हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

संत और सिपाही में देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/26/2007 12:43:00 AM


दखलवाले चंद्रिका भाई की यह रिपोर्ट भारत के शासक वर्ग के चरित्र, संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों के शासकवर्गीय रवैये और जुझारू जनता की हिम्मत को एक ही साथ रेखांकित करती है. कालिख उन लोगों के मुंह पर, जो भूखे लोगों से शांति और अहिंसा की मांग करते हैं और शासकों के लिए हिंसा को आरक्षित कर देते हैं.





चंद्रिका
यह वक्त घबराये हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं

और न यह पूछने का
कि संत और सिपाही में
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!

खबार के पन्ने पर जो खबर 29 जुलाई को छायी हुई थी, उससे बेपरवाह, होटल के नौकर ने टेबल पर गिरी चाय को पोंछकर डस्टबिन में फेक दिया. चौराहे के कचड़े से गाय ने उठा कर अपने जबड़ों में उसे निगल लिया. मूंगफली बेचनेवाले के ठोंगों से होती हुई वह खबर किसी दरवाजे के पास पड़ी थी, जिस पर कुत्ते ने मूत दिया. ट्रेन के डब्बे में वह पढ़ने के बाद बिस्तर बनी. झाडू लगानेवाले ने उसे बुहार कर तेज रफ्तार से दौड़ती ट्रेन की पटरियों पर गिराया और वह हवा में धूल के साथ देर तक उड़ती रही.
खबर थी मोदी गोंडा में पुलिस की गोलियों से भूने गये उन लोगों की जो शांतिपूर्वक धरने पर बैठे हुए थे. मसला था 170 एकड़ जमीन का जो सरकारी कब्जे में थी.
दस हजार की आबादीवाले इस मण्डल में कुल 24 गाँव है, यहाँ के लोग मुख्यतः कृषि पर निर्भर हैं. दरअसल बात यहां से शुरू की जाये जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राज्य से शांति वार्ता के दौरान इस जमीन को भूमिहीनों में बांटने की मांग की. उनकी यह मांग पूरी न हो सकी. अलबत्ता अन्य पार्टियों व उनके कार्यकर्त्ताओं की नजर इस पर जरूर गड़ गयी. कुछ माह बाद जमीन का 35 एकड़ कांग्रेस समर्थकों व कार्यकर्त्ताओं द्वारा जोत लिया गया, जिस पर कोई आवाज इसलिए नहीं उठी, क्योंकि सरकार कांग्रेस की थी. तत्पश्चात मोदी गोंड़ा के प्रधान, जो कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के सदस्य हैं, के कुछ कार्यकर्त्ताओं व समर्थकों ने भी 16 जुलाई को कुछ जमीन जोतनी शुरू की, मनाही होने पर वे 21 जुलाई को धरने पर बैठे. धरने को बेअसर देखते हुए 24 जुलाई से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की. 27 को हुए लाठी चार्ज के विरोध में 28 जुलाई को बंद का आह्वान किया. बंद को असरदार बनाने के लिए सड़क पर वाहनों को न चलने देने का फैसला लिया गया. 28 को दोपहर 12 बजे के आसपास पुलिस की एक टुकड़ी ने आकर 1 घटे के अंदर प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया. धरने पर बैठे लोग अपनी मांगों को लेकर अडिग रहे. फिर पुलिस द्वारा लाठी चार्ज शुरू किया गया. जवाब में लोगों ने पत्थर फेंकना शुरू किया तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, जिससे सात लोग मारे गये, कई लोग घायल हुए. 20 लोगों की सूची घायलों में उपलब्ध हो पायी.
लोगों द्वारा पुलिस के खिलाफ थाने में एफआइआर जैसी हास्यास्पद कार्रवाई की गयी, पर एफआइआर नामंजूर कर दिया गया. उल्टा पुलिस ने ही लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज किया. कुछ समय बाद एपीसीएलसी (आंध्रप्रदेश सिविल लिबर्टी कमेटी) ने किसी तरह से एक एफआइआर दर्ज करवाया, जिस पर सिवाय एक-दो तबादलों के कोई कार्यवाही नहीं हुई.
यह एक संक्षिप्त घटनाक्रम था, जिसकी तफ़्तीश के लिए हम हैदराबाद से सुबह पाँच बजे निकले. हम कुल सात लोग थे, 220 किमी की यात्रा तय कर हमें खम्मम पहुंचना था. जहाँ से 15 किमी दूरी पर बसा था मोदी गोंडा मंडल, सड़क के चारो तरफ टीलानुमा पहाड़िया थीं. सड़क के किनारे खेतों में कपास की फसलें लगी हुई थीं. हमारी गाड़ी में कोई तेलगू धुन बज रही थी, जिसमें बीच-2 में अंगरेज़ी के शब्दों की भी दखलंदाजी थी. झोंपड़पट्टी, भूख, गरीबी, असमानता को देख कर भारत की अखंडता में एकता का एहसास हो रहा था, जो कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर तक सर्वव्याप्त है. तस्वीरों को अपनी आंखों में संजोते हुए तीन घंटे का रास्ता तय करके हम खम्मम के लेनिन नगर कस्बे में पहुंचे, जहां से हमारे साथ कुछ शिक्षक, वकील मोदी गोंडा के लिए रवाना हुए. इनको साथ में लेने के पीछे कारण यह था कि हम गांववालों की तेलगू समझ सकें.
अब हम उस चौराहे पर थे, जहां लोगों को कुछ दिन पूर्व गोलियों से भूना गया था. चौराहे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के झंडे लगे हुए थे, जिसके नीचे सार्ट-कट में सीपीएमजेडएनबी लिखा हुआ था (कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद). किनारे पर आंबेडकर की मूर्ति लगी थी, जो एक हाथ उठा कर आसमान की तरफ इशारा कर रही थी, जिसे हम नहीं समझ सके. चारों तरफ से लोगों ने हमें घेर लिया. लोग हमें घटनाओं का ब्योरा दे रहे थे.
