हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सुनिए : सबसे पहले चाहूंगा तुम्हारा एहसास

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/18/2007 11:43:00 PM

न्हें पहली बार देखा था कालिदास रंगालय में, गिटार कंधे पर लटकाये हुए. उस समय बहुत नज़ाकत से हाथ मिलाया था उन्होंने. उसके बाद अमिताभ पटना में बहुत बार गाते हुए दिखे-मिले. सफ़दर हाशमी की शहादत को याद करते हुए, रंगकर्मी प्रवीण की याद में मनाये जा रहे कार्यक्रमों में, नुक्कड़ नाटकों के पहले और बाद में...अमिताभ पटना की सांस्कृतिक मंडली और जमावडे़ का अहम हिस्सा हैं. अपने गीतों में आम आदमी का दर्द और उसका प्रतिरोध भर देनेवाले अमिताभ अभी एक नये अलबम की तैयारी में हैं. एक दुकान पर उनका पुराना (अब तक का अकेला) अलबम मिला, जिसमें उनके अलावा उनके कुछ दूसरे साथियों के गाये गीत भी हैं. भुपेन हजारिका के गंगा बहती हो क्यों (वीडियो यहां) को मैंने पहली बार अमिताभ के मुंह से सुना, और यह अजीब लगेगा कि मुझे भुपेन दा की जगह अमिताभ इस गीत के स्वाभाविक गायक लगे.







टना में अमिताभ के अलावा संतोष झा दूसरे उल्लेखनीय जनगीत गायक हैं. हम उनका गीत भी यहां देंगे. यहां अमिताभ के अलबम अभिव्यक्ति से एक गीत. संगीत पंकज आयंदे और राणा बनर्जी का है. यह गीत कबीर सुमन के एक गीत से प्रेरित है.

यह मेरा पहला पोडकास्ट है जो इरफ़ान और रवि भाई की मदद और ई पंडित के ट्यूटोरियल के आधार पर ही बन सका है. हम इन सबके आभारी हैं.

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  1. 10 टिप्पणियां: Responses to “ सुनिए : सबसे पहले चाहूंगा तुम्हारा एहसास ”

  2. By राहुल on August 19, 2007 at 2:46 AM

    aahh....riyaz...tum kya chahte ho ?? naukri chakri chodd ke inhi chakkar me fans jaau...aise roye khade karne wale gaane dalte ho...

    yaar...mere paas iski prashansa ke liye shabd hi nahi hain...sachchi...dil se...

  3. By उन्मुक्त on August 19, 2007 at 10:41 AM

    पहली बार सुना, अच्छा लगा।

  4. By अभय तिवारी on August 19, 2007 at 11:44 AM

    बढि़या..

  5. By Pratyaksha on August 19, 2007 at 12:27 PM

    अच्छा !

  6. By Sanjeet Tripathi on August 19, 2007 at 1:05 PM

    शुक्रिया!!

  7. By Udan Tashtari on August 19, 2007 at 4:08 PM

    बेहतरीन. आप डाउनलोड लिंक दे देते तो सहेज लेते अपने मशीन पर.

  8. By रजनी भार्गव on August 19, 2007 at 5:06 PM

    अच्छी लगी.

  9. By yunus on August 20, 2007 at 8:36 AM

    ये और इसके बाद वाला 'तुम लड़ो' सुन लिया । आनंद आया । निर्मल आनंद आया ।
    अब सुनिए--मुझे सफदर हाशमी वाले परचम गीत उपलब्‍ध करा पायेंगे क्‍या
    इसकी कैसेट मेरे जबलपुर वाले घर में पड़ी है ।
    जबलपुर जाना हो नहीं रहा है
    इंतज़ार नहीं करना । बेक़रारी है ।
    कुछ कीजिए, कहीं पड़े हों तो जुगाडि़ए

  10. By anu on August 21, 2007 at 12:48 PM

    waah reyaz!!
    maine socha bhi nahi tha ki amitabh ko blogger par bittha doge.
    \yaar mere yahan net bahut dheere access karta hai lekin hum logon ko mauka jo mila hai ki amitabh ko seedhe sune hain to hum to unke mureed hain.

    maine pahli baar culcutta me unke dwara ek kawita colase dekha tha, gujraat dange par "gujraat ka vikshobh" kawita sangrha par, amitabh ki aawaz dange ki bhyavahta kop darshane me safal hui thi, rongate khade ho gaye the hum logon ke.

    bahut bahut badhiya yaar!!

  11. By apu on September 15, 2007 at 7:25 PM

    सच्चो, कुछ गड़बड़ है रेयाज़ भाई..एक्के सेकंड में डाउनलोड हो जा रहा है, लेकिन फ़ाइल में कुछ आता नहीं..जरा देखवाइए..

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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