हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अपने समय की एक औरत का दर्द और कुछ सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/17/2007 01:32:00 AM

साल के शुरू में एक कविता आयी थी यवन की परी. स्त्री की यातना, पीडा़, दर्द और आंसुओं में लिपटी उस कहानी को कहानी भर माना जा सकता था. माना भी गया. मगर यहां जो कुछ हम पढ रहे हैं-वह अपने आसपास की पीडा़ है, वेदना है, यातना है और कुछ सवाल हैं-जिनके जवाब बाकी हैं. हो सकता है कि कुछ प्रतिप्रश्न भी हों, जिन्हें और जिनके जवाब हम समय के साथ तलाशेंगे (कोशिश करेंगे) मगर अभी वे सवाल पूरे के पूरे और दर्द का वह आवेग-पूरा का पूरा. क्या हुआ जो यह सब उस कवि के बारे में है जिसे अपने समय में हम सबसे अधिक प्यार करते हैं, चाहते हैं.
असीमा भट्ट
का यह आत्मसंघर्ष कथादेश के जुलाई अंक में छपा है. यह बहुत लंबा है इसलिए यहां उसे क्रमवार रूप से
(साभार) दिया जा रहा है. आज पहली किस्त.

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना

असीमा भट्ट
कितनी अजीब बात है जब मैं पत्रकारिता करती थी, लोगों से साक्षात्कार लेती थी और उनके बारे में लिखती थी और जब कुछ खास नहीं होता था तो खीझ कर कहती थी-कहानी में कोई डेप्थ नहीं है संघर्ष नहीं है ! मजा नहीं आ रहा, क्या लिखूं? आज जब अपने बारे में लिखने बैठी हूं तो बड़े पसोपेश में हूं, अपने बारे में लिखना हमेशा कठिन होता है. कहां से शुरू करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह जीवनी नहीं है. हां मेरे जीवन की कड़वी हकीकत जरूर है. कुछ कतरनें हैं, जिन्हें लिखने बैठी हूं. बहुत दिनों से कई मित्र कह रहे थे-अपने बारे में लिखो. पर हमेशा लगता था, अपना दर्द अपने तक ही रहे तो अच्छा. उसे सरेआम करने से क्या फायदा?
लेकिन सुधादी के स्नेह भरे आग्रह ने कलम उठाने पर मजबूर कर दिया क्योंकि यह सच है कि जिसे मैं अपनी निजी तकलीफ मानती हूं, सिर्फ अपना दर्द, वह किसी और का भी तो दर्द हो सकता है. लोहा-लोहे को काटता है इसलिए यह सब लिखना जरूरी है ताकि एक दर्द दूसरे के दर्द पर मरहम रख सके. हो सकता है, जिस कठिन यातना के दौर से मैं गुजरी हूं, कई और मेरी जैसी बहनें गुजरी हों, और शायद वे भी चुप रह कर अपने दर्द और अपमान को छुपाना चाहती हों. या अब तक इसलिए चुप रही हों कि अपने गहरे जख्मों को खुला करके क्या हासिल? खास करके जब जख्म आपके अपने ने दिये हों. वही जो आपका रखवाला था. जिसे अपना सब कुछ मान कर जिसके हाथों में आपने न केवल अपनी जिंदगी की बागडोर सौंप दी बल्कि अपने सपने भी न्योछावर कर दिये.
बिहार के एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरे दादा जी अपने इलाके के जाने-माने डाक्टर थे और उनका सिनेमा हॉल और ईंट के भट्ठे का कारोबार था. समाज में हमारे परिवार का बहुत नाम और इज्जत था. मेरे नाना जी स्वयं जमींदार थे. उनकी काफी खेती-बाड़ी और काफी तादाद में पशु (गाय-बैल और भैंस) थे. पिता जी कम्युनिस्ट थे. बनारस विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. छात्र जीवन से ही वे क्रांतिकारी हो गये. उन्होंने सरकारी तंत्र का कड़ा विरोध किया, जिसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. लंबे समय तक उन्हें जेलों के यातनाघर (सेल) में रखा गया. बाद में उनके साथियों ने उनके लिए केस लड़ा और पिता जी जेल से बाहर आये बाद में जेपी आंदोलन में भी वे काफी सक्रिय रहे. मैं अपने माता-पिता की शादी के 14 साल बाद पैदा हुई थी. मेरे जन्म के बाद मेरे चाचा जी ने कहा था, इतने दिनों बाद हुई भी तो बेटी. इस पर मेरे पिता जी हमेशा कहते हैं-क्रांति मेरी ताकत है. मेरा विश्वास है. उन्हें मुझ पर बहुत गर्व था. वे कहते थे एक दिन आयेगा जब लोग कहेंगे देखो वह क्रांति का पिता जा रहा है.

