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बीच सफ़हे की लड़ाई

अब मेरे पैरों के निशां कैसे हैं (राही मासूम रज़ा की याद)

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/01/2007 05:44:00 PM

आज राही मासूम रज़ा की जयंती है. राही को मैंने आधा गांव से जाना और फिर उसके बाद कटरा बी आर्ज़ू से. उनका शायद ही कोई किरदार हो जिसे भूला जा सकता हो. टोपी शुक्ला और ओस की बूंद और सीन 75, उनके तमाम उपन्यास अपने समय की चिंताओं से भरे पडे़ हैं. कटरा बी आर्ज़ू तो उनकी नायाब रचना है, जिसमें भारत के संसदीय ढांचे के अंदर और तमाम व्यवस्थाओं के रहते हुए भी फ़ासिज़्म के खतरे और उसके एक रूप के बारे में राही स्पष्टता से लिखते हैं. वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली उन्हें याद कर रहे हैं.





हिंदोस्तानियत
का सिपाही

कुरबान अली

डॉक्टर राही मासूम रजा अगर जिंदा होते तो अब 80 बरस के होते, लेकिन करीब 15 बरस पहले वे इस दुनिया से कूच कर गए. यकीन नहीं होता कि राही अब हमारे बीच नहीं रहे. इतनी जल्दी तो राही को नहीं जाना था, अभी तो उन्हें बहुत सारा काम करना था,` आधा गांव' का दूसरा अंक लिखना था, गंगा की गोद में खेलना था.

गंगौली(गाजीपुर) और अलीगढ़ जाकर रहना था. सांप्रदायिकता के खिलाफ जंग लड़नी थी और सबसे बढ़ कर अपने धर्मावलंबियों की संख्या बढ़ाने के लिए धर्म प्रचार करना था, जिसे वह `हिंदोस्तानियत' के नाम से पुकारते थे. दरअसल मेरी नजर में राही कोई लेखक, साहित्यकार, फिल्मी `डायलॉग' स्क्रिप्ट लेखक नहीं, बल्कि सही मायनों में एक सच्चे हिंदुस्तानी की मौत है, जिसे वह देश की सबसे छोटी अकलियत(अल्पसंख्यक) कहते थे.
राही को ज्यादातर लोग उर्दू शायर, `आधा गांव के लेखक तथा दूरदर्शन के धारावाहिक `महाभारत' के डॉयलॉग लेखक के रूप में जानते हैं. लेकिन राही की शख्सियत इस सबसे बिल्कुल मुख्तलिफ थी. फिल्मी लेखन व बंबई जाने पर तो उन्हें अलीगढ़ मुसलिम विश्व विद्यालय के उर्दू विभाग के कुछ संकीर्ण दिमागवाले प्रोफेसरों और पापी पेट ने मजबूर किया था. वरना वह तो अपने गांव गंगौली में रहना चाहते थे और ऐसे हिंदुस्तान का सपना देखा करते थे, जिसकी सियासत में मजहब की कोई जगह न हो और जहां हिंदोस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब (संस्कृति) सबसे ऊपर हो. उनके लिए गंगा सर्वोच्च थी, जिसे वह अपनी मां और देश की सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर मानते थे और शायद पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा गंगा का उतना सुंदर वर्णन किसी और ने नहीं किया, जितना राही ने. (राही ने एक जगह लिखा है मेरी तीन मांएं हैं- नफीसा बेगम, जिनके पेट से पैदा हुआ, गंगा, जिसकी गोद में खेला और अलीगढ़ यूनिर्वसिटी जहां पढ़ा)

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पहली सितंबर, 1927 को गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में जन्मे राही की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी. बचपन में टांग में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएचडी की. `तिलिस्म-ए-होशरुबा' उन कहानियों का संग्रह है, जो पुराने दौर में मुसलमान औरतें(दादी-नानी) छोटे बच्चें को रात में बतौर कहानी सुनाया करती थीं. पीएचडी करने के बाद राही अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे. यहीं रहते हुए राही ने `आधा गांव', `दिल एक सादा कागज', `ओस की बूंद',`हिम्मत जौनपुरी' उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी `छोटे आदमी की बड़ी कहानी'लिखी. उनकी ये सभी कृतियां हिंदी में थीं. इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य `1857' तथा छोटी-बड़ी उर्दू नzज़्में व गजलें लिखे चुके थे, लेकिन उर्दूवालों से इस बात पर झगड़ा हो जाने पर कि हिंदोस्तानी जबान सिर्फ फारसी रस्मुलखत (फारसी लिपि) में ही लिखी जा सकती है, राही ने देवनागरी लिपि में लिखना शुरू किया और अंतिम समय तक वे इसी लिपि में लिखते रहे.

