हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भविष्य जनता के प्रतिरोध में है : सच्चिदानंद सिन्हा

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/20/2007 12:38:00 AM

वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा इस सितंबर में 79 वर्ष के हो गये. मुज़फ़्फ़रपुर में अपने गांव मणिका में एक छोटे-से पुराने मकान में रहनेवाले सच्चिदा बाबू इस उम्र में भी काफी पढ़ते हैं. हाल ही में उन्होंने पूंजी का अंतिम अध्याय नाम से एक किताब पूरी की है, जो जल्दी ही प्रकाशित होगी. इन्होंने 1986 में कोएलिशन इन पॉलिटिक्स नाम से किताब लिखी थी. उस समय कोई गंठबंधन पर सोचता भी नहीं था. जब हम उनके घर पहुंचे, वे रात का समाचार सुनने के बाद लालटेन की मद्धिम रोशनी में पढ़ रहे थे. प्रभात खबर के लिए गंठबंधनों पर विशेष सीरीज़ के लिए सच्चिदानंद सिन्हा से मैंने बातचीत की. प्रस्तुत है इस बातचीत के प्रमुख अंश. ये हाल ही में प्रभात खबर में प्रकाशित हुए हैं.

अभी जो गंठबंधन की राजनीति पूरे देश में चल रही है, उसे आप समग्र रूप में कैसे देखते हैं?

यह भारतीय राजनीति में कोई नयी प्रवृत्ति नहीं है. 1986 में ही इस पर मेरी एक किताब आयी थी कोएलिशन इन पॉलिटिक्स. उस समय कोई गंठबंधन पर सोचता भी नहीं था. 1985 में राजीव गांधी जीत कर आये थे और लोगों का कहना था कि अब देश में एक ही पार्टी का शासन होगा. विपक्ष का भी सफाया हो जायेगा. उस दौर में मैंने गंठबंधन की बात की थी. उस समय जो क्षेत्रीय पार्टियां उभर रही थीं, उन पर किसी की नजर नहीं थी. मैंने उन्हीं के आधार पर कहा था कि अब देश में एक जमात की सत्ता नहीं रहेगी. अब एक पार्टी का एकछत्र शासन खत्म हो जायेगा. असल में इस देश में इतनी भिन्नता है, सांस्कृतिक आधार पर भी तथा अन्य आधारों पर भी कि एक नीति से पूरे देश को चला पाना असंभव है. एक नीति में पूरे देश की राजनीति को समाहित कर पाना असंभव है. उसमें क्षेत्रीयता का पुट होना लाजिमी है. यह नहीं रहेगा तो राजनीति सफल नहीं हो पायेगी. इसी संदर्भ में मैंने बताया था कि दुनिया भर में हर जगह गंठबंधन बन रहे हैं और वे देश का शासन चला रहे हैं. दरअसल गंठबंधन अपने यहां भी काफी पहले से बनते आये हैं. आजादी के दौर में अगर कांग्रेस के स्वरूप पर गौर करें तो हम पायेंगे कि वह अनेक दलों का गंठबंधन थी. तो इस हम तरह देखते हैं यह कितना पहले से होता आया है.

राजनीति में गंठबंधन की आवश्यकता सामाजिक विकास के किस मोड़ पर और क्यों पड़ती है?
पूरे देश का हित तो एक जैसा नहीं होता न. बिहार में जिस तरह की जाति संरचना है, वैसी बंगाल में नहीं है. इसके साथ-साथ राजनीतिक विकास भी अलग-अलग हिस्सों में इतना भिन्न है कि एक राजनीतिक व्यवस्था के जरिये इसे एक जगह नहीं समाहित किया जा सकता है.भारत में जिस तरह का राजनीतिक विकास हुआ उसमें एक तरह के राजनीतिक तंत्र से हुकूमत नहीं चल सकती है. ऐसी अनेक छोटी क्षेत्रीय पार्टियां उभरेंगी ही जिन्हें एक जगह करना होगा. राजीव गांधी की जो सरकार बनी तो लोगों ने कहा था कि यह स्थिरता है, मगर मैंने इसी संदर्भ में कहा था कि यह अस्थिरता है. इतने विशाल देश में हर जगह का राजनीति का चरित्र भी भिन्न था. एकीकृत राजनीतिक सत्ता की संभावना देश में नहीं थी. इसलिए अंतत: ऐसी स्थिति उभरी कि सबको उसे कबूल करना पड़ा. देश की जो अंतर्निहित विविधता थी, उसमें लाजिमी था कि केंद्र या राज्य सत्ता के लिए विभिन्न दलों का गंठबंधन तैयार हो. इससे बचने का एक ही उपाय था कि देश पर तानाशाही थोप दी जाती, जिसमें सारे दलों को जबरन दबा दिया जाता. मगर लोकतंत्र में ऐसा संभव नहीं था. अगर आपको वास्तव में लोकतांत्रिक सत्ता चलाना है तो यह जो विविधता है राजनीतिक दलों के अंदर, उसे समेटना अनिवार्य है. यह हमारे लोकतांत्रिक विकास की अनिवार्य परिणति थी. मगर इसे शुरू में कबूल करने में दिक्कत रही. कांग्रेस ने इसे समय पर पहचाना नहीं. उसका एकछत्र राज था. इसीलिए इसे सामने आने में इतनी देर लगी.