दुनिया में कोई भी शादी इसलिए नहीं होती कि उसका अंजाम तलाक हो. शादी किसी भी लड़की की जिंदगी की नयी शुरुआत होती है. नये सपने, नयी उम्मीदें, नयी उमंगें, बचपन में हर लड़की अपनी दादी-नानी से परियों की कहानी सुनती है. एक परी होती है और एक दिन सफेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और परी को ले जाता है. दुनिया की शायद ही कोई लड़की हो, जिसने ये सपने न देखे हों-सिंड्रेला की तरह.
मेरी शादी पांच जुलाई, 1993 को पटना में हुई. मेरे पति आलोकधन्वा एक प्रतिष्ठित-सम्मानित कवि हैं. खास तौर से संवेदना और प्रेम के कवि. हमारी शादी कई मायनों में भिन्न थी. जाति-बिरादरी के अलावा हमारी उम्र में लंबा अंतराल था. लगभग 20-22 साल का. शादी के वक्त मेरी उम्र 23वर्ष थी और उनकी 45 वर्ष. बड़ी उम्र होने की वजह से हमेशा उनमें एक कुंठा रहती थी. लेकिन शादी के बाद मैंने उम्र को कभी तूल नहीं दिया. प्यार किया तो पूरी तरह से डूब कर प्यार किया. पूरी शिद्दत, पूरी ईमानदारी से. मैं काफ़ी बागी किस्म की लड़की थी. बगैर उनके उम्र और दुनिया की परवाह किये मैं सरेआम, खुली सड़क पर उन्हें गले लगा कर चूम लेती थी और वे झेंपते हुए कहते-तुम प्रेमिकाओं की प्रेमिका हो.
हमारा प्रेम कुछ इस तरह परवान चढ़ा. छोटे शहरों में आज भी रंगमंच के क्षेत्र में कम ही लड़कियां आगे आती हैं. पटना में भी इस क्षेत्र में इनी-गिनी लड़कियां ही थीं. मैं भी उनमें से एक थी. उन दिनों उनकी बेहद मशहूर कविता भागी हुई लड़कियां का मंचन होना था. इसका मंचन संभवतः मई 1993 में हुआ था. उसी दौरान हमारी मुलाकात हुई. मैंने उनकी कविता में भूमिका भी की. शुरू-शुरू में हमारी उस कविता को लेकर बहुत बहस होती थी. अकसर मैं कविता को बारीकी से समझने के लिए पूछती, आखिर आपने यह पंक्ति क्यों लिखी? और वे हंसते हुए जवाब देते-मैंने तुम जैसी लड़कियों के लिए ही लिखा है.
धीरे-धीरे जान-पहचान दोस्ती में बदल गयी. कभी-कभी मैं उनके घर भी जाने लगी. उनकी उम्र को देख कर मुझे हमेशा लगता कि वे शादीशुदा हैं और शायद पत्नी कहीं बाहर रहती हैं या फिर अलग. एक दिन मैंने पूछ ही लिया. आपकी पत्नी कहां रहती हैं. कभी उन्हें देखा नहीं. वे जोर से हंसे और कहा-अरे पगली मैंने शादी नहीं की.
-क्यों?
-इसलिए कि अब तक कोई तुम जैसी पगली मेरी जिंदगी में नहीं आयी.
-आप मजाक कर रहे हैं.
-नहीं! मैं सच कह रहा हूं. तुमने तो जैसी मेरी कविता को सजीव बना दिया. जैसे यह कविता मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए ही लिखी थी.
-आप जैसे कवि को कोई अब तक कोई मिली क्यों नहीं आखिर?
-शायद तुम मेरी तकदीर में थीं. वे अकसर ऐसी बातें करते और मैं उन्हें बस यों ही लिया करती थी. हां! एक बात जरूर थी कि उनका बात करने का खास अंदाज मुझे बहुत भाता.
मुझे याद है, एक दिन शरतचंद्र के श्रीकांत की अभया और टाल्सटाय की अन्ना कारेनीना पर बातें हो रही थीं. उन दोनों को देखने की उनकी दृष्टि मुझसे भिन्न थी और मैंने सहमत न होते हुए तपाक से कहा, आपको नहीं लगता, आखिर उन दोनों स्त्रियों (अभया और अन्ना कारेनीना) की तलाश एक ही थी और वह थी प्रेम की तलाश. वे अचानक बोले-तुम्हें पता है जब मर्लिन मुनरो, अन्ना कारेनीना और इजाडोरा डंकन को एक बोतल में मिला कर हिलाया जायेगा तो उससे जो एक व्यक्तित्व तैयार होगा वह हो तुम. तुम्हारे अंदर की आग ही मुझे तुम्हारे प्रति खींचती है. आज तक मुझे तुम जैसी बातें करनेवाली लड़की नहीं मिली. मुझसे शादी करोगी?
अप्रत्याशित सवाल से मैं चौक गयी-सर मैं आपकी कविताएं पसंद करती हूं. आपकी इज्जत करती हूं, लेकिन शादी के बारे में सोच भी कैसे सकती हूं, आप उम्र में मुझसे कितने बड़े हैं.
-तो क्या हुआ? ब्रेख्त की पत्नी हेलेना भी उनसे लगभग 20 वर्ष छोटी थीं. दिलीप साहब और सायरा जी की उम्र तो बाप-बेटी के बराबर है. दिलीप कुमार तो सायरा बानों की मां नसीम बानो के साथ अभिनय कर चुके थे. तुमने बंदिनी देखी है?उसमें अशोक कुमार और नूतन का प्रेम देखा है?
-फिर भी मैं ऐसा नहीं कर सकती. मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी हूं. मेरी मां इसके लिए कभी राजी नहीं होगी.
-उन्हें बताने की क्या जरूरत है. आखिर तुम अपनी जिदंगी अपनी मां और भाई-बहन के लिए नहीं जी रही हो. तुम्हारी जैसी खुद्दार लड़की को अपने फैसले खुद लेने चाहिए. तुम्हें अपनी शर्तों पर जीना चाहिए.

