हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

थोथी संवेदना की उल्टी बंद कीजिए मित्रो

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2007 02:02:00 AM

ज ऐश्वर्य राय के 34 वें जन्मदिन की खुमारी में डूबे मीडिया के लिए एक खबर मानो उसका जायका खराब करने के लिए आयी. खबर चूंकि पत्रकारों से ही जुडी़ थी, सो मजबूरी थी, वरना उसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता था. बिहार के एक विधायक ने कुछ पत्रकारों की पिटाई कर दी है. यह नवधनाढ्य विधायक राज्य में आतंक का एक पर्याय सा बन गया है-और इसके बावजूद मुख्यमंत्री का खासमखास माना जाता है. यह कांड एक रेशमा नाम की एक युवती की हत्या के सिलसिले में विधायक का पक्ष जानने के लिए गये पत्रकारों के साथ हुआ.

अब इस पर हाय-हाय ज़ारी है.
मगर यह घटना अजीब नहीं है. समाज के हिस्से में यह आश्वस्ति गहरे तक पैठी हुई है कि वह कुछ भी करे, किसी भी तरह से पेश आये-उसे कुछ नहीं होगा. पूंजीपतियों के अलावा नव धनिक, राजनीतिक दलों के नेता, जातियों के क्षत्रप और प्रशासन से जुडे़ लोग इसमें शामिल हैं. जाहिर है-यह इस तंत्र द्वारा ही दी गयी छूट है और यह किसी कमजोरी के कारण नहीं है. बल्कि इस तंत्र की अनिवार्य परिणति इसी में होनी थी-होनी है.

और मीडिया इसमें इसका सहयोगी है-यह इस तंत्र का चौथा खंभा है. इसलिए मीडियाकर्मियों को इस पर नैतिकता की, लोकतंत्र की, आज़ादी की (अभिव्यक्ति की आज़ादी सहित) और अपने विशेषाधिकार की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं है. वे सब उसमें लिप्त हैं. बेशक, मैं समूचे पत्रकारिता जगत की बात नहीं कर रहा-कई हैं जो रोशनी की मीनार की तरह हैं-मगर पत्रकारिता पर वे हावी नहीं हैं. मैं उनकी बात कर रहा हूं जो हावी हैं. और वे वही हैं-जो ऐसे नेताओं की दलाली से लेकर उनके साथ कमीशन में हिस्सा तक बंटाते हैं. लगभग पूरा मीडिया जगत सरकार और प्रशासन का भोंपू बन गया है. सरकार बयान ज़ारी करती है और उसे देश की एक अरब जनता की राय मान लिया जाता है. पुलिस खबर प्लांट करती है और किसी को भी खतरनाक आतंकवादी-उग्रवादी-जनद्रोही मान लिया जाता है. ऐसा कौन करता है? अपने लिए आज़ादी और लोकतंत्र का अधिकार चाहनेवाले पत्रकार यह मानते हैं कि नहीं कि देश के उन लाखों लोगों को भी उन्हीं अधिकारों की मांग करने का अधिकार है? उनमें से कितने हैं-जो वास्तव में जनता का पक्ष लेकर लिखते-बोलते हैं? उनमें से कितने हैं जो जनता की लडा़इयों को समझते-बूझते हैं, उनसे हमदर्दी रखते हैं? उनमें से कितने हैं जो समस्याओं की जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते हैं-सतही और सनसनीखेज विवरणों से नफ़रत करते हैं?

इस घटना को लेकर भी जो सवाल उठाये जा रहे हैं-वे बहुत कुछ अगंभीर किस्म के हैं. और इसे सिर्फ़ बिहार से जोड़ कर देखा जा रहा है. हालत यह है कि कोई भी असली सवाल उठाना नहीं चाहता-वे सवाल, जिनसे शासक वर्ग को असहजता महसूस हो. हां वे सवाल करते हैं, और खूब करते हैं, मगर उसी तरह के जैसे कि मदारी अपने जमूरे से करता है-तमाशा खत्म न हो और रोचकता बनी रहे. एक तमाशा है जो चल रहा है.

