हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/26/2007 12:11:00 AM

ज्यों-ज्यों और जब-जब सत्ता का संकट गहराता है, धर्म और सांप्रदायिक राजनीति की शरण में पूरी व्यवस्था चली जाती है. याद करिए 1991-1992 का दौर, जब देश पर आर्थिक उदारीकरण के रूप में नव उदारवाद थोपा जा रहा था, सांप्रदायिक राजनीति उफान पर थी. आम लोग लोग मंदिर-मसज़िद के चक्कर में पडे़ थे और देश में अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप मज़बूत हो रहा था. बाज़ार खोले जा रहे थे और लोगों की जेब तक बहुराष्ट्रीय पंजों की पहुंच संभव बना दी गयी थी. यह केवल एक उदाहरण है. उसके पहले और उसके बाद भी, जब-जब राजसत्ता संकट में फंसी है और उससे निकलना मुश्किल लगा है-धर्म ने उसकी मदद की है-यह एक ऐतिहासिक तथ्य है. अभी, जब सरकार को लगा कि वह परमाणु करार पर फंस रही है, रामसेतु सामने आया. यहां साफ़ होना चाहिए कि यह संकट तथाकथित वामदलों की तरफ़ से नहीं था, बल्कि वामदलों ने किसी भी तरह का संकट नहीं खडा़ किया, वे तो बस नूराकुश्ती करते रहे. उन्होंने वे असली सवाल खड़े ही नहीं किये जो इस करार के संदर्भ में किये जाने चाहिए थे. कुल मिला कर वाम दलों ने विरोध का दिखावा किया (उनसे हम इसके अलावा किसी और चीज़ की अपेक्षा भी नहीं करते). संकट यह था कि सरकार (मतलब यह पूरी व्यवस्था ही) लोगों के सामने इसके लिए बेपर्द हो रही थी कि उसने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिये थे और लोग देख रहे थे कि इस 'महाशक्ति' को एक अदना-सा अमेरिकी अधिकारी भी घुड़क सकता था. वाम दल अब नौटंकी करते-करते थक चुके थे और कोई दूसरी स्क्रिप्ट उन्हें नहीं मिल पा रही थी. रामसेतु इसी मौके पर त्राता के रूप में सामने आया.

मगर रामसेतु ने कई और सवाल भी खडे़ किये. इस पूरे प्रसंग पर लोगों ने यह कहा कि किसी की आस्था से छेड़्छाड़ ठीक नहीं. बिलकुल. आस्थाओं से क्यों छेड़छाड़ हो? यह ज़रूरी भी नहीं. कोई कुछ भी आस्था रखे, इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मगर जब इसी आस्था के नाम पर हज़ारों-लाखों का कत्लेआम किया जाने लगे (किया जा चुका ही है) तो इस आस्था को माफ नहीं किया जाना चाहिए. यह किसी की भी आस्था हो सकती है कि राम हुए थे, मगर इसे लेकर जब वह हत्याकांड रचने लगे तो फिर उसे यह बताना ज़रूरी है कि वह गलती पर है. ऐतिहासिक तौर पर यह साबित नहीं होता कि राम और कृष्ण का अस्तित्व था. कोई कुछ भी कहता और मानता रहे, वह मानने को आज़ाद है. मगर इससे इतिहास लिखनेवाले और वैज्ञानिक नज़रिया रखनेवाले अपनी धारणा क्यों बदलें? क्या एएसआइ यह मान ले कि राम का अस्तित्व था? भगवा ब्रिगेड तो यही चाहता है.
प्रोफेसर रामशरण शर्मा
प्राचीन भारत के इतिहास के प्रख्यात विद्वान हैं. वे उन इतिहासकारों में से हैं, जिन्होंने प्राचीन भारत के बारे में पुरानी धारणाओं और नज़रिये को बिल्कुल बदल डाला. इसीलिए वे हमेशा से भगवा ब्रिगेड के निशाने पर रहे हैं. उनपर कई जानलेवा हमले तक किये गये हैं. इस व्योवृद्ध इतिहासकार का एक लंबा व्याख्यान हम किस्तों में यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति के विभिन्न आयामों और राम-कृष्ण की ऐतिहासिकता पर विस्तार से चर्चा की है. यह व्याख्यान उन्होंने 1990 में काकतिया विश्वविद्यालय में हुए आंध्र प्रदेश इतिहास कांग्रेस के 14वें अधिवेशन में दिया था. इसका अनुवाद यश चौहान ने किया है. व्याख्यान का प्रकाशन पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने किया है. साभार प्रस्तुति.


सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या

आरएस शर्मा

ब राजनीतिक उद्देश्य से धर्म के नाम पर उसके अनुयायियों को उभारा जाता है तब सांप्रदायिकता का उदय होता है. अपने संप्रदाय की सुरक्षा के नाम पर दूसरे संप्रदाय के लोगों को सताना भी सांप्रदायिकता है. भारत में संप्रदायवाद को खास तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की प्रकृति की रोशनी में देखा जाता है, हालांकि हाल में सिख धर्म के आधार पर संगठित समुदाय को भी जोरों से उभारने की चेष्टा चल रही है.
प्रकृति द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं को हटाने के लिए मानव को अनवरत संघर्ष करना पड़ता है, जिससे धार्मिक विश्वास, कर्मकांड और रीति-रिवाजों का उदय और विकास होता है. उसी प्रकार सामाजिक मसलों पर मानव के विरुद्ध मानव के संघर्ष में भी धर्म और कर्मकांड उभरते व विकसित होते हैं. जब लोगों के लिए प्रकृति द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों की युक्तिपूर्वक विवेचना कर पाना कठिन हो जाता है, तो वे चमत्कारिक और अंधविश्वासपूर्ण स्पष्टीकरणों का सहारा लेने लगते हैं. इन्हीं से जन्म लेते हैं, अनेकानेक देवी-देवता. ऋग्वेद में वर्णित अधिकतर देव प्रकृति की या तो उपकारी या फिर अपकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

फिर जब किसानों, दस्तकारों और अन्य मेहतकशों की कमाई पर आधारित अपनी सत्ता और विशेषाधिकारों को बरकरार रखने में विशेषाधिकार-संपन्न लोग कठिनाई अनुभव करते हैं, तो वे कर तथा खिराज वसूल करने के लिए अंधविश्वास के इस्तेमाल के तरीके ढूंढ़ निकालते हैं. इसी तरह जब अभावों के बोझ से पिस रहे जनसमुदाय सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, तो वे देवता को सहायता के लिए पुकारते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास कराया जाता है कि देवता ने मुक्त और समान मानव प्राणियों का सृजन किया है. इस तरह, धर्म का प्रयोग समाज के विशेषाधिकार संपन्न और सुविधाहीन वर्ग, दोनों करते हैं. पर यह कार्य अधिकतर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग करते हैं, क्योंकि उनकी विचारधारा, जैसाकि भारतीय स्थिति में दरसाया जा सकता है, प्रभुत्वपूर्ण विचारधारा में तब्दील कर दी जाती है और जनता के दिलो-दिमाग में गहरे बिठा दी जाती है.

