हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बस्तर : लोहा गरम है

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/07/2007 12:07:00 AM

हम बस्तर को उसके आदिवासियों, वहां की खनिज संपदा, आदिवासियों के हस्तशिल्प के कारण जानते हैं. हम बस्तर को इसलिए भी जानते हैं क्योंकि वह नक्सली और नक्सलविरोधी सरकारी कार्रवाइयों के लिए खबरों में रहता है. मगर हम जो नहीं जानते वह है बस्तर की आग, बस्तर का लोहा और बस्तर की व्यथा. बस्तर बहुत पहले से शोषण का शिकार रहा है, और लगभग उतने ही दिनों पुराना इसका विद्रोहों का भी इतिहास रहा है. बस्तर की धधकती ज़मीन से एक और रिपोर्ट. यह लंबी रिपोर्ट आलोक प्रकाश पुतुल ने तैयार की है. पहली बार यहां प्रकाशित. प्रथम किस्त.

आलोक प्रकाश पुतुल
त्तीसगढ़ का बस्तर इन दिनों बेहद गरम है.

वैसे गरम होना बस्तर की तासीर है. 30 फीसदी से भी कम साक्षरतावाले बस्तर के आदिवासी सदियों से अपनी इबारत खुद ही लिखते रहे हैं, जिसमें शोषण का अंतहीन सिलसिला है औऱ इस शोषण के खिलाफ़ अनवरत चलनेवाली लड़ाई है.
1857 का कोया विद्रोह हो या उससे पहले 1825 में परलकोट के गेंद सिंह की लड़ाई, बस्तर हमेशा से संघर्ष करता रहा है. 1910 के अंग्रेजों के खिलाफ़ भूमकाल विद्रोह से जुड़े किस्से तो आज भी लोक कथाओं और गीतों के रुप में बस्तर की हवा में तैर रहे हैं, जो हमेशा शोषण के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देते रहते हैं.

लेकिन इस बार दृश्य थोड़ा बदला हुआ है.
सरकार, विपक्षी राजनीतिज्ञ और औद्योगिक घराने बस्तर में पहली बार संगठित हो कर एक छत के नीचे आए हैं. उनका दावा है कि वे बस्तर के आदिवासियों का विकास करना चाहते हैं, उन्हें साक्षर बनाना चाहते हैं, नागर समाज जो सुख-सुविधाएं भोगता है वह सब कुछ उन्हें उपलब्ध कराना चाहते हैं और यह भी कि वे आदिवासियों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ना चाहते हैं.

देश में सबसे अधिक नक्सल प्रभावित बस्तर में 70 फीसदी जनसंख्या आदिवासियों की है, जो छत्तीसगढ़ की कुल आदिवासी जनसंख्या का 26.76 प्रतिशत है. लेकिन सरकार, विपक्षी राजनीतिज्ञ व औद्योगिक घरानों के इस दावे से बस्तर का आदिवासी समाज डरा और सहमा हुआ है और थोड़ा-थोड़ा नाराज़ भी. नाराजगी की यही आग बस्तर में धीरे-धीरे सुलग रही है.

इस मामले की शुरुवात 4 जून 2005 को होती है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह और टाटा स्टील कंपनी के बीच एक एमओयू में हस्ताक्षर के साथ घोषणा हुई कि टाटा स्टील बस्तर में 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रथम चरण में 2
मिलीयन टन और भविष्य में 3 मिलीयन टन की उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लांट लगाएगा.

महीने भर बाद 5 जुलाई 2005 को छत्तीसगढ़ सरकार ने एस्सार ग्रुप के साथ एक करार किया, जिसमें एस्सार ने बस्तर में प्रथम चरण में 1.6 मिलीयन टन और फिर 1.6 मिलीयन टन की उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लॉंट लगाने की घोषणा की. खनिज संपदा में बेहद संपन्न छत्तीसगढ़ में इन दोनों ही एमओयू को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं हुईं.
ज़ाहिर है, दुनिया की इन दो शक्तिशाली स्टील कंपनियों के साथ हुए एमओयू को लेकर लोगों में भारी उत्सुकता थी. मसलन इन कंपनियों को कितनी ज़मीन दी जाएगी, ज़मीन कहां की और किसकी होगी, अगर आदिवासियों की जमीन ली जाएगी तो जमीन के बदले आदिवासियों को कितना मुआवजा मिलेगा, उनके पुनर्वास की क्या-क्या शर्ते हैं, इन कंपनियों को पानी कहां से मिलेगा, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर कितने होंगे, आदि-आदि. सवाल कई थे लेकिन इन सारे सवालों पर सरकार चुप थी.


