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बीच सफ़हे की लड़ाई

अनंत ऊर्जा के असली स्रोत हैं सूप व चलनी

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/08/2007 09:50:00 AM

प्रायः गंभीर विषयों पर लिखनेवाले कुमार अनिल ने इधर कई व्यंग्य लिखे हैं और उनसे लोग तिलमिलाये भी हैं. प्रस्तुत हैं उनके व्यंग्यों में से कुछ, क्रमवार. आज पहला व्यंग्य.

कुमार अनिल

र्जा को लेकर देश में एटमी करार पर इतनी तेज बहस हुई कि सरकार डगमगाने लगी. ऊर्जा की बहस में देश की कीमती ऊर्जा बरबाद हुई.
चलनी कहे सूप से कि तुममे हैं अनेक छेद. इस कहावत के जरिये आदमी की अनावश्यक दोष निकालने की प्रवृत्ति की निंदा की जाती है. निंदा-दर-निंदा के बावजूद यह प्रवृत्ति जिंदा है, क्योंकि यह प्रवृत्ति आदमी को ऊर्जा देती है. इससे एक रस मिलता है. ऊर्जा के असली स्रोत हैं सूप व चलनी. इनके बेहतर इस्तेमाल से ऊर्जा समस्या का समाधान संभव है. युगों-युगों से इसका इस्तेमाल होता आया है. एक आदमी जब इसका इस्तेमाल करता है, तो उसके तन-मन में ऊर्जा के लावे फूटने लगते हैं.

मान लीजिए, किसी ने कोई अच्छा काम कर दिया. सभी उसकी महानता के नीचे दबने लगते हैं. इसी बीच कोई पुरुष उसके अच्छे काम की तुलना किसी बड़े अच्छे काम से कर देता है. क्षण भर में अच्छे काम की महत्ता कपूर की तरह उड़ जाती है. पहला व्यक्ति अपने को हीन समझने लगता है, जबकि दूसरे में ऊर्जा का संचार होने लगता है.

अभ्यास से आदमी इसके इस्तेमाल में महारत हासिल कर सकता है. आज के नेताओं के पास चलनी व सूप का बड़ा स्टॉक है. नीतीश जी चाहे जितना अच्छा काम करें, राबड़ी उन्हें अपने सूप से एक बार में ही फटक देती हैं. विपक्ष को ऊर्जा मिलती है. सूप व चलनी का स्टॉक सत्ता पक्ष भी रखता है. विपक्ष आज का सवाल खड़ा करेगा, तो सत्ता पक्ष पंद्रह सालों की चलनी में चाल देगा. इससे सत्ता पक्ष को ऊर्जा मिलती है.
कवि-लेखक भी इसका इस्तेमाल करके ऊर्जावान होते हैं. फिराक की चर्चा हो, तो आप फैज की चर्चा शुरु कर दें. आपकी धाक जमनी तय है. गोष्ठी में ऊर्जा की तरंगें दौड़ने लगती हैं. इससे भी काम न चले, तो आप कवि के पायजामे की चर्चा कर सकते हैं. इसका इस्तेमाल सर्वव्यापी है.

इसका इस्तेमाल सर्वव्यापी है. ब्लॉग से लेकर दफ्तर तक. दफ्तर में अगर राम कुमार की आलोचना हो, तो उसे चाहिए कि वह फौरन श्याम कुमार का पोस्टमार्टम शुरू कर दे. इससे आलोचना का असर फौरन छू-मंतर हो जाता है और राम कुमार में फिर से ऊर्जा भर जाती है.

जिसके पास जितनी वेराइटी के सूप व चलनी होंगे, वह उतना ही प्रकाशमान होगा. मिथिला के भोज में जो व्यक्ति भोजन की सपाट बड़ाई करेगा, उसे भोलू समझा जाता है. जो देवता सिंह साहब के भोज में खाते हुए चौधरी साहब के भोज का गुणगाण करेंगे, उनकी पूछ बढ़ जाती है. यजमान अपने को तुच्छ समझने लगता है व देवता के चेहरे पर बल्ब जलने लगते हैं. ऐसे देवताओं का बिरादरी में मान बढ़ जाता है. वे समाज में रोशनी फैलाने लगते हैं.

विज्ञान की चर्चा हो, तो आप इतिहास के सूप से फटक दीजिए. इतिहास की चर्चा हो तो आप आस्था की चलनी में चाल दीजिए. इससे राष्ट्र मजबूत होता है. इस राष्ट्रीय ऊर्जा से लोग भूख-प्यास तक भूल जाते हैं.
महिलाओं के पास पहले छोटे साइज के सूप व चलनी थे. वे दिन भर घर में बैठ कर पति को फटकती रहती थीं. दिल्ली में स्वराज व सोनी के पास बड़ी-बड़ी चलनियां हैं. मायावती के सूप से मुलायम खेमे में दहशत है. बिहार की पंचायतों में महिलाएं तेजी से सूप व चलनी के इस्तेमाल की ट्रेनिंग ले रही हैं.

हर धर्म में स्वर्ग की कल्पना की गयी है, पर कोई आदमी मरना नहीं चाहता. इसलिए कि वहां सूप व चलनी की व्यवस्था नहीं है.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ अनंत ऊर्जा के असली स्रोत हैं सूप व चलनी ”

  2. By Faroghe Azzam A.K.A Azmi on October 8, 2007 at 7:12 PM

    This comment has been removed by the author.

  3. By Faroghe Azzam A.K.A Azmi on October 8, 2007 at 7:12 PM

    riyazbhai kaise hain. naya blog banaya hai ispe zaroor dhyan dhijiye ga...www.mysamar.blogspot.com

  4. By हर्षवर्धन on October 9, 2007 at 8:14 PM

    सूप और चलनी के माध्यम से आपने बहुत कुछ छानकर फटक दिया है। बढ़िया है!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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