हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सिमरिया का सच - हुंकार का तिरस्कार

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/24/2007 12:10:00 AM

दिनभर सिमरिया में रह कर लौटा हूं. भाई रामाज्ञा राय शशिधर ने एक बडा़ आयोजन करवाया. मैनेजर पांडेय, अरुण कमल और अवधेश प्रधान ने रामधारी सिंह दिनकर पर बहुत कुछ अनकहा कहा. खैर वह सब एक ओर. भाई अपूर्व कृष्ण पिछले साल सिमरिया गये थे और उन्होंने कविता, दिनकर और सिमरिया को समेटते हुए एक दिलचस्प लेख लिखा है. वे बीबीसी हिंदी में हैं. प्रस्तुत है यह लेख. साथ की तसवीरें भी उन्हीं की खींची हुई हैं. हां एक बात इसी के साथ कि सिमरिया में इस एक साल में दो बदलाव आये हैं. एक-आज जब हम गये तो सड़क बन रही थी-क्योंकि गांव में कल (सोमवार को) कई मंत्री आनेवाले हैं. दूसरा यह कि वह घर जहां दिनकर जन्मे थे, अब नहीं रहा. उसे तोड़ कर अभी एक पक्के मकान का निर्माण हो रहा है. एक दालान बचा हुआ है जिसे दिनकर जी ने बनवाया था.

सिमरिया का सच - हुंकार का तिरस्कार
अपूर्व कृष्ण
कविता क्या है?...किसी धीर-गंभीर-चिंताजीवी-चिंतनजीवी से लगनेवाले प्राणी से ये सवाल किया जाए तो उत्तर में आत्मानुभूति-अनूभुति, अभिव्यक्ति-आत्माभिव्यक्ति आदि भारी-भरकम शब्दों के इर्द-गिर्द रहनेवाला एक उत्तर मिलने की संभावना सौ नहीं तो निन्यानवे प्रतिशत तो अवश्य रहेगी।























घर जिसमें दिनकर जन्मे थे. कुछ ही हफ़्ते पहले यह तोड़ दिया गया है.


लेकिन सामान्य प्राणियों की दुनिया में बिल्कुल नीचे से शुरू किया जाए तो किसी छुटके से स्कूली बच्चे के लिए कविता क्या है?...वो छुटकू तो तब अपने भाव को व्यक्त भी नहीं कर सकता। लेकिन थोड़ी उम्र होने पर शायद इस तरह की कुछ परिभाषा आएगी कि – ‘कविता कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं जिन्हें रटकर उगलना ज़रूरी था, ताकि परीक्षा में पास हुआ जा सके’। थोड़ा ऊपर की श्रेणी में जाएँ, जब छुटकू एक टीनएजर या किशोर बन जाता है, तो उसके लिए कविता ‘साहित्य-सरिता’ या ‘भाषा-सरिता’ जैसी पाठ्य-पुस्तकों में शामिल ऐसी पंक्तियाँ बन जाती हैं, जिनको रटने से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है उनकी व्याख्या को रटना। कवि ने कविता क्यों लिखी, इसको समझना, या रटना। वो भी गेस के हिसाब से, कि पिछले साल निराला की ‘भिक्षुक’ आ गई थी इसलिए उसे पढ़ना बेकार है। इस साल तो दिनकर की ‘शक्ति और क्षमा’ या बच्चन की ‘पथ की पहचान’ में से कोई एक लड़ेगी...फिर स्कूली शिक्षा समाप्त, जबरिया कविता की पढ़ाई समाप्त!


लेकिन छुटकू जब बड़ा होकर कॉलेज में आता है तो भी कविता से ख़ुदरा-ख़ुदरी वास्ता पड़ता ही रहता है। मसलन कोई वाद-विवाद प्रतियोगिता हो, कोई लेख हो, तो उसमें छौंक लगाने के लिए कहीं से छान-छूनकर दो-चार पंक्तियाँ लगाने के लिए कविता की आवश्यकता पड़ती है। एक तो भाषण में, लेख में चार चाँद लग जाएँगे, ऊपर से इंप्रेशन भी जमेगा, कि लड़का पढ़ने-लिखनेवाला है।