और ऐसे में जब एक विधायक कुछ पत्रकारों को पीट देता है तो इसमें अजीब क्या है. क्या आप कह सकते हैं कि उसने कितनों की हत्याएं की होंगीं? आप क्या कर रहे थे उस वक्त? इसके पहले गुमनाम हत्याएं हुईं. कई पिटाए होंगे. आप आज पिटा गये तो कह रहे हैं कि यह गुंडा है. नहीं पिटाते तो आपमें से ही कई, उसी विधायक के डाइनिंग हाल में बैठ कर चाय पीते और लिफ़ाफ़े लेते.

जिस युवती की हत्या का मामला था, उसने कुछ दिन पहले एक चिट्ठी लिखी-सारे अखबारों और प्रशासन को, मुख्यमंत्री सहित. और उसकी हत्या कर ही दी गयी. कितने अखबारों ने उस पत्र की नोटिस ली? कितनों ने उसके बारे में एक भी लाइन छापी? चैनलों ने कितने सेकेंड उस पर दिये?

...और अंत में वह मार डाली गयी.

थोथी संवेदना, सतही हैरतंगेजपन और निरर्थक सवालों की उल्टी बंद कीजिए मित्रो. आपने पूरे स्पेस को घृणित बदबू से भर दिया है. कम से कम आज के दिन ही सही, सही सवालों के साथ सही नज़रिये से देखना, सोचना, बोलना शुरू कीजिए. वरना एक दिन, हमारी-आपकी ऐसी पिटाइयों पर संवेदना जतानेवाला भी कोई नहीं रहेगा.


प्रस्तुत है रेशमा का पत्र. इसकी भाषा, त्रुटियों के बावजूद ज्यों की त्यों रखी गयी है.

माननीय मुख्यमंत्री, बिहार
महाशय
आपके सुशासन में भी आप ही के पार्टी के जदयु विधायक अनंत कुमार सिंह, बिल्डर मुकेश सिंह एवं सुरक्षा गार्ड विपिन सिंह द्वारा मेरा बलात्कार हुआ एवं मुझे रोज जान से मार डालने की धमकी दी जा रही है.

बिल्डर मुकेश सिंह के पास नौकरी के सिलसिले के लिए गयी थी. पहले मुकेश सिंह नौकरी दिलाने के नाम पर मेरा बलात्कार किया. बिल्डर मुकेश सिंह, विधायक अनंत सिंह का एक मकान बंदर बगीचा के पास बनवा रहे थे. वहीं पर उस मकान का मैनेजर बनाने का लोभ दे कर मेरे साथ बलात्कार किये. फिर विधायक अनंत सिंह के सरकारी डेरा पर ले जाकर नौकरी के बहाने विधायक जी भी मेरा दो बार बलात्कार किये. उसके बाद उनका अंगरक्षक विपिन सिंह दूसरे कमरे में ले जाकर बलात्कार किया. उसके बाद यह प्रक्रिया लगातार चलती रही. बात गोपनीय रखने के लिए मुझे जान से मार डालने के लिए धमकी दी गयी है.

दिनांक 10.10.07 को सुबह 9.00 बजे मुकेश सिंह मुझे लेकर विधायक अनंत सिंह के पास फिर नौकरी का बहाना ले कर गये. विधायक अनंत सिंह एवं मुकेश सिंह उनके कसरत करनेवाले मशीन के रूम के बगल के रूम में ले गये थे. वहां ले जाकर पलंग पर से चादर उठाया. पूरे पलंग पर नोटों की गड्डी थी. अनंत सिंह बोले, जितना रुपया लेबे के हो तो ला. बदले में एक स्थानीय विधान पार्षद एवं उनके भाई पर तोरा रेप केस करे परतो, नहीं त तोरा जान मार देबऊ.

दो दीन का समय ले कर किसी तरह वहां से निकल गये.

अब लगता है अनंत सिंह एवं मुकेश सिंह तथा विपिन सिंह किसी भी समय मुझे मार देंगे. हो सकता है कि मेरा पत्र आपके पास पहुंचते-पहुंचते मारी ही जाऊं. अगर मैं मारी गयी तो मुख्यमंत्री जी आपको अपने बेटे की कसम है, मेरे तीनों हत्यारों अनंत सिंह, मुकेश सिंह एवं विपिन सिंह को सख्त से सख्त सजा दिलवायेंगे. अनंत सिंह आपको भी बहुत गाली देता है.

