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बीच सफ़हे की लड़ाई

किसान के संघर्ष में आज की कविता नहीं है उसके साथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/08/2007 12:57:00 AM

कवि अष्टभुजा शुक्ल की कविताओं पर बात करने का मतलब है किसान जीवन के राग-विराग, दुख-सुख और उनके संघर्षों पर बात करना. शुक्ल गांव-गंवई की संवेदना और संभावनाओं से इतने गहरे तक जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग से इन पर सोचना नहीं पड़ता. वे खेती करते हैं, चैत के बादलों को कोसते हैं और हाथा भी मारते हैं. कुछ माह पहले एक काव्य पाठ के सिलसिले में पटना आये अष्टभुजा शुक्ल. प्रस्तुत है कवि से दो बातचीत. एक तो वह है जो मैंने की थी, दूसरी बातचीत बीबीसी हिंदी के मणिकांत ठाकुर ने की थी. (बीबीसी से साभार)

शुरुआत शुरू से ही करते हैं. आपके लेखन की शुरुआत कब से हुई?

तारीख या वर्ष याद नहीं है. लिखने और पढ़ने में, मतलब साहित्य में रुचि प्रारंभ से ही कुछ रही है. उसके तहत पढ़ता था, पढ़ते हुए लगा कि लिखना भी चाहिए. छात्र जीवन था, उस वक्त. मैंने जिक्र भी किया है कहीं कि छंदों में जो गीतात्मक छंद हैं- आंसू के तर्ज पर, उस तरह से लिखता था पहले. छुपा-छुपा कर रखता था. लोगों को पढ़ाने की तत्परता नहीं थी. अब भी वह तत्परता नहीं है.
और उसमें रसीले गन्ने और ताड़ीवान कब दाखिल हुए?
हमारा परिवेश ग्राम्यजीवन का परिवेश है. बचपन में हम कुल्हड़ में अनाज ले जाते थे, ताड़ीवान के पास, बाग में. ताड़ीवान को अनाज देकर बदले में ताड़ी लाते थे. हम देखते कि वह कितनी ऊंचाई पर गया है. जब वह उतरता तो पेड़ को प्रणाम करता, मानों एक खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच कर उतर आया हो. तब उसका जीवन मुझे अलग, खास लगता था. हमें उसका ऊंचाई पर जाना आकर्षित करता था.
लोग कहते हैं कि जड़ों की ओर लौटो. मैं तो जड़ों में ही पड़ा हुआ हूं, अलग से जड़ों की ओर जाने की जरूरत कभी पड़ी नहीं. हम तो रोजाना के भुक्तभोगी हैं. हम गन्ने की फसल गोरने जाते थे, तो पत्तों से शरीर में धारियां पड़ जाती थीं. फिर गुड़ के पकने की सुगंध जो थी, वह भी अपनी ओर खींचती थी. अब तो कोल्हू खत्म होते जा रहे हैं और मिलें गन्ना पेर भी नहीं पा रही हैं.
पद-कुपद में गन्ने पर, कोयले पर कविताएं हैं. किसानों के जीवन से संबद्ध कविताएं हैं. मुझे किसान जीवन को याद करने की जरूरत नहीं पड़ती. मैं वही जीवन जीता हूं. किसान जीवन की संवेदना नयी कविता और आलोचना में कम होती गयी है.

