हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

उधार के लम्हों में रंगरेलियां मनाता देश

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/03/2007 11:42:00 PM

पी साइनाथ को हम पढ चुके हैं पहले भी. इस बार वे बता रहे हैं कि किस तरह देश में तमाम समस्याओं को नज़रअंदाज़ करते हुए बेलगाम बाज़ारवाद और उपभोक्ता प्रवृत्तियों को बढावा दिया जा रहा है.

असंतोष भरा दशक

पी साईनाथ

निराली दुनिया है देहाती भारत! पिछले 60 वर्ष में हम सिर्फ तीन राज्यों को छोड़ कर कहीं भी कोई गंभीर भूमि सुधार या पहरेदारी सुधार लागू नहीं कर पाये हैं. मगर हम महज छह महीनों में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसइजेड) को हरी झंडी दिखा सकते हैं. हमारी आजादी के छठे दशक में ढांचागत और दूसरी असमानताएं अधिकाधिक गहरी होती जा रही हैं और देहाती भारत भारी विपदा में फंस गया है.

अभी चार हफ्ते पहले एक प्रमुख अंगरेजी दैनिक के मुखपृष्ठ का मुख्य समाचार गजब का था! चंड़ीगढ़ के एक नौजवान ने एक अनूठा (फैंसी) सेलफोन नंबर प्राप्त करने के लिए 15 लाख रुपये चुकाये थे. देखते ही देखते तमाम मीडिया हरकत में आ गया. शीघ्र ही टीवी पर हमें यह दृश्य देखने को मिला कि उस नौजवान के माता-पिता अपने सपूत की इस उपल्ब्धि की खुशी में लोगों को मिठाई बांट रहे हैं. अखबारों के मुखपृष्ठों पर समाचारों में इस तरह की बातें कही गयी थीं कि किस प्रकार यह भारत के नये आत्मविश्वास को प्रतिबिंबित करता है और कि किस प्रकार आर्थिक सुधार और उदारीकरण के दौर में इससे हमारा `धांसूपन' प्रकट होता है.
निश्चय ही इससे कुछ प्रकट होता है. वह यह कि अब हमारे यहां ऐसा एक तबका मौजूद है, जिसकी नजर में यह सर्वथा स्वाभाविक है कि देश की मुख्य पत्रिका विलास-वस्तुओं की खोज-खबर लेने और उसकी जानकारी पाठकों तक पहुंचाने का काम करे. इस पत्रिका में प्रकाशक की पाती में पाठकों को बताया गया था कि `500 वैगन गुरखा सिगारों की सीमित खेप 1,15,000 डॉलर प्रति डिब्बे के हिसाब से उपलब्ध है और ऊंट की हड्डी के बने 80 साल पुराने ये डिब्बे एक राजस्थानी महाराजा की मिल्कियत थे.'

भारतीय कृषक परिवारों का औसत मासिक प्रतिव्यक्ति खर्च 15 लाख रुपये से बहुत कम है और 1,15,000 डॉलर से तो बहुत-बहुत कम. वास्तव में वह निरा 503 रुपया है, जो कि ग्रामीण गरीबी रेखा से बहुत ऊपर नहीं है. यह तो राष्ट्रीय औसत हुआ, जिसमें बड़े जमींदार और पिद्दी पट्टीदार सबका समावेश है. साथ ही इसमें केरल जैसे राज्य भी शामिल हैं, जिनमें औसत प्रतिव्यक्ति मासिक खर्च का आंकड़ा लगभग दुगुना है. अगर केरल और पंजाब को छोड़ दिया जाये तो जो आंकड़ा प्राप्त होता है, वह तो और भी निराशाजनक है. बेशक शहरी भारत में भी असमानता का बोलबाला है और वह असमानता बढ़ती भी जाती है. मगर देहाती भारत पर नजर डालें तो वह असमानता सरासर उभर कर सामने आती है.

उन 503 रु का 60 प्रतिशत भोजन पर खर्च होता है. ऊपर से 18 प्रतिशत ईंधन, कपड़े, जूते-चप्पल पर. बचनेवाली तुच्छ रकम में से किसान दवा-दारु पर जितना खर्च करता है, उससे आधा शिक्षा पर खर्च करता है. यानी क्रमश: 34 और 74 रुपये. सो इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती कि `फैंसी' सेलफोन नंबर खरीदना देहाती भारतीय का महत्वपूर्ण शगल कभी बन सकेगा. ऐसे भी अनगिनत देहाती परिवार हैं, जिनके औसत प्रतिव्यक्ति मासिक खर्च का आंकड़ा 503 रुपये के बजाय सिर्फ 225 रुपये है. भूमिहीनों की मुसीबतें तो सरासर भयानक हैं.