किस्सा एमओयू का

ऐसी स्थिति में सरकार और इन दोनों कंपनियों के एमओयू का खुलासा ज़रुरी था. देश में होने वाले एमओयू अब तक सार्वजनिक दस्तावेज़ माने जाते रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार टाटा और एस्सार के साथ हुए एमओयू को सार्वजनिक करने की कौन कहे, इस पर कोई बात भी करने के लिए तैयार नहीं थी.

सूचना के अधिकार के तहत जब लोगों ने इन एमओयू की छाया प्रति सरकार से चाही तो उन्हें जो जवाब मिला वह चौंकाने वाला था. सरकार की तरफ से बताया गया कि एमओयू को किसी तीसरे पक्ष को सार्वजनिक नहीं करने की शर्त भी एमओयू में है, इस लिहाज से एमओयू की प्रति उन्हें नहीं दी जा सकती.

कांग्रेसी विधायकों ने भी ज़ोर-आजमाइश की लेकिन वे भी एमओयू की प्रति हासिल करने में नाकाम रहे. अंततः मामला विधानसभा तक जा पहुंचा. विधान सभा के बजट सत्र में जब विधायकों ने एमओयू की शर्तों के बारे में सरकार से जानना चाहा तो जन प्रतिनिधियों के सामने भी सरकार ने इन दोनों कंपनियों के साथ हुए एमओयू को सदन के पटल पर रखने से इंकार कर दिया.

ज़ाहिर है, यह आकलन करना मुश्किल नहीं था कि सरकार ने प्रलोभन या दबाव में आकर एमओयू में ऐसी शर्तें शामिल की हैं, जो राज्य की जनता के हित में नहीं थीं. इसलिए सरकार इसे सार्वजनिक करने से बचती रही.

बाद में सरकारी दफ्तरों से एमओयू का सच जिस तरह से छन-छन कर सामने आने लगा, उससे यह साबित हो गया कि सरकार ने सारे नियम-कायदे को ताक पर रख कर इन दोनों कंपनियों से समझौता किया है.

तार-तार कानून
छत्तीसगढ़ सरकार ने इन एमओयू में दोनों कंपनियों को बस्तर में कहीं भी ज़मीन चुनने का अधिकार दे रखा था. यानी इन कंपनियों के लिए केंद्र सरकार के उस नियम को धत्ता बता कर ज़मीन देने का आश्वासन दिया गया था, जिसके तहत इस तरह के किसी भी संयंत्र को लगाने से पहले जन सुनवाई के बाद पर्यावरण मंडल की अनापत्ति ज़रुरी होती है. यहां तक कि संयंत्र के रिजर्व फॉरेस्ट के इलाके में इस तरह की अनापत्ति की ज़रुरत की भी राज्य सरकार ने अनदेखी कर दी.

बिजली की कमी से जुझ रहे छत्तीसगढ़ ने इन दोनों कंपनियों को न केवल बिजली वितरण के लिए अधोसंरचना उपलब्ध कराने का आश्वासन इस एमओयू में दिया है, बल्कि बिजली उपलब्ध कराने की जिम्मेवारी भी सरकार ने ली है. जन सुविधाओं के विस्तार या स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार जैसी कोई भी शर्त इस एमओयू में नहीं शामिल की गई.

एमओयू में सरकार ने कंपनियों को नए आयरन ओर के पट्टों के अलावा ऐसे पट्टे देने का भी आश्वासन दिया है, जिनका लाइसेंस पहले से ही किसी और कंपनी के पास है. इन पट्टों से आयरन ओर निकाल कर उनके निर्यात पर भी किसी तरह का प्रतिबंध एमओयू में शामिल नहीं है, यानी दोनों कंपनियां बस्तर में स्टील प्लांट लगाए बिना आयरन ओर बेचने का काम कर सकती हैं. यह सब कुछ 99 साल तक निर्बाध तरीके से चल सकेगा क्योंकि एमओयू की शर्तें आगामी 99 सालों तक प्रभावशाली हैं.

