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बीच सफ़हे की लड़ाई

बस्तर : लोहा गरम है-2

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/10/2007 01:23:00 AM

आप सबको लंबा इंतज़ार करवाया, इसके लिए मआज़रत. दरअसल बिहार में बाढ़ ने इस तरह तबाही मचायी है कि पटना में बैठा नहीं गया. सो हम निकल गये बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के दौरे पर. पहला दौरा समस्तीपुर. असल में यह बाढ़, जैसा कि लोगों ने भी बताया, बांधों के कारण और अधिक तबाही लानेवाली हो गयी है. और इसी के साथ नाकारा और संवेदनहीन तंत्र इस त्रासदी को और गहरा बना रहा है. यही वजह है कि बाढ़ से जितना नुकसान हो रहा है, उससे अधिक नुकसान राहत कार्य के अभाव से हो रहा है. हम ऐसी जगहों पर गये, जहां एक हफ़्ता गुजर जाने के बावजूद न फ़ंसे लोगों को निकाला गया है और न ही उन तक कोई राहत पहुंच सकी है. और जो राहत के पैकेट गिराये जा रहे हैं, उनमें खाद्य सामग्री के नाम पर गेहूं है. गेहूं को न उबाल कर खाया जा सकता है और न भून कर. उसे पीसना ज़रूरी है. और इस तबाही में कौन कहां पिसवायेगा?
खैर बाढ़ की यह दास्तान बाद में, पहले आलोक भाई के लेख की अगली (दूसरी) कडी़. पहली कडी़ आप पढ चुके हैं. दरअसल यह पूरी रिपोर्ट हमें अपने देश के एक दूसरे ही चेहरे से अवगत कराती है.

किस्से अरबों हैं
आलोक प्रकाश पुतुल

सल में लोहण्डीगुड़ा-बेलर में टाटा और भांसी व धुरली में एस्सार के ख़िलाफ़ लोगों का गुस्सा अकारण नहीं है. सच तो ये है स्टील प्लांट और लोहे के नाम पर बस्तर ने अब तक जो कुछ देखा और भुगता है, उसे भुला पाना बस्तर के आदिवासियों के लिए संभव नहीं है.

लोहा बस्तर और छत्तीसगढ़ के जन जीवन में रचा-बसा हुआ है. आयरन ओर से इस्पात बनाने की शुरुवात भी यहां पहली बार नहीं हो रही है. आगरिया गौंड़ आदिवासी तो जाने कब से आयरन ओर को गला कर इस्पात बनाने का काम करते रहे हैं. 19वीं शताब्दी के आरंभ में आगरिया आदिवासियों के कम से कम 441 परिवार घरेलू भट्ठियों में आयरन ओर से इस्पात बनाने का काम कर रहे थे.
और तो और, टाटा ने पहले भी बस्तर में स्टील प्लांट लगाने की पहल की थी. पुराने दस्तावेज़ों की मानें तो 1896 में जमशेदजी टाटा ने भी कुछ भूगर्भ शास्त्रियों के साथ बस्तर का दौरा किया था और बस्तर के लौह खदानों की उपलब्धता व गुणवत्ता के आधार पर बस्तर या उड़ीसा के संबलपुर में स्टील प्लांट लगाने की संभावनाएं तलाशी थीं, लेकिन रेललाइन व दूसरे यातायत के साधनों के अभाव में यह इरादा टालना पड़ा.

इस इलाके में दूसरा कदम रखा एनएमडीसी ने. 15 नवंबर 1958 को स्थापित एनएमडीसी ने 1968 में इसी बस्तर के बैलाडीला से लौह अयस्क का उत्पादन शुरु किया. 14 हिस्सों में बंटे लौह अयस्कों की 2 डिपाजिटों से एनएमडीसी ने उत्खनन शुरु किया और जापान निर्यात करना शुरु कर दिया. प्रति दिन लगभग 1 करोड़ 22 लाख रुपये के 27 लाख टन आयरन ओर का निर्यात किया जा रहा था. लेकिन यह तो तस्वीर का एक पहलू है.

