हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

साम्यवाद अब आयेगा नहीं, तो पूंजीवाद से ही सब बेहतर होगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/05/2007 05:02:00 PM

मैनेजर पांडेय हिंदी आलोचना के क्षेत्र में जाना-माना नाम है. इसी के साथ वे अपने सजग राजनीतिक नज़रिये के लिए भी जाने जाते हैं. प्रभात खबर के साथी निराला ने उनसे अनेक विषयों पर बात्चीत की जो अखबार में छपी भी है.हम इस बातचीत को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं.

सवाल : वैश्वीकरण के बारे में आपकी क्या राय है और इसके प्रभावों का आकलन किस तरह करते हैं?
जवाब : वैश्वीकरण देखने में एक बहुत ही मोहक व आकर्षक शब्द है. लेकिन वास्तविकता काफी खतरनाक व चिंताजनक है. सारी दुनिया का अमेरिकीकरण हो रहा है. 10 वर्ष पूर्व अमेरिका ने न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यानी कि नयी विश्व व्यवस्था की बात कही थी, जो अब सच में बदलता दिख रहा है. पूर्वी यूरोप व रूस में समाजवाद के खात्मे के बाद अमेरिका पूंजीवाद के बल पर पूरी दुनिया में तो अपना प्रभाव जमाना ही चाहता है, उसकी विशेष नजर तीसरी दुनिया यानी कि एशिया, अफ्रिका और लैटिन अमेरिका के देशों पर है. तीसरी दुनिया के देशों में कच्चे माल का भंडार है, यहीं तैयार माल का सबसे आकर्षक बाजार भी है. सो, वैश्वीकरण की चोट सबसे ज्यादा तीसरी दुनिया के देशों पर ही पड़ेगी.
सवाल : तो क्या वैश्वीकरण को एक सिरे से खारिज कर देने से सब ठीक हो जायेगा?
जवाब : नहीं, मेरा आशय अमेरिकी पूंजीवाद के विरोध से है. देश में यदि स्वतंत्र पूंजीवाद का विकास हो तो स्थिति बेहतर होने की संभावना है. वैसे भी अब समाजवाद व साम्यवाद इतने वैचारिक संकट से गुजर रहे हैं कि उसके आने की संभावना निकट भविष्य में नहीं, सो स्वतंत्र पूंजीवाद तो कम से कम राहत की सांस देगा. अब भारत खाड़ी देशों से गैस पाइप लाइन बिछाने का समझौता करेगा या नहीं, इसमें अमेरिका की सहमति ली जाती है, ऐसी अमेरिकापरस्ती पर शर्म आनी चाहिए.
सवाल : लेकिन यह तो हो रहा है, खुल कर हो रहा है. विदेशी कंपनियां आ रही हैं, सेज बन रहे हैं. केंद्र सरकार तो इसके समर्थन में है.
जवाब : सबको याद होगा कि जो देश के वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह हैं, वित्त मंत्री रहते इन्होंने ही भूमंडलीकरण, उदारीकरण की शुरुआत की थी. अब वे प्रधानमंत्री बन गये हैं तो उस सपने को और तेजी से साकार कर रहे हैं. रही बात विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी सेज और मल्टीनेशनल कंपनियों की, तो इसका विरोध किसी दल का राजनेता नहीं करेंगे. करना होता तो अब तक किये होते. क्या अब तक राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसा आंदोलन सम्मिलित रूप से हो सका है? सरकार व नेता तो हर चीज को गिरवी रख देना चाहते हैं. सरकार की नीति तो ऐसी है कि हर नदी, पहाड़, जंगल जैसी सार्वजनिक विरासत को कंपनियों की विरासत बनायी जा रही है, इससे किसका भला होगा. इसके विरोध में नर्मदा बचाओ जैसा आंदोलन चलाना होगा, जिसने तीन राज्यों व केंद्र सरकार व न्यायालय तक को सकते में डाला.