इन सबों के अलावा एमओयू में इन दोनों कंपनियों को स्टील प्लांट के लिए आवश्यक पानी उपलब्ध कराने का जिम्मा भी सरकार ने लिया है. टाटा स्टील ने 35 मिलीयन गैलन पानी प्रति दिन की जरुरत बताई है तो एस्सार ने पहले 25 मिलीयन गैलन पानी, फिर उससे 2.7 गुणा ज्यादा पानी की मांग रख दी. हालांकि इस एमओयू में स्टील प्लांट के साथ वाटर ट्रिटमेंट प्लांट लगाने का कोई जिक्र नहीं था. बस्तर की शंखिनी और डंकिनी नदी का पानी जिन्होंने देखा होगा, उनके लिए यह स्वीकार कर पाना मुश्किल है कि ये नदियां पानी की नदियां हैं. अपने लौह अयस्क की धुलाई के बाद पानी को शंखिनी-डंकिनी में बहाने वाली एनएमडीसी ने इन नदियों को लाल और कीचड़युक्त नाले में बदल दिया है. शंखिनी-डंकिनी को बचाने के लिए लगभग 7 साल पहले एक जनहित याचिका लगाई गई थी लेकिन उस जनहित याचिका पर एक बार भी सुनवाई नहीं हुई.

यहां यह उल्लेखनीय है कि टाटा और एस्सार, दोनों ही कंपनियों को स्टील प्लांट लगाने की स्थिति में इंद्रावती नदी से पानी लेना पड़ेगा, जो पिछले कुछ सालों से सूखे का सामना कर रही है. इंद्रावती के घटते जल स्तर के कारण छत्तीसगढ़ को उड़ीसा पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां से 45 टीएमसी पानी इंद्रावती में छोड़ा जाता है. लेकिन हर साल पानी को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है. जानकारों के अनुसार पिछले 10 सालों से इंद्रावती के लगातार घटते जल स्तर के कारण बस्तर के कम से कम 4 हज़ार तालाब सूख चुके हैं. हालत ये है कि आम जनता को अपनी जरुरतें पूरी करने के लिए भी इस नदी से मुश्किल से पानी मिल पाता है. ऐसे में स्टील प्लांट लगने की दशा में आदिवासियों को इस पानी से भी वंचित होना पड़ेगा.

एस्सार ने 2006 में ही बस्तर के बैलाडीला से विशाखापटनम तक 267 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन का निर्माण किया है. दुनिया की दूसरी सबसे लंबी पाइपलाइन के सहारे हर साल 80 लाख टन लौह अयस्क के चुरे की ढ़ुलाई की जा सकेगी. एस्सार स्टील के महानिदेशक प्रशांत रुइया की मानें तो सड़क मार्ग से लोहे के परिवहन में प्रति टन 550 रुपए के बजाय इस पाइपलाइन से परिवहन में प्रति टन केवल 80 रुपए का खर्चा आएगा. लेकिन इस पाइपलाइन को लेकर भी कम विवाद नहीं हैं.

