हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नरसंहारों के लिए नोबेल पुरस्कार

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/24/2007 11:45:00 PM

















रेयाज उल हक


र्यावरण के लिए आंदोलन और नरसंहार में क्या समानता हो सकती है? युद्ध और शांति में क्या समानता हो सकती है? मार्टिन लूथर किंग, मदर टेरेसा, दलाई लामा, आन सांग सू की और अल गोर में क्या समानता हो सकती है? और ऐसे में नोबेल शांति पुरस्कार का क्या मतलब है, जब वह जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में किये गये उल्लेखनीय कार्य के लिए दिया जाये? शायद बच्चें का सामूहिक नरसंहार? या शायद कोसर पैदा करनेवाले रसायनों का आबादियों के ऊपर हवाई छिड़काव?

आप क्या पसंद करेंगे?
नोबल पुरस्कार समिति का कहना है कि अलगोर को यह सम्मान उनकी जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संषर्घ को लेकर दृढ़ प्रतिबद्धता के लिए दिया गया है।

मगर क्या यहीं आप उत्तर पूर्वी कोलंबिया के ऊष्ण कटिबंधीय जंगलों के मूल निवासियों से अल गोर की इस प्रतिबद्धता का मतलब नहीं जानना चाहेंगे?
यह सही है कि माइकल जैक्सन और शकीरा की आवाजें ज्यादा सुरीली हैं और हालीवुड की फिल्में सप्ताहांत के मनोरंजन के लिए अधिक पसंद की जाती हैं, मगर इन बेहद गर्म जंगलों में बसनेवाले मूल निवासियों से मिला जा सकता है।

असल में अल गोर अपने पुराने 'प्रतिद्वंद्वी' जार्ज बुश की तरह ही एक काबिल बाप के काबिल बेटे हैं। अल गोर के पिता अल्बर्ट गोर (सीनियर) एक तेल कंपनी के निदेशक मंडल में रहे। ऑक्सीडेंटल पेट्रोलियम (संक्षेप में ऑक्सी) नाम की इस कंपनी के संस्थापक अर्मांड हैमर के वे करीबी मित्र थे। हैमर ने उन्हें यह ओहदा अमेरिकी सीनेट से उनके रिटायरमेंट के बाद दिया। अल्बर्ट गोर की कुल जायदाद ऑक्सी के शेयरों सहित करोड़ों डॉलर की थी और उनके बेटे अल गोर भी कंपनी से भारी आर्थिक मदद पाते रहे हैं।

मगर इस तरह की कोई भी मदद कारपोरेट जगत तभी देता है जब उसे किसी तरह के लाभ की उम्मीद हो। अल गोर ने बदले में कंपनी की भरपूर मदद की। जब वे अमेरिका के उप राष्ट्रपति थे, उन्होंने कोलंबिया योजना को लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। कुख्यात कोलंबिया योजना के बारे में वैसे तो बताया गया कि वह मादक द्रव्य के व्यापार के खिलाफ एक सैन्य अभियान थी, मगर असल में उसका उद्देश्य राष्ट्र पर अमेरिकी नियंत्रण के विस्तार के लिए स्थानीय लोगों के प्रतिरोध को कुचलना था। अमेरिका की नशीली दवाओं के विरुद्ध युद्ध और कोलंबिया योजना के तार आपस में जुड़े हुए थे और अमेरिका ने यह पूरा अभियान ही लैटिन अमेरिका में अपने प्रभुत्व के विस्तार के लिए छेड़ा था। अब यह कोई ढंकी-छुपी बात नहीं है। नोम चोम्स्की समेत अनेक टिप्पणीकार इस पर विस्तार से लिख चुके हैं।

ऑक्सी इस कोलंबिया योजना के उत्साही प्रस्तावकों में से थी, जो अमेरिकी सैन्य अभियानों का अब भी फायदा उठा रही है। इसके बाद अमेरिकी सेना के ठेकेदारों ने पाइपलाइन की सुरक्षा के लिए आसपास की आबादी को उनकी जमीन से खदेड़ दिया और कोका उन्मूलन के नाम पर वहां अत्यधिक मात्रा में कार्सीनोजेनिक रसायनों का हवाई छिड़काव किया। इसका प्रतिरोध भी होता रहा है। १९९० के दशक में ५००० स्थानीय लोगों ने ऑक्सी को तेल निकालने के लिए जमीन की खुदाई करने से रोकने की कोशिश की।

