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बीच सफ़हे की लड़ाई

असीमा जी, सारा दोष आलोकधन्वा का ही था?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2007 11:29:00 PM

असीमा भट्ट के लिखे आत्मसंघर्ष पर जिन कुछ लोगों ने प्रतिप्रश्न किये हैं, उनमें से एक हैं जैगम इमाम. दीवानमेल पर असीमा भट्ट के आत्मसंघर्ष को पढ़ने के बाद उन्होंने मुझे उसी के ज़रिये यह सवाल भेजा. क्या आपको लगता है कि इसमें जवाब देने लायक कुछ है?

रियाज साहब


क्या इन बातों का जवाब मिल पाएगा.....

बडी सोची समझी स्क्रिप्ट है। लिखी गई मिटाई गई फिर लिखी गई। खैर, 45 साल के
पुरुष का एक भावुक निमंत्रण और 23 साल की लडकी कुर्बान हो गई। कमाल का प्रेम
है। अब नफरत के पात्र हुए आलोकधन्वा में उस वक्त क्या हीरे जडे़ थे? लेखिका
ने अपने प्रेम की उस अद्भुत अनुभूति को बिना बखाने छोड़ दिया। कवि कम उम्र की कमसिन
कन्या को भोगने को आतुर थे मगर कन्या को तो जैसे इस बात की उत्सुकता ही नहीं
थी कि आलोकधन्वा जैसे कवि की देह का स्पर्श कैसा होता होगा? कवि तो उसे अपनी
गोद में खिलाने के शादी कर रहा था?

आत्मकथा के जरिये आत्मप्रलाप करने में यही दिक्कतें हैं। सच्चाई को अपने
हिसाब से लिखा जाता है। दीवान पर इस कथा के दूसरे अंक के आने के बाद मैंने अपने
एक जाननेवाले, जो कि दीवान पर रजिस्टर हैं, को फोन किया। सवाल था कि ये
लेखिकाएं पति से अलग होने के बाद ही क्यों जहर उगलती हैं। साथ में रहते हुए
कुछ लिख दें...। उन्होंने कहा कि दीवान पर पूछो। सो पूछ रहा हूं। आप मुझे
कुछ भी कह सकते हैं। शायद मुझे ये हक भी नहीं है कि मैं इन सवालों को उठाऊं।
लेकिन अगर इसे पढने का हक दिया गया तो पूछूंगा जरुर। असीमा जी की आत्मकथा में
बार-बार एक बात उभर कर सामने आती है। वो कहीं भी कुछ गडबड नहीं करतीं। सबकुछ
आलोकधन्वा करते हैं। एक मां को अपने अजन्मे बच्चे पर तरस नहीं आता। ये जानते
हुए भी कि रक्त किसी का हो, कोख मां की तो बच्चा मां का है। वो ये कह कर
बच्चे को खत्म कर देती है कि उसका पिता उसे अपना नहीं मानता। हां इस बात की
टीस बार बार उसके जहन में रहती है कि उसका बच्चा चला गया। सच कहूं तो मुझे ये
आत्मसंघर्ष सफाई संघर्ष लगा। हर बात पर लेखिका अपने को बचा रही है। सामनेवाले
को जलील करना उसका मकसद है। और हां, ये भी बता दूं कि मुझे रंडी शब्द का
इंतजार था। जो आ भी गया, मेरी सारी शंकाएं दूर हो गयीं।
खैर लेखिका ने अपनी असफल जिंदगी के लिए पुरुष प्रधान समाज को भी जिम्मेदार ठहराया है। मर्द हर औरत को
भोगना चाहता है...मगर औरत कुछ नहीं चाहती है। उसकी कोई लिप्सा नहीं, उसकी कोई
लालसा नहीं। हर मर्द के लिए मां और बहन, बेटी को छोड़ कर सारी औरतें रंडी
हैं...लेकिन औरतों के लिए बाप, भाई, बेटे को छोड कर दूसरे पुरुष भी पिता और भाई,
बेटे के समान हैं...।
एक बुड्ढे लेखक की आबरु उतारने के लिए इतना करने की क्या जरुरत थी? किसी कवि सम्मेलन के मंच पर चढकर मुंह काला कर देतीं...आपकी
हिम्मत भी दिख जाती और कवि कहीं मुंह दिखाने के काबिल न बचता। चलते-चलते एक
बात और एक सज्जन ने कहा-लेखिका हिम्मती है। हिंदी में इतनी साफगोई से बातें
नहीं होतीं. मैंने कहा बिल्कुल सही...ये एक नयी परंपरा हो सकती है। लेकिन हम उस
देश से आते हैं जहां कई बार पूर्व पति या पत्नियां अपने पति या पत्नियों की
हत्या तक करा देती हैं। फिर ऐसे में आत्मकथा के हथियार से अपने पति उर्फ एक
लेखक को मारना क्या बडी बात है?

शुक्रिया
जैगम

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ असीमा जी, सारा दोष आलोकधन्वा का ही था? ”

  2. By बोधिसत्व on July 30, 2007 at 2:05 PM

    आप ही नहीं असीमा जी और नीलिमा नोटपैड मसिजीवी सबको उत्तर देना चाहिए। असीमा जी के सवाल और आरोप तो पहले दिन से ही एक तरफा आक्रमण की तरह दिख रहे थे।

  3. By Sanjeet Tripathi on July 30, 2007 at 5:58 PM

    सही!!

  4. By चन्द्रिका on July 31, 2007 at 1:05 PM

    आलोक के बडे़ खाश मित्र दिखते है आप,इस पुरूष समाज की व्यवस्था ही यैसी है कि एक प्रगतिशील स्त्री भी अपनी एक सीमा मे मानसिक रूप से बधी ही रहती है |सायद आप उस बात को नही समझ सकते क्योंकि आप अशीमा थोड़ी है? अशीमा ने एसा क्यों नहीं किया, वैसा क्यों नहीं किया| कहना सरल है जब किसी परिवार का एक स्टर् क्चर होता है,ापके ही परिवार को लें, तो क्या कुछ भी घटित होते ही आप उसे बजार में उतार देते है| जरा सोच के बताइये तो साब.......चन्द्रिका

  5. By बात बोलेगी on August 13, 2007 at 9:24 PM

    बोधिसत्वजी से जानना चाहूगा कि क्यों उन्हें असीमा के सवाल एकतरफा आक्रमण की तरह दिखता है ? यदि इनमें से थोड़ी बातें भी सही हैं तो आलोक धन्वा की जो छवि बनती है, वो कहीं भी उस क्रांतिकारी कवि से मेल नहीं खाती। मैं ये नहीं मान सकता कि क्रांति की बात करने वाला आदमी अपने निजी जीवन में अपनी पत्नी पर हाथ उठा सकता है या किसी दूसरी महिला से संबंध रख सकता है।

    क्यों ऐसा होता है कि हमारे समाज में ये खास दिखने वाले ऐसे व्यक्तित्व अक्सर कुछ ऐसा खास कर जाते हैं, जो आम आदमी की भाषा में खुद के मुंह पर कालिख पोतना होता है ...?

    उत्तर खुद भी तलाश रहा हूं

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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