हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कितना ललितललाम यार है, भारत घोडे़ पर सवार है

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/26/2007 11:20:00 PM

रेयाज-उल-हक

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58 में उत्तर प्रदेश के ज़िले बस्ती के दीक्षापार गांव में जन्मे अष्टभुजा शुक्ल के लिए कविता करना कवियों की पांत में शामिल होने के लिए किया गया कोई अनुष्ठान नहीं है. कविता उनके अनुभवों से निकलती है-पर वे अनुभव खालिस निजी नहीं, अपने गांव और अपने परिवेश से जुडे़ हुए हैं. वे ठेठ और भदेस भारतीय मुहावरों और संवेदना के क वि हैं- ग्रामीण समाज जहां गुंथा-बझा होता है, अपने पूरे संघर्षों और पूरे संदर्भों के साथ.
कोई कविता अपने को खुद प्रमाणित करती है. वह समाज का कितनी दूर तक साथ देती है, यही कविता की असली कसौटी है.

रविवार की दोपहर बाद एक काव्यपाठ में कवि अष्टभुजा शुक्ल जब यह कह रहे थे-वे इसके तुरंत बाद पढ़ी गयी अपनी कविताओं के जरिये इसे साबित भी कर रहे थे. अपनी कविताओं के जरिये प्रकारांतर से उन्होंने यह भी बताया कि जो कविता समाज का साथ नहीं देती-उसका साथ समाज भी नहीं देता.
जसम
द्वारा आयोजित एकल काव्य पाठ में अष्टभुजा शुक्ला ने कविता पढ़ने की शुरुआत अर्थात पहाड़ से की. पहाड़ यहां एक संवेदनशील और जिम्मेवार भूमिका के साथ सामने आया है-छेनी से काटने पर अगर चिनगारी निकालने लगते हैं तो, पत्थरों की ओर से हम क्षमा मांगते हैं. यहां हम अर्थात पहाड़. अगली कविता में शुक्ला ने अपने पिता को याद किया-एक अच्छे लोक गायक और मां के नायक पिता को. इसके बाद की कविता में मां भी आयीं जिनकी धोती पिता की धोती से तीन गुनी ज्यादा चलती थी, सी-सी कर.
कवि की संवेदना के सूत्र एक तरफ ऊंट से जुड़ते हैं तो दूसरी तरफ वह चैत के बादलों के प्रति किसानों के रोष को भी प्रकट करता है. कहने की बात नहीं है कि यहां चैत के बादल सिर्फ चैत के बादल नही हैं. अष्टभुजा शुक्ला के यहां संवेदना कितने धरातलों और आयामों में यात्रा करती है, इसका एक उदाहरण है किलने नामक कविता. सूखे में बरसात और माई कविताएं भी लोगों को पसंद आयीं. अपने चर्चित संकलन पद-कुपद से अष्टभुजा जी ने कई पद सुनाये-भज आलोचक, कविजन खोज रहे अमराई, और नहीं अब सहनेवाली, पॉलीथीन अपना परिधान आदि. उन्होंने अपनी नयी कविता हाथा मारना भी सुनायी-जो बकौल अरुण कमल देश के धुर गांवों में पूंजीवाद के प्रभाव को रेखांकित करती है. काव्यपाठ की अध्यक्षता कर रहे कवि अरुण कमल ने कहा कि अष्टभुजा शुक्ल व्यवस्था विरोध के कवि हैं. उन्होंने कविता के पारंपरिक चरित्र में बदलाव लाया है.
पेश है आज कवि अष्टभुजा शुक्ल की कुछ चर्चित रही कविताएं. इनमें से एक कविता-भारत घोडे़ पर सवार है-के बारे में अरुण कमल ने बताया कि जब वह पहली बार छपी थी-आलोचना में, तो उस पर काफ़ी विवाद भी हुआ था, और अखबारों में बयान तक दिये गये थे. उन्होंने कहा कि यह शायद पहली कविता है जिसको लेकर अखबारों में इस तरह से बयान दिये गये. प्रसंगवश यहां यह भी बताते चलें कि इसी कविता को हमलोग पटना के नुक्कड़-चौराहों पर धरना, जुलूस, प्रदर्शनों और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गाते रहे हैं. यहां पटना में यह गीत अमिताभ के नाम से जुड़ गया है, जिन्होंने हमारा पहला परिचय इस कविता से कराया. तो अब कविताएं...ये कविताएं हमें समकालीन जनमत (पत्रिका) के संपादक सुधीर सुमन के सौजन्य से मिलीं.

















