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बीच सफ़हे की लड़ाई

पत्रकारिता जनता से दूर होती जा रही है : पी साईनाथ

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/13/2007 02:29:00 AM

पी साईनाथ का जन्म आंध्रप्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी के पोते हैं। उन्होंने मद्रास (अब चेन्नई) के लोयोला कॉलेज और प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विव्श्रविद्यालय, नई दिल्ली में पढ़ाई की है। आजादी के 60 वें साल में अपनी जिंदगी के 50 साल पूरे कर रहे पी साईनाथ को इस साल एशिया का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। उन्होंने ग्रामीण भारत की स्थिति और उनकी समस्याओं से रूबरू होने के लिए देश के सबसे गरीब राज्यों में 16 अलग अलग आवागमन के साधनों के जरिए 100,000 किलोमीटर की यात्रा की थी। इनमें 5,000 किलोमीटर वे पैदल चले थे। इस 18 महीने के दौरे में उन्होंने 84 लेख लिखे। इन्हीं लेखों पर आधारित उनकी किताब एवरीबडी लव्ज अ गुड ड्रॉट छपी। पेंग्विन की यह ऑल टाइम बेस्टसेलर है। किताब से मिली रायल्टी के जरिए वे नौजवान ग्रामीण पत्रकारों को पुरस्कार में बड़ी राशि देते हैं।

उन्हें अब तक 30 से 40 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें रैमन मैग्सेसे(2007), यूरोपीय आयोग का नताली पुरस्कार (1994), संयुक्त राष्ट्र एफएओ पुरस्कार(2001), एमनेस्टी इंटरनेशनल ग्लोबल अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स जर्नलिज्म (2000) और हैरी चैपिन मीडिया अवार्ड (2005) प्रमुख हैं। उनकी पत्रकारिता पूरी तरह से आर्थिक असमानता और असुरक्षा, बेरोजगारी, सामुदायिक सशक्तीकरण और स्थायी विकास और खाद्यान्न उत्पादन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित रही है। उनसे भारत की आज़ादी, पत्रकारिता और सरकारी नीतियों पर दैनिक भास्कर के गुरुदत्त तिवारी ने बातचीत की.

sainath

आजादी के 60 साल बाद सरकार गरीबों तक पहुंचने में कितनी सफल हो पाई है?

उन तक पहुंचने की बात तो छोड़िए इन सालों में तो सरकार यह समझ पाने में ही असफल रही है कि वास्तव में गरीब है कौन। फिर उस तक पहुंचने की बात ही अलग है। अलबत्ता उसी सरकार ने 352 सेजों को स्वीकृति देने में 6 माह भी नहीं लगाए। यह कदम देश में प्रिंसली राज की वापसी है क्योंकि इन क्षेत्रों से न तो सरकर को कोई कर मिलेगा न उसके कानून ही वहां चलेंगे। यहां तक की सरकार ने यह तक सोचने की भी जहमत नहीं उठाई कि जितनी जमीन ये कंपनियां मांग रही हैं, उतनी की उन्हें जरूरत भी है या नहीं। इन्फोसिस को सेज गोल्फ कोर्स तक के लिए जमीन दे गई है, जबकि उसके यहां जितने कर्मचारी काम करते हैं, उससे दोगुने दुनिया की मशहूर इलेक्ट्रॉनिक कंपनी सोनी की दो इमारतों में काम करते हैं।

तो आपकी नजर में विकास का कौन सा मॉडल ठीक है?

मेरा मानना है कि देश के संविधान में जो नीति निर्देशक तत्व बताए गए हैं, उन्हें लागू करना एक बेहतर शुरुआत हो सकती है, लेकिन इससे पहले हमें सबसे गरीब तबके की पहचान करनी होगी। गरीब की देश में वर्ग, जाति, लिंग और क्षेत्र के आधार पर पहचान की जा सकती है। वर्ग के आधार पर 40 फीसदी गरीब भूमिहीन किसान हैं। 45 फीसदी छोटे और 7.5 प्रतिशत ग्रामीण काश्तकार हैं। बाकी हिस्से में देश के दूसर वर्ग आते हैं। जाति के आधार पर दलित और आदिवासियों में गरीबों का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। इसी तरह पश्चिमी उड़ीसा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, दक्षिण तमिलनाडु, उत्तरी कर्नाटक, पश्चिमी छत्तीसगढ़ सहित देश के 10 से 12 क्षेत्र हैं, जहां गरीबों का 70 से 80 फीसदी हिस्सा रहता है। हमार यहां लिंग पर आधारित काफी भेदभाव है। इसके चलते महिला को समान कार्य करने के बाद भी पुरुष की तुलना में कम पैसे मिलते हैं।इस प्रवत्ति के कारण महिलाओं में गरीबी पुरुषों की तुलना में अधिक है।

