हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नहीं

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/13/2007 12:54:00 AM

एक अदालत से गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित करने का आदेश देनेवाले फ़ैसले की खबर आयी. हाल में अदालतों से कई ऐसी खबरें आयी हैं, जो हैरत में डालनेवाली लगती हैं. मगर वास्तव में वे ऐसी हैं नहीं. देश जिस तरह वैश्वीकरण के रास्ते पर ले जाया जा रहा है, सरकार की सैन्य सुरक्षा में बहुराष्ट्रीय कंपनियां और विश्व बैंक अपनी हत्यारी परियोजनाओं में आगे बढ रहे हैं- लोगों का उनके खिलाफ़ और व्यवस्था के खिलाफ़ प्रतिरोध भी बढ रहा है. इससे ध्यान बंटाने, लोगों की एकजुटता को भंग करने और उन्हें कई हिस्सों में बांट देने की सोची-समझी रणनीति के तहत देश में धर्मांधता को बढावा दिया जा रहा है-उकसाया जा रहा है. यह बहुत आजमाया हुआ तरीका है. राम सेतु का विरोध भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए. हां एक और बात- अदालतें अब अपने दायरे से बाहर निकल रही हैं. वे ऐसे मामलों में आदेश देने लगी हैं-जो उनके कार्यक्षेत्र में नहीं आते या प्राकृतिक तौर पर उनपर कोई अदालत फ़ैसला नहीं दे सकती. जैसे कि नामवर सिंह पर मुकदमा आदि का मामला या फिर अभी कल ही मिड डे पर वाइके सभरवाल मामले में छपी खबरों को लेकर अदालत का फ़ैसला. अगर अदालतें अपना दायरा लांघेंगीं तो फिर उनको कोई हक नहीं बनता कि वे दूसरों के लिए दायरे खींचें. और अगर अदालतें अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकतीं और एक लोकतांत्रिक समाज में इतनी भी सहिष्णु नहीं हो सकतीं तो फिर हम, मतलब जनता, जो कि किसी भी ऐसे तंत्र में समस्त शक्तियों का केंद्र है और सारी संस्थाओं की प्रासंगिकता उसी के कारण है, इनके प्रति सम्मान दिखाते रहने को बाध्य नहीं रह जायेगी. गीता प्रकरण पर प्रमोद रंजन का आलेख.


ब्राह्मणत्व की पुनर्स्थापना का षड्यंत्र

प्रमोद रंजन
चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: ।
तस्य क र्तारमपि मां विद्धयक र्तारमव्ययम् ।।
गीता के रचयिता ने यह श्लोक कृष्ण की ओर से कहा है. मतलब, मैं कृष्ण ही वर्णव्यवस्था का रचयिता हूं. मैंने ही गुण और कर्म देख कर चार वर्णों की रचना की. मैं उन सबका कर्ता हूं पर तुम मुझे अकर्ता ही जानो. यह श्लोक बताता है कि वर्णव्यवस्था किसी ब्राह्मण की रचना नहीं है, यदुकुल के कृष्ण ने इसे रचा है. साथ ही गीता का रचयिता यह भी संदेश देता है कि यह महान कार्य कोई यदुवंशी कर ही नहीं सकता. कुरूक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश साक्षात विष्णु देते हैं, यदुवंशी कृष्ण तो निमित्त मात्र हैं. इसलिए कृष्ण कहते हैं तुम मुझे अकर्ता जानो ! गीता ऐसे ही छलपूर्ण विरोधाभासों से भरी काव्य रचना है, जिसकी रचना का उद्देश्य ब्राह्मण मिथकों की पुनर्स्थापना था. पहली सहस्राब्दि के पूर्वार्ध में प्रख्यात बौद्ध विचारक नागार्जुन, असंग, वसुवंधु और अन्य गैर ब्राह्मण चिंतकों के प्रभाव के कारण खतरे में पड़े ब्राह्मणत्व को उबारने के लिए गीता की रचना की गयी. यही काम भक्तिकाल (16वीं शताब्दी) में तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना कर किया. भक्तिकाल में यह खतरा शूद्र कवियों कबीर, रैदास आदि की ओर से था. जिस तरह रामचरित मानस कोई मौलिक रचना न होकर रामायण की पुनर्व्याख्या है, उसी तरह गीता अद्वैत वेदांत की.

