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बीच सफ़हे की लड़ाई

एक कामरेड कवि को लाल सलाम

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/23/2007 01:36:00 AM

ज के दिन, 23 सितंबर, 1973 को नेरुदा ने दुनिया को खैरबाद कह दिया था. हालांकि उनकी मौत बीमारी से हुई, मगर यह भी उतना ही सही है कि अगर सीआइए के समर्थन से सत्ता में आये तानाशाह जनरलों ने नेरुदा के इलाज में अड़ंगा न लगाया होता तो शायद नेरुदा कुछ समय तक और जी जाते. मगर एलेंदे के बाद चिली में नेरुदा ही उन जनरलों के लिए और सीआइए के लिए सबसे खतरनाक आदमी थे, बल्कि शायद एलेंदे से भी ज्यादा. हम नेरुदा के लिए अगर सबसे सही संबोधन चुनें, तो शायद हम कार्ल मार्क्स का नाम लें. हमें नेरुदा में मार्क्स की ऊंचाई दिखती है-वे शायद कविता के मार्क्स थे. यों ही नहीं है कि जब विवान सुंदरम नेरुदा की कविता पर पेंटिंग बनाते हैं तो उसमें मार्क्स का चेहरा उभर आता है.

नेरुदा निजी तौर पर मेरे लिए एक प्यार की तरह हैं.
माना जाता है भारतीय उपमहाद्वीप में नेरुदा जैसी प्रतिबद्धता, पार्टी के लिए सक्रियता और आमजन से जुडा़व के स्तर पर कोई रचनाकार है तो वह फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं.
प्रस्तुत है नेरुदा की एक कविता और उनसे जुडे़ कुछ वीडियो.

अब हम बारह तक गिनेंगे
और फिर बिना हिले-डुले खडे़ रहेंगे
आइए इस सरज़मीं पर कम-से-कम एक बार
हम किसी भाषा में न बोलें
पल भर के लिए ठिठकें
और अपनी बांहें न हिलायें

वह कितना अलौकिक क्षण होगा
बिना हड़बडी़, बिना इंजन के बूते
हम सब एक साथ होंगे
किसी आकस्मिक अजनबीपन के बीच

ठंडे समंदर में मछुआरे
व्हेल मछलियों को अभयदान देंगे
और किनारे पर नमक बीनता आदमी
अपने टीसते हाथों की ओर नहीं देखेगा

वे जो नयी लडा़इयों के मंसूबे बना रहे हैं
ज़हरीली गैस और ज्वालाओं से लैस
लडा़इयां
जिनमें विजय के बाद कोई बाकी नहीं बचेगा
वे सब भी साफ़-सुथरे कपडे़ पहन
अपने भाइयों के साथ छांह में टहलेंगे
तफ़रीह के साथ

मैं जो चाहता हूं उसे
निष्क्रियता न समझा जाये
बल्कि मैं ज़िंदगी की बात कह रहा हूं...

इतने एकाग्र भाव से
अपनी ज़िंदगी चलाने के बीच
अगर कभी-कभार
कुछ भी किये बगैर
एक लंबी खामोशी में डूब सकते
तो शायद अपने को समझ न पाने
और रह-रह कर जान का जोखिम झेलने
की यह उदासी टूटती

शायद यह धरती हमें सिखा सकती है
कि सर्दियों में सब कुछ मरा हुआ दिखने के बाद
कैसे बाद में जीवित साबित होता है

अब मैं बारह तक गिनता हूं
और तुम सब यूं ही चुपचाप रहो
जब तक मैं चला न जाऊं.


एक कवि जिसने बहुत चीजों को प्यार किया



मैं पाब्लो नेरुदा हूं



नेरुदा का जीवन

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ एक कामरेड कवि को लाल सलाम ”

  2. By अनिल रघुराज on September 23, 2007 at 7:00 AM

    रियाज भाई शुक्रिया, नेरुदा के बारे में इतनी अच्छी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए।

  3. By आशीष on October 25, 2007 at 6:21 PM

    i love Neruda

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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