ऑक्सी अकेली कंपनी नहीं है जो इस इलाके के प्राकृतिक संसाधनों के निर्बाध दोहन का अधिकार चाहती रही है। वह सिर्फ उनमें से एक है। एक्सन और बीपी समेत अनेक कंपनियों ने कोलंबिया के मूल निवासियों को उनकी जमीन पर से उजाड़ने के लिए अर्ध सैन्य बलों का सहारा लिया। इन मूल निवासियों को उनकी जमीन से उजाड़ कर उनसे कहा गया कि वे अमेजन में जाकर फिर से बस जायें।

अमेजन में बसने का मतलब जानने के लिए आपको रॉकेट विज्ञानी होने की जरूरत नहीं है। वहां बसने का मतलब है -बीमारियां, भुखमरी और त्रासद मृत्यु।

और इस तरह शांति के लिए प्रतिबद्ध अल गोर ने मूल कोलंबियनों को अमेजन में फिर से बसाने की योजनाओं पर काम किया और अपने पेट्रोकेमिकल मालिकों के लिए कोलंबिया की तेल से समृद्ध जमीन को खाली करवाया।

आप अगर अल गोर को मिले नोबेल शांति पुरस्कार में 'शांति' शब्द का मतलब जानना चाहते हैं तो कृपया इराक की एक सैर कीजिए। और वहां कब्रिस्तानों को देखना मत भूलिए। अल गोर उन १० डेमोक्रेट सीनेटरों में से एक थे, जिन्होंने १९९० में इराक के खिलाफ युद्ध के समर्थन में मत दिया था। वे उस प्रशासन के सेकेेंड इन कमांड थे, जिसने अमेरिकी सेना को सोमालिया, हैती और बोस्निया भेजा, कोलंबिया में हत्यारे गिरोहों (डेथ स्क्वाड) को धन दिया, इराक , अफगानिस्तान और सूडान पर बमबारी की। उनके प्रशासन द्वारा इराक पर लगाये गये प्रतिबंधों की वजह से पांच लाख इराकी बच्चों की मौत हुई और सर्बिया के खिलाफ विध्वंसक हवाई युद्ध छेड़ दिया गया।

१९९२ में आयी अपनी किताब 'बैलेंस इन द अर्थ' में वे पृथ्वी का विध्वंस करनेवाली ताकतों के रूप में वायु एवं जल प्रदूषण, मृदा क्षय, जंगलों का घटना, बढ़ती आबादी, ओजोन परत में छेद और ग्लोबल वार्मिंग को गिनाते हैं। गोर ने इस किताब में इस पर जोर दिया है कि आंतरिक दहनवाले इंजनों को प्रचलन से बाहर किया जाये। मगर जब वे उपराष्ट्रपति बने तो उन्होंने इस दिशा में कोई काम नहीं किया। इसके उलट जब वे इस पद पर आये तो उन्होंने पर्यावरण आंदोलन को नाफ्टा जैसी मजदूर विरोधी, पर्यावरण विरोधी बिजनेस संस्था के हाथ में सौंप दिया। उन्होंने १९९५ में स्पेंडिंग बिल का समर्थन किया, जिससे लाखों एकड़ वन काट डाले गये और इस कार्रवाई को दो सालों के लिए पर्यावरण और न्यायिक कानूनों द्वारा होनेवाली समीक्षा से छूट मिल गयी। उन्होंने क्लिंटन के साथ मिल कर दक्षिण फ्लोरिडा में चीनी के उद्योगपतियों को हजारों एकड़ जमीन के विनाश की अनुमति दी। उन्हें खाद्य पदार्थों को कोसरकारी तत्वों से बचानेवाले कानून में भी ढील दी।

१९७७ से १९८५ तक हाउस में, १९८५ से १९९३ तक सीनेट में और फिर इसके बाद उपराष्ट्रपति के रूप में अल गोर पेंटागन और रक्षा सामग्री के ठेकेदारों के हितों के लिए काम करते रहे। उन्होंने रक्षा खर्चों में कटौती का विरोध किया और ग्रेनेडा पर हमले तथा केंद्रीय अमेरिका में लड़ाइयों के समय रीगन प्रशासन का समर्थन किया। वे उस क्लिंटन प्रशासन में उपराष्ट्रपति थे, जिसने १९९० के दशक में युगोस्लाविया पर नाटो के जरिये हमला किया और जिसका विस्तार मध्य और पूर्वी यूरोप तक इसके बाजार, संसाधनों और सस्ते श्रम के लिए किया गया। कोसोवो में उन्होंने सर्बिया के खिलाफ कोसोवो लिबरेशन आर्मी नामक एक अर्ध्दसैन्य गिरोह के साथ सहयोग किया और उसके अनेक संगठित अपराधों को नजरअंदाज किया। इसके अलावा उन्होंने सद्दाम हुसैन का तख्ता पलटे जाने का समर्थन किया।