अब जो गंठबंधन सामने आ चुके हैं और वे जिस सामाजिक समीकरण को अभिव्यक्त कर रहे हैं, उन्हें देख कर क्या लगता है कि समीकरण पूरा हो चुका या फिर प्रक्रिया जारी है और अभी इसका अंतिम स्वरूप आना शेष है?
आगे भी नये समूह उभरेंगे. एक ही दल में अलग-अलग जातीय टकरावों से अनेक दल बनेंगे जैसे विगत में जनता दल से टूट कर समता पार्टी, राजद और जदयू आदि दल बने. लोकतांत्रिक राजनीति में अलग-अलग समूहों की भावनाएं होती हैं और उन्हें समेटने की प्रक्रिया भी. निचले स्तर पर जो भावनाएं होती हैं उन्हें समेट कर स्पेस देना ही गंठबंधन की राजनीति है.
आपने कहा कि शुरू में इसे समझने में देर लगी कि गंठबंधन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही अनिवार्य हिस्सा है. क्या कारण रहे इसके?

शुरू में कांग्रेस का एकछत्र राज था. हालांकि तब डीएमके और वामपंथ कुछ जगहों पर उसे चुनौती दे रहे थे, पर केंद्र में कांग्रेस को कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली. पहली बार तब जनता पार्टी की सरकार ने कांग्रेस को एक बड़ी चुनौती केंद्र में दी. मगर जब जनता पार्टी का बिखराव हो गया तो कांग्रेस का पुनः एक छत्रराज हो गया. मगर इसके बाद सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी. 1985 में भी राजीव गांधी की लहर आयी थी तो वह सहानुभूति के वोटों पर आयी थी. उसमें एक कृत्रिम स्थायित्व था. वह भ्रमपूर्ण स्थिति थी. मैंने उसी समय कहा था कि स्थानीय हितों को समाहित करके ही राजनीति हो सकती है. वह आज सही साबित हो रहा है.
आप भी मान रहे हैं कि गंठबंधन वंचित समूहों को अभिव्यक्त करते हैं, जिन्हें बड़ी पार्टियां स्पेस नहीं दे पातीं. आज के गंठबंधनों से क्या लगता है कि अभिव्यक्ति के उस दायित्व को वे पूरा कर रहे हैं?

