हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

ऐनी आपा अपने पीछे सन्नाटा छोड़ गयी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/22/2007 01:03:00 AM


आज दो श्रद्धांजलियां. ऐनी आपा नहीं रहीं. यह खबर एक सदमे की तरह आयी. लगा, ऐसे समय में, जब इतने हमले हो रहे हैं इनसानियत पर, इतनी शदीद बमबारी हो रही है फ़र्दा की तमाम उम्मीदों पर, एक प्यार करनेवाला और अजीज़ साया उठ गया सर के ऊपर से. वे हमारे लिए सेक्युलरिज़्म और जम्हूरियत की मुजाहिद थीं. उर्दू अदब में शायद वे अंतिम थीं-इस्मत आपा और राजेंद्र सिंह बेदी की विरासत से आनेवालीं. हम नहीं जानते कि आग का दरिया और आखिरे शब के हमसफ़र के कितने अल्फ़ाज़ हमारी नसों में खून के साथ बह रहे हैं. हम शायद बहुत दिनों तक यकीन नहीं कर पायेंगे कि यह दुनिया ऐनी आपा के बिना चल रही है. सफ़दर भाई उन्हें याद कर रहे हैं.
और आप सबने दशरथ मांझी के निधन के बारे में सुना, पढा. उन पर पटना के एक शोधार्थी ने संस्मरण लिखा है.


ऐनी आपा अपने पीछे सन्नाटा छोड़ गयी हैं

सफदर इमाम कादरी
कुर्रतुलऐन हैदर के उपन्यास और कहानियों में भारतीय वांग्मय की स्पष्ट रूप रेखा दिखाई देती है. संसार में ऐसे लेखक बहुत थोड़े हैं, जिनके पास अपनी संस्कृति और इतिहास की गंभीर समझ के साथ अत्यंत व्यापक विश्वदृष्टि भी होती है. पाश्चात्य और प्राच्य का कुर्रतुलऐन हैदर जैसा संगम व्यक्तित्व भारतीय लेखकों में विरले ही मिलेगा. लगभग आधी सदी से कुर्रतुलऐन हैदर विश्वमंच पर उर्दू कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व करती रहीं और मात्र 32 वर्ष की आयु में लिखे गये अपने कालजयी उपन्यास आग का दरिया के चमत्कृत और वशीभूत कर देनेवाले अंदाज से एक स्थायी पहचान बनाने में सफल रहीं. 20 जनवरी, 1927 को अलीगढ़ में उनका जन्म हुआ. उनके पिता सज्जाद हैदर चल्दरम उर्दू के पहले कथाकार हैं और उनकी माता नजर सज्जाद उपन्यासकार रही हैं. उन्होंने अंगरेज़ी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर करने के साथ संगीत, कला, पत्रकारिता और फिल्म निर्माण जैसे विविध क्षेत्रों की शिक्षा भारत और यूरोप के ख्यातिप्राप्त संस्थानों में प्राप्त की. वे अंगरेज़ी पत्रकारिता से भी जुड़ी रहीं. लंदन के कई श्रेष्ठ अखबारों में काम करने के बाद इंप्रिंट और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादन विभाग में अपना बहुमूल्य योगदान दिया. प्रगतिशील आंदोलन के उत्कर्ष काल में कुर्रतुलऐन हैदर ने अपना लेखन कार्य शुरू किया.


बातचीत बीबीसी हिंदी.काम से साभार

एक शाम शीर्षक क हानी 1943 में छपी, जिसे उनकी पहली रचना माना जाता है उन्होंने रचनात्मक विविधता को शुरू से अपने लेखन का आधार बनाया तथा एक साथ कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज, आत्मकथा, लेख, समीक्षा, फोटोग्राफी, पेंटिंग और अनुवाद कार्य किया. उनके कट्टर आलोचकों का भी यह मानना है कि उनके पास कहने के लिए कुछ विशेष संदर्भ हैं, जिन्हें वह अपनी भाव पूर्ण शैली से पेश करती रहती हैं.

