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बीच सफ़हे की लड़ाई

हमारे सवालों से आप डरते क्यों हैं अंकल

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/14/2007 01:46:00 AM

मन्नू हमारी एक प्यारी-सी साथी है. वह अभी छठे क्लास में पढ़ती है. उसके पास सवालों की कभी कमी नहीं रहती और चीज़ों को अपने तरीके से देखने की ललक भी उसमें खूब है. बाल दिवस के दिन उसके कुछ सवाल, आप और हम सबके लिए.


मनु साक्षी
ज के बच्चे अनेक सवालों से घिरे हैं. इन सवालों का पता आप हमारी चुप्पी, हमारे तनाव और डरे हुए चेहरे से लगा सकते हैं. आप पायेंगे कि हमारी कोमलता नष्ट हो रही है.
हम आज पाते हैं कि बड़ों को, जो हमारे अभिभावक हैं, शिक्षक हैं और पूरा समाज ही है, अब बच्चों की शरारतें, नटखटपन और मासूमियत पसंद नहीं है. सब लोग हमें जल्दी से परिपक्व, तेज और सबसे अधिक धूर्त बनाने की कोशिशों में लगे हुए हैं.

सरकार ने बच्चों को मजदूरी करने के काम में लगाये जाने से रोकने के लिए कानून बनाये हैं. हमने इसको लेकर प्रचार भी देखे हैं. लेकिन उनमें यह रास्ता नहीं बताया जाता है कि उनका पेट कैसे भरेगा. अगर लोगों को जीने के लिए आसानी से चीजें मिल जायेंगीं तो उनके बच्चे मजदूरी क्यों करेंगे? लेकिन जब सरकार खुद 60-70 रुपये मजदूरी देती हो तो फिर बच्चों को काम पर जाने से कैसे रोका जा सकता है? और बहुतों को तो वह भी नहीं मिलता.

मैं पिछले साल अपने गांव गयी थी. वहां के स्कूल में अक्सर पढ़ाई बंद रहती है. शिक्षक दूसरे कामों में लगा दिये जाते हैं. जब स्कूल चलता है तो वे आधे से ज्यादा दिन खाने की व्यवस्था में ही लगे रहते हैं.

बच्चों की शिक्षा से जुड़ी एक और बात बताती हूं. मेरी एक परिचित नूतन दीदी एनजीओ के प्रोजेक्ट में काम करती थीं. वे बता रही थीं कि वहां पढ़ानेवाले शिक्षकों को 300 से 400 रुपये मासिक वेतन मिलता है. शहर से देहात में फैले हजारों प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों को हजार-1500 रुपया मासिक वेतन मिलता है. यानी इन्हें सरकार की न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर पढ़ाना पड़ता है. लेकिन हमसे फीस तो भारी-भरकम ली जाती है. अब शिक्षक का ध्यान पढ़ाने में लगेगा या यह सोचने में कि शाम को उसके घर का चूल्हा कैसे जलेगा?

खुद टीचर जिस स्कूल में पढ़ाते हैं, वहां अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते. हमारी एक आंटी केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाती हैं, लेकिन उनकी बच्ची डीपीएस में पढ़ती है.

अक्सर ऐसी तसवीरें पत्रिकाओं-अखबारों में देखने को मिलती हैं, जिनमें भूख से चिल्लाते, हाथ फैलाये भोजन मांगते बच्चे दिखते हैं. जब पूरी दुनिया में इतना अनाज पैदा हो रहा है कि खेत परती रखने के लिए सरकार मुआवजा देती है, अनाज समुद्र में फेंका जा रहा है, गोदामों का अनाज सड़ रहा है और उसे चूहे खा रहे हैं, तब करोड़ों बच्चे भूख पेट क्यों सोते हैं?

हम पर पढ़ाई और कैरियर का दबाव है. हम खुशी से खेल नहीं पाते. कुल मिला कर हम दुखी और उदास हैं. क्यों? हम में से बहुतेरे सवाल करने की हिम्मत करते हैं. और जब हम ऐसा करते हैं तब बड़े लोग, अभिभावक और शिक्षक पहले तो कन्नी काटते हैं, टाल-मटोल का सहारा लेते हैं, लेकिन बार-बार वही पूछने पर हमें डांट कर चुप करा दिया जाता है. पता नहीं क्यों हमारे अभिभावक हमसे डरने लगते हैं. क्या आप आज के दिन हमारी पीड़ा से जुड़े इन सवालों के जवाब देंगे?

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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