-नहीं मैं आपसे शादी नहीं कर सकती-कहती हुई मैं वापस आ गयी.

उन दिनों मैं एक वर्किंग वीमेंस हॉस्टल में रहती थी और पटना से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक आज में काम करती थी. तीन दिन बाद एक बुजुर्ग महिला (मेरे पति की मित्र) मुझसे मिलने मेरे दफ्तर आयीं और बताया कि तुम्हारे आने के बाद से वह गंभीर रूप से बीमार हैं. तुम्हारे ऑफिस में फोन किया लेकिन तुमने नहीं उठाया. तुम्हारे हॉस्टल भी मिलने गया लेकिन तुमने मिलने से मना कर दिया. वह हताश हो गया है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक बार चल कर देख लो. उसे मुझे उनसे शादी नहीं करनी थी इसलिए उनसे मिलने या बात करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं उनके साथ ही उन्हें देखने उनके घर आ गयी.
वाकई वे बहुत बीमार और कमजोर लग रहे थे. उस वक्त वहां उनके कुछ मित्र भी थे जो मेरे जाते ही बाहर चले गये. और मेरे कवि पति मेरे पैरों पर गिर कर रोने लगे-मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम नहीं जानतीं तुम मेरे लिए कितनी अहमियत रखती हो. तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी को एक नया अर्थ मिला है. मैं तुम्हें हमेशा, हर तरह से खुश रखूंगा.
इतना बड़ा कवि मेरे सामने फूट-फूट कर रो रहा था. मैं स्तब्ध थी और अचानक मेरे मुंह से निकला ठीक है, आपको शादी करनी है तो जल्दी कर लीजिए वरना मेरे घरवालों का दबाव पड़ेगा तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी. कहने की देर थी और हफ्ते भर में मेरी शादी हो गयी. शादीवाले दिन मेरा मन बहुत उदास था. आखिर मेरी उम्र की लड़कियों की जैसी शादी होती है, वैसा कुछ भी नहीं था. दिल के भीतर से कहीं आवाज उठ रही थी-जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है मैं कहीं भाग जाना चाहती थी, ऐसा जी होता था कि किसी सिनेमा हॉल में जा कर बैठ जाऊं ताकि लोग मुझे ढूंढ न पायें. पर मुझे घर से बाहर जाने का मौका नहीं मिला क्योंकि शादी के कुछ दिन पहले से ही मेरे पति मुझे अपने घर ले आये थे, जहां उनकी बहनें लगातार मेरे साथ रहती थीं.
लगातार रोने और मन बेचैन होने से मेरे सर में दर्द था. हमारी शादी एक साहित्य भवन में हुई थी. वहां से घर आ कर मैं जल्दी सोने चली गयी. देर रात तक मेरे पति और उनकी महिला मित्र की आवाजें मेरे कानों में पड़ती रहीं. सुबह जब मैं जागी तो मेरे पति ने मुझसे कहा जाओ-जा कर उनका पैर छुओ.
-किनका? मैं चौंकी.
मैंने देखा, घर में कोई और नहीं था. उन्होंने रात ही अपनी मां-बहन को अपने घर भेज दिया था. थोड़ी देर बाद उनकी बड़ी बहन का फोन आया. उन्होंने पहला सवाल किया, वो मास्टरनिया (वो महिला एक स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए उन्हें सब मास्टरनिया बुलाते थे) रात में कहां थी?
-यहीं हमारे घर पर ही थीं.
-देखो, अब वह घर भी तुम्हारा है और पति भी. अब पति और घर तुम्हें ही संभालना है.
मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि सबने जान-बूझ कर मुझे धोखा दिया. मेरी सास-ननद को सब पता था और सबने मुझे इस आग में झोंक दिया. ऐसी थी मेरी सुहागरात! मैं शादी के पहले दिन ही बुरी तरह से बिखर गयी. मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैं आज तक नहीं समझ पायी आखिर क्यों किया इन्होंने ऐसा?
बाद में मैंने इस पर बड़े धैर्य और प्यार से बात की-सर मैं आपको सर कहती हूं. आपकी बेटी की उम्र की हूं फिर भी आपसे शादी की. लेकिन जब आप किसी और से प्रेम करते थे तो आपने मुझसे शादी क्यों की? आप जैसे इनसान को तो उन्हीं से शादी करनी चाहिए थी, जिससे प्रेम हो.
-मैं उनसे शादी नहीं कर सकता था.
-क्यों?
-क्योंकि वह पहले से शादीशुदा हैं. उनके बच्चे हैं, वे उम्र में मुझसे 12 साल बड़ी हैं.