असल में कुर्रतुलऐन हैदर ने भारतीय समाज की सांस्कृतिक एवं दार्शनिक बुनियादों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करते हुए अपनी रचनाशीलता का ऐसा एक गंभीर, आकर्षक और भव्य संसार निर्मित किया जिसका चमत्कार कभी कम नहीं हुआ. कुर्रतुलऐन हैदर ने स्मृतियों के सहारे भारतीय समाज को अपने उपन्यासों में रेखांकित किया है. उनका ज्ञान, संपूर्ण शोध और अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारियां, सब उनकी स्मृतियों में समा कर जीवन गाथा बन जाती हैं.
तकनीक के स्तर पर उन्होंने जबरदत प्रयोगधर्मिता दिखायी. उनका पात्र पलक झपकते हजारों वर्ष की यात्रा करके हमारे सामने खड़ा हो जाता है. वर्तमान, भूत और कभी-कभी भविष्य गड्ड-मड्ड करके वे अपनी जादुई यथार्थवादिता को स्थापित करती है. स्मृतियों का यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में ऐसा सर्वकालिक उपयोग बहुत कम लेखकों ने किया है. इसलिए इतिहास और संस्कृति का उनका औपन्यासिक विश्लेषण अनूठा माना गया तथा दर्जनों भाषाओं में उनकी रचनाओं का बार-बार प्रकाशन होता रहा.

कुर्रतुलऐन हैदर की मौत से उर्दू रचनात्मक साहित्य की वह धुरी समाप्त हो गयी, जहां रचनात्मक साहित्य बौद्धिक उद्बोधन के साथ समाज में अग्रणी भूमिका निभाता है. उन्होंने अपने साक्षात्कार और लेखों में जिस बौद्धिकता के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिदृश्य का विश्लेषण किया है वह किसी दूसरे रचनाकार के यहां शायद ही दिखायी दे. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर वे उर्दू की पहचान थीं. उनके होने से उर्दू की मजबूत उपस्थिति मालूम होती थी. वे सभी भाषाओं के लेखकों के बीच बहुत आदर के साथ सर्वस्वीकृत थीं. उनकी मौत के बाद उर्दू साहित्य जगत में कोई ऐसा दूसरा व्यक्तित्व दिखाई नहीं देता, जिसकी इतनी मजबूत सार्वजनिक उपस्थिति हो. भारतीय स्त्री समाज से शिखर पर पहुंचनेवाले रचनाकार यों भी कम हैं. उनके बाद शायद यह खाई फिर न भरी जा सके. इस्मत चुगताई की मौत के बाद कुर्रतुलऐन हैदर ने वह जगह भरी थी, लेकिन उनके बाद दूर-दूर तक सन्नाटा है.

रेखांकन सफ़दर भाई के सौजन्य से.


उन्हें हमेशा दूसरों की ही चिंता रही
अरुण सिंह
न्म और मृत्यु के बीच का फासला एक अनिवार्य नियति है, लेकिन इतिहास में हर कोई दर्ज नहीं हो पाता. इसके लिए इस फासले को एक मकसद बनाना पड़ता है. कबीर के अनुयायी दशरथ मांझी ने जीवन के इस मकसद को बखूबी पहचाना.उस दिन की भेंट आखिरी भेंट होगी, यह मुझे पता नहीं था. पटना में बुद्धमार्ग पर एक दुकान पर चाय पी रहा था. तब वे दिखे. मुख्यमंत्री से जनता दरबार में मिल कर आ रहे थे. बहुत प्रसन्न दिख रहे थे. मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कुरसी पर बिठा कर सम्मानित किया था. बताने लगे-मुख्यमंत्री ने उस रास्ते पर सड़क बनाने की सहमति दे दी है. अस्पताल भी बनेगा. जल्दी ही शिलान्यास के लिए चलेंगे. उनकी छोटी-छोटी आंखें खुशी से चमक रही थीं.
यह दशरथ मांझी थे. जिन्हें मीडिया ने माउंटेन मैन, माउंटेन कटर और न जाने क्या-क्या नाम दे रखा है. बरसों पहले मैं उनसे पहली बार मिला था. वह 1988 का सितंबर था. किसी ने दशरथ मांझी के बारे में बताया कि एक ऐसा भी व्यक्ति है, जिसने लगातार 22 वर्षों तक अकेले अपने हाथों पहाड़ काट कर रास्ता बनाया है. उत्सुकता हुई तो उनकी खोज में लगा और एक दिन मैं उनके गांव की छोटी-सी कुटिया में उनके सामने बैठा था.

