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बीच सफ़हे की लड़ाई

'सच्चाई बयान करने से बचना आत्महत्या के समान है- तसलीमा नसरीन

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/24/2007 01:42:00 AM

तसलीमा नसरीन से मार्कस डैम की बातचीत

तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में हुआ हमला देश की अभिव्यक्ति की आज़ादी के ऊपर हमला था. देश में जिस तरह डेमोक्रेटिक स्पेस कम होता जा रहा है-कम किया जा रहा है, यह उसका एक ताजा नमूना था. प्रस्तुत है, उस हमले के बाद लिया गया तसलीमा का एक इंटरव्यू-जो द हिंदू के 16 अगस्त, 2007 अंक में छपा था. इसका अनुवाद अशोक यादव ने किया है. अशोक जी युवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं. यह अनुवाद हमें जनविकल्प के संपादक प्रमोद रंजन के सौजन्य से प्राप्त हुआ.

हैदराबाद के प्रेस क्लब में आप पर हुए हमले को आपने 'मौत से साक्षात्कार` कहा है. जीवन के प्रति आप के दृष्टिकोण पर इस घटना ने क्या प्रभाव डाला है?
इस एक घटना ने जीवन को ज्यादा कीमती बना दिया है. मौत से मेरी यह मुठभेड़ इतना नजदीक थी मानों मैं मौत से घूम कर आयी हूं. 30 मिनट की उस घटना के दरम्यान क्षण-प्रतिक्षण मैं यही सोचती रही कि मौत मुझे ले जाने आखिर आ ही गयी. मेरे दिमाग में यही बात घूमती रही कि मौत कैसी होगी, यातनाभरी या किसी अन्य तरीके से. जब मैं अंतत: बचा ली गयी तो मुझे ऐसा लगा मानों मैं मौत के जबड़े से निकल कर आयी हूं. मेरे लिए जीवन अपने उसूलों के लिए संघर्ष करने के लिए जीना है. मृत्यु ने इसका अंत कर दिया होता.

इस घटना ने जीवन के प्रति आपके दृष्टिकोण (अर्थात लिखने के लिए जीना) को गहरा किया है?

बिल्कुल ठीक कहा आपने. मैं जीती ही क्यों हूं? जब मेरे पास एक जीवन है तो इसे इस्तेमाल करने तथा ज्यादा अर्थवान बनाने की जरूरत है. यह कोई पहली बार नहीं है जब मुझे मौत की धमकी मिली है. मौत की पहली धमकी 1989 में मिली जब मैंने गंभीरता से लिखना शुरू ही किया था. तब से मेरे साथ मार-पीट की कोशिशें तथा गाली-गलौज, दोनों हुई हैं. मुझे अपना वतन छोड़ना पड़ा. मेरी रचनाओं को प्रतिबंधित किया गया, मैं निर्वासन में जी रही हूं, लेकिन मैं अपने विश्वास से डिगी नहीं हूं. ऐसी विपत्तियों ने मुझे मजबूत ही किया है. लेकिन हाल में हैदराबाद का हमला सबसे भयानक था.

मैं केवल मानवतावादी नहीं बल्कि मनुष्य भी हूं. यह घटना दु:स्वपन की तरह मेरा पीछा कर रही है. इस घटना को याद कर मैं भीतर से कांपने लगती हूं.
खास कर एक लेखिका के तौर पर लगतार भय तथा सुरक्षा में जीना क्या मायने रखता है? क्या इससे आपकी आजादी बाधित हुई है?

कब तक मैं एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश भटकती रहूंगी? 13 सालों से मैं ऐसी ही जिंदगी जी रही हूं। मैं कुछ समझ नहीं पाती. कठमुल्ले कोई एक नहीं, बल्कि हर जगह मौजूद हैं. उनके हाथ लंबे हैं. क्योंकि वे मुझे अपना दुश्मन मानते हैं, इसलिए मौत के साये में हमेशा रहना पड़ता है. उनको पछतावा हो रहा है कि मैं बच गयी. उन्होंने सिर कलम करने का फतवा फिर जारी किया है. मैं कहां जाऊं? मैं केवल जीना तथा मन से लिखना चाहती हूं.

हां, मुझे सुरक्षा दी गयी है. इसके चलते मैं प्रतिबंध में जीती हूं. क्या एक सामान्य व्यक्ति की तरह घूमना-फिरना, बाजार जाना तथा दोस्तों से मिलना मैं नहीं चाहती हूं? एक अर्थ में ऐसा जीवन जीना कठिन है, लेकिन दूसरे अर्थ में मैं ज्यादा संकल्पशील बनती गयी हूं, लिखने की प्रतिबद्धता बढ़ती गयी है. मेरे शब्दों को गंभीरता से लिया जा रहा है, तभी तो मेरे ऊपर हमले हो रहे हैं, अन्यथा इन हमलों की और क्या वजह हो सकती है? सच चोट करता है और कुछ लोग को सचमुच चोट पहुंची है, इतनी चोट पहुंची है कि सच से दूर भाग कर मेरे पीछे लग गये हैं. लेकिन मेरे लिए सच्चाई बयान करने से बचना तथा नहीं लिखना आत्महत्या के समान है.