राही पैदाइश बागी थे और ऐसी किसी चीज पर `कंप्रोमाइज' नहीं करते थे, जो उनके दर्शन ,विचार व सिद्धांत के खिलाफ हो. इसलिए उनकी ऐसे लोगों से कभी नहीं पटी, जो छोटी-छोटी बातों के लिए `कंप्रोमाइज' कर लेते हैं और दोगला चरित्र अख्तियार कर लेते हैं. अपनी साफगोई और बेबाकी के कारण राही को अलीगढ़ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग से निकाल दिया गया. उन पर आरोप लगाया गया कि वह बदकिरदार(दुश्चरित्र) हैं. असलियत यह थी कि उन्होंने अपनी मौजूदा विधवा पत्नी नैयर से प्रेम विवाह कर लिया था और यही बात अलीगढ़ के दकियानूसी लोगों को पसंद नहीं थी. इसी इल्जाम में राही को अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया. स्वयं राही के अनुसार ` वह तो दिल्ली में पनाह देने के लिए राजकमल प्रकाशन की मालकिन शीला संधू मौजूद थीं. नहीं तो उस भरी दोपहर में उन्हें पता नहीं कहां-कहां दर-दर भटकना पड़ता'.

आश्चर्य की बात तो यह है कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय के जिस उर्दू विभाग ने राही को बेइज्जत करके निकाला था, उसी उर्दू विभाग ने राही का सम्मान किया और उनकी शान में कसीदा पढ़ा गया. इसी स्वागत सम्मान में बोलते हुए राही ने कहा कि `एक समय था, जब मुझे इस विभाग से निकाला गया था और आज यही विभाग मेरा सम्मान कर रहा है.' अलीगढ़ के उर्दू विभाग ने राही का यह सम्मान `महाभारत' धारावाहिक' से राही को मिली प्रसिद्धि के बाद किया था.

अलीगढ़ छोड़ने के बाद राही ने नज्म की शक्ल में अपने दोस्त शैलेश जैदी को एक तवील खत लिखा था, जिसका शीर्षक था `चांद तो अब भी निकलता होगा.' इस खत में राही ने लगभग रोते हुए अपने शहर की खैरियत मालूम की थी और अपने दोस्त से पूछा था एक बच्चे की मानिंद कि विश्वविद्यालय परिसर का क्या हाल है? चांद कैसे निकलता है? और सूरज कैसे? और जिन पेड़-पौधों को मैं छोड़ आया था, वो कैसे हैं? इसी नज्म का एक शेर था-

ऐ सबा तू तो उधर से गुजरती होगी
तू ही बता अब मेरे पैरों के निशां कैसे हैं
और एक दूसरे शेर में पूरे शहर पर तंज (कटाक्ष) था-
मैं तो पत्थर था फेंक दिया, ठीक किया
अब उस शहर में लोगों के शीशे के मकां कैसे हैं?
अलीगढ़ छोड़ने के बाद राही कुछ समय के लिए दिल्ली में रहे. फिर वह रोजी-रोटी की तलाश में बबंई चले गये. यह दौर राही की जिंदगी का सबसे बुरा दौर था और शीला संधु व उनके दो-चार दोस्तों के अलावा राही का साथ देनेवाला कोई नहीं था. राही फिल्म लेखन को घटिया काम नहीं मानते थे,`सेमीक्रिएटिव' मानते थे इसलिए मैंने शुरू में कहा कि फिल्म लेखन राही का बुनियादी मकसद नहीं था जरिया-ए-माश (जीविकोपार्जन का तरीका) था. उनकी तड़प थी `हिंदोस्तानियत' की तलाश, जिसे वह अपने सीने से लगा कर ले गये.