असमानता हमारे लिए कोई नयी चीज नहीं है. किंतु जिस निर्ममता के साथ उसे बढ़ाया गया है, जिस आदर्शहीनता के साथ उसे गढ़ा गया है, जिस व्यापक पैमाने पर अब उसका अस्तित्व है और जिस तरह वह तमाम स्तरों पर पहुंच गयी है- सर्वोपरि स्तर पर भी- वह पिछले 15 वर्षों की विशेषता है. अभिजित बनर्जी और टॉमस पिकेरी ने अपने लेख `उच्च्तम भारतीय आमदनियां 1956-2000' में यह दर्ज किया है कि धनिकों (सर्वोपरि एक प्रतिशत) ने समग्र आय में अपना अंश (आर्थिक सुधार के वर्षों में) खासा बढ़ा लिया. मगर जहां 1980 वाले दशक में इस मुनाफे में पूरे वर्ग को हिस्सा मिला था, वहीं 1990 वाले दशक में भारी मुनाफा केवल चोटी के 0.1 प्रतिशत को हासिल हुआ. `1950 वाले दशक में चोटी के 1.01 प्रतिशत की औसत आय समान आबादी की औसत आय से 150-200 गुना अधिक थी. 1980 के दशक के आरंभिक वर्षों तक वह घट कर 50 गुना से कम रह गयी. मगर 1990 वाले दशक के अंतिम वर्षों में वह फिर से 150-200 पर पहुंच गयी. तमाम लक्षण यही बतला रहे हैं कि उसके बाद से स्थिति और बिगड़ी ही है.'

मुख्य कार्यपालक अधिकारियों (सीइओ) के वेतनों के बारे में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की विनम्र टिप्पणी पर उद्योग जगत ने जैसी बौखलाहट प्रकट की, वह इसकी झलक मात्र प्रस्तुत करती है कि इस प्रकार के विशेषाधिकार कितने बहुमूल्य हो गये हैं. अधिकतर अखबारों के संपादकीयों ने प्रधानमंत्री को खूब आड़े हाथों लिया.

इसलिए यह अचरज-भरी और ध्यान देने योग्य बात है कि संपत्ति के केंद्रीकरण के विषय में पिछले वर्षों में छपा एक अत्युत्तम लेख मॉर्गन स्टैनली के कार्यपालक निदेशक चेतन अहैया का लिखा (द इकोनॉमिक टाइम्स, जुलाई 2007) हुआ है. उसमें वे लिखते हैं, `हमारा यह मानना है कि बढ़ती हुई असमानता से जो सामाजिक तनाव-दबाव उपजता है, उसमें पिछले दशक में बढ़ोतरी हुई है. भूमंडलीकरण ने और पूंजीवाद के उत्थान ने उसे गति दी है.' वे महसूस करते हैं कि `बढ़ती असमानता के कारण उठती सामाजिक चुनौतियां' चिंताजनक प्रवृत्ति हैं. वे यह भी मानते हैं कि `संपत्ति में जो विषमता की खाई है, वह और अधिक तीखी' है. वे लिखते हैं, `हमारा विश्लेषण सूचित करता है कि पिछले चार वर्षों में संपत्ति में एक अरब डॉलर (सकल राष्ट्रीय उत्पादन के 100 प्रतिशत से अधिक) की वृद्धि हुई है और यह भी कि इस लाभ का बहुत बड़ा हिस्सा आबादी के बहुत ही छोटे हिस्से के हाथों में सिमट गया है.' डॉ अहैया का यह समझना ठीक ही है कि सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल हमारे अपनाये हुए कई रवैयों का परिणाम है. उदाहरण के लिए, कृषकों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसइएम) के मामले में.

देहाती भारत में जो ढांचागत असमानताएं बनी हुई हैं, यह सब उनके अलावा है. पिछले 60 वर्षों में हमने जमीन के मामले को सुलझाया ही नहीं, न वन और पानी के स्वामित्व के प्रश्न को ही. न व्यापक जातिगत और लिंगगत भेदभाव के सवाल को ही. हमने अपने यहां की ढांचागत और अन्य असमानताओं की बाबत असल में कभी कुछ किया ही नहीं. और अब तो हम उन्हें बदतर बनाने में व्यस्त हो गये हैं.