कारपोरेट मीडिया के इस दौर में इन तथ्यों से इसका कोई लेना-देना नहीं है कि न्यू जर्सी में सात प्रतिज्ञाएं लेनेवाले पर्यावरण के इस नये मसीहा द्वारा जलवायु परिवर्तन के नाम पर कितनी जबानी जमाखर्च की जाती रही है।

जब नोबेल कमेटी यह कहती है कि अल गोर संभवत: अकेले आदमी हैं, जिन्होंने दुनिया में (पर्यावरण संरक्षण संबंधी) कदमों को अपनाये जाने को लेकर महत्वपूर्ण विश्वव्यापी समझ बनाने का काम किया है, तो उसे बताये जाने की जरूरत है कि अल गोर खुद इसको लेकर कितने गंभीर हैं। अल गोर और उनकी पत्नी ऐसे दो बड़े घरों रहते हैं जहां बिजली की अत्यधिक खपत होती है। उनका एक घर नेशविले में १०००० वर्ग फुट का है, दूसरा आर्लिंगटन में ४००० वर्ग फुट का। इन दोनों जगहों पर कंपनियों ने पवनचालित ऊर्जा विकल्प प्रस्तुत किये हैं और अल गोर उन्हें आसानी से वहन भी कर सकते हैं, मगर इसमें उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखायी।

तो क्या यह समझा जाये कि नोबेल समिति इन तथ्यों से अनजान थी और उसने गलती से पर्यावरणविरोधी गतिविधियों में लिप्त एक युद्ध अपराधी को पर्यावरण संबंधी उसकी चिंताओं के लिए शांति पुरस्कार दिया है? कोई राय कायम करने से पहले कुछ और तथ्य जानने जरूरी हैं।

यह पहली बार नहीं है कि किसी युद्ध अपराधी को शांति का नोबेल सम्मान दिया गया है। इसके पहले वुड्रो विल्सन, जिमी कार्टर, हेनरी किसिंजर और थियोडोर रुजवेल्ट जैसे युद्ध, नरसंहारों और तानाशाहों के समर्थन के लिए कुख्यात अमेरिकी राष्ट्रपतियों को यह सम्मान दिया जा चुका है। इसके साथ ही इस्राइल के तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों शिमोन पेरेस, यित्जाक राबिन और मेनाकेम बेजिन को भी यह सम्मान हासिल हो चुका है। कोफी अन्नान को यह सम्मान उस दौर में मिला, जब उनके संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव रहते अफगानिस्तान और इराक पर नृशंस युद्ध थोप दिये गये।

हेनरी किसिंजर को १९७३ में नोबल सम्मान मिला। वियतनाम युद्ध के दौरान हेनरी किसिंजर अमेरिका के राष्ट्रपति थे। इस युद्ध में ४० लाख दक्षिण एशियाइयों की हत्या हुई। किसिंजर की चिली की लोकतांत्रिक सरकार के तख्ता पलट में सक्रिय भूमिका रही। उन्होंने लैटिन अमेरिकी तानाशाहों का भी समर्थन किया। किसिंजर ने सुहार्तो द्वारा पश्चिमी पापुआ को हथियाने और पूर्व तिमोर में लाखों लोगों की हत्याओं में उसकी सहायता की। उन्होंने खमेर रुज का समर्थन किया। किसिंजर ने बांग्लादेश की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट करवाने में सहयोग किया, जिसके कारण लगभग पांच लाख मौतें हुई।

