हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार के माथे पर और कलंक मत लगाइए साथी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/24/2007 11:20:00 PM

कुमार अनिल
कुछ दिनों पहले पटना से प्रकाशित एक प्रमुख हिंदी दैनिक के पहले पन्ने पर खबर छपी कि बेगूसराय के बाढ़पीड़ित अब जलदस्युओं से दहशत में हैं. खबर चौंकानेवाली थी. बिहार के माथे पर पहले ही गरीबी, पिछड़ेपन, जातीय हिंसा व पलायन के कलंक लगे हैं. अब ये जलदस्यु कहां से आ गये? खतरनाक लुटेरे, जो समुद्र में यात्रियों या मालवाहक पोतों को लूटते रहे हैं. खूंखार व निर्दयी. क्या बिहारी समाज और खास कर बेगूसराय आज भी 17 वीं या 18 वीं शताब्दी में जी रहा है. सच्चाई यह है कि ये तो हालात के बनाये टुटपुंजिये चोर हैं. बरतन व पुराने कपड़े चुरानेवाले साधारण चोर. लोगों के जागते ही भाग खड़े होते हैं. चोरी की घटनाएं भी उंगली पर गिनने लायक हैं. जलदस्यु की उक्त खबर को देख कर कोई समझेगा कि बिहारी समाज आज भी 18वीं शताब्दी में है. उसे हॉलीवुड की फिल्म पायरेट्स ऑफ कैरिबियन की याद आ सकती है.

इस बाढ़ में बेगूसराय ने एक नया उदाहरण पेश किया है. बसही में जब बांध टूटा, तो सबसे पहले आस-पास के नौजवान दौड़े. उन्हें आपदा प्रबंधन की कोई ट्रेंनिंग नहीं मिली थी. उन्होंने अपनी कमर में रस्सा बांधा, उसे किसी पेड़ से बांधा व गंडक की धार में कूद पड़े. सैकड़ों लोगों को जान पर खेल कर बचाया. ऐसा करनेवाले एक-दो नहीं सैकड़ों नौजवान थे. बचाव के दूसरे दौर, भोजन व जरूरी सामान पहुंचाने में भी उन्होंने सरकार व दलों को पछाड़ दिया. बसही से पहले मोहनपुर गांव है. इस गांव से चार-चार टीमें राहत का सामान रोज लेकर निकलती हैं.ऐसे गांवों की कमी नहीं है. स्थिति यह है कि रोटी-अचार का पैकेट बना कर दिन-दिन भर युवक नाव की खोज करते हैं. बेगूसराय से बसही के बीच 30 किमी की दूरी में जगह-जगह जनता ने अपनी पहलकदमी पर लंगर खोल दिये हैं. किसी अजनबी को देखते ही पूछते हैं, क्या आप बाढ़पीड़ित हैं. अगर हां कहा, तो वे आपको पकड़ कर कहेंगे कि चलिए, पहले खाना खा लीजिए. यह मदद के लिए जनता का उभार है. स्वत:स्फूर्त उभार.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बिहार के माथे पर और कलंक मत लगाइए साथी ”

  2. By tejas on August 26, 2007 at 8:24 AM

    dhanyavaad yeh samachar dene ke liye...we get many example, where people forget being human in such situations so it is important to celebrate such rare moments and happening, where these people went out of their way to support others.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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