आपकी विश्वासभाजन
अभागी रेशमा

प्रतिलिपि : राबड़ी देवी, एडीजी अभयानंद, आइजी-पटना, डीआइजी-पटना, वरीय आरक्षी अधीक्षक -पटना, आजतक न्यूज चैनल, एनडीटीवी, सहारा न्यूज, जी न्यूज, हिंदुस्तान दैनिक, जागरण, आज, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स.
सभी पत्रकार बंधुओं से एक अभागीन बहन का निवेदन है. अगर मेरी हत्या हो जाती है तो मेरी हत्या के जिम्मेदार विधायक अनंत सिंह एवं सुरक्षा गार्ड विपिन सिंह को फांसी पर जरूर लटकाइयेगा.

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  1. 8 टिप्पणियां: Responses to “ थोथी संवेदना की उल्टी बंद कीजिए मित्रो ”

  2. By Udan Tashtari on November 2, 2007 at 5:22 AM

    दुखद एवं निन्दनीय घटना.

  3. By अनूप शुक्ल on November 2, 2007 at 7:54 AM

    बेहद अफ़सोस जनक!

  4. By masijeevi on November 2, 2007 at 8:02 AM

    उफ्फ

  5. By बाल किशन on November 2, 2007 at 2:12 PM

    शर्मनाक.घोर शर्मनाक.

  6. By Sanjeet Tripathi on November 2, 2007 at 5:08 PM

    दिक्कत यही है कि दूसरे शब्दों मे कहें तो मीडिया तब तब इस बात का नोटिस नही लेगा जब तक कि अनपेक्षित(?) न घट जाए!!

  7. By anitakumar on November 2, 2007 at 6:47 PM

    कल जब हम टी वी पर ये कबर देख रहे थे तो सोच रहे थे कि कोई न कोई ब्लोगर भाई तो जरुर इसकी सच्चाई को लिखेगा और अभी ही लिखेगा…आप की इस पोस्ट पर आप को बधाई। …एक दम सही कहा आपने…ये मीडिया वाले तभी जागते है जब खुद पर बन आती है

  8. By Sagar Chand Nahar on November 2, 2007 at 9:41 PM

    बहुत ही दुखद हुआ परन्तु मुझे नहीं लगता कि नीतीश कुमार; अनंत कुमार का कुछ बिगाड़ पायेंगे।
    आपने आज यह लेख बहुत ही जबरदस्त लिखा है, आपने कड़वा सच लिखा है। किसी की पक्षपात नहीं की और किसी को नहीं छोड़ा।
    बिल्कुल सही लिखा।॥दस्तक॥
    गीतों की महफिल

  9. By pramod ranjan on November 3, 2007 at 12:57 AM

    भाई रेयाज जी,

    आपकी टिप्पणी अच्छी लगी लेकिन इससे बिहार की पत्रकारिता असली चेहरा नहीं दिखता। हमाम के नंगेपन की पूरी सच्चाई कहने का हौसला तो शायद किसी में नहीं है।उस सच को भी जो पूरा कह देगा रेशमा खातून की तरह मारा जाएगा।