-क्या आपने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है? क्या वह रास्ता मुझे दिखायेंगे?- मैं अब भी विश्वास नहीं कर पा रहा था.

-हां, हमने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है- उनके चेहरे पर मासूम-सी मुस्कुराहट चली आयी थी, जिसमें थोड़ी झिझक भी शामिल थी, मानो किसी बच्चे ने गलती से कोई अच्छा काम कर दिया हो और अब उसे स्वीकार करने में झिझक रहा हो. तब उन्होंने वह पहाड़ी और वह रास्ता दिखलाया था. मैं देख कर दंग था. एक चट्टान पर छेनी से पहाड़ी काटने का विवरण लिखा हुआ था. उन्होंने उस पर हाथ रख कर बतलाया- यह देखिए, सारा कुछ इस पर लिखा हुआ है. वहां पहाड़ी काटने का विवरण अवश्य था, किंतु दशरथ मांझी का नाम कहीं नहीं था. हां, उस व्यक्ति ने चालाकी से वहां अपना नाम जरूर लिख दिया था, जिसने छेनी से यह सब लिखा था. तब लगा दशरथ बहुत भोले भी हैं. उनके भोलेपन की कहानियां और भी हैं. पहाड़ी काटने के दौरान लोग उन्हें पागल कहने लगे थे. पत्नी और पिता दोनों समझाते. पत्नी ने उन्हें झिड़का था- तुम पागल हुए हो क्या? तुम्हीं को चिंता है रास्ता बनाने की? और फिर यह दरार तो तबसे है, जबसे यह धरती बनी. पागल मत बनो, चुपचाप जाकर खेतों में काम करो. तब वह हंस कर रह जाते. पिता ने समझाना चाहा, तब उन्होंने कहा था- आज तक हमारा खानदान मजदूरी करता रहा है. मजदूरी करते-करते लोग मर गये. खाना, कमाना और मर जाना. इतना ही तो काम रह गया है. सिर्फ यहएक काम है जो मैं अपने मन से करना चाहता हूं. आप लोग मुझे रोकिए मत, करने दीजिए. उनका काम जारी रहा. बीच में उनकी पत्नी का देहांत हो गया.

-आपकी पत्नी नहीं रहीं, फिर भी आपने पहाड़ी काटने का काम क्यों जारी रखा?

-हां मेरी पत्नी जब मरीं, तो मैं बहुत दुखी हुआ था. मुझे लगा जब वे ही नहीं रहीं, तो पहाड़ क्यों काटूं? लेकिन फिर मुझे लगा मेरी पत्नी नहीं रहीं तो क्या हुआ? रास्ते के बन जाने से कितने लोगों की पत्नियों को फायदा होगा. हजारों, लाखों लोग इस रास्ते से आयेंगे-जायेंगे.

वे सीधे-सादे शब्दों में बहुत गहरी बात बोल गये थे. उन दिनों उनके काम की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं थी. उन्होंने आर्यावर्त में छपी एक कॉलम की छोटी-सी खबर दिखलायी थी, जिसमें उन्हें इस काम के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से 500 रुपये मिलने की चर्चा थी. इस कतरन को उन्होंने बड़े जतन से प्लास्टिक की एक शीट के बीच में रखा था. बाद के दिनों में तो उन पर छपनेवाली खबरों का अंबार लग गया था. उन सारे अखबारों, पत्रिकाओं को वह एक बड़े थैले में हमेशा साथ लिये चलते थे. तब मीडिया में उन्हें अपनी खोज बतानेवालों में भी होड़ लग गयी.