कुछ इसी तरह के माहौल में दिनकर जी की कविताओं से मेरा परिचय हुआ। स्कूली दिनों में दिनकर जी की कौन-सी कविता पढ़ी, बिल्कुल याद नहीं, ये भी हो सकता है कि उस साल दिनकर जी की कविता गेस में नहीं हो, इसलिए देखी तक नहीं। अलबत्ता एक लड़का था स्कूल में, जिसके बारे में चर्चा थी या कोरी अफ़वाह, कि वो दिनकर जी का नाती है। मैं भी लड़के को देखकर आया, लेकिन मुझे उसमें, एक छात्र जो अपढ़ाकू था, एक क्रिकेटर जो अगंभीर खिलाड़ी था और एक वाचाल जिसकी भाषा अश्लील थी, इसके सिवा कुछ ना दिखा। मगर हुआ ये कि दिनकर मेरे लिए पहेली अवश्य बन गए, बल्कि दिनकर जी का पहला इंप्रेशन तो निहायती अप्रभावकारी सिद्ध हुआ।



बहरहाल, कॉलेज के दिनों में भाषण और लेख में छौंक डालने के अभियान के दौरान मुझे - कविता क्या है - इस प्रश्न का उत्तर मिल गया। कविता मेरे लिए कुछ वे पंक्तियाँ बन गईं जो आपको हिलाकर रख दे, एक छोटा-सा ही सही, मगर झटका ज़रूर दे, आपकी तंद्रा भंग कर दे, आपको आत्मशक्ति दे, आपका नैतिक विश्वास डगमग ना होने दे, आपको एक अच्छा इंसान बनाने में मदद करे। और कविता की इस शक्ति से मेरा साक्षात्कार कराया दिनकर जी की कविताओं ने, जिनका एक कथन बाद में पढ़ा कि – “कविता गाकर रिझाने के लिए नहीं बल्कि पढ़कर खो जाने के लिए है”।


तब पढ़ी हुईं उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही याद हो गईं, बिना रट्टा मारे! छोटे-छोटे काग़ज़ के पर्चों पर स्केच पेन से लिखकर उनकी इन कुछ पंक्तियों को साथ रखा करता था –


“धरकर चरण विजित श्रृंगों पर, झंडा वही उड़ाते हैं,

अपनी ही ऊँगली पर जो, खंजर की ज़ंग छुड़ाते हैं,

पड़ी समय से होड़, खींच मत तलवों से काँटे रूककर,

फ़ूँक-फ़ूँक चलती ना जवानी, चोटों से बचकर, झुककर.”


और एक कविता से कुछ पंक्तियाँ थीं –


“तुम एक अनल कण हो केवल,

अनुकूल हवा लेकिन पाकर,

छप्पड़ तक उड़कर जा सकते,

अंबर में आग लगा सकते,

ज्वाला प्रचंड फैलाती है,

एक छोटी सी चिनगारी भी.”


एक और कविता थी –


“तुम रजनी के चाँद बनोगे, या दिन के मार्तंड प्रखर,

एक बात है मुझे पूछनी, फूल बनोगे या पत्थर?

तेल-फुलेल-क्रीम-कंघी से नकली रूप सजाओगे,

या असली सौंदर्य लहू का आनन पर चमकाओगे?”


पता नहीं साहित्य के धुरंधरों की दुनिया में इन पंक्तियों का कितना महत्व है, लेकिन एक सामान्य छात्र की सामान्य दुनिया में ये पंक्तियाँ कई कमज़ोर पलों का सहारा बनीं।