शर्मीला जी, जिनकी म्युजिक की दुकान है, जिसके बगल में ही लोग धरने पर बैठे हुए थे, हमें अपनी दुकान के नजदीक ले गयीं. उन्होंने अपनी दुकान की शटर बंद करके गोलियों के छर्रों से शटर में हुए छेद और निशान दिखाये. गोलियों से टूटे पीसीओ के शीशे भी दिखाये.
हमने आसपास की सभी दुकानों के कांउटर, बाक्स व अन्य सामान में गोलियों के निशान देखे. जगह-2 दीवालों के पलस्तर टूट गये थे.
चौराहे पर, घटना के दौरान मारे गये लोगों की याद में एक 38 फुट ऊंचा स्मारक बनाया गया था. यह 20 फुट लंबे व 20 फुट चौड़े आधार पर गुंबदनुमा निर्माण था. इसमें घटना में मारे गये, उन सात लोगों की तस्वीरें मढ़ी गयी थीं और नीचे उनके नाम लिखे हुए थे. गांव के एक व्यक्ति ने तेलुगू में लिखे उन नामों को पढ़ कर सुनाया जो इस प्रकार थे (उसकेला गोपया, वनका गोपीया, चिट्दूरीबाबू राव, छगम बाला स्वामी, एलागन तुला वीरन्ना, कट्टूला पेदूदा लक्ष्मी, पुस्थलति कुटुम्बराव). इन सात लोगों में छह लोग घटनास्थल पर ही मारे गये, जबकि छगम बाला स्वामी ने 31 जुलाई को अस्पताल में दर्द से कराहते हुए दम तोड़ा.
स्मारक के बगल में उन 16 लोगों के भी नाम थे, जो इस घटना में घायल हुए थे. लोगों ने हमें बताया कि 300 से 400 गोलियां पुलिस द्वारा चलायी गयीं. हम स्मारक में जड़े गये उन सात मृतकों के चित्र देख रहे थे.
रमेश, जिसकी उम्र तकरीबन 15 साल होगी, ने हमें बताया कि उसकी मां बट्टू राम बाई के पैर में गोली लगी है, जिससे उनके पैर में स्टील की छड़ डाली गयी है वे अब चल नहीं सकतीं. चौराहे पर वे ठेला लगा कर केले बेचती थीं. पिता उपेन्द्र, जो दूध बेचते हैं, अब घर का काम देखते हैं. रमेश ने हमसे पूछा कि क्या मैं उसे कोई नौकरी दिला सकता हूं! चौराहे से 100 मी की दूरी पर कोटेश्वर राव का घर था, जिनके हाथ में गोली लगी थी और स्टील की छड़ से उसे बांधा गया था. कोटेश्वर ने हमें बताया कि पहली गोली उनकी शर्ट की जेब पर लगी, जेब में डायरी रखी हुई थी, जिससे वे बच गये. उन्होंने वह डायरी दिखायी, जो फट गयी थी. कोटेश्वर कह रहे थे कि डायरी न होती तो उस स्मारक में मेरा भी फोटो लगा होता.
हम घटना में मृत वीरन्ना की पत्नी उषा से मिले उषा 28 वर्ष की एक दुबली-पतली महिला है, जिनके आंखों के आंसू सूख चुके थे, पर तबाही के मंजर व पति के मृत होने का दर्द अभी-भी किसी कोने में छुपा था. उषा अपने 3 व 4 वर्ष के बच्चों के साथ इस वक्त अपने बहन के घर में रहती थी. उषा ने हमें बताया कि वीरन्ना धरने में शामिल नहीं थे. हादसे के वक्त वे देखने के लिए घर से गये थे और नाहक ही मारे गये.
चौराहे के बगल में भाकपा (संसदवादी) के आफिस में हम गये. हंसिए-हथौड़े का एक बड़ा चिह्न दीवाल पर लाल रंग से पेंट किया हुआ था. चिह्न देख कर नंदीग्राम की याद आ गयी, जहां हंसिया किसानों का गला काटने व हथौड़ा मजदूरों का सिर कुचलने पर उतारू था.
आफिस में हमें घटना के समय कैमरे में कैद की गयी कुछ तस्वीरें दिखायी गयीं. लोगों की अफरा-तफरी, रोते-कराहते चेहरों के साथ फोटो मौन थे. कोई चीख नहीं थी, कोई आवाज नहीं थी.
कैमरे में कैद किये गये चित्रों को तारतम्यता से घटनानुसार रखा गया था- खेत जोतते किसानों के चित्र,, धरने पर बैठे लोग, भूख हड़ताल पर बैठे लोग, बंदी के दिन शांतिपूर्वक बैठे लोग, पुलिस के साथ बातचीत करते लोग, पुलिस की गोलियों से भूने जाते लोग, एसएलआर और एके 47 लिये सिविल ड्रेस में पुलिस, इसके बाद सड़क पर बिखरी लाशें थीं. एक फोटो ऐसा था जिसमें छह लाशों को एक साथ रखा गया था, उन्हे भाकपा (संसदवादी) के झंडे से लपेटा गया था. उसे देख कर यह लगा कि इन पार्टियों के लिए लाश भी वोट मांगेगी. कल उनके बड़े-2 बैनर बनेंगे, सड़क, चौराहे, मुहल्ले, गलियों में वे चिपकाये जायेंगे. गोपीया, बाबू राव, लक्ष्मी, वीरन्ना सब इनके लिए वोट मांगने का काम करेंगे.
मृतकों को पांच लाख रूपये व घायलों को 50 हजार रू की राशि सरकार के द्वारा विभिन्न तरीकों से बांटी गयी, लेकिन लोगों के यह सवाल भी थे कि क्या जिंदगी की कीमत पैसे से तौली जा सकती है? क्या गोपीय, वीरन्ना को 6 लाख रू में लौटाया जा सकता है? क्या कागज के टुकड़ों से उषा के आंसू व दर्द पोंछे जा सकते हैं? क्या दमन व हत्या पुलिस की आदत बन चुकी है? धमाके की अवाज वहां नहीं थी. बीते हुए कल के साथ लोगों ने घटना को अपने घरों में, बच्चों ने अपनी चीखों में, सड़क ने अपनी धूल के नीचे दबा दिया था. तबाही के बाद सब कुछ शांत था. स्मारक पर एक दिया जलते-2 बुछ चुका था जिसकी राख इधर-उधर बिखरी हुई थी.