कुछ अभिव्यक्ति तो हो ही रही है. जैसे पंजाब में जो अकाली दल है, उसकी शक्ति के स्रोत जाट हैं जो प्रायः सिख हैं. पंजाब में सिख किसान हैं और व्यापारी हिंदू हैं. अकाली दल मूलतः किसानों की पार्टी है. कांग्रेस के शासन में जब कि सानों की बात नहीं सुनी गयी तो अकाली वहां मजबूत हुए और वे जीत कर आये. असम में असम गण परिषद बना पर वे असम के लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पाये तो लोग कांग्रेस के पास गये. उससे भी समाधान नहीं हो पाया तो वह अभिव्यक्ति अब उल्फा के जरिये हो रही है. इसकी दोषी सीधे तौर पर राष्ट्रीय पार्टियां हैं जो असंतोष का हल राजनीतिक प्रक्रिया से नहीं कर पायीं. देश में दलितों की स्थिति काफी खराब है. वे बेहद अमानवीय परिस्थिति में रह रहे हैं. उन्हें कोई सुविधा हासिल नहीं है. न उनकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था है और न जीवन की बुनियादी जरूरतों की. उनकी आवाज मायावती उठायीं, पर वे उनकी स्थिति में सुधार के लिए जरूरी बदलाव नहीं ला पा रही हैं. इसके लिए जरूरी अर्थव्यवस्था वे नहीं ला सकतीं. उनका सोच अभिजात वर्ग से जुड़ा हुआ है. उनका व्यवहार भी वही है. मायावती गरीब-दलितों की भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं कर पा रही हैं. अभी के गंठबंधनों में अगर इनकी आवाज को जगह नहीं मिली तो नये गंठबंधन बनेंगे. गंठबंधनों के बारे में खास बात यह है कि वे स्थिर नहीं होते. जैसी समाज की स्थिति उभर कर आयेगी, वैसे गंठबंधन भी शक्ल लेंगे. सारी दुनिया में यही नियम लागू होता है. इस मामले में अमेरिका की स्थिति थोड़ी भिन्न है. जो अंगरेज वहां बसे, उन्हीं के कारण इतनी एकरूपता दिखती है. फिर भी थोड़ी-बहुत भिन्नता तो वहां है ही. हमारा देश जितना बड़ा है उसके अंदर राजनीतिक तौर पर बिल्कुल एकरूपता नहीं ला सकते. वह तानाशाही के जरिये ही संभव है. सबकी भावनाओं की अभिव्यक्ति सिर्फ गंठबंधन की राजनीति में ही हो सकती है. जर्मनी और फ्रांस जैसे छोटे देशों में भी गंठबंधन की सरकारें हैं. यूरोप के अधिकतर देशों में ऐसा है.
गंठबंधनों के इस दौर में वंचित समूहों को अभिव्यक्ति तो मिली, मगर समग्र रूप में देखें तो राज्यों को इसका क्या लाभ मिला, खासतौर पर बिहार और झारखंड में?
लाभ इस पर निर्भर करता है कि कैसी पार्टियों का गंठबंधन है. झारखंड में तो हास्यास्पद स्थिति है. वहां कोई वैचारिक गंठबंधन नहीं है, व्यक्तियों का गंठबंधन है. यहां के मुख्यमंत्री भी निर्दलीय हैं. इस तरह गंठबंधन अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता. यह इस पर निर्भर करता है कि गंठबंधन किस तरह के दलों का है.एक दिलचस्प उदाहरण जर्मनी का है. वहां सोशल डेमोक्रेटिक तथा क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टियां मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टियां रही हैं. भूमंडलीकरण का इतना दबाव है कि पूंजीपतियों को काफी रियायतें देनी पड़ीं, कल्याणकारी राज्य को सीमित करना पड़ा. इससे 40 लाख लोग बेरोजगार हो गये. इसके बाद पिछला जो चुनाव हुआ उसमें इन दोनों के बीच बहुत हल्का फर्क रहा. उनकी राजनीति में कोई फर्क नहीं था. अब उन दोनों ने मिल कर सरकार बनायी और चला रहे हैं, जिसकी चांसलर एंजेला मर्केल हैं, जबकि कुछ ही साल पहले तक वे मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे.
इसलिए मैं कह रहा हूं कि गंठबंधन की अच्छाई और उससे मिलनेवाला लाभ इस पर निर्भर करता है कि वह लोगों की भावनाओं का कितना प्रतिनिधित्व करता है. गंठबंधन लोकतंत्र का एक अनिवार्य ढांचा है जहां विविध तरह के सामाजिक तत्व समाहित होते हैं.
बिहार में जो वर्तमान गंठबंधन है, उसके आधार पर आप क्या आकलन करते हैं कि वह बिहार की भावनाओं की अभिव्यक्ति करता है?

