हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जो सच कह देगा वह रेशमा की तरह मारा जायेगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/03/2007 03:59:00 PM

एक गुंडा विधायक द्वारा पत्रकारों की पिटाई के संदर्भ में मेरी टिप्पणी पर प्रमोद रंजन की यह लंबी टिप्पणी प्राप्त हुई है. यह असल में एक स्वतंत्र पोस्ट का दर्जा रखती है, इसलिए इसे यहां डाला जा रहा है. इरादा है कि इसी बहाने भारत के मीडिया जगत के चरित्र पर एक बहस खडी़ हो.

भाई रेयाज जी,

आपकी टिप्पणी अच्छी लगी लेकिन इससे बिहार की पत्रकारिता असली चेहरा नहीं दिखता। हमाम के नंगेपन की पूरी सच्चाई कहने का हौसला तो शायद किसी में नहीं है।उस सच को भी जो पूरा कह देगा रेशमा खातून की तरह मारा जाएगा।

मीडिया की तटस्थता नासूर बन चुकी है। आज की मन:स्थिति में इस कथित तटस्थता के कारणों का विश्लेषण कर पाने की स्थिति में नहीं हूं , लेकिन जरा सोचिए, रेशमा की यह जो चिट्ठी आपने ब्लॉग पर दी है, पटना के मीडिया कार्यालयों में कई दिनों से घूम रही थी । बताया जा रहा है कि कुछ दफ्तरों में तो रेशमा और उसके भाई ने खुद जाकर यह पत्र संपादकों को सौंपा था। बार-बार बलत्कृत एक महिला को संपादकों को पत्र सौंपने के बाद वाली सुबह कैसा लगा होगा, जब उसने पाया होगा कहीं कुछ नहीं छपा? क्या गुजरी होगी उस पर, जब उसने जाना होगा कि उसकी जिंदगी के लिए अखबारों, समाचार चैनलों के पास एक पंक्ति की भी जगह नहीं है? क्या आप उसके तिल-तिल कर मरने की बेचैनी महसूस कर सकते हैं? अभी हम रेशमा के बारे में ज्यादा नहीं जानते पर शायद वह निम्न मध्यमवर्ग की, नौकरी की चाहत रखने वाली कोई मजबूर स्त्री थी। अन्य आम लोगों की तरह मीडिया पर उसका अथाह भरोसा था। वह अनंत सिंह की ताकत के सामने आत्मसमर्पण कर सकती थी। अगर वह उसके कहे अनुसार एक विधायक ( जो संभवत: राजद के एक विधान पार्षद हैं) पर बलात्कार का मुकदमा करती तो उसे पैसे भी मिल सकते थे लेकिन उसने मीडिया पर भरोसा किया। मुख्यमंत्री के नाम यह पत्र, जिसकी प्रति राबड़ी देवी व पुलिस अधिकारियों को भेजी गई है, निश्चित ही किसी पत्रकार की सलाह पर ही लिखा गया होगा । शायद वह भी आम लोगों की तरह थाना जाने की हिम्मत न कर पाई हो, अगर जाती तो उसका जिक्र पत्र में जरूर रहता, या गई भी हो तो वहां उसे उसकी और 'छोटे सरकार` (अनंत सिंह) की हैसियत का फर्क बता दिया गया होगा। सप्ताह में दो दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जनता दरबार सबके लिए खुला रहता है लेकिन वह वहां भी नहीं गई। जिस मुख्यमंत्री का अनंत सिंह को संरक्षण प्राप्त है, जिनके आवास में ही उसके असली आका रहते हैं, वहां मौजूद अनंत के गुर्गों की नजर से भी वह भला कैसे बचती? मीडिया दफ्तरों में जाकर उसने अपनी आपबीती सुनाई होगी तो उससे कहा गया होगा कि बिना प्रमाण के तो यह बातें प्रसारित नहीं हो सकतीं , एक उपाय है तुम मुख्यमंत्री व आला अधिकारियों के नाम पत्र लिखो। उसकी प्रतिलिपि मीडिया को दो तो उस हवाले से खबर छप सकती है। आप भी जानते हैं कि तटस्थता का ढ़ोंग करने वाली पत्रकारिता का यह पुराना स्टंट है। लेकिन खबर नहीं छपी क्योंकि वह जिस आदमी से संबधित थी वह अनंत सिंह था। अनंत सिंह, मतलब सूबे का सबसे बड़ा हत्यारा, हथियारों के सबसे बड़े जखीरे का मालिक, नीतीश कुमार के साथलालू प्रसाद का भी खासमखास। इतना ही नहीं, बिहारी पत्रकारिता के एक खास पावरफुल तबके का भी गॉडफादर।