कोफी अन्नान को यह सम्मान २००१ में एक 'बेहतर संगठित और शांतिपूर्ण विश्व' के लिए उनके योगदान के लिए दिया गया। मगर अन्नान का इतिहास जानना दिलचस्प है। वे एक समय न्यूयार्क में सचिवालय सेवा विभाग में कार्यरत थे। उस समय उन्हें विशेष राजनीतिक मामलों के विभाग ने मध्यपूर्व और अफ्रीका में अतिरिक्त प्रभार दिया था। उन्होंने अमेरिका द्वारा १९९० के शुरू में सोमालिया में सेना भेजे जाने की मांग का समर्थन किया। इसके बाद वे १९९३ तक शांतिरक्षक अभियानों के प्रभारी रहे। इस दौरान रवांडा में कत्लेआम की स्थिति पैदा हुई। उन्होंने अपनी जिम्मेवारी के तहत इसको रोकने की कोई कोशिश तो नहीं ही की, इसकी रोकथाम के लिए कोई कदम उठाये जाने से दूसरों को जहां तक हो सका रोका। इसके फलस्वरूप वहां लगभग आठ लाख हत्याएं हुई। उन्होंने सुरक्षा परषिद को भी इस नरसंहार की आशंका की जानकारी नहीं दी। इसके अलावा उन्होंने १९९५ में बोस्निया में सर्बों पर बमबारी के अमेरिकी कदम का समर्थन किया।
यह वही आदमी था, जिसने बाद में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के बतौर ली गयी इस शपथ, कि वह आनेवाली पीढ़ियों को युद्ध की त्रासदी से निजात दिलायेगा, मूलभूत मानवाधिकारों में आस्था को पुनर्स्थापित करेगा, न्याय की स्थितियों को स्थापित करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सशस्त्र सेना का उपयोग न हो, को उलट कर रख दिया। कोफी अन्नान ने इसके बरअक्स इराक पर आर्थिक प्रतिबंधों का समर्थन किया, जिसके फलस्वरूप १५ लाख इराकी मौत के शिकार हुए, जिनमें १० लाख ऐसे बच्चे थे, जिनकी उम्र पांच साल से कम थी। अन्नान ने २००३ में बुश प्रशासन द्वारा इराक पर कब्जे का समर्थन किया, जिसके दौरान ६ लाख से अधिक और मौतें हुई। उन्होंने अफगानिस्तान पर हमले का भी समर्थन किया। वे ईरान पर हमले की संभावनाओं के दौरान भी निरंतर खामोश रहे।

संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षक सेना को १९८८ में शांति का नोबेल अवार्ड दिया गया। यह एक ऐसी सेना है जो कभी भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुई। इस सेना को तनावग्रस्त इलाकों में भेजा जाता है, ताकि वह तनाव को कम करे और आम लोगों के लिए सुरक्षा और रोजमर्रा का जीवन सुनिश्चित कर सके, जब तक कि एक स्थानीय सरकार यह काम करने योग्य न हो जाये। १९४८ से अब तक ६० से अधिक ऐसे अभियानों में यह सेना लगायी गयी है और लगभग हर अभियान में यह या तो हमलावर या थोपी गयी सेना के रूप में पेश आयी। अंतत: शांतिरक्षक सेना जहां गयी, वहां उसने मदद की जगह नुकसान अधिक किया। इस्राइल में वह लगभग आधी सदी से तैनात है और यह सब जानते हैं कि वहां संकट सुलझने के बजाय उलझा ही है। यह वहां इस्राइल द्वारा मानवता के विरुद्ध किये जा रहे अपराधों को आंख मूंद कर देखती रही है।

तीनों इस्राइली प्रधानमंत्री, जिन्हें शांति सम्मान दिया गया-नृशंस हत्याओं और नस्लपरस्ती के लिए जाने जाते हैं। मेनाकेम बेजीन ने तो फलस्तीनियों को 'दो पांववाले जानवर' कहा था और उनका मानना था कि यहूदी स्वामी (मास्टर) नस्ल है और यह इस ग्रह पर दिव्य ईश्वर है। शिमोन पेरेस भी फलस्तीन के खिलाफ उग्र सैन्य कार्रवाइयों के लिए जाने जाते हैं।

इसलिए जब नोबल समिति अल गोर को शांति के लिए सम्मानित कर रही होती है तो वह असल में कोई गलती नहीं करती बल्कि वह अपने वास्तविक चारित्र को ही सामने रख रही होती है।

जहां तक अल गोर के पर्यावरण संबंधी सरोकारों का सवाल है, हम उस पर अब बात कर सकते हैं। जब वे जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में बात कर रहे होते हैं, वे पर्यावरण को पहुँच रहे खतरों के बुनियादी कारणों के बारे में बात करने में असफल रहते हैं-वह कारण है मुनाफे का अनियोजित और अराजक तंत्र। वे दरअसल एक पूंजीवादी राजनेता की तरह ही एपल, गूगल और दूसरी हाइटेक कंपनियों में हिस्सेदारियों से धनी हुए हैं। वे सिद्धांतत: और सामाजिक सरोकारों के नजरिये से भी इसके लिए अक्षम हैं कि जलवायु परिवर्तन के बारे में गंभीरता से बात कर सकें।

हम ऐसे मौके पर एक कोलंबिया के जंगलों के एक मूल निवासी के उन शब्दों को दोहरा सकते हैं, जो उसने अल गोर से कहे थे-आपकी खामोशी धरती और उस पर के जीवन की मौत का प्रतीक है।

पूरा पढिए.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ नरसंहारों के लिए नोबेल पुरस्कार ”

  2. By आलोक on October 25, 2007 at 3:39 AM

    यानी नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली!

    आलोक

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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