आज की कविता में बल्कि पूरे साहित्य में किसानों की और ग्रामीण परिवेश की उपस्थिति से आप संतुष्ट हैं?
मैं संतुष्ट नहीं हूं. गुप्त ने जिस तरह किसानों को याद कि या था, उस समय अभिव्यक्ति के जो भी उपकरण थे, शैली थी, तादात्म्य था, उसमें. आज जो कविता है, वह किसान जीवन की समस्याओं पर लिखी ही नहीं जा रही है, जबकि यह आज की प्रमुख राष्ट्रीय समस्या है.
आपकी दृष्टि में इसकी वजह क्या हो सकती है?
इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती हैं. जमीनी लगाव और जमीनी संवेदना का अभाव है. लोग इसके बदले कृत्रिम संवेदना और लगाव के फांस में पड़े हुए हैं. किसान का आनंद तो छिन चुका है, पर उसके दुख और संघर्ष में उसका साथ देनेवाली कविताएं भी नहीं हो रहीं.
आज जो बिल्कुल नया कवि है, वह कवि बनने के लिए कविता लिखता है. जीवन जीने के लिए वह कविता नहीं लिखता. जीवन के स्रोतों से कटाव निरंतर जारी है-जो मूल स्रोत हैं. सुघड़ संवेदना की कविताएं, चिकनी-चुपड़ी संवेदना की कविताएं लिखी जा रही हैं.

आपने छंदों को नहीं छोड़ा है. उन्हें बरतते आये हैं अब भी.
निराला जी ने बड़ा क्रांतिकारी काम किया था कि परंपरागत छंद जो थे उन्हें तोड़ा, जान बूझ कर, मगर उन्होंने उनका निषेध भी नहीं किया. उन्होंने नये छंदों की बात की थी. अब के पाठक समझते हैं कि तुकांत ही छंद है. हरेक छंद कविता नहीं होता है. कविता के लिए संवेदना की जरूरत होती है, आंतरिक लय की जरूरत होती है.
कविता वाचन की चीज होती है-वह कागजी कार्रवाई नहीं होती. मगर आज कविता कागजी कार्रवाई की चीज हो गयी है. अब तो गद्य कविता की जा रही है. क्या कविता गद्य की कोई विधा है? कविता तो एक स्वतंत्र विधा है.

कविता को लेकर आपकी नजर में आज के समय के खतरे क्या हैं?
खतरे तो हैं और दोनों ओर से हैं. एक तो छंद और लय के नाम पर गीतों और गजलों की वापसी की बात की जा रही है. पहले से ही मानक गीत और गजलें इतनी लिखी जा चुकी हैं कि उनमें नया कुछ भी संभव नहीं है. हमें नये छंदों को निर्मित करना होगा. यह आवश्यक नहीं कि वह तुकांत हो.
राजेश्वर 11 वीं शताब्दी के आचार्य हुए दक्षिण के. उन्होंने लिखा था कि एक कवि ऐसे होते हैं, जिनकी कविता उनके घर में ही रह जाती है. एक दूसरी कोटि के कवि ऐसे होते हैं, जिनकी कविता मित्रों तक सीमित होती है. मगर तीसरी तरह की कविता जबान-जबान पर व्याप्त हो जाती है.
कहा जाता है कि कविता के पाठक, उसको समझनेवाले थोड़े ही रहे हैं, मानो वह कोई दड़बा हो. कविता की सबसे बड़ी ताकत उसकी व्याप्ति है. अगर यह व्याप्ति नहीं है तो वह गद्य का एक टुकड़ा होकर रह जायेगी.
अपने पढ़ने की प्रक्रिया के बारे में बताएं. आप क्या और किस तरह पढ़ते हैं?
कोशिश करता हूं कि जो मिल जाये उसे पढ़ डालूं. मेरी एक सीमा है कि मुझे पढ़ने को ही बहुत कम मिल पाता है. कविता का जहां तक सवाल है, हिंदी में तुलसी दास से बड़ा कवि नहीं मानता मैं किसी को, फिर निराला हैं और फिर नागार्जुन हैं. धूमिल मेरे प्रिय कवि हैं. जरूरी नहीं कि आज की तारीख तक आ जायें.

सुनिए अष्टभुजा शुक्ल से मणिकांत ठाकुर की बातचीत.








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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ किसान के संघर्ष में आज की कविता नहीं है उसके साथ ”

  2. By कौशलेंद्र मिश्र on July 19, 2008 at 3:11 PM

    सार्थक प्रयास है,निरंतर जारी रखें

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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