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लालू की रैली : सरकार से असहमत जनता का सैलाब

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2007 12:46:00 AM

लालू प्रसाद का आकर्षण बिहार में कम नहीं हुआ है-आज की रैली ने यह एक बार फिर साबित किया. यह लालू की सत्ता के बाहर रहते पहली रैली थी-पिछले 17 सालों में पहली बार लालू विपक्षी पार्टी के नेता के तौर पर लोगों के सामने थे-और वह भी ऐसे समय में जब वर्तमान सरकार को भी अभी बहुत दिन न हुए हों-वह ठीक से अभी दो साल की भी न हुई हो-लालू के लिए इतनी बडी़ भीड़ का जुटना और इतनी शालीनता से जुटना दिखाता है कि लालू का आधार खिसका नहीं है. पहले की रैलियों को देखें तो एक बात और दिखी-इस बार प्रबंधन पर ध्यान दिया गया और बेतरतीबी और हुड़दंग नाम को नहीं था. कुमार अनिल की टिप्पणी.

कुमार अनिल
चेतावनी रैली लालू प्रसाद की पिछली रैलियों से कई मायनों में भिन्न थी. लाठी-बंदूकवाले नेता इस बार नजर नहीं आ रहे थे. इस बार उच्छृंखलता बिल्कुल नहीं थी. यह छोटे किसानों-भूमिहीनों की बड़ी रैली थी. गरीब जनता की शालीन राजनीतिक दावेदारी थी.

खुद लालू भी बदले-बदले से नजर आये. उन्होंने हंसी-ठहाके के बहुत कम मौके दिये. उनका भाषण कुछ बिखरा बिखरा- सा था. स्वाभाविक भी था-आखिर वे 17 वर्षों के बाद विपक्ष के नेता के बतौर बोल रहे थे. ऐसा इसलिए भी था कि वे आज उस पक्षी की भूमिका में थे, जो किसी आंधी में अपने घोंसले के उजड़ जाने के बाद फिर से तिनका-तिनका जोड़ता है. लालू ने अपना भाषण गुजरात के मुसलिम विरोधी दंगे से शुरू किया, पर वे जानते हैं कि आज सिर्फ सांप्रदायिक दंगे से सुरक्षा का वादा करके मुसलमानों को नहीं जीता सकता. वे सच्चर कमीशन की सिफारिशों की चर्चा करते हैं. वे दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति की सुविधा देने की बात बताना भी नहीं भूलते. उन्होंने ऊंची जाति को बार-बार संदेश दिया कि वे सबको लेकर चलना चाहते हैं. आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने ब्रह्मर्षि समाज (भूमिहारों) को बधाई देने के साथ ही कायस्थ समाज को भी रैली में आने के लिए बधाई दी. वे पिछड़ावाद को छोड़े बगैर ऊंची जाति को अपने साथ लाने के लिए बार-बार संतुलन बिठाते दिखे. शंकर प्रसाद टेकरीवाल, रामचंद्र पूर्वे, प्रेमचंद गुप्त व राजनीति प्रसाद को प्रमुखता दी गयी. पिछड़े, मुसलमानों, दलितों व अतिपिछड़ों के अलावा ब्रह्मर्षि, कायस्थ व बनिया समाज पर लालू की विशेष नजर थी. वे यह बताने में सफल रहे कि रैली सिर्फ यादवों की रैली नहीं है.
15 वर्षों के उनके शासन पर निकम्मेपन का आरोप लगता रहा है. उन्होंने रेलवे के जरिये अपने किये जा रहे कामों का विशेष उल्लेख किया. परसा, मढ़ौरा, मधेपुरा, मोकामा, मुजफ्फरपुर व गढ़हरा में रेलवे के खुलनेवाले कारखानों के जरिये उन्होंने अपनी नयी छवि पेश करने की कोशिश की. उन्होंने रोजगार व पलायन जैसे मुद्दों की चर्चा की, जो कभी उन्हीं की आलोचना के लिए पेश किये जाते थे. पुलिसिया अत्याचार, बीपीएल कार्ड व इंदिरा आवास पर भी वे खूब बोले. कभी लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच वर्ष इंतजार नहीं करतीं. वर्षों से यह उक्ति विपक्ष को ताकत देती रही है. लालू ने भी इस ऐतिहासिक उक्ति का इस्तेमाल करते हुए कहा कि चेतावनी रैली के बाद जल्द ही वे `भगावन रैली' करेंगे. पर इस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए जिस रणनीतिक नारे की जरूरत होती है, वह लालू प्रसाद नहीं बता सके. किसी भी बदलाव के लिए नारे की जरूरत होती है. नारे में ही निहित होता है राजनीतिक दर्शन. कभी इंदिरा ने `गरीबी हटाओ' का नारा दिया था. 1977 का नारा तानाशाही के विरुद्ध लोकशाही था. खुद लालू के खिलाफ एनडीए ने जंगलराज हटाओ का नारा दिया था. कई बार वे हमला करने के बजाय सफाई देते लगे. साफ है कि जिस पिछडा़वाद के जबरदस्त उभार ने लालू प्रसाद को भारतीय राजनीति में स्थापित कर दिया था, अब 90 के दशक का वह दौर भी नहीं है. नयी परिस्थितियों में नयी चुनौतियों का सामना करना अभी बाकी है. हालांकि नारे नेता की उपज नहीं होते, उन्हें परिस्थितियां ही जन्म देती हैं-और यह बेहद स्वाभाविक था कि लालू अभी चीजों को देख रहे हैं. अभी उनके लिए नया नारा देना संभव नहीं है-क्योंकि नये हालात ने अभी ठोस स्वरूप अख्तियार नहीं किया है.
रैली के प्रभावों-संदेशों पर चर्चाएं होती रहेंगीं, लेकिन अभी इतना तो साफ़ है कि रैली सफल रही और बिहार की राजनीति में यह रैली एक नया मोड़ साबित होगी.
तसवीरें मनीष और अमृत की.

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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