हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2007 10:04:00 PM

विकास का सुनामी


-प्रभात कुमार शांडिल्‍य




हमारे घर का आंगन
सामने का बाग-बागान
खेल का मैदान
खेत-खलिहान
जानवरों का बथान
देवी-देवताओं का स्थान
कब्रिस्तान, मशान
सीमा समाप्ति का निशान
गांव का सीवान
सब नहीं हैं अब
खत्म हो गये ये सब
गांव मेरा हो गया आपका
अब इतिहास के पन्नों की धरोहर हो चुका
फिल्मों या टीवी सीरियलों में जब कभी
दिख जाता है
नाटक-नौटंकी या राजपथ पर निकाली गयी
झांकियों में

अब तो जमाना है
अपार्टमेंट, बेसमेंट, फ्लावर पॉट,
स्टेडियम, वेलोड्रोम, स्वीमिंग पुल,
डिपार्टमेंटल स्टोर्स, मल्टीप्लैक्स
फ्लाइओवर, स्लाटर हाउस,
राम मंदिर, महावीर स्थान, जामा मस्जिद,
दरगाह, चर्च, डेयरी, नर्सिंग होम,
ओल्ड एज होम, विद्युत शवदाह गृह
और कब्रिस्तान को घेरे सरकारी दीवार का

गांव नहीं बचा
क्या जरूरत उसकी सीमा रेखा की
पीने के लिए है बिसलेरी की बोतलें
व्हिस्की, रम और तरह-तरह के ब्रांड हैं
देशी, विदेशी, मसालेदार
जहां बोतलें नहीं वहां है चापाकल, बोरिंग
हैं सिंचाई के लिए पंपिंग सेट
बिजली-डीजल-केरोसिन चालित
फिर है टेलीविजन, सीडी प्लेयर, डीवीडी,
मोबाइल फोन और कंप्यूटर
नाभिकीय बम
सब काम तमाम कर देंगे
पल भर में

पीनके के पानी का कुंआ
ठाकुर का कुआं
मर गये मुंशी प्रेमचंद उर्फ धनपत राय
मगर गया कुआं
खेतों के पटवन के स्रोत
आहर-पोखर-तालाब-चौर-पाईन
और औजार
लाठा, कुंडी, रहट, करींग, चांड, सैंन
गांव की नदहीं, आसपास की पहाड़ियों
से अविरल बहते-गिरते झरने
सबको देश की आजादी
देखते-देखते लील गयी
लोकतंत्र टुकुर-टुकुर ताकता रह गया

आधुनिकीकरण, पिख्यमीकरण औद्योगिकीरण
शहरीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण
यह करण-वह करण
की ऐसी आंधी चली
सभ्यता का ऐसा तूफान आया कि धराशायी हो गया
हमारी संस्कृति का विशाल बरगद

फिर बवंडर आये कई
टेका-पट्टा, घूस, बेईमानी, चोरी
कमीशनखोरी, गोली, बंदूक, बक के
और आखिर में आया सुनामी
प्रगति और विकास जैसा सुनाम धन का
ाहर बसते रहे बेतरतीब गांव उजाड़े जाते रहे
नदियां बेच, नहरें सुखा दी गयी
खेत बन गये रेगिस्तान
और अंतत: सब गांव हो गये वीरान
सावन, आश्विन, अगहन, फागुन सब गुजर गये
आसमान ताकता रह गय किसान
मजदूर मजबूर हो
कर गये पलायन
अब तो एक ही काम बचा है
वह है बनाना जल्दी-से-जल्दी
हिन्दुस्तान को सूडान
फिर
भारत सचमुच हो जायेगा महान

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ कविता ”

  2. By Divine India on July 21, 2007 at 11:06 PM

    एकदम सत्य पर आधारित कविता की प्रस्तुति पसंद आई…
    अरे आप तो मेरे बगल के हैं और लिखते भी बहुत अच्छा हैं…।धन्यवाद!!

  3. By परमजीत बाली on July 22, 2007 at 3:39 AM

    बहुत बढिया रचना है।बहुत बढिया लिखा है-

    मजदूर मजबूर हो
    कर गये पलायन
    अब तो एक ही काम बचा है
    वह है बनाना जल्दी-से-जल्दी
    हिन्दुस्तान को सूडान
    फिर
    भारत सचमुच हो जायेगा महान

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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