आज अनंत सिंह द्वारा पत्रकारों की पिटाई की घटना पर पटना के एक अखबार में पहले पन्ने पर एक सेवानिवृत सम्मानित पत्रकार (व्यक्तिगत रूप से मैं भी उनके लेखन से तथ्य संग्रह की बारीकियां सीखता रहा हूं) की टिप्पणी छपी है 'कब तक पिटते रहेंगे प्रकाश सिंह`! उन्होंने लिखा हैं '' प्रकाश सिंह ने तो खबर संग्रह के क्रम में प्रताड़ना झेली है,पर यह कम लोगों को पता होगा कि मीडिया का एक हिस्सा बाहुबलियों से जुड़ी खबरों को नजरअंदाज कर देता है। इस तरह बिहार में वास्तव में क्या हो रहा है, उनमें काफी कुछ जनता के सामने नहीं आ पाता। यह सब राजनीति के अपराधीकरण का परिणाम है।'' आह! कैसी विश्वसनीय बात लिखी है महोदय ने! राजनीति के अपराधीकरण से डरे बेचारे मीडियाकर्मी करें भी तो क्या? लेकिन क्या यह सच नहीं है कि पटना के जिस नं वन अखबार में उन्होंने अपनी उम्र लगा दी, उस अखबार के एचआरडी का सर्वोच्च अधिकारी अनंत सिंह की कोई बात नहीं टालता? 'छोटे सरकार` के आदेश पर वहां वर्षों से पत्रकारों की बहाली होती रही है? उसके आदेश से नियुक्त किए गए पत्रकार अब विभिन्न अखबारों में फैल गए हैं। मैं उनसे तो यह आशा नहीं करता कि वे इस उम्र मे पत्रकारों के उस दूसरे तबके के बारे में जानकारी देकर स्वयं को खतरे में डालें। परन्तु सच्चाई यह है कि बिहार में राजनीति का ही नहीं मीडिया का भी अपराधीकरण हो चुका है। जातिवाद तो खैर चरम पर है ही।
और यह जो राजद-लोजपा का आज बंद था, उससे बड़ा ढकोसला कुछ और नहीं हो सकता। अनंत सिंह जंगली खुंखारपन को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने वाले लालू प्रसाद ही रहे हैं। वह जिसकी कुछ महीने पहले मौत हुई,अनंत सिंह का बड़ा भाई दिलीप सिंह राजद का मंत्री था, उसकी अपनी कोई ताकत नहीं थी। लालू प्रसाद ने अनंत की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए ही उसके भाई को मंत्री बनाया था क्योंकि कई हत्याओं के आरोपी अनंत को कोर्ट की नजर में फरार रहना पड़ता था। बाढ-मोकामा इलाके का बच्चा-बच्चा जानता है कि वास्तव में लालू के कार्यकाल में 'छोटे सरकार` कभी फरार नहीं रहा, वह हमेशा अपने घर से इलाके पर राज करता रहा।
मुश्किल तब खड़ी हुई जब अनंत का एक मजबूत गुर्गा सूरज सिंह उर्फ सूरजभान सिंह अजीत सरकार हत्याकांड में जेल चला गया। कहा जाता है उस समय सूरजभान को अनंत ने मदद नहीं की। दोनों में अदावत बढ़ी और अंतत: सूरजभान अनंत सिंह के मंत्री भाई दिलीप सिंह के खिलाफ वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ा हो गया। दोनों ही भूमिहार जाति के थे इसलिए कड़ा मुकाबला हुआ लेकिन सूरजभान भारी मतों से जीत गया। चुंकि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे सूरजभान की जीत हुई थी इसलिए मोकामा इलाके मे वर्चस्व की दृष्टि से वह लालू प्रसाद के लिए महत्वपूर्ण था। इससे दिलीप सिंह का महत्व कम हुआ। अंतत: 2004में ऐसी स्थिति आई कि लालू प्रसाद ने अनंत सिंह के घर पर छापा मारने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स भेज दी। यह सब ठेठ लालू शैली मे चलता रहा ,ठीक शाहबुद्दीन मामले की तरह कभी मार कभी प्यार शैली में। इसी बीच लालू ने दिलीप सिंह को बिधान परिषद् का सदस्य भी बना दिया। लेकिन अनंत शाहबुद्दीन की तरह राजनीतिक बुद्धि का अपराधी` नही रहा है, उसे लालूजी का यह अंदाज पसंद नहीं आया सो उसने ललन सिंह की रहनुमाई में नीतीश कुमार का दामन थाम लिया। नीतीश कुमार को लगा कि वह उन्हें बाढ़ लोकसभा से चुनाव जीतने में मदद कर सकता है। नीतीशजी को अनंत सिंह द्वारा चांदी के सिक्कों से तौले जाने की खबर तो आपको भी याद होगी रेयाज भाई।
इसलिए यह अनायास नहीं है कि आज पत्रकारों की पिटाई की घटना के विरोध में बंद करवाने पटना के डाकबंगला चौराहे पर लोजपा का सांसद सूरजभान सिंह सबसे पहले पहुंचा था। इस अपराधी सांसद के पिछले सात वर्षों के राजनीतिक जीवन में नेताओं के साथ मंच साझेदारी के आलावा किसी और कार्यक्रम में शिरकत की खबर आपने नहीं देखी-सुनी होगी। लेकिन इस मामले में वह सुबह 8 बजे ही बंद करवाने पहुंच गया। क्या इसलिए कि उसे पत्रकारों की पिटाई की फिक्र है, या दर्जनों हत्याओं का यह आरोपी एक लड़की के बलात्कार से व्यथित हो गया? जाहिर है, नहीं। यह मोकामा टाल की बर्बर आपराधिक अदावत है जो राजनीति का नकाब ओढ़ कर अब सूबे की राजनीति में पहुंच चुकी है।