यह मानने का पर्याप्त आधार है कि इन दिनों गीता और तुलसीदास की पुनर्प्रतिष्ठा की जो कोशिशें चल रही हैं, उनके पीछे दलितों, पिछड़ों की ओर से ब्राह्मणवाद को मिल रही चुनौती से निबटने और ब्राह्मणत्व पुनर्स्थापित करने का षड्यंत्र है. गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित करने की कवायद भी महज एक न्यायाधीश की व्यक्तिगत सनक नहीं अपितु उसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है. न्यायालयों के प्रति पर्याप्त सम्मान के बावजूद हमारी यह शंका उस समय प्रमाणित होती है, जब हम इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एसएन श्रीवास्तव के गीता को धर्मशास्त्र घोषित किये जाने के फैसले और मीडिया में इसकी खबर की तारीखों को देखते है. न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने यह फैसला 30 अगस्त, 2007 को दिया. लेकिन मीडिया में यह खबर 11 सितंबर को आयी. इस बीच चार सितंबर को न्यायमूर्ति श्रीवास्तव सेवानिवृत्त हो गये.
यह एक सामान्य सार्वजनिक फैसला था, जिसके लिए किसी स्टिंग आपरेशन की आवश्यकता नहीं थी. पर्याप्त सनसनी तत्ववाली यह खबर 11 दिनों तक क्यों दबी रही? सामान्यत: तो बनारस के जिस पुजारी मुखर्जी की याचिका पर यह फैसला हुआ था, वह अथवा उसके वकील को ही यह खबर गदगद भाव से तुरंत मीडिया तक पहुंचा देनी चाहिए थी, लेकिन यह खबर 11 तारीख को फ्लैश हुई. 12 सितंबर को विश्व हिंदू परिषद द्वारा भारत बंद का आह्वान किया गया. इस खबर के मीडिया में आने और भारत बंद की तारीख में गहरा संबंध है. भारत बंद से ठीक एक दिन पहले इस खबर के फ़्लैश होने से गीता के उपरोक्त श्लोक की भांति ही एक तीर से कई निशाने सधे. पहला तो यह कि श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त हो जाने के कारण उन पर कार्रवाई का खतरा कम हो गया. दूसरा यह कि भारत बंद के हंगामे के कारण मीडिया में इस खबर को ज्यादा उछाले जाने की संभावना समाप्त हो गयी. यदि यह खबर अधिक चर्चित होती तो निहित राजनीतिक कारणों से इसका पुरजोर विरोध होता और न्यायाधीश पर कार्रवाई की संभावना बढ़ जाती. ऐसे में इस फैसले का कोई मूल्य न रह जाता. इसलिए सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटेवाली चालाकी की गयी. इस चालाकी के सफल होने पर उच्च न्यायालय के इस फैसले के ब्राह्मणवाद के पक्ष में एक थाती बन जाना तय है, जिसका उपयोग वे मामला ठंडा जाने के (संभवत: वर्षों) बाद करेंगे. यही उनकी मंशा भी है क्योंकि वे जानते हैं कि हिंदू धर्मों के दलित, पिछड़ों और अन्य धर्मावलंबियों से राजनीतिक स्तर पर मिल रही जोरदार चुनौतियों के बीच अभी गीता जैसे धर्मग्रंथ को, जो शूद्रों और स्त्रियों को दोयम दर्जे का मानता है और विधर्मियों के सफाये का संदेश देता है, पुनर्स्थापित करना संभव नहीं है. उनकी योजना इस लक्ष्य को सीढ़ी-दर-सीढ़ी हासिल करने की है. यदि भारतीय संविधान के मूल तत्व सेकुलरिज्म की धज्जियां उड़ानेवाले इस फैसले के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज नहीं होता तो निश्चित रूप से वे षड्यंत्र के इस सोपान पर सफल रहेंगे. इसिलए यह अनायस नहीं है धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाये ब्राह्मणवाद के समर्थकों की ओर से इस फैसले को नजरअंदाज कर देने की वकालत की जा रही है. ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना के षड्यंत्र की संभावना इस कारण भी बढ़ जाती कि गैर ब्राह्मण तबकों की राजनीतिक स्तर पर सक्रियता संसदीय व्यवस्था में कुछ महत्व पाने भर की है और इससे अधिक चिंताजनक यह कि सांस्कृतिक स्तर पर इनकी सक्रियता नगण्य है. जैसी की उम्मीद थी, गैर ब्राह्मण तबके में सामाजिक स्तर पर इस फैसले पर बेहद कम प्रतिक्रिया हुई. यदि उनमें सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ होता तो अपमानजनक शब्दों में उनका जिक्र करनेवाले, उन्हें एक मनुष्य के रूप में दूसरे, तीसरे और चौथे दर्जे में रखनेवाले ग्रंथ को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित किये जाने का जबरदस्त विरोध होता(इस फैसले की सूचना ही इसके लिए काफी होती, इसे चर्चित करने के लिए मीडिया का मुखाक्षेपी होने की आवश्यकता न पड़ती) जबकि हुआ इसके विपरीत. एक जातीय संगठन अखिल भारतीय यादव महासभा ने इस फैसले के लिए इलाहाबाद न्यायालय प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए समाचार पत्रों में बयान जारी किया. उनके इस बयान पर सिर्फ ईसा की वह सुविख्यात पंक्ति, जिसमें उन्होंने कहा था- हे प्रभु! उन्हें माफ करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं!