मैं जैसे आसमान से नीचे गिरी. मेरे मुंह से यकायक निकला- यह कहां की हिप्पोक्रेसी है सर? आप 22 साल छोटी लड़की से शादी कर सकते हैं और 12 साल बड़ी स्त्री से नहीं तो फिर आपको उनसे प्रेम संबंध भी नहीं बनाना चाहिए. पत्नियां जब ऐसे सवाल करती हैं तो उनका क्या हश्र होता है, शायद यह किसी से छिपा नहीं. सबसे घिनौनी बात यह थी कि मेरे पति अपनी महिला मित्र को सार्वजनिक जगहों पर घोषित रूप से दीदी बुलाते थे. सुना है, पुष्पाजी भी भारती जी को राखी बांधा करती थीं, यह इलाहाबाद में सभी जानते थे. भाई-बहन के रिश्ते का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है?
बाद में एक दिन उन दीदी का 60वां जन्मदिन भी हमारे ही घर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया. एक दिन मैंने उनसे कहा, अगर आप में साहस है तो खुल कर इस रिश्ते को स्वीकारें. मुझे खुशी होगी कि मेरे पति में इतनी हिम्मत है. यह कायरोंवाली हरकत देश के इतने बड़े कवि को शोभा नहीं देती. मैं आपका साथ दूंगी. आप उन्हें सार्वजनिक तौर पर स्वीकारें. लेकिन इसके लिए तैयार होने के बजाय उन्होंने मुझे बाकायदा धमकी दी कि मैं यह बात किसी से न कहूं, खास कर उनके भैया-भाभी और बच्चों से. वह दिन मुझे आज भी याद है, जब पहली बार उन्होंने मुझ पर हाथ उठाया. जो इनसान पहले मुझसे कहा करता था कि तुम्हारे अंदर आग है. तुम्हारे सवाल बहुत आंदोलित करते हैं, आज वही मेरे पत्नी होने के मूल अधिकार के सवाल पर मुझे प्रताड़ित कर रहा था. ऐसे में हर लड़की का आसरा मायका होता है पर मैं तो वह दरवाजा पहले ही बंद कर आयी थी. मैं बड़ी मन्नतों-मनौतियों के बाद पैदा हुई थी. इसलिए मुझे दादी और नानी के घर सभी जगह बहुत लाड़-प्यार मिला. सबके लिए मैं भगवान का भेजा हुआ प्रसाद थी. सबकी चहेती, सबकी लाडली, अपनी मरज़ी से शादी करके मैंने सबका दिल तोड़ था. चूंकि मैं कहीं जा नहीं सकती थी इसलिए छह महीने अंदर-ही-अंदर घुटती रही और सब सहती रही. एक दिन तंग आकर मां के पास चली गयी. हालांकि मुझमें मां को सब सच बताने की हिम्मत नहीं थी कि मेरे साथ क्या-क्या हो रहा है लेकिन वह मां थी. वह अपने आप समझ गयी थी कि मैं इस शादी को तोड़ने का फैसला करके आयी हूं. उन्होंने जो कहा उसने मुझे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. मां ने कहा, हम औरत जात को दो-दो खानदानों की इज्जत निभानी पड़ती है. एक अपने मां-बाप की और दूसरा अपने ससुराल की. अब तुमने जो किया सो किया. अब शादी तो निभानी ही पड़ेगी. वरना लोग क्या कहेंगे? शादी-ब्याह कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल तो है नहीं.
मैं वापस वहीं लौट आयी जहां मेरे लिए एक पल भी जीना मुश्किल था, फिर भी मैंने एक अच्छी पत्नी बन कर घर बसाने की पूरी कोशिश की लेकिन मैं सफल न हो सकी. शायद मैं बंजर धरती पर फूल खिलाने की कोशिश कर रही थी. आज दुख इस बात का है कि जो रिश्ता बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था उसे मैं सड़ी लाश की तरह घसीटती रही. लहरों के राजहंस में सुंदरी अपने विरेचक (बिंदी) को लगातार इस उम्मीद में गीला रखती है कि उसका पति नंद वापस आ कर उसका श्रृंगार प्रसाधन पूरा करेगा. आखिर सुंदरी हार कर कहती है, मुझे खेद है तो यही कि जितना समय इसे गीला रखना चाहिए था, उससे कहीं अधिक समय मैंने इसे गीला रखा.
मेरा मन कचोटता है-क्यों हर मां सिर्फ अपनी बेटी को ही घर बसाने और बचाने की नसीहत देती है? क्यों घर बचाना सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है? क्यों जब किसी औरत का घर टूटता है तो सारी दुनिया उसे ही कटघरे में खड़ा करती है? क्यों कोई मां अपने बेटे से नहीं कहती कि बेटा, शादी और गृहस्थी की गाड़ी तुम्हें भी चलानी है, कि समाज और खानदान की इज्जत तुम्हारे हाथ में भी है? घर को बचाने की जवाबदेही जितनी पत्नी की है, उतनी पति की क्यों नहीं है? मेरे कई सवालों के उत्तर मुझे आज तक नहीं मिले. क्रमशः

