हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

एक अंधेरे समय में प्रेमचंद की याद

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/01/2007 01:41:00 AM

ज जब देश नव उदारवादी परियोजना की राह पर अपने शासकवर्ग द्वारा ले जाया जा रहा है, उपभोक्ता माल की भरपूर आमद की हत्यारी ओट में विशालकाय बहुराष्ट्रीय मंसूबे पूरे किये जाने की कवायद हो रही है और यह सब देशी सरकारों द्वारा देश और राष्ट्र के गगनभेदी नारों के बीच किया जा रहा है, हमारे ज़ख्म और उनकी टीस और मुखर हो उठती है. जो लोग जानते हैं कि इस दुष्चक्र से निकलने का रास्ता क्या है... उन्हें बंदूकों के बल पर खत्म किया जा रहा है, अगर वे बिकने को तैयार नहीं हुए. यह पूरे देश की परिघटना है. आप इससे मेरे देश की पहचान कर सकते हैं. आप अहिंसा के दिव्य मंत्रोच्चार के बीच भयानक शासकीय रक्तपात, हिरासती मौतों, यातनाओं, फ़र्ज़ी मुठभेडों में हत्याओं, सेना द्वारा किये जाते बलात्कार और संघी गुंडावाहिनियों द्वारा लगातार खुली-छुपी हिंसा झेलते अल्पसंख्यकों की चीखें सुन सकते हैं.

...और ऐसे में हम प्रेमचंद को याद करते हैं. शक और संदेह के कुहासे में, यातना और हत्याओं के अंधेरे में और नंदीग्राम जैसी पीडा़जनक मगर गौरवशाली स्मृतियों में प्रेमचंद हमें याद आते हैं. उन्हें सलाम. एक महान देश की जनता के पहले लेखक को सलाम. उन्होंने शायद सबसे पहले हमें हमारे दुश्मनों के बारे में बताया... शायद भगत सिंह से भी पहले. समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन का आलेख.

हमारे समय के अंधेरे और प्रेमचंद की याद

सुधीर सुमन
प्रेमचंद की कृतियों में भारतीय समाज के विस्तृत चित्र मिलते हैं. उनका साहित्य ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है. शायद ही ऐसा कोई चरित्र या सामाजिक प्रश्न हो, जिसकी उपस्थिति उनके साहित्य में न हो. एक नये उभरते हुए मध्यवर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन पर उनकी गहरी आलोचनात्मक निगाह रही है.
इसके बावजूद अगर प्रेमचंद किसान जीवन के कथाकार माने जाते हैं, तो इसकी वजह यह है कि किसानों को वे नये भारत का निर्माण करनेवाली बुनियादी ताकत के बतौर देखते हैं. उनकी धारणा है कि किसानों की बदहाल जिंदगी में बदलाव से ही मुल्क की सूरत बदलेगी. उनका आकलन है कि अंगरेजी राज्य में गरीबों, मजदूरों और किसानों की दशा जितनी खराब है और होती जा रही है, उतना समाज के किसी अंग की नहीं. राष्ट्रीयता या स्वराज्य उनके लिए विशाल किसान जागरण का स्वप्न है, जिसके जरिये भेदभाव और शोषण से मुक्त समाज बनेगा. उन्हीं के शब्दों में- हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो वर्णों की गंध तक नहीं होगी. वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा.