प्राचीन और मध्यकाल के पूंजीवाद पूर्व के समाजों में धर्म ने वही भूमिका निभायी, जो भूमिका आधुनिक काल के पूंजीवादी और अन्य समाजों में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएं निभा रही हैं. इस कथन का आशय यह नहीं कि पूंजीवाद पूर्व के राज्य धर्म शासित राज्य थे. उनकी नीतियां अधिकतर शासक वर्ग के आर्थिक व राजनीतिक हितों से निर्देशित होती थीं और खुद धर्म का इस्तेमाल इसी प्रयोजन से किया जाता था. इस तरह बौद्ध, ईसाई और इसलाम जैसे धर्मों के उदय ने और भी स्वस्थ दिशाओं में समाज व अर्थतंत्र में सुधार लाने व उसे पुनर्गठित करने में सहायता पहुंचायी. धर्मों द्वारा प्रतिपादित सामाजिक मानदंडों ने बेहतर सामाजिक प्रणालियां निर्मित करने के लिए जनता को प्रेरित किया. पर यह बात समझ लेनी चाहिए कि प्रत्येक धर्म खास किस्म के सामाजिक वातावरण की उपज होता है. इस तरह, बौद्ध धर्म द्वारा आम तौर पर समस्त प्राणियों और विशेष कर गायों की रक्षा पर जो जोर दिया गया, उससे ऐसे समय में सहायता मिली जब लगभग ईसा पूर्व 500 के बाद, गंगा के मध्य मैदानी भागों में बड़े पैमाने पर खेती में लौह उपकरणों का इस्तेमाल होने लगा था. लेकिन बौद्ध धर्म ने उन वर्ण आधारित भेदों को नहीं मिटाया, जो समाज के विभिन्न हिस्सों के बीच अतिरिक्त उत्पाद (अधिशेष) के असमान वितरण के फलस्वरूप पैदा हो गये थे. ब्राह्मण धर्म ने गाय की रक्षा के विचार पर ध्यान केंद्रित करके बौद्ध धर्म के हाथ से पहल छीन ली. बड़ी ही चालाकी से उसने यह घोषणा भी कर डाली कि ब्राह्मणों का जीवन भी गाय की तरह अति पवित्र है और फिर इस विचार को पुर्नजन्म के विचार के साथ जनता के दिमाग में ठोंक-पीट कर बैठा दिया गया. स्पष्ट ही, गाय की रक्षा के सिद्धांत ने उन जनजातीय क्षेत्रों में हल आधारित कृषि और पशुपालन को काफी उन्नत किया, जो क्षेत्र विजित करके और भूमि अनुदानों के जरिये, ब्राह्मणों के प्रभाव के तहत आ गये थे. लेकिन अब कृषि तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति के साथ सुरक्षा में प्राथमिकता की दृष्टि से स्वभावत: ही, मवेशी काफी पीछे रह गये हैं. आज पवित्र गाय का सिद्धांत हमारी आर्थिक प्रगति में अवरोध बन जाता है. हम या तो ऐसे पशुओं का ही पेट भरें जो आर्थिक रूप से अलाभकारी और अनुत्पादक हैं और या फिर उत्पादक कार्यों में संलग्न इनसानों का ही. इस बात पर अनेक प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने जोर दिया है. इस प्रकार हम भौतिक जीवन और विचारधारा की शक्ति के तकाजों के बीच परस्पर क्रिया को देख सकते हैं. पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आरंभिक इतिहास में बौद्ध धर्म ने सकारात्मक भूमिका निभायी और समाज को गति प्रदान की.

इसी तरह ईसाई धर्म ने दास और स्वामी के बीच समानता के सिद्धांतों का प्रचार किया, दोनों को ईश्वर की दुनिया में एक ही कोटि का प्राणी घोषित किया, पर रोमन साम्राज्य ने इस दोनों के बीच मौजूद वास्तविक सामाजिक विभेद का उन्मूलन करने के लिए कुछ भी नहीं किया. इसलाम धर्म ने विभिन्न अरब कबीलों और जनजातियों को एक ही राज्य में जोड़ कर प्रगतिशील भूमिका अदा की और उनके बीच लगातार चलनेवाले कबीलाई झगड़े-फसादों को काफी हद तक कम कर दिया. उसने अमीर और गरीब के बीच समानता के सिद्धांतों का भी प्रचार किया और यह आग्रह किया कि जकात (दान) व करों के जरिये अमीरों को गरीबों की मदद करनी चाहिए. पर इसलाम भी अपनी जन्मभूमि में मौजूद सामाजिक वास्तविकता की उपेक्षा न कर सका और उसे अपने अनुयायियों को अधिकतम चार पत्नियां रखने की अनुमति देनी पड़ी. यह कबीलाई मुखियों द्वारा 20-30 या उससे भी अधिक पत्नियां रखने से निश्चय ही बेहतर था. हालांकि इसलाम मूर्ति पूजा के खिलाफ था, पर उसे भी इसलाम पूर्व के मक्का में स्थापित संगे असवद की पवित्रता को स्वीकार करना पड़ा. अत: धर्मों को उन सामाजिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जिनमें वे जन्म लेते हैं.
क्रमशः

