हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मैंने अच्छे दिनों के कई ख्वाब देखे

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2007 11:25:00 PM


भाई गुलरेज़ को पटना रंगमंच के साथी और पूरे बिहार में हिंदी-उर्दू शायरी के पाठक उनकी नज़्मों, उनके कोलाजों और उनके एखलाक के लिए जानते हैं. अभी वे बाढ़ से घिरे मोतिहारी में हैं-बीमारी से भी अभी-अभी उठे हैं. उनके सपने और उनके सपनों की किर्चियां.


गुलरेज शहजाद
जादी के छह दशक बीत गये, अर्थात जीवन का एक पैराग्राफ समाप्त हो गया. बहुत दुरूह समय काटते हुए हम यहां तक पहुंचे हैं. आज जब हम पूरे कालखंड पर नजर दौड़ाते हैं तो पता चलता है कि स्थितियां नहीं बदलीं, बल्कि सिर्फ माहौल और तरीके बदल गये हैं.
अंगरेजी शासनकाल के राय बहादुरों और खान बहादुरों की जगह देश की संसदीय प्रणाली की बजबजाती हुई जमीन पर `बेहया के पौधों' की तरह उग आये कर्णधारों ने ले रखी है. `ब्यूरोक्रेसी' और `पॉलिटिस' देश का बेड़ा गर्क करने में पूरी तरह तत्पर और संलग्न है. 2020 तक विकसित देशों की श्रेणी में आने की अंधी दौड़ में शामिल भारत में आम जनता बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेल रही है. भूख से मरने की घटनाओं के साथ किसानों की आत्महत्याएं स्थिति की वास्तविकता को दरसाती हैं. नाटककार, कवि मित्र संजीव की कविता की पंक्तियां हैं,

भूख से व्याकुल
भारत में
एक आदमी ने
खुशी-खुशी
अपने बच्चे गिरवी रख कर
बीवी किराये पर देकर
बीच चौराहे
अपने पेट पर
हाथ रख कर
अपनी भी बोली लगा दी
लेकिन उसे दुख
सिर्फ इतना था कि
सभी सौदे नकद नहीं
बल्कि उधार हुए थे.
देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय (मुसलमान) की स्थिति देश के मुंह पर तमाचे की तरह है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने देश के मुसलमानों की स्थिति को आईने की तरह साफ कर दिया है और कमेटी की सिफारिशें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं. प्रदर्शन राजनीति का अंग रहा है. अर्थात जो हम करें वह दिखे, लेकिन राजनीति ने हमारे जीवन को इस तरह प्रभावित किया है कि भावनात्मक संबंधों की सांसें उखड़ने लगी हैं. हमारी मुलाकातों और व्यवहार से सादगी-सच्चाई समाप्त होती जा रही है. हमें आपसी प्रेम-भाईचारा को जताने की आवश्यकता पड़ने लगी है,

हर मुलाकातों का मकसद कारोबार-ए-जिंदगी
सबकी दहशत एक जैसी सबकी घातें एक सी
भूमंडलीकरण और नव उदारवाद ने बेईमानी के अवसर को इतना बढ़ा दिया है कि देश में मुकर जाने की परंपरा-सी बन गयी है. आखिर हम किससे पूछें कि हमारा भविष्य कहां है? मेरा मानना है कि देश की सबसे बड़ी पूंजी इसके लोग हैं. इतनी बड़ी पूंजी का सही निवेश आखिर किसकी जिम्मेदारी है. देश में लेबर फोर्स बढ़ता गया, लेकिन काम के अवसर नहीं बढ़े. हम बहुत जगहों पर गैरजरूरी तरीके से तकनीक के गुलाम बनते जा रहे हैं. देश की प्रगति तभी संभव है जब हर हाथ को काम मिलेगा.

कार्य के बहुत से क्षेत्रों में तकनीक के बजाय परंपरागत तौर-तरीके ज्यादा फायदेमंद साबित होंगे. इसके कई उदाहरण खुद कई पश्चिमी देशों में मौजूद हैं. फिदेल कास्त्रो (दक्षिण सम्मेलन, हवाना-2000) ने फासीवादी शक्तियों के खतरों के तहत वामपंथियों का आह्वान किया था-ऐसे दुश्मन को शिकस्त देने के लिए स्वभावत: जरूरी हो जाता है कि वामपंथी शक्तियां संसदीय बौनेपन का परित्याग करें और गैर संसदीय संघर्ष के विस्तीर्ण मैदान में अपना प्रमुख जोर लगायें. हम खुली आंखों से देख रहे हैं कि वामपंथी शक्तियां अपनी ऊर्जा कहां बरबाद कर रही हैं.

नक्सलबाड़ी आंदोलन के 40 वर्ष हो गये. नक्सलवाद को अपना नैतिक और राजनीतिक समर्थन देनेवालों की एक बड़ी जमात देश में तैयार हुई है, लेकिन जनअदालतों की सच्चाई समाचार चैनलों ने जो दिखायी, उसका असर गलत पड़ा है. इसके अतिरिक्त समय-समय पर मिलनेवाली खबरों के आधार पर हम कह सकते हैं कि आंदोलन भटकाव का भी शिकार हुआ है. आम आपराधिक गिरोह और नक्सलवादियों के बीच के फर्क का फासला बहुत कम दिखने लगा है. सवाल यह है कि क्या नक्सलवादियों के शस्त्रों में विचारधारा के कारतूस का अभाव हो चला है?
यह समय सपनों के टूटने का समय है.
पाश की पंक्ति याद आती है-सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना. सपने टूट जरूर रहे हैं, लेकिन यकीन के साथ कह सकता हूं, सपने मरे नहीं हैं और नहीं मरेंगे. नसीर अहमद नासिर की कविता की पंक्तियां याद आती हैं-
बहुत दूर गांव है मेरा
जहां लालटेनों की मद्धिम रोशनी में
सबको याद करते हुए
मैंने अच्छे दिनों के कई ख्वाब देखे
स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ और नक्सलबाड़ी आंदोलन की 40वीं वर्षगांठ के काल में संघर्ष के एक नये आंदोलन की शुरुआत होगी. जहां से रास्ता खत्म होता, वहीं से दूसरी राह निकलती है.

संपर्क- नकछेद टोला, मोतिहारी.

प्रभात खबर से साभार

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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