जब आर्थिक सुधार आरंभ किये गये, उस समय भी देहाती परिवारों के निचले 50 प्रतिशत के हाथों में कुल कृषि भूमि का 3.5 प्रतिशत से भी कम हिस्सा था और सबसे ऊपरी 10 प्रतिशत परिवारों के हाथ में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा जमीन थी. यह तो हुई समस्त कृषि भूमि की बात. अगर सिंचित भूमि का अलग हिसाब लगायें तो और भी डरावनी तसवीर उभरती है. अगर उत्पादक परिसंपत्ति को भी जोड़ लें, तो स्थिति बदतर हो जाती है. एक आकलन के अनुसार, 80 प्रतिशत देहाती परिवार या तो भूमिहीन या सबमार्जिनल या मार्जिनल किसान हैं. उनकी हालत को बेहतर बनाने के लिए पिछले 15 वर्षों में कोई काम नहीं हुआ है. उसे बदतर बनानेवाला काम बहुत कुछ हुआ है.

कृषि नीति देहाती भारत के लिए केंद्रीय महत्व की चीज है और उसका रुख क्या है, यह सर्वथा स्पष्ट है. हमारी कृषि नीति का मूलभूत विचार बिल्कुल सीधा है- कृषि को किसानों के हाथों से छीन कर बड़े-बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों के हाथों में मजबूती से थमा देना. प्रत्येक कदम, प्रत्येक नीति इसी विचार को आगे बढ़ाती है.
देश के इतिहास में होनेवाला सबसे विराट विस्थापन हम अपनी आंखों से देख रहे हैं. यह विस्थापन किसी बांध या खदान परियोजना के तहत नहीं हो रहा है. यह खेती में हो रहा है. और हमें इसका कोई अंदाजा नहीं है कि हम इन लाखों-करोड़ों लोगों का करेंगे क्या, जिन्हें हम कृषि भूमि से बाहर खदेड़ रहे हैं. खदेड़ने का काम टैंकों और बुलडोजरों के जरिये नहीं किया जा रहा है. हम तो बस छोटी जोत के लिए खेती को असंभव बना रहे हैं और इस तरह जिनकी आजीविका हम इतने उल्लासपूर्वक छीन रहे हैं, उनके लिए कोई भी विकल्प हम तैयार नहीं कर रहे हैं.

आजादी मिलने के बाद के शुरुआती वर्ष और कुछ नहीं तो भी उम्मीद-भरे वर्ष तो थे. उन वर्षों में कई सुधार हुए जो प्रभावोत्पादक भले न रहे हों, पर उल्लेखनीय अवश्य थे. साक्षरता, औसत आयुमान, और दूसरे मानव विकास सूचकांकों में उन्नति हुई. `जय जवान! जय किसान!' वह नारा था, जिसने युद्धकाल में ही सही, जनता का मन मोहा. इस बात को स्वीकार किया गया कि देश के भविष्य को किसान अपने कंधे पर ढो रहा है. कम से कम उस समय तो यही जान पड़ता था.

60 साल बाद आज देहाती भारत की सरासर दुर्दशा है. हरित क्रांति के ठीक पूर्ववर्ती काल से लेकर आज तक का सबसे विकट कृषि संकट इस समय धधक रहा है. मगर वह हमारे अभिजात वर्ग का ध्यान अधिक समय तक पकड़े नहीं रख पाता. खेती एकदम ढह पड़ी है. खेती में सार्वजनिक निवेश तो पहले ही सिकुड़ कर शून्य पर पहुंच गया था. रोजगार खत्म हो गये हैं. केवल राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम ने हाल के दिनों में थोड़ी-बहुत राहत पुहंचायी है. लाखों लोग कस्बों व शहरों की राह पकड़ रहे हैं. मगर वहां भी रोजगार के अवसर इक्के-दुक्के ही हैं. बहुतों की यह दशा है कि वे न कृषक हैं, न श्रमिक. छोटी-मोटी मजदूरी या घरेलू चाकरी करनेवालों का ठट्ठ जमा होता जा रहा है. एक आकलन के अनुसार, घरों में महरी का काम करने के लिए झारखंड से आयी दो लाख लड़कियां अकेले दिल्ली में हैं.

कर्जों पर भारी बंदिशों ने लाखों किसानों को दीवालियों की जमात में धकेल दिया है और यह हालत तब है, जबकि किसानों को नकदी फसलें उगाने को प्रोत्साहित किया गया था. सन 2003-04 में केरल में एक एकड़ जमीन में वेनीला उगाने की लागत उतही ही जमीन में धान उगाने की तुलना में 15 से 20 गुना अधिक बैठती थी. फिर भी किसानों को खतरों की उपेक्षा करके वेनीला की खेती अपनाने को प्रोत्साहित किया गया. वेनीला की कीमतें लुढ़क गयीं और कर्ज के द्वार बंद हो गये. वेनीला उगानेवाले ऐसे कई किसानों ने खुदकुशी कर ली है.

