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राम का अस्तित्व और अयोध्या

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/19/2007 12:48:00 AM

क्या राम का वास्तव में कोई अस्तित्व था? क्या अयोध्या एक ऐतिहासिक नगरी है? प्रख्यात इतिहासकार राम शरण शर्मा अपने लंबे व्याख्यान के इस हिस्से में (और आगे के हिस्सों में भी) मुख्यतः इसकी चर्चा कर रहे हैं. सातवीं किस्त.

प्रो राम शरण शर्मा

तिहास में लूटपाट करनेवाले आमतौर कब्जे में आयी लूटपाट के मामले में अपने सभी उत्पीड़ितों से एक जैसा ही व्यवहार करते हैं. इसी तरह तैमूर ने मध्य एशिया में मुस्लिम आबादी पर उससे कहीं अधिक विध्वंस बरपा किया, जितना उसने भारत में किया था. 1398-99 में भारत में काफी मुस्लिम आबादी थी पर तब भी गैर मुस्लिम आबादी उससे ज्यादा ही थी. इस तरह हालांकि तैमूर के हमले प्रथमत: मुसलमान शासकों के खिलाफ लक्षित थे पर जो प्रजा उसके हमलों की शिकार बनी, उसमें स्वभावत: ही हिंदू भी थे. ऐसे अनेकानेक उदाहरण दिये जा सकते हैं कि जब सत्ता और लूट के माल का मामला होता था तो हिंदू और मुस्लिम दोनों ही शासक वर्गों के सदस्य समान रूप से क्रूर सिद्ध होते थे. इसके विपरीत ऐसे बहुत से उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें हिंदु और मुस्लिम दोनों समुदायों के आम लोगों के बीच मौजूद सहिष्णुता की बात तो जाने दीजिए, हिंदु और मुस्लिम शासकों, दोनों ने सहिष्णुता दर्शायी. इसलिए मुस्लिम शासकों को क्रूर और हिंदू शासकों को दयालु व सहिष्णु शासकों के रूप में चित्रित करना गलत होगा. पर दुर्भाग्य से हिंदू संप्रदायवादी ऐसी ही छवि चित्रित कर रहे है तथा मुस्लिम कट्टरपंथी भी कोशिश में है कि इस मामले में उनसे पीछे न रहें.

पिछली किस्तें : एक, दो, तीन, चार, पांच, छह
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सांप्रदायिक प्रचार का एक महत्वपूर्ण नमूना बाबरी मसजिद की दीवारों पर अंकित एकदम हाल के 30 भित्ति चित्र हैं. इस मसजिद में राम की प्रतिमा को जबर्दस्ती बिठाया गया है. जिस जिला न्यायाधीश के फैसले की वजह से संप्रदायवादी बाबरी मसजिद को कब्जे में ले सके, उसकी प्रतिमा बड़े ही उत्साहपूर्वक मसजिद के प्रवेश द्वार पर स्थापित की गयी है. उस के बाद से तो लगता है कि संप्रदायवादी राम की पूजा करने से अधिक उस न्यायाधीश की छवि को महिमा मंडित करने में संलग्न रहे हैं. दरअसल राम को अपने निकृष्टतम राजनीतिक दुराग्रहों को छुपाने के लिए आड़ बना लिया गया है. एक भित्ति चित्र में यह दर्शाया गया है कि किस तरह बाबर के सैनिक राम के इस कल्पित मंदिर को ध्वस्त कर रहे हैं और हिंदुओं का कत्लेआम कर रहे हैं. इस भित्ति चित्र के नीचे लिखा है कि बाबर के सिपाहियों ने अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करते समय 75000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया और उनके रक्त को गारे की तरह इस्तेमाल कर बाबरी मसजिद खड़ी की. आग लगानेवाली ऐसी झूठी बातें सांप्रदायिक भावनाओं को हवा देने के लिए प्रस्तुत की जाती हैं. यह प्रचार उतना ही झूठा है जितना यह विचार कि बाबर ने राम मंदिर को ध्वस्त किया और उसकी जगह पर बाबरी मसजिद बनवायी.
उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक, रामचंद्र सिंह ने अयोध्या में 17 स्थानों की खुदाई करवायी और ऋणमोचन घाट व गुप्तारघाट नाम के दो स्थलों का भी उत्खनन करवाया. उनके अनुसार वहां अधिकतर स्थानों पर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से पहले आबादी होने के चिह्र नहीं मिलते. केवल मणिपर्वत और सुग्रीवपर्वत नाम के दो स्थानों को मौर्य काल का कहा जा सकता है. भारत सरकार के पुरात्तत्व विभाग के भूतपूर्व महानिदेशक ब्रजवासी लाल ने कई बार अयोध्या के कई स्थलों का उत्खनन करवाया और इस उत्खनन से पता चला कि ईसा पूर्व सातवीं सदी भी कुछ पहले ही जान पड़ता है क्योंकि उत्तरी छापवाले पोलिशदार बर्तनों की तिथि को आसानी से उक्त काल का नहीं ठहराया जा सकता.
यह बात याद रखनी होगी कि अयोध्या में बस्ती होने की सबसे पुरानी अवधि के लिए हमारे पास कोई कार्बन तिथि नहीं है. वहां प्रारंभिक आबादी की अधिक विश्वसनीय तिथि कुछ मृण्मूर्तियों के अस्तित्व द्वारा मिलती है. इनमें से एक जैन आकृति है, जो मौर्य युग की अथवा ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के अंत और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के के आरंभ की हैं. बहरहाल, मध्य गंगा क्षेत्र की कछारी भूमि में जितने स्थानों का उत्खनन किया गया, उनमें से अधिकतर स्थान ईसा पूर्व सातवीं-छठी शताब्दी तक पर्याप्त रूप से बसे हुए प्रतीत नहीं होते. जो लोग राम की ऐतिहासिकता में विश्वास करते हैं, वे उनकी तिथि ईसा पूर्व 2000 के आसपास तय करके चलते हैं. यह इस आधार पर किया जाता है कि राम दाशरथि महाभारत युद्ध से लगभग 65 पीढ़ियों पूर्व हुए थे. आम तौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि महाभारत युद्ध ईसा पूर्व 1000 के आसपास हुआ था. इसलिए हमारे सामने पर्याप्त रूप से अयोध्या के बसने और अयोध्या में राम के युग के बीच 1000 वर्षों से अधिक का अंतर प्रकट होता है. इसी कठिनाई की वजह से कुछ विद्वान अयोध्या को अफगानिस्तान में बताने की कोशिश करते हैं.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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