हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सिस्टम बना रहा है नक्सली

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/06/2007 12:15:00 AM

स्टेन स्वामी झारखंड में मानवाधिकार के मुद्दों और नक्सलवाद पर लगातार लिखते रहे हैं. अपने हाल के इस लेख में वे विकास के अभाव और भ्रष्टाचार में आकंठ में डूबे तंत्र और नक्सलवाद पर नज़र डाल रहे हैं.

स्टेन स्वामी
न दिनों गांव में रहनेवाले लोगों का शांतिपूर्ण ढंग से जीवन जीना बहुत ही मुश्किल होता जा रहा है. इसकी वजह सरकार है और खासतौर पर पुलिस, जिसका आजकल एक सूत्री एजेंडा है उग्रवाद को काबू में लाना. हर दिन के अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस तरह की कहानियों से भरे पड़े हैं. कभी पुलिस पर उग्रवादियों के हमले, तो कभी उग्रवादियों पर पुलिस के हमले की खबरें. उग्रवादियों को तलाश करने और मारने की प्रक्रिया में समाज का हर व्यक्ति पुलिस की निगाह में संदिग्ध बन जाता है. यहां तक कि समाज के वंचित समूहों के अधिकारों के हिफाजत के लिए खड़े व्यक्तियों/समूहों/संगठन भी इसके शिकार होते हैं. ऐसे लोगों पर नजर रखी जाती है, उन्हें धमकाया जाता है और यहां तक कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार भी किया जाता है. यह सब कुछ उग्रवाद से लड़ने के नाम पर किया जाता है.

एक दूसरी चीज, जो सबसे परेशान करनेवाली है कि सरकार `संदिग्ध उग्रवादियोंं' और `संदिग्ध अपराधियों' को पकड़ने, पीटने, प्रताड़ित करने और हत्या कर देने के लिए अनुमति दे रही है और प्रोत्साहित कर रही है. यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है. इसका मतलब हुआ कि जिसको भी स्थानीय लोग बिना किसी सबूत के `उग्रवादी' या `अपराधी' समझ लेंगे, उसे प्रताड़ित कर सकते हैं या हत्या कर सकते हैं. इसका यह भी अर्थ हुआ कि न्यायेतर प्रक्रियाएं स्वीकार्य हैं. यह स्वयं राज्य को `आतंकवादी राज्य' बनाता है. कार्यशील प्रजातंत्र में न्यायपालिका को चाहिए कि वह सरकार और पुलिस के संविधानेतर व्यवहार पर रोक लगाये.
विद्वान बार-बार यह बताते रहे हैं कि नक्सलवाद की जड़ें जनता द्वारा महसूस किये जानेवाले सामाजिक असंतोष के भीतर हैं. यह सामाजिक -आर्थिक -राजनीतिक व्यवस्था है, जो राज्य में नक्सलवाद की वृद्धि के लिए जवाबदेह है. इसके बावजूद आज भी सरकार आर्थिक , सामाजिक क्षेत्र में असली विकास के लिए गंभीर नहीं है. चलिए कुछ उदाहरण देखें:
झारखंड में सिंचाई की स्थिति
कुल 79.71 लाख हेक्टेअर भूमि में से मात्र 38.44 लाख हेक्टेअर खेती की जमीन है. राज्य में सिंचाई के विकास के सरकारी प्रयास के नजरिये से देखें तो वर्ष 2002 से वर्ष 2007 तक 1239 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. खरीफ मौसम के दौरान 10.5 फीसदी (3.8 लाख हेक्टेअर), रबी मौसम के दौरान 5 फीसदी(1.9 लाख हेक्टेअर) और गरमी के मौसम के दौरान 1-2 फीसदी(0.73 लाख हेक्टेअर) जमीन सिंचित हुई.(स्रोत: प्रभात खबर 12 फरवरी, 2007)

90 फीसदी किसान अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपनी जमीन पर निर्भर हैं और उनमें से 90 फीसदी जमीनों में सिंचाई की सुविधा नहीं है. इसी का नतीजा है ग्रामीण इलाकों में भीषण गरीबी. ग्रामीण इलाकों में रहनेवाले किसानों की बेहतरी सरकार की जवाबदेही है. राज्य में 90 फीसदी आबादी इन्हीं की है. साफ है कि सरकार ग्रामीणो के मोरचे पर विफल रही है.
जब ग्रामीण गरीबी बढ़ती है और गांव के नौजवानों के पास रोजगार का कोई अवसर नहीं होता है, तब ऐसी स्थिति में उग्रवादी समूहों में उनके शामिल होने के आकर्षण को समझा जा सकता है. भारी खर्च और रक्तपात की कीमत पर नक्सलियों को मार गिराने के एक सूत्री एजेंडे पर काम करने के बजाय सरकार को खासतौर पर गांव के लोगों के जीवनस्तर में सुधार करने की तरफ अपना ध्यान लगाना चाहिए.

भ्रष्टाचार का सवाल
भ्रष्टाचार के हर पहलू की खबरों से अखबार भरे रहते हैं. जितना ज्यादा इसकी तह में जायेंगे उतना ज्यादा भ्रष्टाचार आप पायेंगे. इनमें से अधिकांश जनता का धन है जो चोरी कर लिया गया है. इस धन की वापसी और भ्रष्टाचारियों को सजा देने की अब तक कोई गंभीर कोशिश नहीं की गयी है. कई दिनों तक भ्रष्टाचार की कई क हानियां प्रेस में प्रकाशित की गयीं, और उसके बाद उसे पूरी तरह भुला दिया गया. फिर उसके बाद जिंदगी पुरानी पटरी पर पहले की तरह चलने लगी.

