हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत-अमेरिका परमाणु करारः मानव जाति का अस्तित्व ही दावं पर लगा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/10/2007 01:20:00 AM

नोम चोम्स्की ज़िंदाबाद केवल अरुंधति राय ही नहीं करतीं, किसी न किसी कारण से वे सभी लोग भी करते हैं जो अमेरिकी साम्राज्य के लौह पंजे के तले अपनी गरदन दबी हुई महसूस करते हैं और उसके खिलाफ़ संघर्षों में भागीदार हैं. चोम्स्की अमेरिका में रहते हुए अमेरिकी नीतियों के सबसे मुखर आलोचक हैं. यह लगभग सर्वसम्मत बात है कि अभी की दुनिया के वे सबसे बडे़ बौद्धिक-विचारक हैं. उनकी आवाज़ दुनिया की सबसे बडी़ आवाज़ों में से है. मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर एमेरिटस चोम्स्की की गिनती बीसवीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषाविज्ञानियों में होती है, मगर उनका काम मीडिया, राजनीति और आधुनिक मनोविज्ञान में भी वैसा ही-उतना ही महत्वपूर्ण है. इस बार वे भारत द्वारा अमेरिका के साथ किये गये करार पर चिंता जता रहे हैं. आइए, हम सब सुनें.

नोम चोम्स्की

रमाणुसंपन्न देश अपराधी देश हैं. विश्व न्यायालय के अनुसार उनका कानूनी दायित्व है कि वे परमाणु अप्रसार संधि की धारा छह की कसौटी पर खरे उतरें. इस संधि के प्रावधानों के अनुसार परमाणु हथियारों के पूरी तरह से खात्मे के लिए विश्वासपूर्ण समझौते करना है. कोई भी परमाणुसंपन्न देश इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा है. इसका उल्लंघन करने में संयुक्त राज्य अमेरिका अगुआ है, खासतौर पर बुश प्रशासन, जिसने यहां तक कहा कि वे धारा छह के अधीन नहीं हैं.

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सुनिए एक दुर्लभ बातचीत, जिसमें नोम चोम्स्की दुनिया के एक और महान विचारक-लेखक हावर्ड ज़िन के साथ इराक, वियतनाम, एक्टिविज़्म और इतिहास पर चर्चा कर रहे हैं. इस बातचीत का हिंदी अनुवाद जल्दी ही हाशिया पर देने की कोशिश चल रही है.












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27 जुलाई को वाशिंगटन ने भारत के साथ एक ऐसा समझौता किया है, जो परमाणु अप्रसार संधि की मूल आत्मा को नष्ट करता है. हालांकि दोनों देशों में इसका पुरजोर विरोध हो रहा है. इस्राइल और पाकिस्तान की भांति भारत ने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किया है. इसने इस संधि से बाहर रह कर परमाणु हथियार विकसित किया है. यह समझौता करके बुश प्रशासन ने उद्दंड व्यवहार को अपना समर्थन दिया है. यह समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका के कानून का उल्लंघन तो है ही, साथ ही न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप को बाइपास भी करता है. यह ग्रुप 45 देशों का समूह है, जिसने परमाणु हथियारों के विस्तार के खतरे को कम करने के लिए कड़े नियम बनाये हैं.
आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डैरिल किंबाल का आकलन है कि यह समझौता भारत को और परमाणु परीक्षण करने से प्रतिबंधित नहीं करता है. सबसे चकित करनेवाली बात यह है कि अगर भारत ऐसे परीक्षण करता है, तब भी अन्य देशों से ईंधन हासिल करने में वाशिंगटन दिल्ली की मदद करेगा. यह बम बनाने के लिए सीमित घरेलू आपूर्ति को फ्री करने के लिए भारत को अनुमति भी देता है. ये सारे कदम अंतरराष्ट्रीय अप्रसार समझौते का सीधा उल्लंघन हैं.