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  1. 12 टिप्पणियां: Responses to “ सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता ”

  2. By Asahmat on September 26, 2007 at 2:29 AM

    vampanthi vichardhara se prerit itihaaskaron ka udaharn na hi de to achha hai. unka sankuchit drishtikon unhe har mudde ko varg, sangharsh ki tarah dekhne ko prerit karta hai. Aur isi wajah se wo jo itihaas likhte hain usmen pakshapaat hota hai. Agar wo chashma utarkar dekhein to shayad unka bhi gyan vardhan ho aur hamara bhi. Videshon ke itihaaskar itihaas ki sachhai janne ki koshish karte hain. Hamare yahan ke itihaaskar itihaas ko apne tarike se paribhashit karne ki koshish karte hai. Sarsvati ko kya sirf isliye nakar dena chahiye ki use hindu dharm granthon mein varnit kiya gaya hai?
    Abhi tak jo itihaas ham padhte hain Ram usmein nahi hai. lekin 200 saal pahle to itihaas mein Mohan jo dado aur Harappa bhi nahi the.manta hoon ki dharm ke naam par logon ko bevkoof banaya ja raha hai aur sabse jyada chid un logon se hai jo ki apne dharm ka palan karne ke liye insaniyat ko nuksan pahuchate hain. lekin maaf kijiye main ramsharn sharma jaise kisi khas vichardhara se prerit itihaskaron ki baat manne se achah hai main raam ko hi maan loon

  3. By अनिल रघुराज on September 26, 2007 at 7:34 AM

    रेयाज़ भाई, अच्छी सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। चीज़ों को नए सिरे से समझने में मदद मिलेगी। इत्मीनान से पढ़ूंगा।

  4. By deepanjali on September 26, 2007 at 10:59 AM

    आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

  5. By Reyaz-ul-haque on September 27, 2007 at 12:27 PM

    @ असहमत
    बंधुवर अगर वामपंथियों का नज़रिया संकुचित होता है तो कृपया बतायेंगे कि व्यापक नज़रिया किसका या किनका होता है? आपको इतिहास और दर्शन की कितनी समझ है जो आप यह मान रहे हैं कि हर मुद्दे को वर्ग संघर्ष की दृष्टि से देखने पर वह संकुचित हो जाता है? और बंधु
    निष्पक्ष तो कुछ भी नहीं होता. यह भ्रम है आपका कि सब कुछ निष्पक्ष होता है या होना चाहिए. यह असंभव है. लोग (और आप भी ) हमेशा पक्ष लेते हैं. और अगर इतिहासकार भी जनता का पक्ष लेते हैं और विज्ञान का, तो वे कुछ भी गलत नहीं करते. आपने सरस्वती का ज़िक्र पता नहीं किस संदर्भ में किया है और यह भी अस्पष्ट रह गया है कि आप किस सरस्वती की बात कर रहे हैं. नदी का कि देवी का.
    ज़रूर, हड़प्पा और मोहनजोदडो के बारे में 200 साल पहले पता नहीं था, मगर इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि 200 साल पहले हड़प्पा और मोहन के अवशेष थे ही नहीं. वे थे, अपनी जगह पर थे और जब वहां खुदाई हुई तो वे मिले. मगर राम के अस्तित्व का कोई सबूत अब तक मिला ही नहीं है. जिन जगहों को राम से जोडा़ जाता है, उन जगहों में राम का जो काल बताया जाता है उस काल में आबादी के अवशेष नहीं मिलते हैं. जो मिलते हैं वे बहुत बाद के हैं. इसके अलावा खुद रामकथाएं इतनी भ्रामक हैं कि अकेले वे ही राम के अस्तित्व को नकार देती हैं. आप एस रंगनायकम्मा का विषवृक्ष : रामायण पढिये.

