हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भूख जब हद से गुजर जायेगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/17/2007 12:39:00 AM

मनीष युवा पत्रकारहैं, और उनमें काफ़ी हिम्मत है धारा के विरुद्ध चलने की भी. पहली बार मेरा उन पर ध्यान गया था जब उन्होंने भारत के विश्व कप में हारने की कामना करते हुए एक लेख लिखा था. यहां उनकी चिंताएं और उनके कुछ वाजिब सवाल.

मनीष शांडिल्य
राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्ति की 61 वीं वर्षगांठ मना रहा देश आज स्पष्ट रूप से विभाजित दिखाई दे रहा है. अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती हुई खाई के कारण जनता दो अलग-अलग देशों में रह रही है-एक है समृद्ध इंडिया और दूसरा है विपन्न भारत. वर्तमान आर्थिक विकास को निष्ठुर विकास की संज्ञा दी जा सकती है, जिसमें आर्थिक विकास के लाभों का अधिकतर भाग समृद्ध वर्ग यानी इंडिया को प्राप्त हो रहा है तथा करोड़ों गरीबों यानी भारतवासियों को और बढ़ती हुई गरीबी की परिस्थिति में हर रोज संघर्ष करना पड़ रहा है. घोषित रूप से कल्याणकारी राज्य कहलानेवाले देश इंडिया की आर्थिक नीतियों को देख कर लगता है कि इंडिया बहुसंख्यक भारतीयों को बोझ समझ कर मिटाने पर तुला है. परंतु इंडिया को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में भारत का संसाधन और खून-पसीना लगा है और भारत के प्रति उसकी भी महती जिम्मेवारी बनती है-इस सच और जिम्मेवारी से इंडियावाले जान-बूझ कर आंखें चुरा रहे हैं. आज इंडिया नौ प्रतिशत की विकास दर से छाती फुला सकता है और सेंसेक्स की ऊंचाई पर चढ़ कर आसमान छू सकता है पर भारत में रहनेवाली विशाल आबादी बाजार को समृद्ध करते-करते खुद कंगाल होती जा रही है. सवाल है कि यह वृद्धि दर और सेंसेक्स कब तक औसत बेहतरी मापने का पैमाना बने रहेंगे. इस औसत बेहतरी के आंकड़ों में तो बीपीएलवालों की गरीबी भी डुबा दी जाती है. क्या सत्ता की राजनीति करनेवाला कोई भी दल इन जनविरोधी आर्थिक नीतियों का मुकम्मल विरोध करेगा? विपक्ष में रहनेवाले दल मात्र विरोध का धर्म निभाने के लिए विरोध करते हैं. पर सत्ता में आने के बाद फिर इन्हीं नीतियों के पैरोकार बन जाते हैं. वर्तमान में सेज और खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के प्रवेश से लगभग 30 करोड़ भारतीयों के सामने इंडिया के नीति निर्माताओं ने न सिर्फ रोजगार बल्कि अस्तित्व व अस्मिता का भी संकट खड़ा कर दिया है. आखिर ऐसी आर्थिक नीतियां क्यों बन रही हैं कि भारत के आम आदमी का पेट भरनेवाले और तन ढंकनेवाले दुकानों-खोमचों-फेरीवालों को उजाड़ा जाये और इंडिया के लोगों की पसंद मैकडोनॉल्ड और शॉपिंग मॉल को सरकारी खर्चे पर बसाया जाये. आज स्थिति यह है कि इंडिया ने किसानों को कोल्ड स्टोर्स तक के लिए निजी कंपनियों की ओर ताकने पर मजबूर कर दिया है. और निजी पूंजी देशी हो या विदेशी उसका अपना एजेंडा होता है. वह एजेंडा है एकाधिकारवाद का और यह एकाधिकारवाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु है. इसलिए आज संकट लोकतंत्र के सामने भी है.
क तरफ अरबपतियों के मामले में इंडिया आठवें नंबर पर है तो दूसरी तरफ मानव विकास सूचकांक में भारत १२६ वें पायदान पर है. इतना बड़ा विभेद क्यों है इंडिया और भारत में? आखिर ऐसी परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई और यह खाई लगातार और चौड़ी ही क्यों होती जा रही है? इसके पीछे है वर्तमान पूंजीवादी अर्थव्यवस्था द्वारा लागू भूमंडलीकरण का कार्यक्रम. पूंजीवादी व्यवस्था में 20 प्रतिशत आबादी के ग्रीड (लालच) तक को तो पूरा करने की क्षमता है पर यह 80 प्रतिशत की नीड (जरूरत) को कभी पूरा नहीं कर सकती. यही 20 प्रतिशत आबादी आज इंडियन सिटिजन है और शेष 80 प्रतिशत भारत का हिस्सा हैं. प्रख्यात लेखिका और समाजकर्मी अरुंधति राय कहती हैं कि इंडिया ने भारत के संसाधन से परिपूर्ण हिस्सों को अपना उपनिवेश बना लिया है और इंडियावालों ने इस धरती पर मौजूद दुनिया के अभिजातों के साथ मिल जाने के लिए भारत के संसाधनों को लूटने और वैश्विक लिहाज से काफी सस्ते श्रम का दोहन करने का पूरा प्रबंध कर लिया है.