भारत-अमेरिकी समझौता दूसरे देशों को नियम तोड़ने के लिए उकसानेवाला है. ऐसी खबर है कि पाकिस्तान परमाणु हथियारों के लिए प्लूटोनियम उत्पादन के लिए रिएक्टर बनानेवाला है. यह ज्यादा उन्नत हथियार बनाने के दौर की शुरुआत है. भारत जैसी सुविधा हासिल करने के लिए इस्राइल अमेरिकी कांग्रेस में लॉबिंग कर रहा है. उसने नियमों से छुटकारे के लिए न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप से निवेदन किया है. एक बार अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों ने दरवाजा खोल दिया, तो चीन-पाकिस्तान समझौते की भांति अब फ्रांस, रूस और ऑस्ट्रेलिया भारत के साथ परमाणु समझौते के लिए आगे बढ़ें, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

भारत-अमेरिकी समझौते में फौजी और व्यापारिक दोनों ही उद्देश्य निहित हैं. परमाणु हथियार विशेषज्ञ गैरी मिलहोलिन ने कांग्रेस में विदेश सचिव कोंडेलिजा राइस द्वारा दिये गये बयान के हवाले से बताया है कि `प्राइवेट सेक्टर को ध्यान में रखते हुए इस डील को बनाया गया था. खासतौर पर एयरक्राफ्ट और रिएक्टर के लिए.' मिलहोलिन मानते हैं कि यह डील फौजी विमानों के लिए है. परमाणु युद्ध के खिलाफ प्रतिबंधों को नजरअंदाज करके यह समझौता क्षेत्रीय तनावों को न सिर्फ बढ़ाता है, बल्कि वह दिन भी जल्द ही दिखा सकता है, जब परमाणु विस्फोट किसी अमेरिकी शहर को तबाह कर देगा. वाशिंगटन का संदेश साफ है- `संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए पैसे की तुलना में निर्यात नियंत्रण कम महत्वपूर्ण है.' अमेरिकी कारपोरेटों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है मुनाफा, चाहे कितना भी खतरा क्यों न हो. किंबाल बताते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका परमाणु व्यापार के मामले में भारत को उन देशों की तुलना में ज्यादा सहूलियत दे रहा है, जो परमाणु अप्रसार संधि की सभी शर्तों और जवाबदेहियों को पूरा कर रहे हैं. दुनिया के अधिकांश हिस्से में कुछ ही लोग इस पागलपन को देखने में असफल रह सकते हैं. ईरान के खिलाफ युद्ध की धमकी के दौरान ऐसा दिखा कि वाशिंगटन उन देशों को पुरस्कृत करता है, जो परमाणु अप्रसार संधि के नियमों की अवहेलना करते हैं. वस्तुस्थिति यह है कि बुरी तरह से उकसाने के बावजूद ईरान ने परमाणु अप्रसार संधि के नियमों का उल्लंघन नहीं किया है. संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के दो पड़ोसियों पर कब्जा जमा लिया है और ईरान की सत्ता को खुले तौर पर गिराने में लगा है. गौरतलब है कि 1979 से ईरान पर अमेरिकी नियंत्रण नहीं है, इससे वह क्षुब्ध है.

पिछले कुछ वर्षों से भारत और पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में कोशिशें की हैं. आम लोगों के आपसी संपर्क में बढ़ोत्तरी हुई है. दोनों देशों के बीच कई लंबित विवादों पर बातचीत का दौर जारी है. भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से इस प्रक्रिया पर उलटा असर पड़ सकता है. इस पूरे क्षेत्र में भरोसा निर्माण के कई साधनों में से एक है- पाकिस्तान के रास्ते बननेवाली प्राकृतिक गैस के लिए ईरान-भारत पाइपलाइन का निर्माण. यह पाइपलाइन इलाके के लोगों को एक साथ करती और शांतिपूर्ण एकता की संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करती.