तसवीर : असीमा भट्ट अपने नाटक एक गुमनाम औरत का खत में
और नीचे, आलोकधन्वा

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  1. 22 टिप्पणियां: Responses to “ अपने समय की एक औरत का दर्द और कुछ सवाल ”

  2. By अनूप शुक्ला on July 17, 2007 at 7:09 AM

    एक जाने-माने कवि का दूसरा चेहरा देख रहा हूं।

  3. By Jeet jayenge hum tu agar sang hai on July 17, 2007 at 9:39 AM

    accha likhti hain ap...pata hai jab hum koi baat batatehain tho is tarah se batate hain ki humari galti na nazar aaye...jab ap mei wo baat thi ya hai tho sabko naraz karke us kavi se shadi na karna chahiye tha....kahin na kahin tha apke mann mei,pyar...tabhi ap maane shadi ke liye...aur pyar mei koi shart nahi...ap ko apna shrestha dena tha...ya phir ap aazadi se apni alag duniya bana sakti thin...jahan apko wo sab milega jo ek kamyaab shaqsiyat ko milta hai...apke sawaal ke jawaab yahan koi nahi dega...sab kavi hee hai yahan...sirf itna kahunga khud par bharosa rakhiyeye aur khud ke liye jeena shuru kijiye...apko padhna accha lagta hai mujhe,ap yuon hee likhte rahein...pranaam

  4. By Sanjeet Tripathi on July 17, 2007 at 10:52 AM

    नि:शब्द!!!

    हाशिया का आभार!!

  5. By चन्द्रिका on July 17, 2007 at 4:27 PM

    चंद लोगों ने चुन ली मौत

    बीच चौराहे पर फांसी लगाकर

    गया था कल शाम को जिन्हें

    मैं अपनी कविताएँ सुनाकर

    आलोकधन्वा जिनकी कविता गोली दागो पोस्टर,जनता का आदमी जैसी कवितायें लिखि है ऐसा सुनकर बड़ा कष्ट होता है फिर लगता है कि ये किसको सिखाने ,बताने उत्तेजित करने के लिये कवितायें लिखते है किस दुनियां को बदलनें की बात करते है और किससे वाक ई कविता का ये अंश मुझे सिहरन सा देता है-

    आधी रात को एक बिना सिर वाला आदमी सफेद चोगे में
    आता है कमरे के भीतर
    बोलता है सफेद आवाज़ में, 'तुम अभी भी ख़ूबसूरत हो'
    मेरे इनकार करने पर कहता है, 'मैं तुम्‍हारा पति हूं'

    वह झूठ बोल रहा है, मैं जानती हूं
    लेकिन वह मेरे पति जैसा लगता ज़रूर है
    वह शुरू होता है बिना चुंबन के बिल्‍कुल मेरे पति जैसा ही
    उसे मालूम नहीं है प्‍यार और यौन संबंध में

    शॉक थेरोपी इससे बेहतर है

    सुबह वह फिर आता है ख़ूबसूरत जवान नर्स के साथ
    'हमारे बच्‍चे कैसे हैं' मैं पूछती हूं
    वह अपने बालों वाले हाथ हिला हिला कर हंसता है, हंसते हुए कहता है
    'मुझे नहीं मालूम, मैं तुम्‍हारा पति नहीं हूं'
    फिर पूछता है, 'आज कैसा लग रहा है, कल रात कोई बुरा सपना तो नहीं देखा?