पहले की जो सरकार थी, उसे तो देखा ही है हम सबने. आज भी नीतीश केवल बयान ही देते हैं. उन्होंने ग्लोबल मीट भी करा लिया, पर गांव में तो कुछ भी अंतर नहीं दिख रहा है. मेरे गांव के गरीबों की हालत तो इधर खराब ही हुई है.
नीतीश कुमार विकास के उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर चंद्रबाबू नायडू चले थे. क्या भविष्य दिखता है इनका?
चंद्रबाबू नायडू ने जिस तरह काम किया, उसमें बाहर से पैसा आता है, कुछ युवकों को रोजगार भी मिलता है. शुरू-शुरू में तो यह सब चमत्कार की तरह दिखता है, पर वह सब कुछ समाज के सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के लाभ के लिए होता है. नीचे के किसानों की स्थिति इतनी खराब हो गयी कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी. इसी असंतोष का परिणाम है वहां नक्सली आंदोलन की मजबूती. जिस रास्ते पर नीतीश चल रहे हैं, उसमें सतह पर तो काफी चकाचौंध दिखाई देती है पर खेती में जब तक बदलाव नहीं आयेगा, लोगों का जीवन स्तर नहीं सुधरेगा तब तक विकास का कोई मायने नहीं. महाराष्ट्र भी इतना उन्नत राज्य है पर किसान सबसे अधिक आत्महत्याएं वहीं कर रहे हैं.
बिहार में पहले जो गंठबंधन था और अब जो गंठबंधन है, उसमें विशेष अंतर क्या है? बिहार में गंठबंधन किस हालत में है? क्या उससे विकास होगा?
कोई खास अंतर नहीं है. अतिपिछड़ों-दलितों की महिलाओं को पंचायत में आरक्षण दिया गया, पर जो एकल पद हैं उनके आरक्षण से महिलाओं का सशक्तीकरण तो नहीं हुआ, हां पंचायतों को कमजोर जरूर किया गया. मेरे गांव में एक दलित महिला मुखिया चुनी गयी है. बैठकों में वह नहीं जाती, उसके पति जाते हैं, जिनकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है. इसलिए अधिकारी उनकी सुनते नहीं और मनमाने फैसले ले लेते हैं. गंठबंधन तो सपाट हालत में है. जहां तक विकास की बात है, वे एनआरआइ से विकास करना चाहते हैं. भला वे कैसे करेंगे एनआरआइ से विकास? यहां न खनिज हैं और न बड़े उद्योग-धंधों के आधार पर यहां कुछ हो पायेगा. यहां छोटे उद्योगों से ही कुछ होगा. मगर नीतीश जी के सोच में दिखता है कि बिहार का विकास यहां की ऊर्जा और यहां के दिमाग पर नहीं हो सकता. महिलाओं के लिए यह सोच विकसित हुआ है कि नीतीश जी उनके लिए काम कर रहे हैं. इससे उन्हें सहानुभूति और समर्थन मिला है. मगर उनके राज में पंचायती राज व्यवस्था तो खत्म ही हो गयी है. यह बिहार की त्रासदी है. अभी जरूरत थी इस व्यवस्था को सशक्त करने की, मगर महिलाओं को दिये गये आरक्षण ने पंचायतों की रही-सही साख भी खत्म कर दी. वे कमजोर हुई हैं, ब्यूरोक्रेसी के हाथ में चली गयी हैं. हां एक फर्क जरूर है. लालू के समय में केंद्र से आया बहुत सारा पैसा लौट जाता था, खर्च नहीं हो पाता था. अब उसे नीतीश कुमार नौकरी देकर खर्च कर रहे हैं. मगर उन्होंने जो रास्ता अख्तियार किया है कि ठेके पर बहाली का, वह ग्लोबलाइजेशन के पैटर्न पर है. यह खतरनाक हो सकता है. जिनकी नियुक्ति हो रही है वे अनुबंध की अवधि में चाहेंगे कि नौकरी से जितना हो सके फायदा उठा लें. मतलब यह कि पैसा काफी खर्च हो रहा है, जो तत्काल दिखाई भी दे रहा है. लालू के समय में यह नहीं होता था. दलों के बारे में मेरी मान्यता है कि देश में जितने भी मुख्य दल हैं, बुनियादी तौर से उनकी नीतियों में कोई फर्क नहीं है. माकपा सहित सभी दल भूमंडलीकरण को लेकर चल रहे हैं. वे सब उसे कैसे भी लागू करने के प्रति दृढ़ दिखते हैं. सिंगूर में जो हुआ वह इसका एक अच्छा उदाहरण है. सेज नामक योजना विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ की नीति है. यह चीन से शुरू हुई. इसकी मूल नीति है कि औद्योगिक विकास को प्रश्रय दिया जाये और किसानों की जमीन किसी भी तरह ले ली जाये. हाल ही में मैं चीन के बारे में एक रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिसमें रिपोर्टर ने उसके औद्योगिक विकास की तारीफ की है पर उसका अनुमान है कि अगले 20-30 वर्षों में 40 करोड़ लोग गांवों से शहरों की तरफ पलायन कर जायेंगे. आखिर ऐसे विकास का क्या मतलब?
आरक्षण ने भारत के समाज को और राजनीतिक परिदृश्य को गतिशील किया. अब इसकी भूमिका किस तरह की रह गयी है?

