हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हमारे ज़ख्मों से खून रिस रहा है आलमपनाह

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2007 12:45:00 AM

आज़ादी के उल्लास, जय-जयकारे और सत्य-अहिंसा के पवित्र मंत्रोच्चार के बीच यह 15 अगस्त भी बीत जायेगा. हम उनकी विरासत से हैं, जिन्होंने आज से 60 साल पहले भी शंखध्वनियों और शहनाइयों के शोरगुल के बीच कहा था-यह आज़ादी झूठी है, देश की जनता भूखी है. हम मैला आंचल के उन पात्रों की तरह हैं जो आज़ादी के जुलूस में जनता की भूख और उसके अधिकारों की बात कहते हैं और पीटे जाते हैं. मगर हमने अपनी जुबानें बंद नहीं की हैं और अपना दिमाग, अपना बेहतरीन दिमाग, गिरवी नहीं रखा है और अपने विचारों को बाज़ार में नहीं ले आये हैं. इसलिए हमारे सवाल अब भी ज़िंदा हैं, हमारी चीखें अब भी रोशन हैं, हमारे ज़ख्म अब भी दर्द करते हैं और उनसे खून और मवाद रिसता है. हम उन्हीं कुछ सवालों के साथ, जो आज भी असहज कर देते हैं और अनुत्तरित हैं. देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है या बना दिया गया है, उसमें असहमति के स्वर देशद्रोह की तरह लगते हैं. मगर फिर भी, हम यह खतरा उठाते हुए, और यह कहते हुए कि देश नारों और जयकारों से नहीं बनता, बल्कि लोगों से बनता है, अपनी असहमति दर्ज़ कराते हैं. हम इस आज़ादी से अपनी असहमति दर्ज़ कराते हैं.

आज़ादी, मगर कैसी और किसके लिए?
रविभूषण
प्रेमचंद के उपन्यास गबन (1931) में देवीदीन ने यह पूछा था, `साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाट बनाये घूमोगे, इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा... तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो, और वह भी बढ़िया, पर गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता. उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग -विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो तुम गरीबों को पीस कर पी जाओगे.'