बस्तर में कोंटा इलाके के आदिवासी विधायक कवासी लखमा कहते हैं-एनएमडीसी ने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का शोषण ही किया है. आज भी एनएमडीसी में इस इलाके के अधिकतम 15 फीसदी लोगों को रोजगार मिला है.

लेकिन बात केवल रोजगार की नहीं है. एनएमडीसी की खदानों की लीज जब 1995 में खत्म हुई, उसी के आस पास भारत सरकार से संबद्द साइंस एंड टेक्नालॉजी सेल की रिपोर्ट सामने आई. रिमोट सेसिंग एप्लीकेशन सेंटर द्वारा इस इलाके की व्यापक जांच और सर्वेक्षणों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रम एनएमडीसी द्वारा लगातार उत्खनन और पर्यावरण की घोर उपेक्षा के कारण माईनिंग एरिया के चारों ओर के 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र का पर्यावरण, फ्लोरा-फाना, बॉयोडायवरसिटी, जंगल, खेती और जीव जगत बुरी तरह प्रभावित हुआ है. यह पूरा इलाका वन रहित हो गया है. केंद्र और राज्य सरकारों ने भी समय-समय पर माना कि एनएमडीसी के उत्खनन के कारण इस इलाके में रहने की परिस्थियां बदत्तर हुई हैं.
इस इलाके के लगभग 100 किलोमीटर के विस्तार में बहने वाली शंखिनी नदी में लौह अयस्क की धुलाई के बाद छोड़े गए पानी के कारण शंखिनी और डंकिनी नदी लाल दलदल वाले क्षेत्र में बदल गईं. लाखों लोगों के लिए जीवनदायिनी ये नदियां मुसीबत बन गईं. गावों में नई-नई बीमारियों का प्रकोप फैलता चला गया. सैकड़ों गावों का पानी प्रदूषित हो गया और सिंचाई की सुविधा छिन गई. इन नदियों के दलदल में सैकड़ों पालतू पशु समा गए. कई बच्चे भी इन नदियों के दलदल में फंस कर अपनी जान गंवा बैठे.

वायदों का सच बनाम नगरनार
इधर 90 के दशक में ही बस्तर के मावलीभाटा और नगरनार में भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी ने स्टील प्लांट लगाने की जब घोषणा की तो बैलाडीला में जल, जंगल और जमीन की हालत से वाकिफ आदिवासियों ने संगठित हो कर यह सवाल पूछा कि इस स्टील प्लांट से हमें क्या मिलेगा.

ज़ाहिर है, इसका जवाब किसी के पास नहीं था. यहां तक कि इस प्लांट के लिए जमीन अधिगग्रहण के दौरान जब आदिवासियों ने अपने पुनर्वास को लेकर सरकारी नीति का खुलासा चाहा तो पता चला कि इस स्टील प्लांट के लिए सरकार ने कोई पुनर्वास नीति बनाई ही नहीं है. लेकिन सरकार के लिए यह स्टील प्लांट तो जैसे नाक की बात हो गई थी. सरकारी दमन चक्र ऐसा चला कि सैकड़ों आदिवासियों के साथ-साथ कई लोग पुलिस और एनएमडीसी के गुंडों के हाथों प्रताड़ित हुए.

भारत जन आंदोलन के नेता व तब के अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के आयुक्त ब्रह्मदेव शर्मा को तो गुंड़ों ने नगरनार का विरोध करने पर लगभग नंगा करके जुलूस निकाला था और सार्वजनिक रुप से उन्हें प्रताड़ित किया था. ये वही ब्रह्मदेव शर्मा थे, जिनकी एक आईएएस के रुप में पूरे बस्तर में तूती बोलती थी.

बहरहाल स्टील प्लांट का विवाद गहराता गया और सरकारी फाइलों का बोझ बढ़ता रहा.
1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तो सरकार ने उन पुरानी परियोजनाओं को खंगालना शुरु किया, जो मध्य प्रदेश से विरासत में मिली थी. इसी क्रम में राज्य बनने के कुछ ही दिन बाद एनएमडीसी ने फिर से बस्तर में स्टील प्लांट लगाने की घोषणा की और आनन-फानन में दंतेवाड़ा के गीदम के घोटपाल और हीरानार में स्टील प्लांट के लिए आदिवासियों की ज़मीन पर कब्जा करना शुरु कर दिया.