इस सवाल के उत्तर के दो आयाम हैं. परंपरा से वर्ण व्यवस्था की वजह से अगड़ी जातियों को छोड़ कर बाकी लोगों को आगे बढ़ने से रोका गया था. पढ़ाई-लिखाई वर्जित थी पिछड़ों में. इससे उनमें शिक्षा का ह्रास हुआ. फिर उनके पढ़े- लिखे लोगों में चेतना आयी कि शिक्षा का प्रसार होना चाहिए. अंगरेजों के ही समय में जस्टिस पार्टी ने आरक्षण की मांग की जिसके प्रयासों से आरक्षण मिला. इसके बाद इधर 20-25 सालों से आरक्षण का नया दौर चला. लोगों को इसके आधार पर नौकरी मिलनी शुरू हुई. वे राजनीति में भी आने लगे. एक हद तक विकास हुआ. मगर दूसरा पहलू यह है कि अब पिछड़ी जाति के नेताओं की कोशिश है कि अगड़ी जाति के नेताओं की जमात में ही शामिल हो जायें. उनका ध्यान अपनी जाति पर नहीं है. वे ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते, जो आज के समय का सबसे बड़ा मुद्दा है.आरक्षण से एक हद तक प्रगति तो हुई कि वे वहां तक पहुंचे जहां से इन्हें वंचित रखा गया था, पर दलित अब भी भूमिहीन और विपन्न हैं. ये जो पिछड़ों के नेता हैं उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी कि गरीबी को कैसे हटाया जाये, इस पर विचार करें. फिर अगर वे ऐसा करेंगे तो उन्हें ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा, जो वे करेंगे नहीं. एक तबका, जिसे क्रीमी लेयर कहते हैं, सारी सुविधाएं उसी तक सीमित हो गयी हैं, नीचे तक वे पहुंचे ही नहीं पा रही हैं. यह तभी संभव होगा जब बुनियादी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन हो. मगर यह सब जिन पर करने का दायित्व है, वे अगड़ी जातियों के नेताओं की जमात में शामिल होने की सोच रहे हैं. पिछले उत्तर प्रदेश चुनाव में दाखिल कि ये गये कागजातों से पता लगा कि राज्य में सबसे अधिक संपत्ति मायावती की थी. दूसरे नंबर पर मुलायम थे. ये उस जाति के नेता हैं जो दिन भर मेहनत करता है तो दो जून भी मुश्किल से खा पाता है. बिहार में भी देखिए कि रामविलास पासवान कितने संपन्न हैं, जबकि उनकी जाति के लोग अब भी काफी दरिद्रता में रह रहे हैं. ऐसा इसलिए है कि रामविलास पासवान की तमन्ना इस अर्थव्यवस्था को बदलने की नहीं है. यानी इनकी स्थिति सुधारने की तमन्ना नहीं बल्कि उनकी भावनाओं को उभार कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश है.
अब तो मायावती भी ब्राह्मणों को रिझा कर सत्ता की महात्वाकांक्षी को और आगे बढ़ाने में लगी हुई हैं. मगर मूल बात है कि जब तक आर्थिक नीति नहीं बदलेगी, सिर्फ आरक्षण की बात कहने भर से दलितों-पिछड़ों का विकास नहीं होगा. कितने दलित पढ़े-लिखे होंगे कि वे आरक्षण से नौकरी पा सकेंगे? जब दलितों के लिए कोई जगह ही नहीं है तो आरक्षण से क्या होगा? उनके जीवन में सुधार के लिए वर्तमान आर्थिक नीतियों पर हमला करना होगा और फिर सभी जातियों के गरीबों की बात करनी होगी. मगर यह भी ये नेता नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनका वोट बैंक गड़बड़ा जायेगा.
इन आर्थिक नीतियों से भविष्य में सामाजिक स्तर पर क्या बदलाव आने की उम्मीद हैं?
अभी तो खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को मंजूरी दी गयी है. इससे हालत और खराब होगी. अभी होता यह है कि युवक कहीं कर्ज-उधार लेकर कोई दुकान खोल लेते हैं. पर वालमार्ट आदि के आने से उनकी स्थिति और बदतर हो जायेगी. अभी एक खबर आयी कि सतपुड़ा में बाघों का अभयारण्य बन रहा है. 150 गांव इसके दायरे में आ रहे हैं, जिन्हें विस्थापित करना है.
पहले तवा जलाशय बना था, उनको उसमें मत्स्यपालन का अधिकार काफी संघर्षों से मिला. अब वह जलाशय भी अभयारण्य के दायरे में है. आदेश हुआ है कि अब गांववाले जलाशय में मत्स्यपालन और डूब की खेती नहीं कर सकते. इस तरह सैकड़ों परिवारों की आजीविका छिन जायेगी. यह सब ग्लोबलाइजेशन से हो रहा है. वहां पर्यटक आयेंगे और मौज करेंगे. वह पैसा धनिकों की जेब में जायेगा. गरीबों को क्या मिलेगा?
भारत में राजनीति की एक और धारा है-नक्सल धारा. इसका भविष्य क्या देखते हैं?

