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बीच सफ़हे की लड़ाई

बाबा रामदेव बनाम बिहार के दफ़्तरी

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/18/2007 12:37:00 AM

आज कुमार अनिल बिहार के दफ़्तरों और दफ़्तरियों की खबर ले रहे हैं.

कुमार अनिल
बिहार में बाबा रामदेव के समर्थक उदास हैं. इसलिए कि बाबा का प्रभाव लगातार कमजोर होता जा रहा है. लोगों ने कपालभाति आदि का अभ्यास बंद कर दिया है. बाबा के स्वस्थ भारत की कल्पना को सबसे बड़ी चुनौती बिहार सरकार के दफ्तरों ने दी है.

कपालभाति आदि से क्या होता है? सांस की गति तेज की जाती है. योग से मांसपेशियां मजबूत होती हैं. बिहार सरकार के दफ्तरों का कहना है कि जो काम बाबा फीस लेकर करते हैं, वही काम वे मुफ्त में करते हैं.
आपको विश्वास नहीं, तो आप कोई भी छोटा-सा काम लेकर किसी दफ्तर में चले जायें. आपको इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग तक इतनी दफा आना- जाना पड़ेगा कि आपकी सांसें ऊपर-नीचे होने लगेंगीं.
पतंजलि में एक बाबा हैं. यहां हर दफ्तर में अनेक बाबा हैं. वहां भी बाबा से रू -ब-रू होना मुश्किल है. यहां भी आसान नहीं. वे कभी लंदन, कभी अमेरिका में हैं. यहां के बाबा की खोज-खबर ही नामुमकिन है.
रामदेव बाबा बस एक ही चीज में आगे हैं. वे बेहतर ब्रांडिंग कर लेते हैं. टीवी में छाये रहते हैं. बिहार सरकार को भी चाहिए कि वह अपने दफ्तरों की ब्रांडिंग करे. देश को बताये कि प्रखंड के बड़ा बाबू से लेकर सचिवालय के मुलाजिम तक लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर किस प्रकार मैराथन धावक तैयार करने का काम कर रहे हैं.
नीतीश जी गरीबों के लिए नाहक परेशान हैं. अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कर रहे हैं. लाखों खर्च हुए. उन्हें चाहिए कि वे अविलंब एक आदेश पारित करें. हर गरीब के लिए सुबह-सुबह सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाना अनिवार्य कर दें. साल भर में गरीब हट्टे-कट्टे हो जायेंगे. आखिर आंबेडकर छात्रावास के लड़के छात्रवृत्ति के लिए दौड़-दौड़ कर हट्टे-क ट्टे हो रहे हैं या नहीं.
पतंजलि के बाबा के पास गिने-चुने नुस्खे हैं. हमारे दफ्तरों के पास अनगिनत नुस्खे हैं. लाल कार्ड की सूची, आवास प्रमाणपत्र, माध्यमिक बोर्ड से अंक प्रमाणपत्र... कितना गिनायें. कोई काम शुरू कर के देखिए. भूमिहीन कमजोर होता है व भूस्वामी मजबूत. भूस्वामी इसलिए मजबूत होता है, क्योंकि दादा से पोता तक वह दाखिल-खारिज के लिए दौड़ता रहता है.
आजकल जच्चा-बच्चा भत्ता देने की योजना चल रही है. हर जननी मातृत्व भत्ते के लिए अस्पतालों की दौड़ लगा रही है. इससे जच्चा तंदुरुस्त होती है, फिर बच्चे तो तंदुरुस्त होंगे ही. यह योजना बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में ज्यादा कारगर है. वहां जान-माल की क्षतिपूर्ति के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गयी हैं. क्षतिपूर्ति के लिए हर आदमी दौड़ रहा है. रोज दौड़ रहा है. इससे बाढ़पीड़ितों के साथ ही उनकी आनेवाली नस्लें भी स्वस्थ होंगी.
पतंजलि के बाबा कहते हैं कि कोका-कोला मत पियो. कई तो कहते हैं कि गोमूत्र ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक है. बिहार के बाढ़पीड़ित गोमूत्र में और भी जैविक पदार्थ मिला कर पी रहे हैं. पी कर सीधे स्वर्ग जा रहे हैं. डायरिया तो मुफ्त में वाहवाही ले रहा है. असली योगदान तो हमारे दफ्तरों का है, स्वास्थ्य केंद्रों का है.
जय हो दफ्तर की. जय हो दफ्तरी की.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बाबा रामदेव बनाम बिहार के दफ़्तरी ”

  2. By Udan Tashtari on October 18, 2007 at 4:02 AM

    गजब भाई रियाज भाई. धांसू. सच है कि काहे चक्कर लगाये जाये बाबा रामदेव के जबकि वो ही काम यूँ भी सरकारी बाबू कराये दे रहे हैं और उससे कम फीस में फायनली जो काम कराने निकले थे वो भी बोनस में हो जायेगा.

    मजा आ गया. :)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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