    अच्छा होगा, आप यह पूरी सिरीज़ पढ जायें.

    ... और वाम-दक्षिण के चक्कर में पड़ने के बजाय आप ऐतिहासिक तथ्यों के चक्कर में पडिए. वे आपको कभी धोखा नहीं देंगे. वैसे भी वाम विशेषज्ञों ने दुनिया को इतना दिया है, जितना किसी ने नहीं. अगर आप इसे देखना नहीं चाहते तो इससे उनका कुछ भी नुकसान नहीं होने जा रहा है.

  6. By Asahmat on September 30, 2007 at 11:10 PM

    bandhu, aapne bhi vampanthiyon wali chalaki khelna shuru kar di na.kisi mudde ko uthane wale ke baare mein saval utaho. use kaho ki wo kuchh nahi janta hai. main kya koi bhi yahan sampoorn gyani hone ka dava nahi kar sakta. aur maine to ye bhi nahi kaha ki main Ram ko aitihasik maanta hoon. Aur rahi baat vampanthiyon ke yogdan ki to bhai agar kisi itihaskar ne kisi kshetra mein kuchh yogdan diya hai to iska matlab kya ye hai ki ham uski har baat ko sveekar kar lein? Budhha ne bhi kaha hai ki meri baat ko aankh moondkar mat mano use parakho pahchano phir mano.
    Yahan main Sarsvati nadi ki baat kar raha hoon. mera sirf ye kahna hai ki jaroori nahi hai ki har myth ka itihaas ho , lekin bina khoj been kiye ye dharna lekar chalna galat hai.

  7. By Asahmat on September 30, 2007 at 11:22 PM

    aur jahan tak nuksan faide ki baat hai, mujhe batane ki aavshaykta nahi hai ki Ram ko jyada log jaante hain maante ya Ramsharan ji ko

  8. By dhruv on November 3, 2007 at 6:29 PM

    dekiye mitra aap ko ya kisi bhi tathakathit buddhijivi verg ko koi haq nahi ki voh ram ke bare mai kuch bhi backwash kare. ram hamare aaradhya dev hai aur hamare liye servasva bhi hai. agar aap apne aap ko buddhijivi samjte hai to please aapki 10vi pidhi mai jo mahanubhav ho gaye hai unka birth certificate blog per rakh ke dikhaye. mitra har ek ko ek dusare ke dharma ka sanmaan karna chahiye agar aisa kuch vishvaman karna hai to mai aapko khule me charcha ka padkar karta hu.yeh vampanthi chij kya hai bharat ke azad hone par bhi unki nishtha chin se judi hui hai.aise gaddaro ki backwash sunane ke hum aadi nahi hai

  9. By रामेन्द्र सिंह भदौरिया (ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु शास्त्री) on March 27, 2008 at 2:10 AM