सच चाहे जितना कड़वा क्यों नहीं हो, लेकिन मामला चोट लगने से निश्चय ही ज्यादा का है.
मेरे खिलाफ घृणा का अंतहीन प्रचार है-पुरुषवादियों से लेकर तत्ववादियों और धार्मिक जुनूनी-सभी मेरे पीछे पड़े हुए हैं. इस्लामी तत्ववाद के खिलाफ बोलने का मैंने, बहुत बड़ा खतरा उठाया है, लेकिन ऐसा मैं एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम समाज को चेतना देने तथा यह दिखाने के लिए कह रही हूं कि ज्यादा उदारतावादी विकल्प मौजूद हैं.

इसलिए हैदराबाद जैसे हमले लगभग अवश्यंभावी हो गये हैं. मेरे दुश्मन केवल मुस्लिम तत्ववादी ही नहीं बल्कि इसके अलावा अन्य धर्मों में भी मौजूद हैं. हिन्दू और ईसाई उग्रवादी जो कि समानता के खिलाफ हैं, वे भी मुझ पर प्रहार करते हैं. बांग्लादेश में 1991 में बने Smash Taslima Committee (तस्लीमा को मारो कमिटी) की तरह कमेटियां भी मौजूद हैं. उनका उद्देश्य मुझे खत्म करना है.
मुझ पर हमला करने की दूसरे देशों, इंग्लैंड और यूएस के विश्वविद्यालयों में भी; योजनाएं बनी हैं-औरतों के अधिकार तथा समानता को लेकर मेरे लेखन और संघर्ष के कारण.

ऐसी ताकतें पूरी दुनिया में बढ़ रही हैं. कई मामलों में सरकारें तथा राजनीतिज्ञ दोषी हैं. राजनीतिक लाभों के लिए अल्पसंख्यकों को अक्सर तुष्ट किया जाता है, उनके भीतर की हिंसा को अक्सर माफ किया जाता है. तथाकथित उदारवादी, बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा भी इनको बचाने के नाम पर धार्मिक उग्रता को छुपा समर्थन देते हैं.

ऐसा अल्पसंख्यकवाद अंतत: तत्ववाद तथा दकियानूसी को प्रोत्साहन देता है, जिससे जागृति को नुकसान पहुंचता है. जब तक अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में नहीं मिलाया जाता है तब तक वे अलग-थलग रहेंगे और असिहष्णुता तथा पोंगापंथ भी जीवित रहेगा.
हैदराबाद हमले के खिलाफ बुद्धिजीवियों का विरोध ज्यादातर शांत ही रहा.

विरोध ज्यादा तीखे होने चाहिए थे. खतरे में केवल तसलीमा नहीं है बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं विदेशी हूं या शरणार्थी हूं.

हमलावर मुझे शरणार्थी कहते हैं लेकिन क्या वे सोचते हैं कि इस देश में मेरी तरफ लिखने तथा बोलने वाला कोई पैदा नहीं होगा?
मेरे कुछ साथी हमले के विरोधी हैं किंतु मेरी रचनाओं की आलोचना भी करते हैं. ऐसा क्यों हैं? मेरी सभी रचनाएं धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद, की़ अधिकार, आजादी और समानता के पक्ष में वक्तव्य है. वे शरीयत के खिलाफ हैं. मैं उनसे पूछना चाहती हूं कि मेरे किन मूल्यों पर उनको एतराज है. यदि उन्हें ये मूल्य स्वीकार्य नहीं हैं तो वे भी खतरनाक हैं.

ऐसे भी बुद्धिजीवी हैं जो अनजाने ही धार्मिक उग्रवादियों के हाथों में खेल जाते हैं. वे इनके तलवारों की धार तेज करते हैं. जिन्हें वे प्रगतिशीलता कहते हैं वह हकीकत में समाज को अंधकार की ओर ले जाने वाला होता है. हालांकि उनके तौर तरीके तत्ववादियों से कुछ अलहदा हो सकते हैं. जब हिन्दू तत्ववादी हमला करते हैं तो प्रतिक्रिया तेज होती है किंतु मुस्लिम उग्रवादियों के मामले में प्रतिक्रिया शांत होती है-केवल इसलिए कि मुस्लिम समाज अल्पसंख्यक समुदाय है, जिसे सुरक्षा की जरूरत है.

हैदराबाद में जब हमलावर मेरी ओर आक्रामक अंदाज में बढ़े तो उनकी आंखों में गुस्सा था, घृणा थी जिसे अंधेरे की ताकतों ने पैदा किया था. शायद असली दुश्मन इतनी आसानी से नही दिखायी देते हैं.

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ 'सच्चाई बयान करने से बचना आत्महत्या के समान है- तसलीमा नसरीन ”

  2. By विशाल श्रीवास्तव on August 24, 2007 at 9:48 AM

    Sakshatkar Padhwane ke liye dhanyawad....

  3. By manoj roy on January 13, 2008 at 10:01 PM

    yeh samachar bahut had tak sach hai. taslima ki aapbiti aakhen kolnewali hai

    manoj roy

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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