    मीडिया की तटस्थता नासूर बन चुकी है। आज की मन:स्थिति में इस कथित तटस्थता के कारणों का विश्लेषण कर पाने की स्थिति में नहीं हूं , लेकिन जरा सोचिए, रेशमा की यह जो चिट्ठी आपने ब्लॉग पर दी है, पटना के मीडिया कार्यालयों में कई दिनों से घूम रही थी । बताया जा रहा है कि कुछ दफ्तरों में तो रेशमा और उसके भाई ने खुद जाकर यह पत्र संपादकों को सौंपा था। बार-बार बलत्कृत एक महिला को संपादकों को पत्र सौंपने के बाद वाली सुबह कैसा लगा होगा, जब उसने पाया होगा कहीं कुछ नहीं छपा? क्या गुजरी होगी उस पर, जब उसने जाना होगा कि उसकी जिंदगी के लिए अखबारों, समाचार चैनलों के पास एक पंक्ति की भी जगह नहीं है? क्‍या आप उसके तिल-तिल कर मरने की बेचैनी महसूस कर सकते हैं? अभी हम रेशमा के बारे में ज्यादा नहीं जानते पर शायद वह निम्न मध्यमवर्ग की, नौकरी की चाहत रखने वाली कोई मजबूर स्त्री थी। अन्य आम लोगों की तरह मीडिया पर उसका अथाह भरोसा था। वह अनंत सिंह की ताकत के सामने आत्मसमर्पण कर सकती थी। अगर वह उसके कहे अनुसार एक विधायक ( जो संभवत: राजद के एक विधान पार्षद हैं) पर बलात्कार का मुकदमा करती तो उसे पैसे भी मिल सकते थे लेकिन उसने मीडिया पर भरोसा किया। मुख्यमंत्री के नाम यह पत्र, जिसकी प्रति राबड़ी देवी व पुलिस अधिकारियों को भेजी गई है, निश्चित ही किसी पत्रकार की सलाह पर ही लिखा गया होगा । शायद वह भी आम लोगों की तरह थाना जाने की हिम्मत न कर पाई हो, अगर जाती तो उसका जिक्र पत्र में जरूर रहता, या गई भी हो तो वहां उसे उसकी और 'छोटे सरकार` (अनंत सिंह) की हैसियत का फर्क बता दिया गया होगा। सप्ताह में दो दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जनता दरबार सबके लिए खुला रहता है लेकिन वह वहां भी नहीं गई। जिस मुख्यमंत्री का अनंत सिंह को संरक्षण प्राप्त है, जिनके आवास में ही उसके असली आका रहते हैं, वहां मौजूद अनंत के गुर्गों की नजर से भी वह भला कैसे बचती? मीडिया दफ्तरों में जाकर उसने अपनी आपबीती सुनाई होगी तो उससे कहा गया होगा कि बिना प्रमाण के तो यह बातें प्रसारित नहीं हो सकतीं , एक उपाय है तुम मुख्यमंत्री व आला अधिकारियों के नाम पत्र लिखो। उसकी प्रतिलिपि मीडिया को दो तो उस हवाले से खबर छप सकती है। आप भी जानते हैं कि तटस्थता का ढ़ोंग करने वाली पत्रकारिता का यह पुराना स्टंट है। लेकिन खबर नहीं छपी क्योंकि वह जिस आदमी से संबधित थी वह अनंत सिंह था। अनंत सिंह, मतलब सूबे का सबसे बड़ा हत्यारा, हथियारों के सबसे बड़े जखीरे का मालिक, नीतीश कुमार के साथलालू प्रसाद का भी खासमखास। इतना ही नहीं, बिहारी पत्रकारिता के एक खास पावरफुल तबके का भी गॉडफादर।

    आज अनंत सिंह द्वारा पत्रकारों की पिटाई की घटना पर पटना के एक अखबार में पहले पन्ने पर एक सेवानिवृत सम्मानित पत्रकार (व्यक्तिगत रूप से मैं भी उनके लेखन से तथ्य संग्रह की बारीकियां सीखता रहा हूं) की टिप्पणी छपी है 'कब तक पिटते रहेंगे प्रकाश सिंह`! उन्होंने लिखा हैं '' प्रकाश सिंह ने तो खबर संग्रह के क्रम में प्रताड़ना झेली है,पर यह कम लोगों को पता होगा कि मीडिया का एक हिस्सा बाहुबलियों से जुड़ी खबरों को नजरअंदाज कर देता है। इस तरह बिहार में वास्तव में क्या हो रहा है, उनमें काफी कुछ जनता के सामने नहीं आ पाता। यह सब राजनीति के अपराधीकरण का परिणाम है।'' आह! कैसी विश्वसनीय बात लिखी है महोदय ने! राजनीति के अपराधीकरण से डरे बेचारे मीडियाकर्मी करें भी तो क्या? लेकिन क्या यह सच नहीं है कि पटना के जिस नं वन अखबार में उन्होंने अपनी उम्र लगा दी, उस अखबार के एचआरडी का सर्वोच्च अधिकारी अनंत सिंह की कोई बात नहीं टालता? 'छोटे सरकार` के आदेश पर वहां वर्षों से पत्रकारों की बहाली होती रही है? उसके आदेश से नियुक्त किए गए पत्रकार अब विभिन्न अखबारों में फैल गए हैं। मैं उनसे तो यह आशा नहीं करता ि‍क वे इस उम्र मे पत्रकारों के उस दूसरे तबके के बारे में जानकारी देकर स्‍वयं को खतरे में डालें। परन्‍तु सच्चाई यह है कि बिहार में राजनीति का ही नहीं मीडिया का भी अपराधीकरण हो चुका है। जातिवाद तो खैर चरम पर है ही।