उन्हीं दिनों कोलकाता से एक फिल्म निर्माता का पटना में आगमन हुआ. दशरथ मांझी पर फिल्म बनाने के नाम पर उन्होंने कलाकारों से खूब खुशामद करवायी और पैसे भी ऐंठे. दशरथ को भी उन्होंने सपना दिखलाया. वह फिल्म आज तक नहीं बनी.

दशरथ अद्भुत जीवटवाले थे. मैंने कभी उन्हें खाली नहीं देखा. वे एक ऐसी मोमबत्ती थे जो दोनों सिरों से जल कर रोशनी बिखेर रही थी. उन्हें पेड़-पौधे लगाने का भी बहुत शौक था. उनके लगाये न जाने कि तने पौधे अब पेड़ बन गये होंगे. कभी उन्हें अपने इलाके में चापाकल लगवाने की चिंता होती, तो कभी अस्पताल बनाने की. कभी पुल बनवाने की बात करते तो कभी बिजली पहुंचाने की. अपने परिजनों की चिंता में घुलते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा. यद्यपि उनका एक मात्र बेटा अपंग है और बेटी विधवा.

दशरथ जी नहीं रहे. उनके सपने अब भी हैं. मरते वक्त भी उन्हें अपने सपनों की ही चिंता रही होगी. दशरथ जी से जब मैं पहली बार मिला था तो एक जिज्ञासा हुई थी क्या दशरथ इतिहास में दर्ज हो सकेंगे? इसका उत्तर मुझे मिल गया प्रतीत होता है. दशरथ जी जनश्रुतियों का हिस्सा बन गये हैं. बरसों बाद जब कभी कोई दशरथ मांझी की चर्चा करेगा तो मैं भी कह सकूंगा हां, मैं उस महामानव से मिल चुका हूं.

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  1. 9 टिप्पणियां: Responses to “ ऐनी आपा अपने पीछे सन्नाटा छोड़ गयी हैं ”

  2. By indscribe on August 22, 2007 at 2:55 AM

    Great post. One after the other giants of Urdu literature are passing away.

    Intezar Husain ko Allah achcha rakhe aur umr-e-daraaz de.

  3. By Udan Tashtari on August 22, 2007 at 6:31 AM

    रेयाज भाई

    यह पोस्ट भीतर तक हिला देने की काबिलियत रखती है. बहुत आभार हम तक यह पहुँचाने का.

    सादर

    समीर लाल

  4. By अनूप शुक्ला on August 22, 2007 at 7:16 AM

    बहुत अच्छा लगा यह पढ़कर!

  5. By Reyaz-ul-haque on August 23, 2007 at 2:34 AM

    shukriyaa bhai samir ji aur anup ji.

  6. By indscribe on August 24, 2007 at 1:44 AM

    hamaara bhi shukriaa adaa kar dete to achchaa lagtaa..ya english meN post karne waloN se naraazgi hai...:)

  7. By Reyaz-ul-haque on August 24, 2007 at 2:06 AM

    नहीं indscribe भाई
    नाराज़गी क्यों रहेगी? बल्कि सबसे पहले आपने टिप्पणी की थी, हक भी आपका ही बनता था. मगर दिक्कत यह थी कि आपका नाम नहीं जानते थे. अब भी नहीं जानते, फिर भी आभार.

    हम विनम्रता से सिर झुकाते हैं. मआज़रत.

  8. By Oroosa on August 27, 2007 at 2:04 AM

    This comment has been removed by the author.

  9. By indscribe on August 27, 2007 at 2:08 AM

    Reyaz bhai...Aadab

    arrey hum to bas lutf le rahe the...aap mujhe indscribe kah sakte haiN ya Adnan....and I am adding your blog in my blogroll also....my second blog Mindspeak.

  10. By यशवन्त माथुर on December 6, 2012 at 9:20 AM


    कल 07/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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