इसका कोई भविष्य नहीं दिखता है. माओ की बात वे करते हैं. माओ ने सांस्कृतिक क्रांति की चीन में और आज वही चीन पूंजीवाद पर पहुंच गया है. ऐसे में देखें तो भारत में इसकी क्या जरूरत है कि यहां भी लाखों लोग मरें और फिर 50 साल बाद माओवादी शासन में आयें और पूंजीवाद की राह अपना लें.असल में जो सबसे गरीब तबका है इस देश का, उसे राहत नहीं मिल रही है.
नक्सलवाद के रूप में यह उसकी बगावत है. बस यही. और सिर्फ नक्सलवाद ही नहीं, कश्मीर, मणिपुर आदि का आतंक वाद भी इसी असंतोष का विस्फोट है.मगर इसके नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वह व्यवस्थित और सोची-समझी रणनीति के तहत नहीं हो रहा है. यह केवल भावनात्मक विस्फोट है जो स्थितियों से परेशान होकर वंचितों की बगावत है अपनी स्थितियों के खिलाफ. यह हम छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, असम, मिजोरम, उत्तरबंग, कामतापुरी में देख सकते हैं. मुद्दे अलग-अलग हैं पर वे सब एक हैं.
तो भविष्य किसमें है?
भविष्य जनता के प्रतिरोध में है. जनता ही कुछ करेगी. लैटिन अमेरिका में यह दिख रहा है शावेज और इवो मोरालेस के रूप में. मोरालेस पहला मूल निवासी है वहां का राष्ट्रपति बननेवाला. फिर निकारागुआ में भी उम्मीद दिख रही है. दुनिया में दिखाई दे रहा है कि अमेरिकी साम्राज्य के खिलाफ शक्ति उभर रही है.

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  1. 6 टिप्पणियां: Responses to “ भविष्य जनता के प्रतिरोध में है : सच्चिदानंद सिन्हा ”

  2. By अनिल रघुराज on September 20, 2007 at 8:55 AM

    भविष्य जनता के प्रतिरोध में है...दिक्कत ये है कि हमारे समाजवादी हमेशा निर्गुण बातें करते हैं। जनता का प्रतिरोध अचानक कहीं ऊपर से टपक तो नहीं पड़ेगा?

  3. By Srijan Shilpi on September 20, 2007 at 3:47 PM

    महत्वपूर्ण है यह बातचीत। धन्यवाद।

    जनता को सामूहिक प्रतिरोध के लिए प्रेरित कर सकें, ऐसे भरोसेमंद नेता कहां हैं? आज के सभी नेता तो जनता की सेवा के नाम पर अपनी मलाई खाने में लगे हैं।

  4. By ATUL on September 23, 2007 at 8:15 PM

    धन्यवाद रियाज जी
    सच्चिदा बाबू की नक्सली आन्दोलन का वैचारिक सकट पुस्तक का भी जिक्र हो तो अच्छा रहेगा. वैसे इन्टरव्यू बहुत अच्छा है.
    अतुल

  5. By Reyaz-ul-haque on September 24, 2007 at 12:31 AM

    अतुल भाई आप छपरावाले न? बढिया लगा आपको पाकर.
    आप लिखिए इस किताब पर कुछ, हाशिया के लिए. और नक्सलवाद के वैचारिक संकट पर (अगर कोई है तो) कुछ अधिक ही विस्तार से लिखिए. स्वागत है.

  6. By Reyaz-ul-haque on September 24, 2007 at 12:34 AM

    (एक और बात, रेयाज़ लिखने का रियाज़ ज़रूरी है. है न? )

  7. By संजय तिवारी on November 26, 2007 at 9:26 PM

    जनता का वह प्रतिरोध शुरू हो चुका है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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