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जमाना पत्रिका में 1919 में ही प्रेमचंद लिखते हैं-आनेवाला जमाना अब किसानों-मजदूरों का होगा. दुनिया की रफ्तार इसका साफ संकेत दे रही है...जल्द या देर से, शायद जल्द ही, हम जनता को मुखर ही नहीं अपने अधिकारों की मांग करनेवालों के रूप में देखेंगे और तब वह आपकी किस्मत की मालिक होगी. तब आपको अपनी बेइंसाफियां याद आयेंगी और आप हाथ मल कर रह जायेंगे. जनता की इस ठहरी हुई हालत से धोखे में न आइए. इनकलाब के पहले कौन जनता था कि रूस की पीड़ित जनता में इतनी ताकत छिपी हुई है?
इस उद्धरण पर गौर किया जाये तो कई संकेत मिलते हैं. एक तो यह कि प्रेमचंद के लिए जनता का मतलब आमतौर पर मजदूर-किसान हैं. दूसरा यह है कि उन्हें इस जनता की छिपी हुई क्रांतिकारी ताकत का अंदाजा है. और तीसरा यह कि उन्हें पूरा भरोसा नहीं कि किसान-मजदूरों का राज्य जल्दी आ जायेगा. इसलिए उन्होंने शायद शब्द का इस्तेमाल किया.
प्रेमचंद को आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले सामंती अभिजात्य लोगों और मध्यवर्गीय अवसरवादियों को लेकर गहरा संशय था. गबन उपन्यास के अविस्मरणीय चरित्र देवीदीन खटीक, जिसके दो बेटे स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए थे, को आनेवाले राज्य के बारे में तगड़ा संशय है- अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे. पहले अपना उद्धार कर लो, गरीबों को लूट कर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है... सच बताओ, तब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाठ बनाये घूमोगे. इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा... तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो और वह भी बढ़िया माल. गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता. उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो गरीबों को पीस कर पी जाओगे.
इस देश में पिछले 60 साल का राज यह बतलाता है कि प्रेमचंद की आशंकाएं सही थीं. आज का शासक वर्ग और उसके हाकिम-हुक्काम प्रेमचंद के जमाने से भी अधिक सुविधापरस्त, भ्रष्ट, अन्यायी, बेईमान और फरेबी हुए हैं. हाकिमों को आज भी बड़ी-बड़ी तलबें चाहिए, उन तलबों से भी उनके पेट नहीं भरता, तो वे विकास योजनाओं की राशि और गरीबों की राहत सामग्री तक डकार जाते हैं. राजनीति में आज भी बड़े भूस्वामियों, पूंजीपतियों और अवसरवादी मध्यवर्ग का वर्चस्व है. विलायत यानी साम्राज्यवादी शक्तियों का घर भरने का काम आज पूरी बेहयाई और बर्बरता के साथ जारी है. कानून और न्याय आज भी धनिकों के लिए हैं. जो वास्तविक उत्पादक शक्तियां हैं, वे आज भी जमीन से वंचित हैं या उन्हें जमीन से बेदखल किया जा रहा है. उत्पादन के साधनों पर उनका अधिकार नहीं है. पूरे देश में हक मांगते गरीबों और मजदूर-किसानों के ऊपर गोलियां चलायी जा रही हैं. गरीब-मेहनतकशों की हत्याएं इस मुल्क की आम परिघटना बनती जा रही हैं. विडंबना यह है कि अपने किसानों को भारी सब्सिडी देनेवाले अमेरिका के इशारे पर हमारे देश का शासक वर्ग किसानों को दी जानेवाली सारी सुविधाएं खत्म करता जा रहा है. कर्ज के जाल में फंसा कर उन्हें मार रहा है जॉन सेवकों की दलाल सरकारों ने किसानों और मजदूरों को आत्महत्या और भुखमरी के दुष्चक्र में डाल दिया है.
प्रेमचंद जहां अपने साहित्य में किसान-मजदूरों के शोषण, दमन और गरीबी का हृदयविदारक चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं उनकी शक्ति की पहचान भी कराते हैं. किसानों की बदहाली की वजहों को प्रेमचंद ने कई आयामों से देखा है. प्रेमाश्रम में किसान बेदखली और लगान के खिलाफ प्रतिरोध करते नजर आते हैं. कर्मभूमि में वे लगानबंदी का विरोध करते हैं और मध्यमवर्गीय नेतृत्व के अवसरवाद का आघात झेलते हैं. और गोदान में होरी के जरिये जमींदारों और महाजनों तथा वर्णव्यवस्था द्वारा मृत्यु के मुंह में धकेले जाते किसानों की त्रासद कथा कहते हैं. किसानों की आत्महत्या, किसान आंदोलनों की दशा-दिशा, ग्रामीण मेहनतकश स्त्री की दावेदारी, सांप्रदायिक ता, धार्मिक पाखंड और तथाकथित जनभागीदारीवाले हमारे लोकतंत्र के संदर्भ में ये तीनों महत्वपूर्ण उपन्यास हैं, जिन पर विस्तार से बातचीत हो सकती है, लेकिन फिलहाल रंगभूमि की चर्चा जरूरी है.
