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बीच सफ़हे की लड़ाई

लोकतांत्रिक लडा़इयों के लिए सिकुड़ता स्पेस

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/06/2007 11:54:00 PM

सीतामढी़ ज़िले के रुन्नीसैदपुर में भाकपा (माले) नेता अशोक साह मारे गये. वे बाढ राहत सामग्री में धांधली को लेकर खाद्यान्न माफ़िया के खिलाफ़ संघर्षरत थे. वे मुख्यंत्री तक से मिले थे और शिकायत की थी-मगर सब बेअसर रहा. अगर हमारे देश में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण संघर्षों का जवाब यही है तो हम क्यों माओवादी आंदोलनों को कोसते हैं? लोग शांतिपूर्ण तरीके से नहीं लड़ने दिये जायेंगे और उनकी समस्याओं का निबटारा नहीं होगा तो वे फिर वे हथियार ही उठायेंगे.

अशोक साह की हत्या और इसके निहितार्थों पर प्रभात खबर के स्थानीय संपादक अजय कुमार की टिप्पणी.

लोकतांत्रिक लडा़इयों के लिए सिकुड़ता स्पेस

अजय कुमार

शोक साह मारे गये. पुलिस हिरासत में उनकी मौत (हत्या) हो गयी. अशोक कोई बड़े नेता नहीं थे. लेकिन वह बड़ा काम जरूर कर रहे थे. यह उनकी मौत का कारण बना.
बाढ़ राहत के मौके को ललचायी नजरों से अवसर के तौर पर देखना प्रशासनिक तंत्र का पुराना जनविरोधी धंधा रहा है. इस बाढ़ में इस धंधे के खिलाफ आम लोगों की दर्जनों स्थानों पर पुलिस-प्रशासन के साथ तीखी झड़पें हुईं. कई जगहों पर गोलियां चलीं. लाठी की तो पूछिए ही नहीं.

अशोक साह ने सीतामढ़ी के रुन्नीसैदपुर में बाढ़ राहत में गोलमाल के खिलाफ आवाज उठायी थी. निर्धारित वजन की तुलना में कम राहत सामग्री देना किसी अपराध से कम नहीं है. इस अपराध के खिलाफ बोलने की सजा अशोक को मिली. जो अपराधी थे, वे खुले घूम रहे हैं. यह इस समय की त्रासदी है.

सरकार कहती है कि जो भ्रष्ट हैं, उनके बारे में सूचनाएं दें. अशोक ने यह सब कुछ किया, बाढ़पीड़ितों के साथ मिल कर. पर यह व्यवस्था उन्हें कोई संरक्षण नहीं दे सकी. अगर उनके साथ आम जन खड़े न होते, तो शायद उनका शव भी गायब हो जाता. इस आशंका की वजह पुलिस का वह चरित्र है, जो इस घटना में बार-बार दिखता है. बाढ़ राहत में गड़बड़ी के खिलाफ आवाज उठाने पर दुष्कर्म का एक झूठा मुकदमा उन पर लाद दिया गया. पुलिस ने राहत में गड़बड़ी करनेवालों के खिलाफ तो कुछ भी नहीं किया, उलटे उसने एक लोकतांत्रिक आवाज को खामोश कर दिया. इस व्यवस्था को घुन की तरह चाट-चाट कर कमजोर-विकृत बना रहे तत्वों की वह चेरी बनी रही.

हमारे आसपास जो कुछ भी गलत चल रहा है, आखिर उसे कहां रखा जाये? थाने का हाल तो सबके सामने है. इस मामले में डीआइजी के निर्देशों का खुल्लम-खुला उल्लंघन `मनसोखी' का नमूना है. यह भी कि निचले स्तर पर पुलिस बल किस कदर उच्छृंखल हो चुका है. जानकारी यह भी मिली है कि अशोक को थाने पर लाने के बाद उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए बड़े अधिकारियों को लानतें दी जा रही थीं. कहा जा रहा था कि हमारे खिलाफ बोलने का अंजाम अब समझ लो. मुख्यमंत्री के जनता दरबार तक में अशोक ने स्थानीय पुलिस और भ्रष्टचारियों की साजिश के बारे में जानकारी दी थी. पर हुआ कुछ भी नहीं.

इस प्रकरण ने इस सवाल को भी मौजूं बना दिया है लोकतांत्रिक तरीके से व्यवस्था विरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ लड़ने की जगह कितनी सिकुड़ती जा रही है. क्या उसी राजनीतिज्ञ की बात सुनी जायेगी, तो बाहुबली और ताकतवर हो? आम आदमी की राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होगी क्या?

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ लोकतांत्रिक लडा़इयों के लिए सिकुड़ता स्पेस ”

  2. By bhupen on October 7, 2007 at 7:08 AM

    महेश्वर जी के शब्दों में-
    इंसाफ़ की लड़ाई में मौत कोई शिकस्त नहीं होती.

  3. By amit on October 7, 2007 at 10:48 PM

    sahi kahte hain sathi. apne sahin nabz pakdi hai. desh men aam aadmi ke liye jagah kamati ja rahi hai.

    ..ladai aagey tak le jani hogi, tabhi bat banegi.

  4. By rahul on October 7, 2007 at 10:53 PM

    bhupen wajib bolte hain. maut tay nahin karegi ki hum jeete yaa haare. wah to hamaara sangharsh hi tay karega. Ashok jee ko hamara salam. apko bhi ki, apne unke sangharsh ke bare men batay. abhaar.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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