  6. By Mornig on July 22, 2007 at 12:11 AM

    Bahut achchha hai ki maine alok dhanwa ki kavitayen nahi padhin.aaj is waqt se pahle mai ye baat kahte hichakti thi ki log kya kahenge ki khud ko kavi kahti hain aur sahitya ke itane shirshasth kavi ki koi rachna nahi padhi! per aaj mai garv se kah sakti huin ki maine alok dhanwa ki koi kavita nahi padhi.
    Waise ye koi nayi baat nahi hai. Her unchi meenar ke neeche neenv ki inton ka khoon hota hai. yahan ganimat ye hai ki aseema ko ye ehsaas tha aur unhone sangharsh kiya......aur shayad himmat bhi. per kshama kijiyega wo koi bahut qabile tareef nahi hain....20th centuri ki ladaki hoker jisko vivah ki pahli hi raat apane pati ki sachchai pata lag jati hai usne yatana ka kram itana lamba kaise hone diya? Maaf kijiyega agar wo ye kahti hain ki wo aaj bhi us purush se prem karti hain to mai kahungi ki wo sach nahi kah rahi hain. aaj bhi unke bheeter ya to wahi ladaki baithi hai jo samaj se darti hai ya wo apane ko mahaan siddh karna chahati hain.
    Mera Irada unke zakhmon per namak chhidakne ka nahi hai.......lekin ye zaroor kahoongi ki unka shaadi ka faisla ek atmnirbher ladaki ki bhawnatmak moorkhta se adhik kuch bhi nahi. Lekin iske liye bahut had tak wo doshi nahi hain.wo umra hi kuch aisi hoti hai shayad.aur kaviyon ka abhamandal bhi kuch aisa hota hai ki wo aam admi se kavi ki insani kamzoriyan aur dosh chhupa leta hai.
    Per iske baad bhi agar agar unhone koi kada kadam nahi uthaya ya nahi uthana chahti hain to ye doosari galati hogi.Ye seedha sa cheat and fraud ka case hai. domestic voilence against women ke act ke antergat unko turant is per action lena chahiye.agar nahi leti....ya agar unke bheeter aisa karne ki ichchha nahi jaagi hai ab tak to unko khud ke bheeter phir se dekhna chahiye ki kahin wo hindi ke is mahantam kavi aur nihayat hi gire hue nimnkoti ke insaan ke abhamandal se akrant to nahin hain?
    Aur agar hain to unko ab apane chhute hue saahas ke saare sire samet lene chahiye.Draupadi ko veshya kah dene bher se mahabharat ho gaya tha aur is ghanghor apman aur dhokhe ka pratishodh kewal ek maun mukti! kadapi nahi! Kranti ki jin baatoin ki aag se prabhavit hoker aalok ne unse prem ka natak ker prem aur sambandh dono ko badnaam kiya usi aag mein jala ker alok ko basm ker dena chahiye aur agar kranti aisa nahi karti hain to unki kranti aur unki aag kori laffazi ho sakti hai jeene, joojhne aur mukti ka sangharsh nahi.Istri ki mukti ke yagya mein wo ek shaheed nahi mani jayengi....samanya sainik bhi nahi mani jayengi.wo mahaz ek aam midle class ladaki ki tarah dekhi jayengi jiska pahle upyog abhvyakti ki swatantrata ki baat kahne wale tathakathit krantikari kavi ne kiya aur ab kuch doosare log is ke naam per uski peeda ka istemal ker rahe hain......afsos wo bazar aur insan ke is chhadm ko nahi samajh rahi hain ya koi mahan prem jeene ki lalsa bachi rah gayi hai.
    jeewan her kala aur rachana se mahan hai bada hai.....agar hum use nahi bacha sakto kuch nahi bacha payenge.....hum hain to khuda bhi hai.

    Aseema ek patni hone ke naate kya karti hain ye deeger prashn hai magar sahitya samaj kya karta hai...ye kuch kam mahatvpoorna prashna nahi hai. qaide se alok dhanwa aur unki saari jhoothi satahi rachnaon ka bahishkar hona chaiye...unka ukka paani band hona chahiye.unko diye gaye saare puraskar wapas le liye jane chahiye.Aur Is chhal ke liye unko kadi saza deni chahiye.
    Ek baat aur ab mahila sangathno ko kaviyon, lekhakon, kalakaaron, rachanakaron, buddhijeeviyon ke ghar per kadi nazar rakhnai chahiye.kyonki kamobesh sabhi jagah thode thode farq kism ki shoshan katha chal rahi hai aaj bhi. hum bas use jaan gaye hain jo hamare saamne aa gaya hai.baqi to koi chor hai hi nahi. per mujhe lagta hai ki thode thode chor to sabhi hain.

    Is ghatna ke khulase ke baad samaj ke is verg ki mansikta ki bhi analysis ki jaani chahiye jo baatein to badi badi karta hai per aurat ko ek object se zyada kuch nahi manta.
    sambandhon ka vishleshan yahan bahut zaroori hai. Halanki ye to poore poore purush manovigyan ka aaina hai.waise bhi mard tab tak hi aurat ke aage peeche ghoomta hai jab tak wo use mil na jaye....han na kah de....aur haan kahte hi uske prem ka jwar utar jata hai......aur aurat uske liye ek sex object ya paon ki jooti ki tarah ho jati hai. darasal purushon ka saara prem aur saari taqat unki tangon ke beech tak hi seemit rahti hai.usase aage wo badh hi nahi paate hain.kak cheshta vako dhyanam ka sakshat awtar hain ye.
    Pati ban jane ke baad to majboori hoti hai warna prem jaisi koi vastu ya bhav se inka naata door door tak nahi hota inka. Prem kavitayen bhi man se nikalti hain ya tangoin ke beech se sahi sahi jaan paana mushkil hai.
    Sahi hai aurat hamesha bhawanatmak moorkhta karti hai aur purush use hamesh murkh banata hai chhalta hai.prakaranter se her jagah kahani yahi dohrayi jati hai. kahani ghar ghar ki.....! per afsos ekta kapoor ko ye sab subjects nahi milte....wo to pata nahi kaisi aurat hain.....! nahi darasal wo aurat nahi verg hain....bazar verg.aseema ne sahi likha hai ki is kroorta ke ister per sabhi purushon mein badi ekta hoti hai. mahilaon mein nahi.per haan mahilaon meion bhawanatmak moorkhta ki ekta hoti hai tabhi to unki maa ne is sambandh ko nibhane aur ghaseetane ke liye wapas bhej diya aur saas nanad tatasth ho gayin aur ek tathkathit bahan ya premika unka palla chhod nahi saki.aur purush bechara......alok dhanwa ban nachata raha......pata nahi nachta raha ya nachata raha.....! darasal mein is kahani ki aur parten kholne ki bhi zaroorat hai. us aurat ki bhi bhoomika janane ki zaroorat hai jo usi ki shaadi kisi aur se kara deti hai jisase prem karti hai.yaqeenan ye atmtyag ki baat to nahi ho sakti. kahani kuch aur hai shayad aseema bhi us ki jad tak na pahunch payin hon.samajh mein nahi aata ki wo aurat kaisi hai jo ye janti hai ki umra mein bade hone ke karan uske prem ko saamajik manyta nahi de sakta ek purush....aur wahi purush apane se do dashak choti umra ki ladaki se shaadi karne mein umra ka fasla nahi dekhta....is domuhe pan ko janane ke baad bhi usase prem kaise ker paati hai......nahi ye prem nahi ho sakta.....yaqeenana ye kuch aur hai.talaasho aseema iske peeche bhi kuch aur parten hongi.
    Baharhaal jo hua ho gaya.ab jeewan ko parinde ki tarah jeena seekh hi lena chahiye.hum panchi unmukta gagan ke pinjerbaddh na rah payenge. ghar ki khareedi hui laundi nahi hain ki hamari koi izaat na ho aur laundi ki bhi izzat honi chahiye akhir wo bhi sramik hai.
    alok aur aseema ki kahani padhker to ab is prajati se hi vishwas uth gaya hai.har kavita ke peeche kuch khoon ki chand boonden ya kisi insaan ka domuhapan dikhai padne laga hai...isane to kavita ka saara ras hi sokh liya....ab to kavita bhi kahte bhai hoga...sach mein hey kavita ab tumko mer jana chahiye kyonki abhi na jane kitane alok dhanwa honge tumhare sansaar mein jinke baare mein hamko pata nahi hai.nari tum kewal shraddha ho....kya is per vishwas rah jayega ab?
    yatra naryastu pujyante bhi kisi kavi ne hi kaha tha
    aur shayneshu rambha, karyeshu daasi kah aurat ki bhoomika is desh mein bahut pahle hi batai ja chuki hai....darasal bhoomika nahi auqat......auqat batai ja chuki hai.