आजादी की 60वीं वर्षगांठ पर हमें यह जानना और विचार करना चाहिए कि भारत में गरीबों की संख्या कितनी है? ग्रामीण भारत की क्या दशा है? किसानों और मजदूरों का क्या हाल है? देश में आर्थिक विषमता बढ़ी है या घटी है? किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका से क्यों हटा है? नयी आर्थिक नीति (1991) का या भूमंडलीकरण और उदारीकरण का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त हुआ है? राजनीति का कार्य क्या है? सामान्य जन और उसके जन प्रतिनिधि में कितना अंतर है? शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा सबको क्यों नहीं है? देश के 32000 स्कूलों में एक भी छात्र क्यों नहीं हैं? क्या भारतीय मध्य वर्ग समूचे भारत का पर्याय है? मीडिया कितनी सच्ची खबरें पाठकों को देता है? क्या भारत हत्या और आत्महत्या के बीच जी रहा है? भारत की आजादी से किसे लाभ प्राप्त हुआ है? क्या हमारे देश में सबको न्याय प्राप्त है? अपराधी और गुंडे जेल में क्यों नहीं हैं? भ्रष्टाचार मिटना चाहिए या नहीं और यह कैसे मिटेगा? भारतीय प्रतिभा का पलायन क्यों हो रहा है? रातोंरात अमीर कैसे बना जाता है? उत्पादक बड़ा है या उपभोक्ता? स्वतंत्र भारत में भारतीय जनता को किसने विभाजित किया? राजनीति में वंशवाद रहना चाहिए या मिटना चाहिए? चापलूसों और खुशामदियों से घिर कर क्या उचित कार्य किया जा सकता है? प्रश्न एक नहीं, हजारों हैं. यह कौन करेगा? इसका उत्तर कौन देगा?
नागार्जुन ने आजादी के मात्र चार वर्ष बाद 1951 में एक कविता लिखी थी-स्वदेशी शासक. आजाद भारत के शासकों का रंग-ढंग उन्होंने समझ लिया था. स्वतंत्र भारत का शासक सामान्य जन को `शांति और संयत जीवन की' नसीहत देता रहा है और अपने लिए `अपरिमित धन की जुगाड़' में तत्पर रहा है. नागार्जुन ने इस कविता में बहुत तीखी बातें लिखी थीं, `हमें, हमारे घरवालों को, पड़ोसियों को दो छुटकारा/ शीघ्र मुक्ति दो इस रौरव से/ जहां न भरता पेट, देश वह कैसा भी हो, महानरक है.' भारत एक साथ स्वर्ग और नरक दोनों है. कुछ लोगों को स्वर्ग का सुख है और सामान्य जन को नरक का दुख. स्वाधीनता की लड़ाई मिलजुल कर लड़ी गयी थी. उस समय के मूल्य और आदर्श मिट गये हैं, क्योंकि आज भारत में अंगरेज नहीं हैं. फिर भारत में इतना हाहाकार क्यों है? लूट और भ्रष्टाचार क्यों है? अपराध और व्यभिचार क्यों है? अपहरण और बलात्कार क्यों है? अशिक्षा और बीमारी क्यों है? बाढ़ और सूखा क्यों है? छीनाझपटी और लूटमार क्यों है? वादा-खिलाफी क्यों है? 60 के दशक में नागार्जुन ने एक कविता लिखी थी, `26 जनवरी 15 अगस्त.' इससे पहले `स्वदेशी शासक' कविता में भारतीयों की साधना को व्यर्थ घोषित किया- `व्यर्थ हुई साधना, त्याग कुछ काम न आया/ कुछ ही लोगों ने स्वतंत्रता का फल पाया.' स्वतंत्रता का फल सबको प्राप्त क्यों नहीं हुआ? हमने जो विकास-नीतियां तय कीं और पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं, क्या उससे सबको फायदा हुआ? हमारी नीयत में खोट थी या हमारी कार्य पद्धति गलत थी?

गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. आजादी की 50वीं वर्षगांठ 1997 में धूमधाम से मनायी गयी थी. गणतंत्र दिवस की अर्धशती भी मनायी जा चुकी है. हम किसी भी अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते. आयोजन उत्सवधर्मी बन जाते हैं या फिर सब कुछ औपचारिक और कर्मकांड बन कर रह जाता है. मगर भारत में सभी सुखी और मस्त नहीं हैं. नागार्जुन ने 26 जनवरी 15 अगस्त कविता में प्रश्न करने के साथ स्वयं उत्तर भी दिया था. `किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?/ कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?' उन्होंने सेठ, शोषक, नामी गला-काटू, थूक-चाटू, चोर, डाकू, झूठा, मक्कार, कातिल, छलिया, लुच्च-लबार को `सुखी' और `मस्त' कहा है. नागार्जुन नेता को इसी श्रेणी में रखते हैं. नेता अच्छे भी होंगे पर उन्हें ढ़ूंढ़ना कठिन है. भारत में एक ओर सुखी और मस्त लोग हैं और दूसरी ओर दुखी और त्रस्त लोग हैं. ऐसा अंतर क्यों है?

भारत आज सुविधा संपन्न और सुविधाविहीन लोगों में विभाजित है. यह विभाजन अनुचित ही नहीं, घातक भी है. आतंकवाद से खतरों की बात अक्सर की जाती है, पर इस अनुचित और अमानवीय विभाजन की ओर कम ध्यान दिया जाता है. आधुनिक भारत की जो रूपरेखा बनी थी, वह नष्ट हो चुकी है. समकालीन भारत की एक नयी रूपरेखा बना दी गयी है. हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ी थी. आज अमेरिकी साम्राज्यवाद का चुंबन-आंलिंगन कर मस्त हुआ जा रहा है. भारत की जनता की उपेक्षा कर भारत का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता. जाति और धर्म की राजनीति से किस प्रकार के भारत का चित्र प्रस्तुत करेंगे?