फिर छह साल बाद जब बीबीसी हिंदी सेवा के लिए काम करने लंदन आया तो एक दिन एक पुराने वरिष्ठ सहयोगी से पूछा कि क्या बीबीसी ने कभी दिनकर जी से कोई इंटरव्यू लिया था जो मैं सुन सकूँ। पता चला कि प्रख्यात प्रस्तुतकर्ता ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी ने एक बार लंदन में ही दिनकर जी का इंटरव्यू लिया था और उसकी कॉपी ओंकार जी के पास होनी चाहिए जो तबतक अवकाश प्राप्त कर चुके थे मगर बीच-बीच में बीबीसी के दफ़्तर आते थे। आख़िर मैंने श्रद्धेय ओंकार जी से एक दिन अपनी इच्छा बताई और मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा जब कुछ ही दिन बाद उन्होंने बिना किसी मान-मनौव्वल के अपनी जानी-पहचानी मुस्कुराहट के साथ दिनकर जी के इंटरव्यू का एक कैसेट लाकर मुझे सौंप दिया और ये भी बताया कि दिनकर जी का डील-डौल और व्यक्तित्व कितना प्रभावोत्पादक था। इस घटना के कुछ अर्से बाद ओंकार जी का स्वर्गवास हो गया। उनका वो अमूल्य उपहार अभी भी मेरे पास रखा है।


अब दिनकर जी की कद-काया के बारे में तो मैं दूसरों से ही सुन सकता था, लेकिन उनकी आवाज़ सुनने का मौक़ा मेरे सामने प्रस्तुत था। और सचमुच दिनकर जी की आवाज़ में वही गर्जना थी, वही तेज़, वही आह्वान जो उनकी कविताओं में महसूस किया जाता रहा है...


“सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं...” (स्कूली दिनों में सुना था कि एक किसी चटकारे प्रसंग में दिनकर जी ने ख़ुद कहा, या उन्हें किसी ने कहा इसी कविता के संदर्भ में दिनकर जी के गाँव का नाम लेते हुए कि – “सुनूँ क्या बंधु मैं गर्जन तुम्हारा, कि स्वयं सिमरिया का भूमिहार हूँ मैं”)


तो इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में दिनकर जी से नाता बना रहा। कभी “रश्मिरथी”, तो कभी “कुरूक्षेत्र”, तो कभी “हुँकार” को उलटता-पलटता रहा। “संस्कृति के चार अध्याय” को भी पढ़ गया जिसके आरंभ में नेहरू जी के साथ बेलाग ठहाका लगाते हुई उनकी तस्वीर है।


लेकिन मन में इच्छा थी उस माटी को देखने की जिसने दिनकर जी को पैदा किया, पाला-पोसा, आशीष दिया। ये इच्छा पूरी हुई पिछले साल दिसंबर में, जब काम के सिलसिले में बेगूसराय गया। बरौनी ज़ीरो माइल से राजेंद्र पुल की ओर बढ़ने पर बीहट बाज़ार के पास एक बड़ा सा गेट दिखा जिसपर दिनकर द्वार लिखा था, और उनकी कुछ कविताएँ भी लिखीं थीं। मैं रोमाँच से भर उठा, राष्ट्रकवि दिनकर का गाँव, सिमरिया!


चरपहिया गाड़ी गेट के नीचे से सरसराते हुए आगे निकली लेकिन कुछ ही दूर जाकर हिचकोले खाने लगी। रास्ता कच्चा पहले से था, या पक्का होने के बाद फिर से कच्चा जैसा लगने लगा था, ये बताना बेहद मुश्किल था। मगर रास्ते का रंग देखकर तो यही लग रहा था कि वो ना पक्का था-ना कच्चा, खरंजे वाली सड़क थी जिसमें शायद ईंटे बिछाई गई थीं किसी ज़माने में जो अब घिस चुकी थीं और अब उनपर धूल और मिट्टी का राज था। रास्ते के दोनों तरफ़ खेत थे, जो तब भी वैसे ही रहे होंगे जब दिनकर इन रास्तों से गुज़रे होंगे। मन था कि खेत, धूल-मिट्टी तथा आते-जाते लोगों, गाड़ी को निहारते बच्चों से डायरेक्ट आँखें मिलाऊँ लेकिन तेज़ उड़ती धूल के कारण गाड़ी का शीशा चढ़ाना ही पड़ा। गाड़ी हिचकोले खाते, धूल के बादल से लड़ती हुई आगे बढ़ती रही, मैं शीशे के पीछे से कभी आगे-कभी दाएँ-कभी बाएँ निहारता रहा। लेकिन रास्ता था कि ख़त्म होने का नाम ही ना हो और मैं सोच रहा था कि पता नहीं तब के ज़माने में दिनकर जी कैसे मुख्य सड़क पर आते होंगे क्योंकि तब क्या, अभी के दिनों में भी सिमरिया जैसे बिहार के गाँवों में अधिकांश लोगों के लिए बाज़ार तक आने-जाने का सबसे सुलभ साधन अपने ही पाँव हुआ करते हैं, या बहुत हुआ तो साइकिल।