हम तो वे कदम भी नहीं उठा रहे हैं, जिनकी अनुमति सरासर अन्यायपूर्ण विश्व व्यापार व्यवस्था (डब्ल्यूटीओ) तक देती है. यही कारण है कि हमारे अपने किसानों को कपास जैसी अपनी पैदावार के लिए मिलनेवाली कीमतें मौसम-दर-मौसम कम होती जा रही हैं. अमेरिका अपने कपास-कृषकों को जो भारी आर्थिक इमदाद (सब्सिडी) देता है, उसका हम कोई विरोध नहीं करते. अमेरिका ने वर्ष 2001-02 में कपास की एक लाख से ज्यादा गांठें हमारे देश में लाकर पटक दीं. शुल्क (ड्यूटी) बढ़ाया नहीं जा रहा है. 30,000 एचआइवी विजाओं के लिए गरीबों के हितों का सौदा करने को हम खुशी से तैयार हो गये हैं.

सरकार बताती है कि सन 1993 से अब तक 1,12,000 से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं. सरासर कम कूता (अनुमान) होते हुए भी यह आंकड़ा काफी बुरा है. ये खुदकुशियां कर्ज के मारे की गयी हैं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण बताता है कि किसानों की ऋणग्रस्तता पिछले 10 वर्षों में बढ़ कर दुगुनी हो गयी है.

इस सबका कोई प्रतिरोध न हो रहा हो, इसके विरुद्ध कोई आवाज न उठायी जा रही हो, ऐसा भी नहीं. एक के बाद एक चुनाव में, एक के बाद एक विरोध-प्रदर्शन में जनता सरकारों को अपने विचार स्पष्ट बता चुकी है. वैसे राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम जैसी कुछ अच्छी बातें भी हुई हैं. मगर मुख्य रुझान बहुत जबरदस्त है और वह सर्वनाश की तरफ अबाधित गति से बढ़ रहा है. तबाही तो पहले ही वह मचा चुका है. मगर हम हैं कि हमारी दिलचस्पी 15 लाख रुपये में मिलनेवाले सेलफोन नंबर में है. शायद इसमें भी कुछ अर्थ है. वह फैंसी सेलफोन नंबर उधार के पैसे से खरीदा गया है और हम भी उधार लिये लम्हों में रंगरलियां मना रहे हैं.

अंगरेजी दैनिक `द हिंदू' में प्रकाशित, हिंदी अनुवाद प्रभात खबर से साभार

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ उधार के लम्हों में रंगरेलियां मनाता देश ”

  2. By अनामदास on September 4, 2007 at 3:18 AM

    साईंनाथ भारत के गिनेचुने पत्रकारों में हैं जो सचमुच पत्रकार हैं. मैं उन्हें सलाम करता हूं. उन्हें मैगसेसे से पहले पद्मश्री, पद्मभूषण मिलना चाहिए था लेकिन वह उनके लिए नहीं है, वह तो नेताओं का काला धन सफ़ेद करने वाले आर्थिक विशेषज्ञों, उनके बवासीर और हाइड्रोक्सील का ऑपरेशन करने वाले डॉक्टरों, उनकी महफ़िलों में नाचने गाने वाले कलाकारों, उनके ड्राइंग रूम के पेंटिग बनाने वाले चित्रकारों और उनके लिए भाषण लिखने वालों के लिए के हैं. धन्यवाद, साईंनाथ को हिंदी में पढ़वाने के लिए.

  3. By चन्द्रिका on September 4, 2007 at 8:19 AM

    रेयाज़ अभी मैं खम्माम हैदराबाद से फैक्त फाइंडिंग से लौटा हूँ,वहाँ भूमि सुधार की मांग कर रहे किसानों पर जिस बेरहमी के साथ गोलियांचलाइ गई है जो की भूमिहीन थे जिसमें28 जुलाइ को 7 लोगों की मौत भी हो गयी, कई लोग घायल हुये है हम आजा़दी कैसे मान ले कि हम आजा़दी के 60 वर्ष पूरे कर रहे है जिनको आजा़दी मिली है वो अंग्रेजी शासन में भी आजा़द थे वही सामंत लोग आजा़द हुये है जिन्हे थोड़ा समझौते करने पड़ते थे अंग्Rेजों से...... मै पूरी रिपोर्ट प्रकाशित करूगा......

  4. By अनूप शुक्ला on September 4, 2007 at 12:45 PM

    बहुत अच्छा लेख लिखा है साईंनाथ ने। हमको पढ़वाने का शुक्रिया।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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