आजादी के 60वें वर्ष के आयोजन-समारोह में हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि यह वर्ष प्लासी की लड़ाई की ढाई 100वीं वर्षगांठ, 1857 की 150वीं वर्षगांठ और भगत सिंह की जन्मशती का भी है. प्लासी की लड़ाई (1757) सिराजुद्दौला की सेना में 57 हजार सैनिक थे और रॉबर्ट क्लाइब के सैनिकों की संख्या मात्र साढ़े तीन हजार थी और इनमें से भी अंगरेज सैनिकों की संख्या मात्र 950 थी. रॉबर्ट क्लाइव की सेना में 2600 सैनिक भारतीय थे. सिराजुद्दौला की सेना का प्रधान सेनापति मीर जाफर था. वह 45 हजार सेना के साथ अंगरेजों से जा मिला, सिराजुद्दौला बिना लड़े पराजित हो गया. प्लासी की लड़ाई के बाद भारत अंगरेजों के अधीन हो गया. जिम्मेदार भारतीय थे. जॉन विलियम केई ने सिपॉय वार इन इंडिया में लिखा है - `हिंदुस्तान में हमारी सत्ता की पुनर्स्थापना का सेहरा हमारे हिंदुस्तानी समर्थकों के सर है, जिनकी हिम्मत और बहादुरी ने हिंदुस्तान को हमवतनों से छीन कर हमारे हवाले कर दिया.' (शम्सुल इस्लाम द्वारा उद्धृत, प्लासी का साजिशी सबक, जनसत्ता, 15 जुलाई 2007)

भारत को आजादी बिना `खड़ग' और `ढाल' के प्राप्त नहीं हुई है. हजारों लोगों को फांसी दी गयी, लाखों लोग मारे गये, हजारों लोगों को उम्रकैद की सजा मिली. सैकड़ों गांव उजड़ गये. इसे भूलना सबसे बड़ा अपराध है. यह आजादी झूठी तो नहीं, पर अधूरी थी. इसे पूरा करने का दायित्व राजनेताओं और भारतीयों पर था, जो नहीं हुआ. हम आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से स्वाधीन नहीं हुए. मानसिक गुलामी बढ़ती गयी. गांवों का हमने विकास नहीं किया. भारतीय महानगर भारत के द्वीप हैं. इन महानगरों से भारत का वास्तविक चित्र उपस्थित नहीं होता. अधिसंख्य जनता गरीब और फटेहाल है. अशिक्षित और परेशान हैं. यह बहुत बड़ी आबादी है, लगभग 70 प्रतिशत. इसे भूलना और हाशिये पर डालना अनुचित ही नहीं, जुर्म भी है. आजादी का जश्न पूरे होशो-हवास में मनाने पर हम आजाद हिंदुस्तान को बेहतर बनाने की दिशा में पहल कर सकते हैं. यह पहल जरूरी है. स्वतंत्रता का फल सबको प्राप्त होना चाहिए. हमारी सभी नीतियां धनवानों और पूंजीपतियों के लिए नहीं बननी चाहिए. विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के लुभावने-आकर्षक मायाजाल में फंस कर हम वास्तविक विकास नहीं कर सकते. स्वतंत्रता के 60वें वर्ष में आत्ममंथन की आवश्यकता है. भविष्य के गर्भ में क्या है, कोई नहीं जनता. मगर हम अनुमान कर सकते हैं.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ हमारे ज़ख्मों से खून रिस रहा है आलमपनाह ”

  2. By संजय तिवारी on August 15, 2007 at 8:29 PM

    बहुत अच्छा और सार्थक लेखन.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें