करना
लोकतंत्र के हित में कैसे हैङ्क्ष संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन का
प्रश्र्न बडा प्रश्र्न है. गयारह महीनों से नंदीग्राम पर भूमि उच्छेद
प्रतिरोध कमेटी का कब्जा था और अब माओवादियों ने स्वीकारा है कि वे
नंदीग्राम में हैं. नंदीग्राम 'मुक्तक्षेत्र' नहीं था. अब वहां के किसान
स्थानीय माकपा नेताओं की अनुमति के बगैर खेतों से अपनी फसल अपने घर नहीं
ले जा सकते. वहां राज्य नहीं, माकपा के कैडर कार्यरत हैं. क्या यह स्थिति
लंबे समय तक कायम रह सकेगीङ्क्ष माकपा ने नंदीग्राम में 'केमिकल हब' और
'सेज' के लिए भूमि अधिग्रहण न करने की बात अवश्य कही है, पर मुख्य सवाल
यह है कि पूंजीवादी विकास के मार्ग से वह अपने को अलग करेगी या नहींङ्क्ष
रणधीर सिंह पश्र्िचम बंगाल में माकपा की राजनीति के जिन वर्तमान संकटों
और टैजिडी की जडें की ओर ध्यान दिलाते हैं, उस ओर प्रकाश करात और
बुद्धदेव भट्टाचार्य को ध्यान देना चाहिए. रणधीर सिंह ने फ्यूचर ऑफ
सोशलिज्म में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि तीस वर्ष तक लगातार सत्ता
में बने रहने के बाद भी दूसरे राज्यों की तुलना में माकपा ने उनसे भिन्न
और कुछ विशिष्ट नहीं किया है. उसने भी अन्य राज्यों की तरह विकास के
पूंजीवादी मार्ग का ही चयन किया है. अब माकपा नेता समाजवाद और वर्ग
राजनीति की भाषा में बात नहीं करते हैं. मार्क्सवाद को उद्धृत करते हैं,
उसे अश्लील करने के लिए. पूंजीवादी विकास - मार्ग को 'रिजेक्ट' कर ही
सच्चा मार्क्सवादी हुआ जा सकता है. रणधीर सिंह प्रश्र्न करते हैं कि
समाजवादी सिद्धांतों की रोशनी में पश्र्िचम बंगाल में क्या किया जा सकता
है और क्या नहीं किया जा सकता हैङ्क्ष अच्छी सरकार एक हाथ में सितार और
दूसरे में हथियार नहीं रखती.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ नंदीग्राम : माकपा मार्क्सवाद को अश्लील कर रही है ”

  2. By ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ on November 25, 2007 at 11:27 AM

    आपकी बातें सत्य हैं। नंदीग्राम में जो कुछ हो रहा है, वह सर्वथा अक्षम्य है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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