आख़िर चरपहिया गाड़ी में बैठकर की गई एक लंबी सी प्रतीत हुई यात्रा के बाद हम पहुँच ही गए – दिनकर के जन्मस्थान। भारत में कवियों-लेखकों-कलाकारों के जन्मस्थानों की दशा पर जिसतरह की रिपोर्टें अक्सर आती रहती हैं, उनसे मुझे ये तो कतई उम्मीद नहीं थी कि दिनकर जी की जन्मस्थली पर उसतरह का कुछ भव्य होगा जैसा कि इंग्लैंड में हुआ करता है।


इंग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, जॉन मिल्टन, विलियम वर्ड्सवर्थ, चार्ल्स डिकेंस, जेन ऑस्टन आदि लेखकों-कवियों के जन्मस्थल-मरणस्थल से लेकर उनसे जुड़े दूसरे पतों की भी एक विशेष पहचान रखी गई है। दूर-दूर से लोग देखने आते हैं, कि अमुक पते पर, अमुक हस्ती जन्मा-मरा, या इतना समय बिताया, या कि वहाँ रहकर फ़लाँ कृति लिखी, आदि-इत्यादि। और तो और लंदन में तो आर्थर कॉनन डॉयल के विश्वविख्यात चरित्र शर्लक होम्स के नाम पर भी एक म्यूज़ियम बना है, बेकर स्ट्रीट के उसी पते पर जो कहानियों में उसका ठिकाना है। और ये तब जबकि शर्लक होम्स एक काल्पनिक चरित्र है। वैसे ये अलग बात है कि इन सारे स्थलों को देखने के लिए टिकट कटाना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार की व्यवस्था वहाँ है उसके लिए पैसे तो लगने स्वाभाविक हैं, इसलिए लोग टिकट कटाकर शेक्सपियर और जेन ऑस्टन के जन्मस्थलों और समाधियों को देखने जाते हैं।































सिर्फ़ तसवीरों में बचा है यह घर, इसका एक बडा़ हिस्सा अब नहीं बचा.


बहरहाल सिमरिया में ब्रिटेन सरीखी किसी व्यवस्था की तो मुझे उम्मीद नहीं थी, लेकिन जो दिखा उसकी भी कहीं से कोई उम्मीद नहीं थी। दिनकर के जन्मस्थल की एक-एक दरकती-जर्ज़र ईंट भारत में साहित्यकारों के साथ किए जानेवाले बर्ताव की जीती-जागती कहानी हैं। भरभराती-गुमसाई दीवारों के बीच से ले जाकर मुझे एक कमरा ये कहते हुए दिखाया गया कि यही वो गर्भगृह है जहाँ दिनकर का जन्म हुआ था। अब उस कमरे की हालत ऐसी कि सिर ऊपर करो तो साक्षात दिनकर यानी सूर्यदेवता के दर्शन हो जाएँ क्योंकि छत का नामोनिशान मिट चुका था। और दिलचस्प ये कि गर्भगृह में पता नहीं किस कारण से, दरवाज़े की चौखट में लगी साँकल में ताला लगा था। मज़े की बात ये थी कि जिस कमरे की भुसभुसाई चौखट में झूलती जंग लगी साँकल में उतना ही ज़ंग लगा ताला झूल रहा था, उस दरवाज़े के पल्ले ही नदारद थे! अलबत्ता बदहाल घर के बाहर एक चमचमाते काले संगमरमर की एक पट्टिका दिखी जिसपर लिखा था – ‘15 जनवरी 2004 को बरौनी रिफ़ाइनरी के सौजन्य से राष्ट्रकवि की जन्मस्थली के उन्नयन कार्य का श्रीगणेश हुआ’। शायद भगवान गणेश भी अपनी बदनामी पर आहत हो रहे होंगे!