र्चित कथाकार शैवाल कहते हैं कि भारत एक संस्कृति का देश है और इंडिया बाजार का देश. संस्कृति और देश के बीच बाजार आ गया है. आज आम-आदमी की जिंदगी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वह जिये तो किस देश में, जहां उसका वजूद सुरक्षित बच जाये. यह सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति को नष्ट किये बगैर विदेशी बाजार अपने पैर नहीं जमा सकता. इसलिए आज भारत की संस्कृति पर पूंजीवादी उपकरणों यानी मनोरंजन के साधनों के माध्यम से लगातार हमला हो रहा है, टीवी के जरिये-फिल्मों के जरिये. और अंतरधार्मिक विवाह, रिचर्ड गेरे-शिल्पा चुबंन, चित्रकारों की प्रदर्शनी पर हाय-तौबा मचानेवाले भारतीय संस्कृति के स्वघोषित झंडाबरदार इस बड़े और योजनाबद्ध सांस्कृतिक हमले पर चुप क्यों हैं?

ले
किन वर्तमान हालात ज्यादा देर तक किसी को चुप रहने का मौका नहीं देनेवाले हैं, क्योंकि हर निगाह पूछ रही है कि आज भारत और इंडिया अलग-अलग देश क्यों हैं? एक ओर अभावों का समंदर तो दूसरी तरफ दौलत का अंबार. यह असंतुलन इसी तरह बढ़ता रहा तो खतरे का निशान पार कर जायेगा. खतरनाक उनके लिए जो इंडिया में रहते हैं. क्योंकि वे भारत की समस्याएं सुलझाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे. और फिर सड़क पर उतरना ही अंतिम रास्ता रह जायेगा भारतवासियों के पास क्योंकि

भूख जब हद से गुजर जायेगी
खुद-ब-खुद सड़कों पे उतर आयेगी.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ भूख जब हद से गुजर जायेगी ”

  2. By राहुल on August 17, 2007 at 11:34 AM

    क्या कर लेंगे आप अगर लोग गरीब है ? क्या कर लेगी सरकार अगर लोग भूखे मर रहे हैं ? क्या कर लेंगे गरीबों के हित मे बड़ी बड़ी बाते करने वाले ? क्या वो ए सी का सुख छोड़ देंगे ? क्या आप अपनी रोज़ी रोटी कमाना छोड़ देंगे ? या फिर क्या सरकार नंगी होकर अमेरिका के आगे कैबरे करना छोड़ देगी ?
    कुछ भी हो , यहाँ पर हम लोगो से ज्यादा वो हैं जिन्होंने यथास्थिति से पूरी तरह से समझौता कर लिया है और वो भी हैं जो इसे बनाए रखने के लिए जी जान लगा दे रहे हैं। मैं बता रहा हूँ , चाहे जितना भी लिख लीजिये , चिल्ला लीजिये यहाँ तक कि खुद को आग लगा लीजिये , इन यथास्थितिवादियों के कान मे जूं तक नही रेंगने वाली है।

  3. By चन्द्रिका on August 17, 2007 at 5:02 PM

    मनीश सर जी,देश मे एक व्यवस्था चल रही है जो उनकी है जिन्हें आजादी दी गयी और जो 15 अगस्त 1947 को देश आजा़द मान लिये वाकई में यह उनकी ही आजा़दी थी मानने की कोइ बात ही नही पेरियर, अम्बेडकर, और भगत सिंह की के सपनों की आजादी शायद जनता के सपने में फिर से आने लगी है जगह-जगह के बढते आंदोलन को मैं इसी रूप में देखता हूँ| आजका बिजनस वाला पेज भी देख लो यह कितनी जल्दी ढहेगा कहा नही जा सकता.........

  4. By Kumar on August 23, 2007 at 11:02 AM

    Manish, Congratulations !!! An article well carved out from India's 60th independence. Keep going !!!.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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