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रूसी क्रांति के 90 साल : समाजवाद का सपना ज़िंदा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/07/2007 12:53:00 AM

वह दुनिया की पहली क्रांति थी जो पहले से तारीख तय करके हुई थी. लेनिन ने कहा था-6 नवंबर वक्त से पहले होगा... और 8 नवंबर तक वक्त बीत चुका होगा. हमें 7 नवंबर को कार्रवाई शुरू करनी होगी. और क्रांति 7 को शुरू हुई.

विचारधाराओं और इतिहास के अंत की दंभपूर्ण घोषणाओं के दौर में रूस की संगठित सर्वहारा क्रांति ने 90 वर्ष पूरे किये. यह वह दौर है जब 'द इकोनॉमिस्ट' में लंबे-लंबे लेख इन प्रस्थापनाओं के साथ प्रकाशित हो रहे हैं कि एक विचार के बतौर समाजवाद सबसे उन्नत है, लेकिन इसका कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है. यहां तक दावे किये जा रहे हैं कि लेनिन का प्रयोग मार्क्सवाद से एक भटकाव था.
अब रूसी क्रांति के 90 सालों के बाद, जब उस क्रांति द्वारा स्थापित हुआ सोवियत संघ भी अब अस्तित्व में न हो, इकोनॉमिस्ट का यह कहना यह दिखाता है कि मार्क्सवाद का भय किस कदर बना हुआ है.

20 वीं सदी की शुरुआत, 19वीं सदी के अंत की तरह सर्वहारा के संघर्ष से हुई, जिसके साथ मार्क्सवाद का क्रांतिकारी वैचारिक आधार था और जिसे अंतरराष्ट्रीय तौर पर लेनिन जैसे नेता का नेतृत्व हासिल था. लेनिन ने पूंजीवाद के स्थायी रूप से संकटग्रस्त होने की बात करते हुए कहा कि पूंजीवाद का अल्पकालिक संकट अब एक निरंतर संकट के दौर में प्रवेश कर गया है, जो अंतत: पूंजीवाद के अंत पर जाकर समाप्त होगा. इसे उन्होंने पूंजीवाद की उच्च्तम अवस्था कहा, जहां से आगे जाना संभव नहीं है, बस उसका अवसान और अंत ही संभव है.

लेनिन को सुनिए : सोवियत सत्ता क्या है










(इस आडियो में लेनिन सोवियत सत्ता के बारे में बता रहे हैं. यह आडियो लेनिन के उन 13 भाषणों में से है जो ग्रामोफोन पर रिकार्ड किये गये थे. भाषण का टेक्स्ट पढ़ने के लिए यहां आएं.)
हालांकि लेनिन की क्रांति संबंधी कार्यनीतियों को अनेक कम्युनिस्ट नेताओं ने ही चुनौती दी, मगर अंतत: लेनिन सही साबित हुए. उनके नेतृत्व में सर्वहारा ने क्रांति की.

एक ऐसे समय में जब दुनिया के साम्राज्यवादी देश दुनिया पर कब्जे के लिए युद्ध कर रहे थे और मुनाफे के लिए मारामारी के बीच जनता भयानक और त्रासद गरीबी में जी रही थी, क्रांति ने दुनिया की एक बड़ी आबादी को मुनाफाखोरों के कब्जे से निकाल लिया. हालांकि दो ही दशकों के भीतर दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ और इसमें सोवियत जनता को काफी जान-माल की क्षति उठानी पड़ी. लेकिन इसी के साथ यह उपलब्धि भी सोवियत जनता की ही थी कि उसने फासीवाद से दुनिया को बचाया.

रूसी क्रांति की कुछ तसवीरें
मगर जल्दी ही, स्टालिन के बाद के सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी पर स्टालिनविरोधी ताकतों का कब्जा हो गया. काउत्स्कीपंथी और स्टालिनविरोधी ताकतें हावी हुईं. उनकी कारगुजारियों ने अंतत: सोवियत संघ का विघटन करके छोड़ा. यह विघटन उनके पूंजीवाद का पतन था न कि लेनिन और मार्क्स की विचारधारा का.