अभी बस इतना ही। व्यथित हूं कुछ और बातें मन में घुमड़ रहीं हैं पर कहने का मन नहीं बन पा रहा।

- प्रमोद रंजन

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ जो सच कह देगा वह रेशमा की तरह मारा जायेगा ”

  2. By रवीन्द्र प्रभात on November 3, 2007 at 5:43 PM

    सच हमेशा कड़वा होता है भाई , क्योंकि - झूठ के तेवर उधार होते हैं और सच बड़े ही धारदार होते हैं , बहुत सुंदर अभिव्यक्ति , बधाई !

  3. By काकेश on November 3, 2007 at 6:15 PM

    एक सच को नंगा करती यह टिप्पणी. यह विचारणीय है कि तथाकथित मीडिया किस के लिये काम कर रहा है. जब खुद के पत्रकार पिटते हैं तो सबकुछ याद आ जाता है लेकिन रेशमा जैसे ना मालूम कितने लोग ऎसे ही मारे जाते है. संवेदनशील उद्गार,

    http://kakesh.com

  4. By Manish on November 3, 2007 at 8:06 PM

    कम से कम आपने टिप्पणी के माध्यम से काफी कुछ साफ किया। बहुत बहुत शुक्रिया पर्दे के पीथे के सच को सामने लाने के लिए...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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