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ संत और सिपाही में देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है! ”

  2. By अजित on October 26, 2007 at 3:58 AM

    दरअसल कोई प्रश्नवाचक चिह्न नहीं है। कोई सवाल नहीं है। दोनों ज़रूरी हैं दोनो ज़रूरत थे और हैं। सवाल ईमान का है। ईमान कहां कायम है ? फिर संत और सिपाही ही नहीं मुंसिफ, अहलकार, समाजसेवी,नेता, शिक्षक, दाना और नादाँ सब इसमें शामिल हैं । यही सबसे बड़ी समस्या है। मगर ऐसा करने से शीर्षक बहुत लंबा हो जाएगा।

  3. By अनुनाद सिंह on October 26, 2007 at 9:15 AM

    किस 'देश' के लिये? हिन्दुस्तान के लिये या पाकिस्तान के लिये?

  4. By Raviratlami on October 26, 2007 at 12:25 PM

    भारत के संबंध में तो दोनों एक से बढ़कर एक खतरनाक हैं! दोनों ही सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत वसूली के लिए काम करते हैं.

  5. By Rajesh on October 28, 2007 at 6:47 AM

    देशभर में भूमि बंदोबस्त की जरूरत है.किसानी पर निर्भर लोगों को खाली जमीनें न्याय के साथ बांटे जाना चाहिए. उद्योगों को भूमि उपलब्ध कराने में तत्परता नजर आती रही है. व्यावसायी ऊंची कीमत पर पारम्परिक खेतों को खरीद कर इनकम टैक्स बचाने के लिए इस्तेमाल कर रहे है. आन्ध्रप्रदेश ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान में यह समस्या गहराती जा रही है.
    राजेश अग्रवाल, बिलासपुर छत्तीसगढ़

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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