    Abala jeewan hai tumhari yahi kahani satya hi lagta hai itani jujharu aur sangharshsheel ladaki ki kahani sunker.Magar ab sawyam prabha samujjwala swatantrata pukarti......badhe chalo badhe chalo.

  7. By संजीव कुमार सिन्हा on July 30, 2007 at 4:43 PM

    नक्सलवादियों का स्त्री-विरोधी चेहरा अंतत: उजागर हो ही गया। आलोक के शब्द-क्रांति थोथे निकले।

  8. By Abhishek on September 5, 2008 at 9:44 AM

    साहित्य की मौत एक साहित्यकार के पतन से शुरु होती है और शोषण के शीर्ष पर यह कहानी उन तमाम प्यार में पागल लडकियों की कहानी का अन्त कर देती है। क्या अब कोई कहानी होगी जिसमें पुरूष और नारी अपने भावों से परे हो पवित्र प्रेम और समर्पण की कुछ बात कह सकेंगे। खोखला होना अगर ऐसा होता है, तो साहित्य की परम्परा पर ही फ़िर से सोचना चाहिए, कि जिसे जीने का शऊर नहीं वह कविता का दर्शन कैसे बघार सकता है?

    एक और पूजा प्रेत-पूजा निकली और जरुरत है कि साहित्यकार कम से कम साहित्य से जुडे लोग इस यातना की सरे आम माफ़ी माँगें। मैं शर्मिंदा हूँ कि मैंने कुछ कविताएँ लिखी हैं, संघर्ष की और प्रेम की भी, पर इसके बाद तो कालिदास को भी प्रायश्चित करना चाहिए कि हमने एक अमानुष के हाथ में कविता की सशक्त संवेदना और उसका आत्यंतिक विश्वास सौंपे जा सकने की संभावना बनाई। अपनी कविताओं से अपने प्यार को पुकारने के लिए मैं क्षमा माँगता हूँ। शायद यह क्षमा असीमा जी के लिए मुश्किल हो पर उन्हें जीवन की कविता से नहीं ही भागना चाहिए, वह धरती पर लिखी गई सबसे नायाब और सबसे उम्मीदशुदा कविता होती है।

  9. By krishna mohan jha on November 1, 2010 at 10:26 PM

    ये बातें उतनी ही सच्ची या झूठी हैं जितनी कोई भी एक पहलू से बनी तस्वीर होती है…

  10. By Kishore Choudhary on November 1, 2010 at 10:36 PM

    This comment has been removed by the author.

  11. By Kishore Choudhary on November 2, 2010 at 6:46 AM

    :(

  12. By anand on November 4, 2010 at 11:44 PM

    dhanwa ji ka shaidayi tha magar ye dekh kar kafi peeda pahuchi hai. ummeed karta hoon ab app us narak se bahar aa payi hongi.