    हमने तो राम को सुना है,हमने तो राम को देखा नही है,हमने तो राम को समझा है,हमने तो रामचरित्र को अपने जीवन में लाकर एक सुखी घर का संचालन देखा है,मगर इस दो अक्षर के नाम की इतनी महत्ता क्यों बढती चली गयी,वाम पन्थी हों,या दायें पन्थी,राज्य और राजनीति में सब कुछ जायज बताते है,यही हाल भारत का है,रामायण में कहा है,"राम न सकें नाम गुण गाई",जब राम खुद ही नाम का गुण बताने में असमर्थ है,तो हमारी तुम्हारी बिसात क्या है,जिस रामसेतु की बात करते है,वहां पर किसी भी द्र्ष्टि से देखा जाये तो आज भी समुद्र अपनी मर्यादा बांधे खडा है,रामेश्वरम में मैने देखा है कि हिन्दू और मुसलमान दोनो ही मंगलवार और शुक्रवार को मांस का प्रयोग नही करते है,धनुषकोटि के लिये आज से चालीस साल पहले रेलवे लाइन डाली गयी थी,लेकिन एक साल भी नही टिक पायी,बीस हजार व्यक्ति काल कवलित हुए थे,सबसे बडा सवाल पैदा होता है,कि जो अपने को हिन्दू बताते है,वे भी कितने हिन्दू रह गये है,धर्म को साथ रखकर केवल मानसिक धारणा को साफ़ रखा जा सकता है,राम की महिमा वही जान सकता है,जिसने दो अक्षर का मतलब समझा है,प्रकृति का कारण और निवारण दो अक्षर के शेष रहने से ही निकलता है,राम के भी दो अक्षर है,ईशा के भी दो अक्षर है,मौला के भी दो अक्षर है,आप के भी दो अक्षर ही शेष है,गिनकर देख लीजिये,अपने नाम के अक्षरों का योग करिये,उनमे चार का गुणा कीजिये,फ़िर पांच जोड दीजिये,फ़िर दो का गुणा कर दीजिये,और अन्त में आठ का भाग दे दीजिये,देखिये शेष दो ही बचेगा,तो मेरी प्रार्थना है,कि इस जरा मरण के दो कामों के अन्दर क्यों अपने को फ़ंसाये खडे हो,यह कलयुग है, कलयुग में काल दुकाल परें,बहु लोगनि भूख प्यास मरें,कुल्वन्तनि नारि निकारि सखी घर आनि बिराजति चेरी जती,जो कहुँ झूठ मसखरी जाना,कलजुग सोइ गुणवन्त बखाना

  10. By रामेन्द्र सिंह भदौरिया (ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु शास्त्री) on March 27, 2008 at 2:25 AM

    "जो नर मछली खात है,मुंडी पूंछ समेत ।
    तरि बैकुन्ठे जात हैं,नाती पूत समेत ॥
    जो तोको कांटा बुवे,ताहि बोइ तू भाला ।
    वो क्या समझे कि पडा किसी से पाला ॥
    किलो के घर में घुसत ही,चलो गयो है शेर ।
    तोला रत्ती चलि रहो,वाह ! सुनारी खेल ॥
    मांस की मन्डी भीड लगी,गीध मरे सब भूख के मारे।
    ट्रेक्टर जोते खेत रेल पे भीड बढी सब शहर सिधारे॥

  11. By स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ on June 24, 2009 at 4:05 PM

    आपने एक अच्छा कदम उठाया है, शर्मा जी के लेखों को यहाँ प्रकाशित करके, मैं अनुमति चाहता हूँ अपने ब्लॉग (स्वच्छसन्देश.ब्लागस्पाट.कॉम) पर इसे पोस्ट करने के लिए.....

  12. By jai prakash on October 13, 2010 at 2:59 AM

    reyaz-ul haq ram ki etihasikta ka nirnay tocourt se ho ja rha h. jra apne mohammad ki etihasikta ka pramad de sakte ho. kya tum uplabdh kra sakte ho koi dastavej jo yeh sabit krta ho mohmmad sahab kabhi paida bhi hue the. jis din mohammad ko court me ghasita jayega na sara ka sara gyan gayab ho jayega. ek pagal itihaskar ko prakkyat itihaskar kah dene se wo prakkyat nhi ho jayega.

  13. By Anonymous on April 27, 2014 at 3:44 PM

    अबे ओ मदर छोड़ तेरे अल्लाह की माँ छोड़ेंगे साले ....राम पे सवाल उठा रहा है और वाम पंथ की आड़ में इस्लाम का झंडा उठा रहा है.....गांड फार देंगे मादरचोद......बिहार में एक बार दंगा होने दो

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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