आलोचक वीर भारत तलवार ने एक जगह सही ही लिखा है कि प्रेमचंद साहित्य को पढ़ कर हिंदीभाषी गरीब किसान अपने वर्ग शत्रुओं को और भी अच्छी तरह पहचान सकेगा. आज सिंगूर, नंदीग्राम, दादरी, कलिंगनगर आदि जगहों में विकास के जिस तर्क और शासन तंत्र की जिस धौंस के जरिये किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने का जो हिसंक अभियान चलाया जा रहा है, वह बरबस प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि की याद दिलाता. सिगरेट का कारखाना खोलने के लिए जॉन सेवक अपने गुमाश्ते ताहिर से पूछता है कि वह सूरदास की जमीन कितने में दिला सकता है? ताहिर कहता है उसे शक है कि वह उसे नहीं बेचेगा. तब जॉन सेवक पूरे दंभ से बोलता है, अजी बेचेगा उसका बाप. उसकी क्या हस्ती है, रुपये के 17 आने दीजिए और आसमान के तारे मंगवा लीजिए. मगर सूरदास तैयार नहीं होता, तब ताहिर मोहल्लेवालों को धमकी भरे लहजे में समझाता है, जिस वक्त साहब जमीन लेने पर आ जायेंगे, ले ही लेंगे. तुम्हारे रुके न रुकेंगे. जानते हो शहर में हाकिमों से उनका रब्त-जब्त है? ... सीधे से, रजामंदी के साथ दोगे, तो अच्छे दाम पा जाओगे, शरारत करोगे, तो जमीन भी निकल जायेगी, कौड़ी भी हाथ न लगेगी. मुहल्लेवालों की एकजुटता को तोड़ने के लिए वह सबको तरह-तरह के प्रलोभन देता है, समृद्धि के सपने दिखाता है और जमीन छीन लेता है. फिर बाद में वह दूसरों से भी घर खाली कराने लगता हैं. उन्हें जो मुआवजा दिया जाता है, उससे वे कहीं छप्पर डाल कर भी नहीं कर सकते, पुलिस जॉन सेवक की मदद करती है. लोगों के घर में घुस कर सामान फेंकने लगती है. प्रेमचंद ने लिखा है- मानो दिन-दहाड़े डाका पड़ रहा हो. सूरदास अपनी झोंपड़ी छोड़ने को तैयार नहीं होता, जनता जुट जाती है. उसके बाद पुलिस गोलियां चलाती है.
इस प्रसंग में रामविलास शर्मा ने बड़ी मार्मिक टिप्पणी की है कि इस तरह अंगरेजी राज में किसानों की जमीन उन्हीं के खून से तर करके अपने वफादार दोस्त जॉन सेवक को भेंट करता है. क्या आज के बदले संदर्भों में आज के राज पर भी एक तीखा कमेंट नहीं है?
सूरदास मरते वक्त भी हार स्वीकार नहीं करता- हम हारे तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धांधली तो नहीं की. फिर खेलेंगे, जरा दम ले लेने दो, हार-हार कर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक-न-एक दिन हमारी जीत होगी, अवश्य होगी.
बेशक सूरदास के वंशजों ने अब भी हार नहीं मानी है. वह अपने संगी-साथियों से कहता है- हमारा दम उखड़ जाता है, हांफने लगते हैं, खिलाड़ियों को मिला कर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मारपीट करते हैं. कोई किसी को नहीं मानता. अगर अपने उजड़े हुए घर बसाने हैं, तो अपना एका मजबूत करो.
प्रेमचंद जहां अपने साहित्य में किसान-मजदूरों के शोषण, दमन और गरीबी का हृदयविदारक चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं उनकी शक्ति की पहचान भी कराते हैं. पूर्वजन्म के चमत्कार से भरे कायाकल्प में भी दलित बेगार करने से इनकार करते हैं. किसान अहिंसावादी नेता चक्रधर की धौंस बरदास्त नहीं करते. चक्रधर की ठोकरों से एक किसान की मृत्यु हो जाती है, तो दूसरा बूढ़ा किसान उसे माफी नहीं देता, उसका निर्णायक स्वर है- तुम बाबू जी को दयावान कहते हो, मैं उन्हें सौ हत्यारों का एक हत्यारा कहता हूं. राजा हैं, इससे बच जाते हैं, दूसरा होता तो फांसी पर लटकाया जाता. मैं तो बू़ढा हो गया हूं, लेकिन उन पर इतना क्रोध आ रहा है कि मिल जायें तो खून चूस लूं.
प्रेमचंद का साहित्य आज की परिस्थितियों में यह संदेश दे रहा है कि नव उपनिवेशवाद और उसके देशी आधारों के जनविरोधी शासन को मजदूरों और किसानों के आंतरिक गुणों का विकास करके ही ध्वस्त किया जा सकता है और नये समाज और राष्ट्र निर्माण के अधूरे सपने को साकार किया जा सकता है. प्रेमचंद जहां साहित्य में भारतीय किसान के नजरिये को ले आये, वहीं अपनी कृतियों के जरिये किसानों की चेतना को विकसित करने का भी काम किया. यह हमेशा याद रखना चाहिए कि साहित्य में विषय के तौर पर किसान-मजदूर प्रेमचंद के लिए सचेतन चुनाव थे. प्रेमचंद इनके प्रति कितने सचेत थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब बहुतों को चीन के हुनान किसान आंदोलन की रिपोर्ट का पता नहीं था, तब उन्होंने उस पर टिप्पणी लिखी थी- हमारे पड़ोस के मुल्क में वहां के नेताओं द्वारा किसानों की शक्ति की पहचान ली गयी है, लेकिन हमारे अपने देश में नेताओं ने किसान की शक्ति को नहीं पहचाना है. इसलिए उन्होंने यह भी कहा कि मैं उस आनेवाली पार्टी का मेंबर हूं, जो अवाम-अलनास (जनसाधरणत:) की सियासी तालीम को अपना दस्तूरुल-अमल (विधान) बनायेगी.
पेंटिंग : हेम ज्योतिका