5वीं अनुसूची लागू होने के करण बस्तर के इस अधिसूचित क्षेत्र में नियमानुसार ग्राम सभा की सहमति से ही ज़मीन ली जा सकती है. लेकिन इस तरह के नियम को ताक पर रख कर जब जमीन अधिग्रहण का काम चालू रहा तो आदिवासी सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगे और भूमि अधिग्रहण के मामले की गूंज दिल्ली तक जा पहुंची. छत्तीसगढ़ सरकार ने भी माना कि अधिग्रहण के लिए आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया जा सका है. अंततः एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ सरकार ने अपना काम-धाम इस इलाके से समेट लिया। इसके बाद एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बार फिर अपना रुख नगरनार की ओर किया.

बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर है नगरनार. बस्तर के सर्वाधिक घनी आबादी और उत्कृष्ट कृषि योग्य भूमि वाले इस इलाके में जब स्टील प्लांट लगाने के ख्वाब आदिवासियों को दिखाए गए तो उन्हें बताया गया कि इस इलाके के आदिवासियों के लिए रोजगार, आवास, शिक्षा औऱ चिकित्सा के क्षेत्र में संभावनाओं के नए दरवाज़े खुलेंगे लेकिन इसका सच बस्तर की सल्फी से भी कड़वा साबित हुआ.


मई, 2001 में जब भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी ने नगरनार में स्टील प्लांट लगाने की घोषणा की तो आदिवासियों को कई सब्जबाग दिखाए गए. कहा गया कि 40 हज़ार लोगों को रोजगार दिया जाएगा, लोगों को ज़मीन के बदले जमीन दी जाएगी, बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाएगी, खेतों के बदले पर्याप्त मुआवजा दिया जाएगा और यह भी कि सभी लोगों को घर बना कर दिए जाएंगे. लेकिन जब इस स्टील प्लांट के लिए 300 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण का काम शुरु हुआ किया तो एनएमडीसी और राज्य सरकार की नियत आदिवासियों की समझ में आ गई.
शुरुवात तो ग्राम सभा से से ही हुई जहां ज़मीन अधिग्रहण से पहले गांव वालों की सहमति लेनी थी. सरकार ने तो जैसे तय कर रखा था कि नियम-क़ायदा को ताक पर रख कर चाहे जैसे भी हो एनएमडीसी के लिए आदिवासियों की ज़मीन हासिल करनी है. लेकिन जब आदिवासियों से बंदूक की नोंक पर सहमति बनाने के प्रयास शुरु हुए तो लोगों ने विरोध करना शुरु कर दिया.

24 अक्टूबर 2001 को ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ आदिवासियों ने जब एनएमडीसी और सरकार का विरोध करना शुरु किया तो पुलिस ने पहले तो निहत्थे लोगों पर बर्बरता से लाठियां बरसाई और जब बात उससे भी नहीं बनी तो गोलियां चलाई गई. महिलाओं समेत 50 से अधिक लोग बुरी तरह हताहत हुए.

लेकिन आदिवासियों का विरोध इस तरह की कार्रवाई से भी कम नहीं हुआ. 2 मार्च 2002 को आदिवासियों ने अपनी ग्रामसभा की और तय किया कि एनएमडीसी के प्रस्तावित स्टील प्लांट के लिए ज़मीन अधिग्रहण का काम नियम-क़ानून के दायरे में हो और विस्थापित होने वाले आदिवासियों के पुनर्वास की व्यवस्था के अलावा उन्हें ज़मीन के बदले ज़मीन दी जाए, जिससे उनकी आजीविका चलती रहे.

उम्मीद की जा रही थी कि सरकार आदिवासियों की इन मांगों पर विचार करेगी और मामला सुलझ जाएगा. लेकिन किसी भी क़ीमत पर एनएमडीसी को नगरनार में ज़मीन दिलवाने पर अड़ी हुई सरकार को आदिवासियों का यह विरोध नहीं जंचा. इस ग्रामसभा के अगले दिन से ही पुलिस ने विस्थापित होने वाले आदिवासियों को धमकाना शुरु कर दिया. विस्थापित आदिवासियों को मनमाने तरीके से तय किए गए मुआवजे के चेक जबरदस्ती लेने के लिए पुलिस ने सारे हथकंडे अपनाने शुरु कर दिए.

