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बीच सफ़हे की लड़ाई

सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-2

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/27/2007 11:58:00 AM

आज देखते हैं कि किस तरह देश के इतिहास को विकृत किया गया और उसमें आधारहीन बातों की मिलावट की गयी, जिनके आधार पर आज फ़ासिस्ट सांप्रदायिक गिरोह अपनी स्थापनाएं प्रस्तुत करते हैं. दूसरी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा
मय-समय पर, जब धर्म के पुराने सिद्धांत बदलती हुई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में संगत नहीं रह जाते, तो धर्मों में सुधार करने तथा उनके अनुयायियों से उन्हें स्वीकार्य बनाने के लिए आंदोलन चलाये जाते हैं.
आधुनिक काल में आर्य समाज, प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज इसके महत्वपूर्ण उदाहरण है. इनमें से आर्यसमाज आंदोलन सर्वाधिक महत्वपूर्ण जान पड़ता है. आर्यसमाज आंदोलन ने महिलाओं और शूद्रों पर, जिन पर कि वेदों का पठन-पाठन करने की पाबंदी थी और खास करके महिलाओं पर, जिन्हें कि बालविवाह व आजीवन वैधव्य का शिकार बनाया जाता था, लगायी गयी पाबंदियों के विरुद्ध अभियान चलाया. उसने मूर्ति पूजा का विरोध किया और उससे जनित बुराइयों के खिलाफ संघर्ष चलाया. आर्यसमाजियों ने काफी शोघ और अनुसंधान किया तथा अन्य सुधारकों के साथ मिल कर प्राचीन ग्रंथों से, खास कर वेदों से, अनेक ऐसे उदाहरण एकत्र किये, जिनसे हिंदू समाज में महिलाओं और निचले तबकों की स्थिति को ऊपर उठाने के लिए समर्थन प्राप्त हो. पर अब आर्यसमाज के प्रारंभिक संस्थापकों द्वारा हिंदू समाज के सुधार के लिए दरसाया गया, उत्साह नहीं रहा. उसकी जगह मुसलिम विरोधी अभियान ने ले ली है. इससे भी बुरी बात यह कि संसार के सारे बुद्धि-वैभव और उपलब्धियों को, आंख बंद कर, वेदों में ही स्वीकार करने की विचारग्रस्तता हावी है. इस तरह के प्रचार को कोई भी इतिहासकार, जिसे अपने को तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित करना होता है, गले के चे नहीं उतार सकता. जब तक इस तरह के घृणित प्रचार का तथ्यों और आंकड़ों द्वारा प्रतिकार नहीं किया जाता, जिनकी प्राचीन ग्रंथों में कोई कमी नहीं, तब तक शिक्षित समुदाय के लोगों दिमागों के संप्रदायीकरण को नहीं रोका जा सकता और शिक्षितों के प्रभाव में रहनेवाले साधारणजनों को भी भ्रमित होने से बचाया नहीं जा सकता. अन्य कारणों के साथ इस तरह के जहरीले धार्मिक प्रचार के चलते ही मध्यकाल में जेहाद हुए और कैथोलिकों व प्रोटेस्टेटों के बीच धर्मोन्मादपूर्ण युद्ध हुए. इस समय इस तरह का प्रचार भारत की राष्ट्रीय एकता के ध्येय के लिए खतरा खड़ा करता है.