    और यह जो राजद-लोजपा का आज बंद था, उससे बड़ा ढकोसला कुछ और नहीं हो सकता। अनंत सिंह जंगली खुंखारपन को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने वाले लालू प्रसाद ही रहे हैं। वह जिसकी कुछ महीने पहले मौत हुई,अनंत सिंह का बड़ा भाई दिलीप सिंह राजद का मंत्री था, उसकी अपनी कोई ताकत नहीं थी। लालू प्रसाद ने अनंत की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए ही उसके भाई को मंत्री बनाया था क्योंकि कई हत्याओं के आरोपी अनंत को कोर्ट की नजर में फरार रहना पड़ता था। बाढ-मोकामा इलाके का बच्चा-बच्‍चा जानता है कि वास्तव में लालू के कार्यकाल में 'छोटे सरकार` कभी फरार नहीं रहा, वह हमेशा अपने घर से इलाके पर राज करता रहा।
    मुश्किल तब खड़ी हुई जब अनंत का एक मजबूत गुर्गा सूरज सिंह उर्फ सूरजभान सिंह अजीत सरकार हत्याकांड में जेल चला गया। कहा जाता है उस समय सूरजभान को अनंत ने मदद नहीं की। दोनों में अदावत बढ़ी और अंतत: सूरजभान अनंत सिंह के मंत्री भाई दिलीप सिंह के खिलाफ वर्ष २००० के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ा हो गया। दोनों ही भूमिहार जाति के थे इसलिए कड़ा मुकाबला हुआ लेकिन सूरजभान भारी मतों से जीत गया। चुंकि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे सूरजभान की जीत हुई थी इसलिए मोकामा इलाके मे वर्चस्व की ि‍ दृ ष्‍ट से वह लालू प्रसाद के लिए महत्वपूर्ण था। इससे दिलीप सिंह का महत्व कम हुआ। अंतत: २००४ में ऐसी स्थिति आई कि लालू प्रसाद ने अनंत सिंह के घर पर छापा मारने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स भेज दी। यह सब ठेठ लालू शैली मे चलता रहा ,ठीक शाहबुद्दीन मामले की तरह कभी मार कभी प्यार शैली में। इसी बीच लालू ने दिलीप सिंह को बिधान परिषद् का सदस्य भी बना दिया। लेकिन अनंत शाहबुद्दीन की तरह राजनीतिक बुद्धि का अपराधी` नही रहा है, उसे लालूजी का यह अंदाज पसंद नहीं आया सो उसने ललन सिंह की रहनुमाई में नीतीश कुमार का दामन थाम लिया। नीतीश कुमार को लगा कि वह उन्हें बाढ़ लोकसभा से चुनाव जीतने में मदद कर सकता है। नीतीशजी को अनंत सिंह द्वारा चांदी के सिक्कों से तौले जाने की खबर तो आपको भी याद होगी रेयाज भाई।

    इसलिए यह अनायास नहीं है कि आज पत्रकारों की पिटाई की घटना के विरोध में बंद करवाने पटना के डाकबंगला चौराहे पर लोजपा का सांसद सूरजभान सिंह सबसे पहले पहुंचा था। इस अपराधी सांसद के पिछले सात वर्षों के राजनीतिक जीवन में नेताओं के साथ मंच साझेदारी के आलावा किसी और कार्यक्रम में शिरकत की खबर आपने नहीं देखी-सुनी होगी। लेकिन इस मामले में वह सुबह ८ बजे ही बंद करवाने पहुंच गया। क्या इसलिए कि उसे पत्रकारों की पिटाई की फिक्र है, या दर्जनों हत्याओं का यह आरोपी एक लड़की के बलात्कार से व्यथित हो गया? जाहिर है, नहीं। यह मोकामा टाल की बर्बर आपराधिक अदावत है जो राजनीति का नकाब ओढ़ कर अब सूबे की राजनीति में पहुंच चुकी है।

    अभी बस इतना ही। व्यथित हूं कुछ और बातें मन में घुमड़ रहीं हैं पर कहने का मन नहीं बन पा रहा।

    - प्रमोद रंजन

    Pramod Ranjan

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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