यह पाइपलाइन और वह उम्मीदें, जो इससे बंधी हैं, भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते की बलि चढ़ सकते हैं. अमेरिका इसे अपने दुश्मन ईरान से भारत को अलगाने के रूप में देखता है, इसीलिए वह भारत को ईरानी गैस के बदले में परमाणु शक्ति दे रहा है. हालांकि सच्चाई यह है कि अमेरिका जो भारत को देगा, वह ईरान से मिलनेवाली सामग्री की तुलना में बहुत ही कम है.

भारत-अमेरिकी समझौता वाशिंगटन के द्वारा ईरान को अलग-थलग करने का उपाय है. 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने `हाइड एक्ट' पारित किया है, जिसमें निर्दिष्ट है कि जनसंहार के हथियारों को हासिल करने के प्रयासों के लिए ईरान को निरुत्साहित करने, अलग-थलग करने और जरूरत पड़े तो प्रतिबंधित करने और नियंत्रण करने की अमेरिकी कोशिशों में भारत का पूरा और सक्रिय सहयोग हासिल किया जाये.

गौरतलब है कि अधिकांश अमेरिकी और ईरानी लोग इस पूरे इलाके (ईरान और इस्राइल समेत)को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र बनाने के पक्षधर हैं. तीन अप्रैल 1991 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 687 को भी याद कर सकते हैं, जब अमेरिका से इराक पर हमले की बाबत जवाब-तलब किया गया था, तो वाशिंगटन ने लगातार वकालत की थी कि मध्य-पूर्व क्षेत्र को नरसंहार के हथियारों और मिसाइलों से मुक्त किया जाये.

साफ है, मौजूदा संकट को कम करने के रास्ते की कमी नहीं है. भारत-अमेरिकी समझौते को पटरी से उतार दिये जाने की जरूरत है. परमाणु युद्ध का खतरा बहुत ही गंभीर है और बढ़ रहा है. और इसकी वजह अमेरिकी अगुआईवाले वो परमाणुसंपन्न देश हैं, जो परमाणु अप्रसार के दायित्वों को पूरा करने से इनकार करते हैं और उसका खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं. भारत-अमेरिकी समझौते का यह नवीनतम प्रयास विपत्ति की तरफ ही एक और कदम होगा. इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के द्वारा इसके निरीक्षण के बाद अमेरिकी कांग्रेस के पास इस समझौते को जांचने-परखने के लिए चिंतन करने का मौका है. मुमकिन है कि कांग्रेस इस समझौते को रद्द कर सकती है. कांग्रेस में परमाणु अस्त्रों के खिलाड़ियों से ऊबे हुए लोगों की संख्या अच्छी है. आगे बढ़ने का सबसे अच्छा रास्ता है कि वैश्विक स्तर पर परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए काम किया जाये. हम इस बात को समझें कि दावं पर मानव जाति का अस्तित्व लगा है.
अनुवाद: विनय भूषण
साभार: खलीज टाइम्स, हिंदी अनुवाद प्रभात खबर में प्रकाशित | मूल लेख यहां पढें.

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ भारत-अमेरिका परमाणु करारः मानव जाति का अस्तित्व ही दावं पर लगा है ”

  2. By अनिल रघुराज on October 10, 2007 at 8:00 AM

    अच्छा लेख, लेकिन क्या यह आकलन सही है कि...
    यह समझौता भारत को और परमाणु परीक्षण करने से प्रतिबंधित नहीं करता है. सबसे चकित करनेवाली बात यह है कि अगर भारत ऐसे परीक्षण करता है, तब भी अन्य देशों से ईंधन हासिल करने में वाशिंगटन दिल्ली की मदद करेगा.

  3. By Reyaz-ul-haque on October 11, 2007 at 1:17 AM

    हां अनिल भाई, यह अजीब लगनेवाली बात है. मगर शायद सही है. चोम्स्की भी इससे चकित हैं.

    आप आते हैं, यह अच्छा लगता है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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