पहली किस्त यहां पढें

औपनिवेशिक आधिपत्य के तहत एशियाई देशों के राष्ट्रवादियों ने, जो उस समय सभ्य देश बन चुके थे, जब औपनिवेशिक देश सांस्कृतिक रूप से बहुत पिछड़े हुए थे-स्वभावत: अपने अतीत से प्रेरणा ग्रहण की. भारत, अरब देशों, तुर्की और कई अन्य देशों में अभी यही हुआ. स्वतंत्रता सेनानी अपने देश के सामंती पिछड़ेपन तथा अपने शासकों की औद्योगिक -पूंजीवादी प्रगति से जरा भी विचलित नहीं हुए. उपनिवेदशवादियों की हुकूमत का प्रतिरोध करने के लिए उन्होंने अतीत की अपने देश की उपलब्धियों को याद किया. इनसे उन्होंने विश्वास और प्रेरणा हासिल की. भारत में और अन्यत्र यह कार्य कुछ खतरा मोल लेकर इतिहासकारों ने किया. अपने निरंकुश शासन को न्यायोचित ठहराने के लिए ब्रिटिश इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि भारतीय स्वशासन चला सकने में असमर्थ हैं और यह कि वे अपने समूचे इतिहास के दौरान निरंकुश सत्ता के आदी रहे है. इसके जवाब में भारतीय इतिहासकारों ने यह दरसाने की कोशिश की कि भारत में स्थानीय स्तर पर और राज्य स्तर पर भी, अनेक स्वशासित संस्थाओं का अस्तित्व रहा है. ब्रिटिश इतिहासकारों ने खास तौर से और पश्चिमी इतिहासकारों ने आम तौर से यह दावा किया कि सभ्यता के अनेक तत्व भारत में बाहर से आये थे. इसके जवाब में भारतीय राष्ट्रीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि उनकी संस्थाएं और सांस्कृतिक तत्व विशुद्ध देशीय थे. निस्संदेह, भारत के अतीत को अंगरेज़ों द्वारा मलिन करने के प्रत्युत्तरस्वरूप अच्छा शोध कार्य किया गया. राष्ट्रवादियों द्वारा भारत के अतीत की जो खोज की गयी, उसने देश के इतिहास के अनेक पक्षों को उजागर किया, किंतु साथ ही पुनरुत्थानवाद के कतिपय प्रबल तत्वों को भी उछाला.

प्राचीन भारत का अध्ययन करनेवाले कुछ प्रमुख इतिहासकारों में, जिन्होंने देशभक्तिपूर्ण स्थिति अपनाने का प्रयास किया, काशीप्रसाद जायसवाल, हेमचंद्र रायचौधरी और केए नीलकंठ शास्त्री आते हैं. जायसवाल पहले इतिहासकार थे, जिन्होंने प्राचीन भारत में गणतंत्रों के अस्तित्व के बारे में ठोस प्रमाण प्रस्तुत किये. इसी तरह नीलकंठ शास्त्री ने सबसे पहले चोलों और पल्लवों के तहत ग्राम और जिला स्तरों पर स्वशासन संस्थानाओं के महत्व को रेखांकित किया. ऐसे अनुसंधानों ने निश्चत ही उन लोगों की वाणी को मुखर किया, जो अंगरेजों की इस बात का खंडन करना चाहते थे कि भारत में निरंकुश शासन की ही परंपरा रही है. पर कभी-कभी ये लेखक विज्ञानसम्मत ऐतिहासिक पुनर्रचना की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाते थे. जायसवाल ने हिंदू राज्यतंत्र नामक अपनी पुस्तक का समापन इस सूक्ति से किया: जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी, जिसका अर्थ है कि जननी तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है. उन्होंने प्राचीन भारतीय राजनीतिक संस्थाओं का बड़ा ही प्रेरणाप्रद वर्णन प्रस्तुत किया. नीलकंठ शास्त्री ने तो ब्राह्मणों की सांस्कृतिक सर्वोच्चता तक पर जोर दिया है और कहीं-कहीं यह माना है कि हिंदू मुसलमानों से अधिक सहिष्णु थे, एक ऐसी उक्ति जो अब संप्रदायवादियों के बीच काफी चल पड़ी. जायसवाल, नीलकंठ शास्त्री और अन्य इतिहासकारों ने शकों और मौर्य युग के बाद भारत आनेवाले अन्य लोगों के विजातीय चरित्र पर भी जोर दिया. के गोपालाचारी ने सातवाहनों की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने शकों को इस आधार पर भारत में अपना पैर नहीं जमाने दिया कि वे विदेशी थे. इस तरह उनलोगों तक को, जो स्थायी रूप से भारत में बस गये और उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न अंग बन गये, विदेशी कहने का यह रवैया अब कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है तथा हिंदू संप्रदायवादी बार-बार मुसलमानों को विदेशी कहते हैं.
क्रमशः

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता-2 ”

  2. By ashutosh on September 27, 2007 at 1:42 PM

    itnee swachchha drishti!

  3. By रवीन्द्र प्रभात on September 27, 2007 at 2:13 PM

    मूँह में राम बगल में छुरी जो रखते वे
    पाते हैं सम्मान हमारी बस्ती में।

  4. By Reyaz-ul-haque on September 28, 2007 at 1:48 AM

    रवींद्र जी
    अच्छी तुकबंदी है (हालांकि ट्रेडिशनल ही है).

    ज़रा खुलासा कर देते तो अच्छा रहता. कुछ निर्गुण टाइप हो गया है.
    और आशुतोष जी आपका भी.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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