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ एक अंधेरे समय में प्रेमचंद की याद ”

  2. By अजित वडनेरकर on August 1, 2007 at 2:00 AM

    अच्छा लगा। प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक हैं। भारतीय संदर्भों मे कालातीत है उनका लेखन। आपका ब्लाग भी अच्छा लगा।

  3. By notepad on August 1, 2007 at 11:14 AM

    बहुत अच्छा लगा पढकर ।प्रेमचन्द के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को किनारे कर दें तो उनके द्वारा उठाई गयी लगभग सभी समस्याएं और चिन्तन प्रासन्गिक है। ऐसी सामग्री प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद !!

  4. By चन्द्रिका on August 2, 2007 at 10:05 AM

    प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं इसलिये मैं शर्मिंदा हूँ,इससे पता चलता है समाज की जड़ता का,पता चलता है नकारे व अय्यास साहित्यकारों की बेदम लेखनीं का, आज होरी की मौत नहीं हो रही है बल्कि वह आत्महत्या कर रहा है,देश के मुसलमानों के साथ आज भी वही व्यवहार,जब तक ये स्थितियाँ नहीं बदलेंगी प्रेमचंद प्रासंगिक बने रहेंगे जरूरत है प्रेमचंद की प्रासंगिकता को खत्म करनें की|

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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