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बीच सफ़हे की लड़ाई

वे मंदिर, जो लूटे और तोडे़ गये

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/06/2007 02:46:00 PM

इतिहास में बार बार हिंदू मंदिरों के लूटे और तोडे़ जाने का ज़िक्र आता है. इसके लिए सांप्रदायिक इतिहासकार और राजनीतिक दल शासकों के मुसलमान होने को ज़िम्मेवार ठहराते हैं. प्रख्यात इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा सांप्रदायिक राजनीति और राम के अस्तित्व संबंधी अपने व्याख्यान के इस चरण में उन्हीं मंदिरों की कहानी कह रहे हैं.
राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की पांचवीं किस्त.




पिछली किस्तें : एक, दो, तीन, चार
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सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-5

प्रोफेसर आरएस शर्मा


र्तमान में पुनरुत्थानवादी विचारों को कुछ सांप्रदायिक मानसिकतावाले लेखक इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें समर्थन दे रहे हैं. यह दावा किया जा रहा है कि अतीत में दुनिया में जो कुछ भी अच्छा और महान रहा है, वह भारत से ही उद्भूत हुआ और यहीं से दुनिया के दूसरे भागों में फैला. लेकिन इतिहासकार, जिन्हें ठोस प्रमाणों को आधार बनाना होता है, ऐसे विचारों को स्वीकार नही कर सकते. बात चाहे विभिन्न प्रकार की धातुओं और सिक्कों के इस्तेमाल की हो या लेखन के प्रयोग और सभ्यता के ऐसे ही अन्य तत्वों की, हमें तो बड़ी ही सावधानी से प्रमाणों की छानबीन करनी होती है. जैसाकि पता चलेगा तमाम अति पुनरुत्थानवादी विचार ऐसे इतिहासकार प्रस्तुत करते हैं, जो हिंदू संप्रदायवादी और इसलामी रुढ़िपंथी विचारों से प्रतिबद्ध है.

भारत में संप्रदायवाद की समस्या को बुनियादी तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की समस्या के तौर पर देखा जाता है. यह समस्या इस तरह नहीं सुलझायी जा सकती कि एक धर्म विशेष को माननेवाले शासकों द्वारा दूसरे धर्म को माननेवाले शासकों और अधीनों के खिलाफ की गयी दमन-उत्पीड़न की कार्रवाइयों पर परदा डाला जाये. इतिहास बतलाता है कि शासक वर्ग चाहे किसी भी धर्म के रहे हों, उनका यह विशेषाधिकार रहा है कि वे अपनी प्रजा को और अपने दुश्मनों को लूटें और उनका उत्पीड़न करें और जो मालमत्ता मिले उसकी मुख्यत: शासक वर्ग के ऊपरी तबकों के सदस्यों के बीच बंदरबांट कर लें. अगर इसलामी बादशाहों और राजाओं ने हिंदू मंदिरों की लूटपाट की तो इतिहासकार इस तथ्य को नजरअंदाज करके उनके प्रति कोई सद्भावना पैदा नहीं कर सकते. पर ऐसी लूटपाट के कारणों का विश्लेषण करना होगा और उनकी व्याख्या करनी होगी जैसा कि मोहम्मद हबीब ने अपनी पुस्तक सुल्तान महमूद आफ गजनीन में महमूद गजनी द्वारा की गयी लूटपाट के मामले में किया है. साधारण व्यक्ति भी इस बात को देख सकता है कि चाहे सभी हिंदू मंदिर सोमनाथ और तिरुपति के मंदिरों की तरह समृद्ध न रहे हों तो भी आम तौर पर मसजिदों के मुकाबले मंदिर कहीं अधिक समृद्ध हुआ करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में, सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां, 300 हजाम और बहुत से पुजारी थे. इस मंदिर के स्वामित्व में 10 हजार गांव थे. पर मसजिदों की वास्तु संबंधी बनावट ही ऐसी है कि संपत्ति संग्रह के लिए वहां कोई जगह नहीं होती. यह तो प्रार्थना के लिए एक खुली इमारत होती है. मंदिरो में संपदा के संचय के कारण ही कुछ हिंदू राजा कीमती धातुओ से बनायी गयी मूर्तियों को ध्वस्त करने और राजकोष के लिए धन संपत्ति पर कब्जा करने के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में कश्मीर के शासक हर्ष ने ऐसा ही किया था. उसने एक अधिकारी नियुक्त किया था, जिसका काम मूर्तियों को ध्वस्त करना था (देवोत्पाटन). ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति और कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में अंधविश्वासपूर्ण युक्तियों से भोले-भाले लोगों से पैसा उगाहने के लिए सुझाये गये उपायों से यह विचार खारिज हो जाता है कि हिंदू शासक वर्ग के लोग अपनी प्रजा के प्रति लगातार सहिष्णु रहते आये थे. पतंजलि के महाभाष्य, यानी ईसा पूर्व 400 के लगभग के पाणिनी के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी पर ईसा पूर्व 150 के लगभग लिखित उनकी टीका के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अपना खजाना भरने के लिए मौर्य शासक धातु मूर्तियों को पिघलाते थे. अत: धन की अदम्य लालसा के चलते मौर्यों और अन्य शासकों ने धार्मिक मूर्तियों की पवित्रता तक को नहीं बख्शा.