कस्तूरी, नगरनार या आमागुड़ा जैसे प्रभावित गांव के लोगों के जेहन में आज भी 10 मार्च की याद ताज़ा है. अपनी 5 एकड़ ज़मीन एनएमडीसी के हवाले करने वाले नगरनार गांव में हड्डियों के ढ़ांचे की तरह दिखने वाले रुपसाय हल्बी में बताते हैं- “पुलिस ने उस रात अपनी बर्बरता की सारी हदें लांघ दी थीं.”

गांव वालों के अनुसार एनएमडीसी के प्रस्तावित स्टील प्लांट वाले गांवों में पुलिस ने देर रात को धावा बोला और गांव में महिलाओं और बच्चों समेत जो भी नज़र आया, उन्हें बेतहाशा पीटना शुरु किया. घरों में सो रहे लोगों के दरवाज़े तोड़ डाले गए और लोगों को गांव की गलियों में घेर-घेर कर जानवरों की तरह मारा गया. महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया.

लेकिन इसके बाद कुछ भी नहीं हुआ.

यह “कुछ नहीं होना” नगरनार के लोगों के लिए एक ऐसा नासूर बन गया, जिसका जख्म लगातार रिसता रहता है.

जिस स्टील प्लांट के लिए एनएमडीसी और सरकार ने आदिवासियों पर इतने जुल्म ढ़ाए, उस प्रस्तावित इलाके में एनएमडीसी ने रातों-रात चाहरदिवारी बना दी और अपने बोर्ड टांग दिए. इस बात को लगभग 5 साल होने को आए, लेकिन चाहरदिवारी के अलावा स्टील प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ा.
जिन आदिवासियों की ज़मीन छीनी गई, उनके पास कोई साधन नहीं बचा. खेती वे कर नहीं सकते थे, क्योंकि ज़मीन एनएमडीसी के कब्जे में है और वायदे के मुताबिक उन्हें नौकरी तो मिली ही नहीं, क्योंकि स्टील प्लांट का काम ही शुरु नहीं हुआ. 303 विस्थापित परिवारों में से 43 परिवार तो ऐसे हैं, जिन्हें मुआवजे की राशी भी नहीं मिली.

नगरनार में एनएमडीसी की चाहरदिवारी में ही बने राज्य के पहले आईएसओ थाना के सहायक उपनिरीक्षक प्रमोद मिश्रा अपनी कुर्सी पर लगभग पसरते हुए कहते हैं- “अभी भी शायद आदिवासियों के ख़िलाफ़ कुछ मामले लंबित हैं.”

ज़ाहिर है, अपना सब कुछ गंवा देने के बाद अब आदिवासियों के हिस्से अदालतों के चक्कर हैं, भूख है, बदहाली है और वायदों के ढेर तो हैं ही, जिसके पूरे होने की उम्मीद अब सभी लोग छोड़ चुके हैं.

एनएमडीसी के टेक्नीकल डायरेक्टर पीएस उपाध्याय और नगरनार परियोजना के प्रबंधक आलोक मेहता बताते हैं कि अब नगरनार में स्टील प्लांट के बजाय एक लाख टन वार्षिक उत्पादन की क्षमता का स्पंज ऑयरन संयंत्र लगाया जाएगा. इसके अलावा 10 मेगावाट क्षमता वाले केप्टिव पावर प्लांट की भी स्थापना की जाएगी.

लेकिन बस्तर में अब इस बात पर भरोसा करने को कोई तैयार नहीं है. वैसे भी स्टील प्लांट की तुलना में स्पांज ऑयरन संयंत्र में लोगों को कितना रोजगार मिलेगा, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है.क्रमशः
(पैनोस साउथ एशिया अध्ययन का हिस्सा) तसवीर आलोक प्रकाश पुतुल की

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बस्तर : लोहा गरम है-2 ”

  2. By Sanjeet Tripathi on August 10, 2007 at 11:58 AM

    ह्म्म, शुक्रिया!!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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