सवाल : आप जिसे अमेरिकापरस्ती कह रहे हैं, उससे छुटकारा की कोई संभावना दिखती है क्या?
जवाब : जो तीसरी दुनिया के देश हैं, वहां के राजनैतिक दल व राजनेताओं को नैतिक साहस दिखाना होगा. ऐसा हो भी रहा है लेकिन टुकड़े-टुकड़े में. लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति चावेज ने अमेरिका का खुल कर विरोध किया है और नीतियों को मानने से इनकार कर दिया है. लेकिन यह तो सबको पता है न कि जो अमेरिका का विरोध करता है, उसके साथ क्या व्यवहार किया जाता है. अभी हाल ही में सीआइए की रिपोर्ट में तो यह बात खुल कर सामने आ ही गयी न कि क्यूबा के फिदेल कास्त्रो की हत्या के लिए कितना परेशान था अमेरिका. कास्त्रो ही नहीं, चावेज की भी हत्या करवाना चाहता है अमेरिका.
अमेरिका में एक कट्टर इसाई समुदाय है यूवांजलिस्ट. बताया जाता है कि बुश को राष्ट्रपति बनवाने में इस समुदाय की भूमिका अहम रही थी. इसी समुदाय के सबसे बड़े धार्मिक गुरु ने अभी हाल ही में सार्वजनिक तौर पर कहा है कि चावेज की हत्या कर देनी चाहिए. आखिर क्यों एक धार्मिक गुरु ऐसी बातें कहेगा और क्यों नहीं कहीं से विरोध के स्वर उठे? अमेरिकी दादागिरी यही है.
सवाल : और आजाद भारत के 60 साल होनेवाले हैं. इन 60 वर्षों की यात्रा को कैसे देखते हैं आप? आप जिस तरह मल्टीनेशनल कंपनियों के आने व वैश्वीकरण से खतरे को बयान कर रहे हैं, उससे क्या देश में ईस्ट इंडिया कंपनियों का कॉकस बन रहा है?
जवाब : पहली बात तो यह स्वयं महसूस करने की है कि इस देश में सिवाय चुनाव पर्व के, कुछ भी ऐसा होता है क्या जो लोकतंत्र के होने का अहसास कराये? शुक्र है कि अब भी नेताओं को चुनाव द्वारा संसद व सदन तक भेजा जाता है, जिससे भारत के लोकतांत्रिक देश होने का अहसास हो जाता है. 60 वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, यह अपने आप में एक अलग व विस्तृत विषय है लेकिन जिस तरह यहां मल्टीनेशनल कंपनियों का जाल गांव-जवार तक फैल रहा है, लोगों को उजाड़ रहा है और उन्हें सरकारी शह मिल रही है, उससे एक नहीं दर्जनों इस्ट इंडिया कंपनियां एक साथ अपने तरीके से काम करेंगी. वह समय जल्द ही आ रहा है.
सवाल : दक्षिणपंथियों के बारे में तो शुरू से कहा जाता रहा है कि वे व्यावसायिक घरानों के पोषक रहे हैं लेकिन वामपंथी पार्टियों को क्या हो गया है? पश्चिम बंगाल से लेकर चीन तक तो वैश्वीकरण की ही बयार है.
जवाब : नहीं, वामपंथियों को आप दो भाग में बांट कर देखिए. एक वे हैं जो सरकार के साथ हैं और सत्ता-शासन से उनका मोह रहा है और दूसरे वे जो सरकार व सत्ता से बाहर रहते हैं. सत्तावाले वामपंथी हमेशा बाहर वाले वामपंथियों को तरह-तरह से परेशान करते हैं. पश्चिम बंगाल की सरकार की बात क्या करें. वहां वही हो रहा है जो चीन में हो रहा है. ये शुरू से चीन को अपना आदर्श मानते भी रहे हैं. अब तो दुनिया में कई वामपंथी विचारक कह रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का नाम कनफ्युशियस पार्टी ऑफ चाइना कर देना चाहिए, देखने में लघु नाम सीपीसी बरकरार भी रह जायेगा.
सवाल : इसका मतलब यह कि वाम बनाम वाम की जंग जारी है.