माओ-त्से-तुंग ने लेनिन की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए चीन में सांस्कृतिक क्रांति की और उसे और अद्यतित किया. मगर माओ के बाद के चीन में भी ऐसी शक्तियां हावी हुईं, जिन्होंने चीन को बाजार के आगे दंडवत कर दिया है.
तो क्या इससे यह साबित होता है कि अब समाजवाद की उम्मीद खत्म हो गयी? वह विफल हो गया? दरअसल इन घटनाओं से सिर्फ यह साबित होता है कि समाजवाद को जैसे ही मेहनतकश जनता से अलग किया जायेगा, वह खत्म हो जायेगा. इन दोनों असफलताओं ने मार्क्स और लेनिन को और ज्यादा सही साबित किया है.

और आज के दौर में, जब एफडीआइ-एफआइआइ के रूप में पूंजी का आयात-निर्यात अपने सबसे विकराल रूप में हमारे सामने है, एमएनसी-टीएनसी पूरे व्यापार का नियंत्रण कर रहे हैं और साम्राज्यवाद अपने संकट से निकलने के लिए एक के बाद एक देश पर युद्ध थोपता जा रहा है-लेनिन और मार्क्स उतने ही अपरिहार्य लग रहे हैं. जिस महामंदी से पूंजीवाद को कीन्स ने निकाला था, 70 के दशक से वह फिर हावी हो गया है. यह इसलिए अधिक खतरनाक है, क्योंकि इससे निबटने के सारे कीन्सीय औजार विफल हो गये हैं.

और ठीक इसी समय दुनिया के अनेक देशों में जनता का प्रतिरोध तेज हो रहा है. पूरा एशिया और लैटिन अमेरिका जनता के विद्रोहों के केंद्र बनते जा रहे हैं. पूंजी का इतना असमान वितरण हुआ है कि मात्र एक प्रतिशत लोग दुनिया की आधी से अधिक संपत्ति के स्वामी हैं.

और ऐसे में समाजवाद का सपना जिंदा है, क्योंकि उसे अभी संसाधनों का, आमदनी का, अवसरों का और सामाजिक न्याय का समाज में समान बंटवारा करना है-वह सब करना है जिसे आज तक की कथित उदारवादी आर्थिक नीतियां करने में विफल रही हैं. उसे उत्पादन को इस तरह समायोजित करना है कि पूरे समुदाय की जरूरतों को पूरा करे, न कि मुनाफे का माध्यम बने.

सोवियत संघ खत्म हो गया, मगर इससे क्रांति समाप्त नहीं हुई. चिड़िया घोंसला बनाती है और आंधियां उसे उड़ा ले जाती हैं. मगर इससे चिड़िया के लिए घोंसले की उपयोगिता-अनिवार्यता खत्म नहीं हो जाती. उसे बार-बार घोंसला बनाना पड़ता है. बस, इससे वह यह सीखती है कि उसे और बेहतर घोंसला बनाना है. इसलिए यह इतिहास के अंत का नहीं, जनता द्वारा स्वर्णिम इतिहास के निर्माण का दौर है.


देखिए, रूसी क्रांति पर आइजेंस्टाइन की मशहूर फ़िल्म अक्टूबर





देखिए, क्रांति पूर्व रूसी मज़दूरों और सैनिकों की दयनीय दशा, फ़िल्म पीटर्सबर्ग का अंत

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ रूसी क्रांति के 90 साल : समाजवाद का सपना ज़िंदा है ”

  2. By संदीप on November 8, 2007 at 9:14 PM

    शशिप्रकाश्‍ा की कविता की पंक्तियां उधार लेकर कहें तो :

    उन्‍हें कहने दीजिए
    कि क्रांतियां मर गयीं

    जिनका स्‍वर्ग है इसी व्‍यस्‍था के भीतर।

    करने दीजिए इतिहास के अंत की

    अंतहीन बकवास।

    द इकोनॉमिस्‍ट जैसों द्वारा समाजवाद के निरर्थक साबित करने के प्रयास और कुछ नहीं, सिवाय इसके कि पूंजीपतियों को साम्‍यवाद का हौवा सताता रहता है, इसलिए सबसे ज्‍यादा किसी के खिलाफ लिखा ज्‍यादा है तो वह है मार्क्‍सवाद और सर्वहारा क्रांति। और चूंकि मीडिया का इसी मुनाफाखोर व्‍यवस्‍था का अंग है और उसका उद्देश्‍य भी सामाजिक परिवर्तन न होकर मुनाफा ही है, तो उससे इसके अतिरिक्‍त कोई उम्‍मीद की भी नहीं जा सकती। क्रांतियों और मानवता की कुर्बानियों की इस तरह की याददिहानी भी ऐसे ठंडे समय में बेहद जरूरी है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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