सच्चाई यह है कि भ्रष्टाचार खत्म किया जा सकता है, अगर सरकार इस मुद्दे पर गंभीर हो. मगर, सरकार ऐसा करेगी नहीं क्योंकि सत्ताधारी वर्ग का फायदा जीवन के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बने रहने में है. कोई किसी पर उंगली नहीं उठा सकता है, क्योंकि यहां हर किसी के पांव भ्रष्टाचार के दलदल में सने हैं. इस तरह से सारा समाज कमजोर हो जाता है. यह सामाजिक और आर्थिक रूप से समृद्ध वर्गों के लिए रास्ता बनाता है ताकि इस स्थिति का वे फायदा उठायें और खुद `नेता' और `शासक ' बनें.

इसीलिए सरकार और सत्ताधारी वर्ग लगातार `नक्सलवाद' की निंदा करेगी. इसके साथ-साथ वह भ्रष्टाचार का संरक्षण भी करेगी. समाज के हाशिये पर पड़े लोगों और गरीबों का दमन जारी रहेगा.
  • अनुवाद: विनय भूषण, प्रभात खबर से साभार

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ सिस्टम बना रहा है नक्सली ”

  2. By चन्द्रिका on September 7, 2007 at 12:10 PM

    सहमति...
    नहीं यह समकालीन शब्द नहीं है
    इसे बालिगों के बीच चालू मत करो
    जंगल से जिरह करने के बाद
    उसके साथियों ने उसे समझाया कि भूख
    का इलाज सिर्फ नींद के पास है!
    मगर इस बात से वह सहमत नहीं था
    बिरोध के लिये सही शब्द पटोलते हुए
    उसनें पाया कि वह अपनी जुबान
    सहुवाइन की जा़घ पर भूल आया है
    फिर भी हकलाते हुए उसने कहा-
    मुझे अपनी कविताओं के लिये
    दूसरे प्रजातंत्र की तलाश है
    सहसा तुम कहोगे और फिर एक दिन-
    पेट के इसारे पर
    प्रजातंत्र से बहर आकर
    वाजिब गुस्से के साथ अपनें चेहरे से
    कूदोगे
    और अपने ही घूँसे पर
    गिर पड़ोगे|
    क्या मैनें गलत कहा? अखिरकार
    इस खाली पेट के सिवा
    तुम्हारे पास वह कौन सी सुरक्षित
    जगह है,जहाँ खड़े होकर
    तुम अपने दाहिने हाँथ की
    शाजिस के खिलाफ लड़ोगे?
    यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी-
    दांये हांथ की नैतिकता से
    इस कदर मजबूर होता है
    कि तमाम उम्र गुज़र जाती है मगर गाँड़
    सिर्फ बांया हाथ धोता है
    और अब तो हवा भी बुझ चुकी है
    और सारे इश्तिहार उतार लिये गये है
    जिनमें कल आदमी-
    अकाल था! वक्त के
    फा़लतू हिस्सों में
    छोड़ी गयी फा़लतू कहांनियाँ
    देश प्रेम के हिज्जे भूल चुकी है
    और वह सड़क
    समझौता बन गयी है
    जिस पर खड़े होकर
    कल तुमने संसद को
    बाहर आने के लिये आवाज़ दी थी
    नहीं,अब वहाँ कोई नहीं है
    मतलब की इबारत से होकर
    सब के सब व्यवस्था के पक्ष में
    चले गये है|लेखपाल की
    भाषा के लंबे सुनसान में
    जहाँ पालों और बंजरों का फर्क
    मिट चुका है चंद खेत
    हथकड़ी पहनें खड़े है|

    और विपक्ष में-
    सिर्फ कविता है|
    सिर्फ हज्जाम की खुली हुई किस्मत में एक उस्तूरा- चमक रहा है
    सिर्फ भंगी का एक झाड़ू हिल रहा है
    नागरिकता का हक हलाल करती हुई
    गंदगी के खिलाफ

    और तुम हो, विपक्ष में
    बेकारी और नीद से परेशान!

    और एक जंगल है-
    मतदान के बाद खून में अंधेरा
    पछीटता हुआ
    (जंगल मुखबिर है)
    उसकी आंखों में
    चमकता हुआ भाईचारा
    किसी भी रोज तुम्हारे चेहरे की हरियाली को बेमुरव्वत चाट सकता है

    खबरदार!
    उसनें तुम्हारे परिवार को
    नफ़रत के उस मुकाम पर ला खड़ा किया है
    कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी
    तुम्हारे पड़ोसी का गला
    अचानक
    अपनीं स्लेट से काट सकता है|
    क्या मैनें गलत कहा?
    आखिरकार..... आखिरकार.....

    धूमिल की यह कविता मै टिप्पणी में इस लिये दे रहा हूँ ताकि नक्सलबाड़ी को बताया जा सके इस कविता का शीर्षक भी नक्सलबाड़ी है-

  3. By अजित on September 7, 2007 at 5:22 PM

    अच्छा लेखन। चंद्रिका जी के सौजन्य से धूमिलजी की शानदार कविता भी पढ़ी। आभार ...

  4. By ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ on September 10, 2007 at 4:36 PM

    आपकी बातें सौ फीसदी सत्य हैं। असल में आदमी दो चेहरों के साथ जीने का आदी हो गया है। धूमिल की संलग्न कविता इसका साक्षात उदाहरण है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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