टाटा और एस्सार द्वारा स्टील प्लांट लगाने संबंधी गड़बड़ियों के मुद्दे पर जनहित याचिका लगाने वाले राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी कहते हैं- एस्सार ने इस पाइपलाइन के लिए भी अब तक मुआवजे का भुगतान नहीं किया है. इसके अलावा इस पाइपलाइन के लिए 8.4 मीटर चौड़ाई की ज़रुरत थी, लेकिन एस्सार कंपनी ने 20 मीटर की चौड़ाई में सारे पेड़ काट डाले.
बहरहाल बस्तर में स्टील प्लांट के एमओयू का मामला राजनीतिक गलियारे में उलझ गया और टाटा व एस्सार ने अपने स्टील प्लांट के लिए बस्तर में ज़मीन तलाशना शुरु कर दिया.
टाटा ने अपने लिए 5 हज़ार एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहण के लिए बस्तर के लोहण्डीगुड़ा इलाके के 10 गांवों का चयन किया, वहीं एस्सार ने अपने लिए दंतेवाड़ा से 20 किलोमीटर दूर धुरली और भांसी में 2500 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण की शुरुवात कर दी. स्टील संयंत्रों की स्थापना के लिए जिस तरह की नई तकनीक आई है, उसमें इतनी अधिक जमीन की जरुरत को लेकर ही सबसे पहले सवाल उठने शुरु हो गए. इससे पहले 1955 में जब भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना की जा रही थी, उस समय भी बड़ी मात्रा में लोगों को विस्थापित करके इस्पात संयंत्र की नींव रखी गई. लेकिन 1972 के आसपास यह समझ में आ गया कि इतनी अधिक जमीनों की जरुरत नहीं थी. अंततः लगभग 50 प्रतिशत जमीनें सरकार को वापस कर दी गई और बाद में औने-पौने भाव में व्यवसायियों ने सरकार से जमीन खरीद ली.
टाटा और एस्सार द्वारा इतनी ज़मीन मांगे जाने के पीछे यह तर्क दिया गया कि इस जमीन का इस्तेमाल बैंक से लोन लेने के लिए किया जाएगा.
लेकिन बस्तर में जमीन पाना इतना आसान नहीं था.
आदिवासियों ने अपनी सभाएं बुलाई और साफ कर दिया कि टाटा या एस्सार को अपनी ज़मीन नहीं देंगे. सरकार में शामिल विधायक और सांसद भी जनता के साथ आ गए और प्रस्तावित स्टील प्लांट वाले इलाके की हवा गरम होने लगी.
आज हालत ये है कि लोहण्डीगुड़ा-बेलर और भांसी-धुरली के इलाके में लोग टाटा-एस्सार का नाम सुनते ही भड़क उठते हैं. क्रमशः
(पैनोस साउथ एशिया अध्ययन का हिस्सा) तसवीर आलोक प्रकाश पुतुल की

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  1. 7 टिप्पणियां: Responses to “ बस्तर : लोहा गरम है ”

  2. By अजित वडनेरकर on August 7, 2007 at 4:17 AM

    जानकारीपूर्ण । अगली कड़ी का इन्तज़ार है। हाशिये पर अब रोज़ आना होगा। अपने ब्लोग पर लिन्क दे दिया है।

  3. By Reyaz-ul-haque on August 7, 2007 at 5:38 AM

    shukriya. jarur aiyie. swagat.

  4. By Sanjeeva Tiwari on August 7, 2007 at 7:00 AM

    बहुत ही अच्‍छी जानकारी । पुतुल जी को हम बीबीसी में ही पढते रहे हैं अब इस प्‍लेटफार्म पर पढने को मिला अच्‍छा लगा अगली कडियों का इंतजार है ।‍

    बधाई !
    “आरंभ” संजीव का हिन्‍दी चिट्ठा

  5. By Sanjeet Tripathi on August 7, 2007 at 10:13 AM

    शुक्रिया, शुक्रिया, शुक्रिया पुतुल जी, इस पूर्ण जानकारी के लिए!!

    हाशिया का आभार!!

  6. By notepad on August 7, 2007 at 10:16 AM

    बहुत महत्वपूर्ण जानकारी है ।रियाज़ जी के प्रयास सराहनीय हैं ।

  7. By rajni on August 7, 2007 at 2:41 PM

    Alok je ko abhi tak BBC aur germany ke Deutsche Welle main hi padhne ka awasar mila thha. unhen Hashiya par dekh kar acharaj huwa. bahoot hi acchi report likhi hai unhone. meri badhai len.
    Rajni Singh

  8. By Manish on August 7, 2007 at 9:44 PM

    बस्तर जिले की इसी इंद्रावती नदी से पानी लेकर NMDC द्वारा फेकी जाने वाली आयरन फाइन्स का प्रयोग कर स्टील बनाने के लिए feasibility report पर कभी मैंने भी योगदान दिया था। वो योज़ना तो ठंडे बस्ते में चली गई। बहरहाल बहुत अच्छी जानकारी दी अब तक आपने, धन्यवाद।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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