इस पहचान के बाद अगर हम कोई शुरुआत करते हैं तो उसके नतीजे काफी अच्छे आ सकते हैं, लेकिन अफसोस, आजादी के 60 सालों में ऐसे कोई प्रयास नहीं हुए।

60 सालों में देश की सबसे बड़ी असफलता क्या लगती है?

इस दौरान सिर्फ तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में ही भूमि सुधार हो सका है। इसे पूर देश में लागू करने में असफल रहना देश की सबसे बड़ी विफलता है। केरल में 1957 में सबसे पहले भूमि सुधार हुआ था और आज इस राज्य में साक्षरता दर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से कहीं अधिक है।

आप खुद एक पत्रकार हैं। मौजूदा मीडिया किस दिशा में आगे जा रहा है?

मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि मीडिया में आज समर्पित पत्रकारों की कमी है, लेकिन वह अपने अपने मीडिया हाउसों की व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं के आगे बेबस हैं। मीडिया लीडरशीप के अभाव में जर्नलिज्म आम जनता से कटता जा रहा है। उसके सामने विव्श्रसनीयता का संकट आ खड़ा हुआ है। 2004 के लोकसभा चुनावों में सभी मीडिया हाउसों के चुनाव पूर्व विश्लेषणों का धर रह जाना इसका सबसे बड़ा सुबूत है कि मीडिया जनता की नब्ज पहचानने में कितना नाकाम है।

क्या आप मानते हैं कि मीडिया कोपरेरट जगत के चंगुल में फंस चुकी है?

हां! यह सच है। मीडिया की पूरी सोच को कापरेरट प्रभावित कर रहा है। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की खबरों के लिए अखबारों में जगह नहीं है। और किसी व्यक्ति द्वारा 15 लाख रुपए महज एक मोबाइल नंबर के लिए उड़ा देने की खबरें पहले पन्ने की बैनर खबर बन जाती है। यह चलन जनता को गुमराह कर रहा है। सच्चाई तो यह है कि आज भी देश के अगड़े ग्रामीण का प्रतिमाह व्यय महज 503 रुपए है। इसमंे 80 प्रतिशत से अधिक भोजन में व्यय करने के बाद वह शिक्षा पर केवल 17 रुपए और स्वास्थ्य पर केवल 34 रुपए प्रतिमाह खर्च पा रहा है। ऐसे में पिछड़े और भूमिहीन गरीब की तो बात ही मत करें। उसके पास तो स्वास्थ्य पर खर्च करने के लिए ही धन नहीं है।

क्या मीडिया में बदलाव आएगा?

हां! आने वाले सालों में हम सब इस बदलाव के गवाह बन सकते हैं। इस तरह विव्श्रसनीयता के संकट से जूझती मीडिया को जनाक्रोश का सामना करना होगा। इसके बाद फिर से उसे अपने बेसिक में लौटकर काम करना होगा।

(भास्कर से साभार)

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ पत्रकारिता जनता से दूर होती जा रही है : पी साईनाथ ”

  2. By अभय तिवारी on August 13, 2007 at 7:54 AM

    पढ़ाने के लिए आभार

  3. By संजय तिवारी on August 13, 2007 at 12:28 PM

    भाष्कर में पढ़ा तो लगा था कि ब्लाग पर देना चाहिए. आपने ब्लाग पर देकर बहुत अच्छा काम किया.
    आपको बहुत धन्यवाद.

  4. By आशीष on April 5, 2008 at 5:53 PM

    साईनाथ जैसे पत्रकारों की वजह मीडिया में हम आए हैं

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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