जवाब : मैंने पहले ही कहा कि दुनिया भर में वामपंथ, साम्यवाद, समाजवाद वैचारिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं. पूंजीवाद की पुन:स्थापना ही कुछ वामपंथी दलों का मकसद हो गया है.
सवाल : भारत में कई अलग-अलग तरह के भारत बन रहे हैं. दक्षिण व पश्चिम के राज्य दिन ब दिन विकास की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और हिंदी पट्टी के राज्य विवशता के आंसू बहा रहे हैं. इससे कितना इत्तफाक रखते हैं आप?
जवाब : हिंदी पट्टी की यह समस्या तो प्राचीन काल से ही रही है. जड़ता और आडंबर में हिंदी पट्टी इस कदर फंसा रहा कि उसे कुछ करने का ध्यान ही नहीं रहा. अब तो स्थिति ऐसी हो रही है कि हिंदी पट्टी के मजदूरों को कहीं काम भी नहीं मिल रहा. सभी जगह मारे जा रहे हैं, भगाये जा रहे हैं फिर भी हिंदी पट्टी के नेताओं को शर्म नहीं आती. यह शर्म से डूब मरने की बात है कि हिंदी पट्टी के नेता व शासन के लोग अपने प्रदेश में तो रोजगार सृजित नहीं ही कर पाते, दूसरे जगह उनके लोग मारे-काटे व भगाये जा रहे हैं.
सवाल : बिहार में तो सरकार बदली है, वहां कैसी उम्मीद...?
जवाब : हिंदी पट्टी के किसी राज्य की बात करें, पहली समस्या तो यही है कि अपने लोगों को रोजगार-स्वरोजगार का उचित मंच मुहैया कराये. इसे पूरा किये बगैर विकास का कोई मॉडल मायने नहीं रखता.
सवाल : राष्ट्रपति चुनाव में चल रहे नौटंकी पर भी कु छ कहना चाहेंगे?
जवाब : इस तमाशे को तो पूरा देश देख-सुन रहा है. दरअसल कांग्रेस शुरू से ही कठपुतली शासन में विश्वास करती रही है. एक समय में राष्ट्रपति सरकार की निरंकुशता व मनमानी पर अंकुश लगाने का काम करता था. अब जो राष्ट्रपति ही लाचार होगा, वह क्या अंकुश लगायेगा, यह सोचनेवाली बात है.
सवाल : अब बात साहित्य की करते हैं. नये रचनाकारों को प्रकाशन के संकट से मुक्ति कब मिलेगी?
जवाब : प्रकाशन का संकट तो कृत्रिम है. आप हाल के दिनों में देखिए, प्रकाशक दिन ब दिन कुबेर होते जा रहे हैं और लेखकों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा. लेखकों को रॉयल्टी नहीं मिलती और कुछेक तो लेखकों की ऐसी जमात भी मिलती है जो खुद से पैसा देकर अपनी रचनाओं को छपवाते हैं. यह संकट रहेगा, क्योंकि अब सारे के सारे प्रकाशक दिल्ली में बैठ मठाधीशी कर रहे हैं जो ठीक संकेत नहीं.
सवाल : और आखिर में नामवर सिंह द्वारा हाल ही में पंत के समग्र साहित्य संसार को कचरा करार दिया जाना कहां तक ठीक लगता है?
जवाब : मैं नामवर सिंह के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. वे आजकल चौंकानेवाले अंदाज में बोलते हैं. रही बात पंत की तो हिंदी साहित्य में संवेदनात्मक लेखन को आधार उन्होंने ही दिया था. और फिर कौन कवि ऐसा हुआ है, जिसकी सारी रचनाएं ठीक हों. सबका कुछ न कुछ कचरा होता ही है लेकिन कसौटी पर तो हमेशा ही अच्छी रचनाओं से कसा जाता है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ साम्यवाद अब आयेगा नहीं, तो पूंजीवाद से ही सब बेहतर होगा ”

  2. By अनूप शुक्ला on August 5, 2007 at 7:17 PM

    यह बातचीत पढ़ाने के लिये आपका आभार!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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