राही की जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा देश का विभाजन था, जिसके लिए वह मुसलिम लीग, कांग्रेस और धर्म की राजनीति को दोषी मानते थे. उनके लिए सबसे बड़ा धर्म `हिंदोस्तानियत' थी और उसकी संस्कृति को यह अपनी सबसे बड़ी धरोहर व विरासत मानते थे. इस `हिंदोस्तानियत' को नुकसान पहुंचानेवाली वह हर उस शक्ति के खिलाफ थे, चाहे वह मुसलिम सांप्रदायिकता की शक्ल में हो या हिंदू सांप्रदायिकता की शक्ल में. इसीलिए वह अपने जीवन भर इन शक्तियों की आंख की किरकिरी बने रहे. अपने पहले उपन्यास `आधा गांव' में राही ने उन चरित्रों का बहुत ही सजीव चित्रण किया है, जो धर्म के नाम पर विद्वेष फैलाने, धर्म का राजनीतिकरण करने और अंतत: देश का विभाजन कराने में सफल रहे. राही के संपूर्ण लेखन में यहीं `कंसर्न' प्रमुखता से मिलते हैं. सांप्रदायिकता की राजनीति, देश का विभाजन, इससे उजड़े और प्रभावित हुए गरीब और साधारण लोग, खास कर संयुक्त पंजाब-बंगाल, उत्तरप्रदेश व बिहार के लोग. तबाह होती हिंदोस्तानी संस्कृति, गिरते हुए सामाजिक मूल्य, लुप्त होती ढ़ाई हजार वर्ष पुरानी सभ्यता वगैरह.

यों तो डॉक्टर राही मासूम रजा से मेरी कई मुलाकात हुई, लेकिन दिसंबर 1990 में हुई उनसे आखिरी मुलाकत अब तक एक ऐतिहासिक यादगार बन गयी है. उस समय उत्तर भारत खास कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक माहौल बड़ा तनावपूर्ण था. अलीगढ़ और असके आस-पास खौफनाक दंगे हो रहे थे. मैं चूंकि उन दंगो का ऐनी शाहिद (प्रत्यक्षदर्शी) था, इसलिए बहुत हताश और सहमा हुआ था. आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ रही थी. ऐसे निराशाजनक माहौल में राही ने मेरी हौसला आफजाई की. मैं उनसे बार-बार कह रहा था कि बंबई में बैठ कर आप वहां की स्थिति का सही अंदाजा नहीं लगा सकते, लेकिन राही लगातार कह रहे थे कि लोगों के एक-दूसरे से इतने गहरे संबंध हैं कि इन दंगों से टूटनेवाले नहीं हैं, उन्होंने कहा था कि लोग जब यह समझ जायेंगे कि धर्म का इस्तेमाल सत्ता पाने या अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए राजनीतिक लोगों ने किया है, तो फिर बलवे नहीं होंगे. आज सोचता हूं कि उत्तर प्रदेश के संदर्भ में उनकी यह टिप्पणी कितनी सटीक थी.

धारावाहिक `महाभारत' की स्क्रिप्ट लिखते समय राही ने व्यास के `महाभारत' को सौ से अधिक बार पढ़ा था. हिंदी-अंगरेज़ी, संस्कृत, फारसी, उर्दू लगभग उन तमाम भाषाओं में, जिनमें महाभारत उपलब्ध है. `गीता' लिखते समय वह अलीगढ़ आकर रह रहे थे. उनका कहना था कि गीता `महाभारत' का सार है और इसे वह सुकून से लिखना चाहते हैं. उसी समय बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बयान देकर राही पर आरोप लगाया था कि वह `महाभारत' को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं और कृष्ण के चरित्र को टि्वस्ट कर के दिखा रहे हैं. इस पर राही ने अटल जी को फोन किया और पूछा कि क्या आपने ऐसा बयान दिया है? और यह कि क्या आपने `महाभारत' पढ़ी है? अटल जी के `हां'कहने पर वह उन पर बिगड़ गये और कहा कि आप झूठ बोलते हैं. यदि आपने `महाभारत' पढ़ी होती , तो मुझे यकीन है कि आप जैसा पढ़ा-लिखा व्यक्ति यह बेहूदा बयान नहीं देता और अटल जी लाजवाब हो गये.

वैसे बहुत कम लोगों को मालूम है कि जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय पर बनी दूरदर्शन की `डॉक्युमेंटरी' फिल्म का स्क्रिप्ट लिखवाने के लिए बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी राही के घर गये थे. पहले तो राही ने यह स्क्रिप्ट लिखने से मना कर दिया, लेकिन आडवाणी के बहुत इसरार करने पर राही ने उस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी और जब आडवाणी जी ने उसकी फीस पूछी, तो राही ने कहा कि दिल्ली में आपके साथ एक वक्त का खाना खा लूंगा, यही काफी है.

राही का न होना मेरे लिए एक जाती सदमा है और उन तमाम हिंदोस्तानियों के लिए भी, जो अपने इस अजीम मुल्क , इस गुलशन को सर-सब्ज, खुशहाल और फलता-फूलता देखना चाहते हैं और जिन्हें इस अजीम मुल्क के इतिहास, इसकी संस्कृति, इसकी मिट्टी, इसके नदी-नालों से प्यार है. राही की याद उन सबको हमेशा सताती रहेगी.

प्रभात खबर से साभार

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  1. 10 टिप्पणियां: Responses to “ अब मेरे पैरों के निशां कैसे हैं (राही मासूम रज़ा की याद) ”

  2. By yunus on September 1, 2007 at 10:28 PM

    शुक्रिया राही साहब का जन्‍मदिन याद दिलाने के लिए ।

    मैंने राही साहब की लिखी एक ग़ज़ल अपने ब्‍लॉग पर चढ़ाई है ।

    सुनिएगा । एक शायर के रूप में वो कमाल के थे । जल्‍दी ही बाकी ग़ज़लें भी

    रेडियोवाणी पर सुनवाई जाने वाली हैं ।

  3. By अनूप भार्गव on September 1, 2007 at 10:43 PM

    राही साहब के बारे में इतनी सुन्दर जानकारी के लिये धन्यवाद ।
    उन की कविताओं की एक किताब पढी थी बचपन में 'मैं एक फ़ेरीवाला' नाम था (शायद) ।
    उसे काफ़ी ढूँढने की कोशिश की , लेकिन नहीं मिल सकी । यदि आप को जानकारी हो तो बतायें ।
    एक खूबसूरत नज़्म थी उस में ...

    मेरा नाम मुसलमानों जैसा है ,
    मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो ....
    ...
    ...
    ...
    ...लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है ,
    मेरे लहु से चुल्लू भर कर महादेव के मूँह पर फ़ैको,
    और उस जोगी से ये कह दो,
    महादेव ! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
    ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में गाढा , गर्म लहु बन बन कर के दौड रही है ।

  4. By Manish on September 2, 2007 at 1:20 AM

    मेरे शहर का अखबार इतना बढ़िया लेख छापता है! मन खुश कर दिया आपने रियाज़ साहब इस लेख को छाप कर। बहुत अच्छी जानकारी मिली।
    मुझे राही मासूम रज़ा की शायरी बेहद पसंद है। यूनुस भाई ने शुरुआत कर दी है..एक ग़ज़ल मै भी जल्द ही पेश करूँगा जो मेरे दिल के बेहद क़रीब है।

  5. By Udan Tashtari on September 2, 2007 at 2:43 AM

    आनन्द आ गया यह आलेख पढ़कर. संग्रहणीय. आपका बहुत बहुत आभार इस प्रस्तुति के लिये.

  6. By Manish on September 2, 2007 at 3:36 PM

    कल डां राही मासूम रज़ा की जिस ग़ज़ल का जिक्र कर रहा था, वो हम तो हैं परदेस में ही थी.
    आज उससे जुड़ी अपनी स्मृतियों के साथ अपने चिट्ठे पर पेश किया है।
    http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/2007/09/blog-post.html

  7. By अनूप भार्गव on September 2, 2007 at 8:39 PM

    ज़रा इसे भी देखें:
    http://anoopkeepasand.blogspot.com/2007/09/blog-post.html

  8. By Pratyaksha on September 3, 2007 at 10:20 AM

    बहुत बढिया लेख !

  9. By Neeraj Rohilla on February 6, 2008 at 11:25 AM

    पत नहीं ये पोस्ट कैसे छूट गयी थी । आज पढा तो मन खुश हो गया । आगे भी ऐसे ही हिन्दोस्तानियत में यकीन रखने वाले साहित्यकारों के बारे में लिखते रहें ।

  10. By Ashok Khurana on October 23, 2016 at 2:41 PM

    बेहतर है और रज़ा साहब की तारीफ़ में कम है,वह हकीकत में भारतीय थे,ढ़ोगी नहीं।

  11. By Ashok Khurana on October 23, 2016 at 2:41 PM

    बेहतर है और रज़ा साहब की तारीफ़ में कम है,वह हकीकत में भारतीय थे,ढ़ोगी नहीं।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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