तसवीर में बायें से :
अष्टभुजा शुक्ल
, तीसरे स्थान पर अरुण कमल, बीच में सफ़ेद नीले कुरते में कथाकार हृषीकेश सुलभ. उनके आगे नीली शर्ट में कर्मेंदु शिशिर. सबसे आगे, सफ़ेद कुरते में (दायें) खगेंद्र ठाकुर. तसवीर अमृत जयकिशन की. प्रभात खबर से साभार.




लेकिन हमें

हमें भले ही पसीने में नहाना पड़े
लेकिन किसी को अंगराग न लगाना पड़े
हमें आधा खाना पड़े, आधा सोना पड़े, आधा पहनना पड़े
लेकिन हमें किसी के राज में न रहना पड़े
हमें भले ही दूसरों के जूते मरम्मत और पालिश करना पड़े
लेकिन हमें किसी को जूते पहनाना न पड़े
हमें भले फलों के बारे में ज्ञान कम हो
लेकिन हमें आम को इमली और इमली को आम न कहना पड़े
हमें होंठ सी लेने पड़े, आंखों से बोलना पड़े और
त्वचा से सांस लेनी पड़े
लेकिन तुम्हें प्यार के विरुद्ध कभी मुंह न खोलना पड़े.

गणित के कुछ प्रश्न

कोई दूकानदार
एक बोरी यूरिया में
एक बोरी पिसा नमक मिलाता है
तो उसकी आय
उसकी लागत की तिगुनी हो जाती है

वही खाद
एक लघु सीमांत किसान
जब अपने खेत में डालता है
तो उसकी आय
उसकी लागत की
आधी आती है
किसान की
किस पीढी़ का बच्चा
दूध भात खायेगा
एवं किस युग के किस चरण में
रामराज्य अथवा समाजवाद आयेगा?

भारत घोडे़ पर सवार है

एक हाथ में पेप्सी कोला
दूजे में कंडोम
तीजे में रमपुरिया चाकू
चौथे में हरिओम
कितना ललित ललाम यार है
भारत घोड़े पर सवार है

एड्स और समलैंगिकता की
रहे सलामत जोड़ी
विश्वग्राम की समता में
हमने सीमाएं तोड़ी
दुनिया पर एकाधिकार है
भारत घोड़े पर सवार है

आठ हजार जेन की मारूती
बिकी मुक्त बाजार
एक हजार पुस्तकें छप कर
पड़ रहीं बेकार
वैभव द्विज, रचना चमार है
जगद्गुरु उत्तम विचार है
भारत घोड़े पर सवार है

कहीं बलात्कार हो जाये
तो चुप रहना नारी जी
बूढ़ी होने पर मुआवजा
देंगे अटल बिहारी जी
तीस फीसदी पर विचार है
भारत घोड़े पर सवार है

तुम भी खालो हम भी खा लें
थोड़ा-थोड़ा देश बचा लें
जब तक जीयें झोंपड़ी-झुग्गी
तब तक अपनी सौंध उठा लें
लालू जी कैसा बिहार है
भारत घोड़े पर सवार है

चंद्रशेखर जी दा़ढी में
कुछ फंसे हुए हैं तिनके
बाल ठाकरे हार चुके
रुद्राक्षी दाने गिन के
कितना पक्का जनाधार है
भारत घोड़े पर सवार है

शासन और प्रशासन से ही
सड़क नहीं है खाली
बची-खुची जगहों पर बाबू
पुलिस पहुंचनेवाली
जनता की सरकार यार है
भारत घोड़े पर सवार है

दुनियावालों आकर देखो
यहां अहिंसा रोती
जाती हुई सदी में भारत
खोल चुका है धोती
आर्यपुत्र को रथ विकार है
हलो! फोन का कटा तार है
भारत कितना मजेदार है
भारत घोड़े पर सवार है.

कल पढिए अष्टभुजा शुक्ल से एक बातचीत तथा कुछ और कविताएं.
कवि की तीन कविता की किताबें अब तक आयी हैं- पद-कुपद, दुस्स्वप्न और चैत के बादल. इसके अलावा मिठउना(ललित निबंध संग्रह) अवधारणा एवं सृजन (ललित निबंध) भी उनकी कुछ अन्य किताबें हैं. उन्होंने अतिक्रमण नाम की लघुपत्रिका का भी संपादन किया है.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ कितना ललितललाम यार है, भारत घोडे़ पर सवार है ”

  2. By अभय तिवारी on August 27, 2007 at 7:30 AM

    बढ़िया!

  3. By चन्द्रिका on September 1, 2007 at 6:14 PM

    bahut vyastata me tha par adatan hashiye par ghoomte huye ye kavita padi kvita ke anya puto ko chhod de to kafi achchhi lagi....reyaj bhai

  4. By Pratyaksha on September 18, 2007 at 5:32 PM

    बढिया ! खासकर 'भारत घोडे पर सवार है'

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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