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बीच सफ़हे की लड़ाई

रात के विरुद्ध, प्रात के लिए...

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2007 12:20:00 AM





















पको अपने बचपन की दीपावली याद है? आपने अपने पास-पड़ोस के कुम्हारों को सिर पर हाथ रखे यों दीपावली को बीत जाते कब देखा था?

इस दीपावली पर, पिछले कुछ सालों की ही तरह बाजार में सस्ते और प्राय: विदेशी खिलौनों, मूर्तियों की भरमार है. और कहने की जरूरत नहीं है कि इसने देश के उन लाखों लोगों के धंधों को चौपट कर दिया है, जो उनकी आजीविका के साधन थे.
और यह सिर्फ दीपावली की बात नहीं है.
बाजार ने हमारे लिए पर्व-त्योहारों के जो नये अर्थ दिये हैं, उनमें मनुष्य और उसकी गरिमा कहीं नहीं है. बाजार जिस उत्सव में शामिल है, वह सिर्फ मुनाफे का उत्सव है. अगर आप इसे दूसरे शब्दों में देखना चाहें तो कुछ आंकड़ों पर गौर करें. पिछले एक साल में देश भर में 22 करोड़ लीटर शराब पी गयी है. डांस, बार और पबों में एक हजार से 50 हजार रुपये तक एक आदमी द्वारा खर्च कर दिये जाते हैं- सिर्फ एक घंटे की मौज-मस्ती पर. अनेक महानगरों में नाइट क्लबों में प्रवेश की फीस 10 हजार रुपये तक है. फाइव स्टार पार्टियों में हरेक व्यक्ति पर तीन से 10 हजार तक का खर्च आता है. देश का लॉटरी बाजार 250 अरब रुपये का है. भारत में जुए का बाज़ार 500 अरब रुपये का और विलासिता की सामग्री का बाजार 64,000 करोड़ रुपये का है.

दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक आबादी घोर विपन्नता और गरीबी के अंधकार में जी रही है. सीमांत पर जी रहे ये करोड़ों लोग उत्सव में शामिल तो हैं, पर उनके पास इसका कोई उल्लास अब नहीं बचा रह गया है. इससे व्यापक आबादी में क्षोभ और काफी हद तक हताशा भी पैदा हुई है.

देश में बड़ी मात्रा में आ रही वित्तीय पूंजी ने, कारपोरेट चालित मीडिया ने और लगातार घटते अवसरों ने यह मानस गढ़ने की कोशिश की है कि अब सट्टे के जरिये, लॉटरी और ऐसे ही तमाम हथकंडों के जरिये अमीर बना जा सकता है या बना जाना ही चाहिए. यह लोगों को एक लंबी और अंधी सुरंग में दाखिल कर देने जैसा है.

इसलिए दीपावली की खुशियां ज्यादा रोशनी से भरी हों, जिंदगी की राहों में और अधिक उजाला हो और हमारे दिन अपने उल्लास से भरे-पूरे हों-इसके लिए बाजार के गणित और उसके मुनाफे के चक्रव्यूह से अपने त्योहारों को निकालने की कोशिश हो.

आइए, इस दीपावली में हम वे दीप रोशन करें जो रात से इस लड़ाई में सवेरा होने तक हमारा साथ दें.

आप सबको दीपावली की ढेरों शुभकामनाएं.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ रात के विरुद्ध, प्रात के लिए... ”

  2. By परमजीत बाली on November 9, 2007 at 1:23 AM

    दिवाली मुबारक!

  3. By Udan Tashtari on November 9, 2007 at 2:10 AM

    आप एवं आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं।

  4. By Ek ziddi dhun on November 11, 2007 at 10:43 PM

    celebration ke vaikalpik tareeke develop karne zaroori hai.n...yoon bhi tyohar behad brahmnical hai.n, ashleelta ki had tak

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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