दिनकर के जन्मस्थल की ये दुर्दशा देखकर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि लगभग सौ साल पहले सचमुच यहाँ साहित्य का एक ऐसा प्रखर दिनकर जन्मा था जिसकी आभा से सारा राष्ट्र आलोकित हुआ।


सिमरिया में दिनकर जी की पीढ़ी के कुछ लोगों का कहना था कि राष्ट्रकवि बनने के बाद भी दिनकर का सिमरिया से नाता टूटा नहीं था। लोगों ने बताया कि दिनकर जी के अपने रिश्तेदार अब पटना में रहा करते हैं। पटना में दिनकर जी के घर का या किसी अन्य स्मृति-स्थल का तो पता नहीं, वैसे एक दिनकर मूर्ति अवश्य है राजेंद्र नगर के पास, जिसका ज़िक्र अब केवल पता बताने के एक प्वाइंट के तौर पर हुआ करता है।


बात समझ में बिल्कुल नहीं आती कि दिनकर जी के घर की ऐसी हालत क्यों है। दिनकर जी स्वयं भी तीन-तीन बार राज्यसभा के सांसद रहे थे, फिर ये हाल कैसे है, क्योंकि आज के दिन में तो ये बात अपचनीय है कि किसी पूर्व सांसद का घर बेहाल हो। दिनकर जी के गाँव में, उनका जो टूटा-फूटा घर बचा है उसके चारों तरफ़ के सारे घर पक्के हैं। केवल एक घर कच्चा है – दिनकर का घर।


लेकिन शायद गाँधीवाद को स्वीकार करने के बावजूद युवाओं को विद्रोह की राह दिखाने के कारण स्वयँ को एक ‘बुरा गाँधीवादी’ बतानेवाले दिनकर संसद में पाँव रखकर भी नेता नहीं बन सके।


कैमरे में तस्वीरें, और मन में एक मायूसी लिए मैं वापस जाने के लिए तैयार हुआ। ये सोचता कि अगर राष्ट्रकवि के जन्मशती वर्ष में उसके जन्मस्थल का ऐसा तिरस्कार हो सकता है तो राष्ट्र के अन्य कवियों की कहानी बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।


मैं दिनकर के जन्मस्थल पर कोई रिपोर्ट करने के इरादे से कतई नहीं गया था। रिपोर्ट मेरे दूसरे सहयोगी कर रहे थे। लेकिन मेरे साथ सफ़र कर रहे एक स्थानीय पत्रकार को लगा कि शायद मैं कोई ‘स्टोरी’ ढूँढ रहा हूँ, इसलिए उसने मुझसे कहा – ‘आए हैं तो यहाँ एक रिपोर्ट कर लीजिए, एक चरवाहा है जो भैंसी भी चराता है और दिनकर जी की कविताएँ भी सुनाता है।’


मैंने धन्यवाद देकर उस सज्जन से कहा – ‘ना ठीक है, आप कर लीजिए।’


पत्रकार ने कहा – ‘हम तो पहले ही कर चुके हैं, सहारा-ईटीवी सबपर आ चुका है।’


मैंने कहा – ‘तो ठीक ही है, हो तो चुका है।’


पत्रकार ने हिम्मत नहीं हारी और कहा- ‘एक और कहानी है, पास में नौ साल का एक बच्चा है जो बड़ा-बड़ा आदमी को उठाकर बजाड़ देता है।’


मैंने मुस्कुराकर ना की मुद्रा में सिर हिला दिया और गाड़ी में बैठा। पीछे एक तिराहे पर दिनकर जी की, शीशे में चारों ओर से घिरी, एक साफ़-स्वच्छ स्वर्णिम मूर्ति, मौन मगर मुस्कुराती, हमारी गाड़ी को जाते देख रही थी। कुछ ही पलों में गाड़ी के चारों चक्के फिर कच्ची सड़क पर हिचकोले खाने लगे। धूल-मिट्टी उड़ने लगी। शायद नाच रही थी वो माटी भी, अपने ही एक सपूत की लिखी इस कविता की धुन में खोई -


“मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,

चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं

पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी,

समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं”.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ सिमरिया का सच - हुंकार का तिरस्कार ”

  2. By deepanjali on September 25, 2007 at 4:13 PM

    आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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