निश्चय ही अशोक ने जो कुछ किया वह कहीं अधिक श्लाघ्य और सराहनीय था, पर उसकी नीति से ब्राह्मणों को आर्थिक धक्का लगा. मौर्यों की सत्ता के रहे-सहे अवशेषों का सफाया करनेवाला और ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के अंत के आसपास ब्राह्मण राजवंश का संस्थापक, पुष्यमित्र शुंग दूसरी तीसरी शताब्दि के आसपास लिखित ग्रंथ दिव्यावदान में बौद्ध मतावलंबियों के घोर उत्पीड़क के रूप में प्रकट होता है. वह अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ स्तूपों को नष्ट करता, विहारों को जलाता, भिक्षुओं की हत्याएं करता, शाकल यानी आधुनिक सियालकोट तक आगे बढ़ता चला गया था. सियालकोट में उसने घोषणा की थी कि जो भी उसे एक बौद्ध भिक्षु का सिर लाकर देगा, उसे सोने के सौ सिक्के पुरस्कार में मिलेंगे. यह बात अतिरंजनापूर्ण भी हो सकती है, क्योंकि शुंग शासन के अंतर्गत बौद्ध स्तूपों का निर्माण भी किया गया था. लेकिन पुष्यमित्र शुंग और भिक्षुओं के बीच शत्रुतापूर्ण वातावरण से इनकार नहीं कि या जा सकता. हमें यह भी पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में गौड़ के शैव शासक शशांक ने उस बोधिवृक्ष को कटवा डाला था, जिसके नीचे बैठ कर बुद्ध को ज्ञान (बुद्धत्व) प्राप्त हुआ था. सातवीं शताब्दी के उसके समकालीन राजा हर्ष को सहिष्णु शासक माना जाता है पर उसने भी उन ब्राह्मणों को कारावास में डाला और उनका संहार किया था जिन पर कन्नौज की सभा में बुद्ध के सम्मान में खड़ी की गयी मीनार को जलाने का षड़ंयत्र रचने का आरोप था. मध्यकाल के आरंभ में दक्षिण भारत के जैनियों और शैवों के बीच हमें खुली शत्रुता की बातें सुनने को मिलती हैं और परंपरागत कथनों से पता चलता है कि 8000 जैनियों को सूली पर चढ़ा दिया गया था. यह घटना मंदिर के उत्कीर्णनों में भी परिलक्षित है.
क्रमशः

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ वे मंदिर, जो लूटे और तोडे़ गये ”

  2. By babu123 on October 6, 2007 at 6:22 PM

    Sare aalekh vampanthi bichardhara ke pratik hai

  3. By ATUL on October 6, 2007 at 7:56 PM

    बहुत बढिया किस्त शुरू करने के लिए बधाई. सारी बातें तर्कसंगत और तथ्य्पूर्ण है. प्राचीन काल में तो शाश्व्त झगड़ा श्रमणों और ब्राह्मण परपरा के बीच ही था. पतंजलि ने पाणिनी के एक सुत्र शाश्वती विरोधे द्बंद: की व्याख्या में उदाहरण स्वरूप दिया है श्रमण-ब्राह्मणम च. इसी तरह यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि मस्जिदों की बनावट ही ऐसी होती है कि वहां संपत्ति संग्रह नही हो सकता. इतिहास के विकास की तार्किक व्याख्या राम शरण जी और राम विलास जी, मो हबीब जैसे लोग ही कर सकते हैं जिनके पास एक समालोचनात्मक और समग्र दष्टि हो. आज ही देखा तो पांचों किस्त पढ़ गया. टिप्पणी केवल यही कर रही हूं.
    अतुल

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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