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ नहीं ”

  2. By Basant Arya on September 13, 2007 at 1:22 AM

    that is why i say god forgive them they dont know what they are doing

  3. By अनिल रघुराज on September 13, 2007 at 7:35 AM

    प्रमोद रंजन जी का विश्लेषण एकदम सटीक है। मेरा तो मानना है कि गीता या रामचरित मानस एक खास दौर की किताबें हैं। इन्हें उसी तरह पढ़ा जाना चाहिए। वैसे संस्कृत मेरी समझ में नहीं आती, लेकिन शायद गीता में शूद्रों और स्त्रियों को दोयम दर्जे का मानने की बात नहीं है। यह बात तो तुलसी के रामचरित मानस में है।

  4. By संजय तिवारी on September 13, 2007 at 8:16 AM

    श्रीमद्भगवगीता के बारे में एक टिप्पणी में कुछ नहीं लिखा जा सकता. लेकिन जिस श्लोक को के विस्तार में लेखक महोदय यह सब कह रहे हैं वे श्लोक को समझ ही नहीं पाये हैं. इसलिए उनके पूरे विवरण का कोई तुक नहीं है.

  5. By Sanjay Sharma on September 15, 2007 at 3:18 PM

    Geeta aur Ramayan hai kya, Ye Sant Kabir,Sant Raidas ke Sahitya se jana ja sakta hai. Hame gaur karna hoga kya Kabir,Raidas ek Inch bhi Geeta se alag huye hain ? Pramod Ranjan ya koi aur chahe jo bhi ugale swatantra hain.Brahmin ko koi fark nahi padta,Bharam tod liya jaaye to behtar Brahmin Means Vidwan and vidwan kahin bhi puja jata hai. Pramod ji puje ya na puje.Kya Kavir, Raidas brahamn ke dwara aadar ke saath nahi padhe jaate.

    Class/Division se Baukhalane waale
    Gentleman apane Ghar me jhanke 4 bhai me karm division kaise hai.

    Bahut kuchh likha ja sakta hai. magar chahta huin Geeta aur Ramayan
    ko Ek baar aur padha jaaye suna hai bahut Dimag ki jaroorat hai. usse samajhane ke liye.

    Brahmin ne Likha hai to kya kya likha hai,apane liye kya likha hai aur dusaron ke liye kya likha hai.
    Dusare ko haani kar raha hai to na padhe na.

    "Dhol gawar shudra pashu naari
    ye sab hai taadan adhikaari .

    Ka matlab galat liya gaya Dhol ko aap peet kar dekhiye bahut bura swar nikalega,koi vishesagya hi dhol baja pata hai.gawar ko kisi bhi jamaane me usaka baap bhi nahi maar sakta tha kyonki risk bana rahta hai reply milne ka Gawar ko kya pata kon peet raha hai baap ya public kahi copy paste na kar de.
    Naari kisi bhi saahitya me peetane ke kaabil nahi samjhi gai.Pashu Agar ghar me kuta ya billi ko maar kar dekhiye ek beeta ki billi kya haal kar deti hai.esliye he prabhu ! Galat arth na nikala jaaye. yehan Taadan ka arth "Vishesh Nazar" se hai.Maarne-peetane se nahi.
    Ant me Jaaki rahi Bhawna jaisi Prabhu murati Dekhi teen Taisi.

    Ramayan ko samajhane ke liye Sant MOrari Bapu se sampark sadha ja sakta hai.

    Apane andar bhi ek Sant baitha hota hai use jagaaiye sahi arth milta jata hai.

    Jay Ramayan ! Jay Geeta !!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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