  13. By avinash on February 2, 2011 at 3:41 PM

    AAPKO SAADI MUBARAK HO.AAP JAISE LOGON KE SATH YAHI HASRA HONA CHAHIYE.AAPLOG SAMAJHDARI KE USPAAR JA CHUKEIN HAI.AB APNE ANDAR DHADHKTI AAG KO KYON NAHI PAHCHAN PARAHI HAI.AAP JULI AUR PROFESSOR KR BAGAL MEIN GHAR KHRIDIYE AUR BHAJAN KIRTAN KIJIYE.AAPSE ANURODH HAI REYAJ UL HAQ JI AAP AISE SOCIAL COMMUNIST BLOG PAR AISI EMOTIONAL KATHAON KA PRACHAR NAHI KAREIN.

  14. By भास्कर on August 9, 2011 at 7:51 PM

    लंबे समय बाद दोबारा ये हादसा पद रहा हूँ ...फिर से आलोक धन्वा का नाम सुनते ही मन गुस्से से भर जाता हैं...ऐसे ढोंगी को सरे आम गोली मार दूँ...

    भास्कर

  15. By gardy roy on October 11, 2011 at 6:56 PM

    sahitya ki kafi acchi jankari hai apko....aur apki leknhi to bejod hai....par afsos apni pehchan nhi bna shi....to apne pati ke nam ko bhunnaa suru kar diya apne....wah...alok dhanwa ki chawi aur shakhsiyat in mangarhant aur fictional stories se hilne bhi nhi wali....koi dusri emotional story banaiye......

  16. By asima bhatt on July 16, 2012 at 12:17 PM

    मेरे दोस्तों, मेरे भाई, मेरे शुभचिंतकों... मैंने बहुत चुप रहने के बाद अपनी चुउप्पी तोड़ी थी. फिर से आज मेरे मन में जैसी आग लगी है. अगर आलोकधन्वा को ही भुनाना होता तो कब का भुना लेती. इतना तो सभी जानते हैं कि औरतें कुछ करने पर आती है तो क्या कर सकती है,,, रखैल और रंडी भी भुना लेती है. मै तो पत्नी हूँ और मेरे जो कानूनन हक हैं कलेजे पे बैठ के ले सकती हूँ. लेकिन सब छोड़ दिया क्यूंकि एक डरे हुए इन्सान से क्या लड़ना. वो तो पहले ही हरा हुआ है. अभी तो बहुत कुछ लिखना बाकी है.. बस आलोकधन्वा की उम्र लंबी हो वरना आप जैसे समझदार लोग कहेंगे मैंने कुछ भी बकवास किया है....
    पूछो आलोकधन्वा से मुझसे शादी क्यूँ कि??? क्या वो सच बोल पायेगा.
    पूछो कि वो वर्धा उनिभ्सिटी से क्यूँ मुंह छुपा कर भागा????
    अब वो लिखते हैं- "तुम मेरे जिन्दगी में वैसे ही वापस आ जायो जैसे कि कभी गई ही नहीं थी..."
    और मै कह्ती हूँ - "जब पूरे अमावस की रात
    तुम्हे पागलों कि तरह ढूढती फिर रही थी
    उस रात तुम कहाँ थे चाँद....
    ऐसा है मिया बीबी के झगडे में पडोसी की ऐश हो ही जाती है. कुछ बोलने से पहले सौ बार सोंचे....
    धन्यवाद

  17. By asima bhatt on July 16, 2012 at 12:38 PM

    लम्बे अरसे तक चुप रहने के बाद मैंने कुछ लिखा था. अभी पूरा लिखना तो बाकी है. बस अलोकधन्वा की उम्र लंबी हो वरना आप जैसे के महानुभाव कहेगे मैंने वकवास किया है....
    ऐसा है मुझे किसी को भुनाना होता हो कब का भुना लेती. इतना हक तो रखैल और रंडी को भी होता है. मै तो बीबी हूँ. कानूनन जो मेरे हक हैं कलेजे पर बैठके ले सकती हूँ. लेकिन एक डरे हुए आदमी से क्या लड़ना जो पहले ही हारा हुआ है. एक पत्नी के रूप में कोई स्त्री जितना पुरुष को जानती है कोई नहीं जान सकता. वो मेरे सामने नंगे हुए हैं. मैंने दो बार उसके बच्चे को गर्भ में धारण किया है...आप लोगों ने नहीं... इसमें कोई शक नहीं कि आलोकधन्वा बहुत बडे कवि है लेकिन पति के रूप वो एक कायर और भगोड़े इन्सान हैं.

  18. By आभा निवसरकर मोंढे on May 8, 2013 at 2:58 PM

    एक बार फिर साबित हुआ कि कलाकार चाहे कवि हो या कोई और इंसान भी उतना ही अच्छा हो जरूरी नहीं...

  19. By Anonymous on May 11, 2013 at 1:01 AM

    umda

  20. By Dr Maa Samta on November 19, 2014 at 11:44 AM

    मैंने सब तुम्हारी आँखों में ही पढ़ लिया था असीमा। सकारात्मकता ही जीने का उत्तम राज़ है कला है। बढ़ती चलो मैं हूँ ना।

  21. By mahesh prajapati on October 19, 2016 at 10:04 PM

    Shadi karogi kya

  22. By mahesh prajapati on October 19, 2016 at 10:04 PM

    Shadi karogi kya

  23. By mahesh prajapati on October 19, 2016 at 10:05 PM

    Shadi karogi kya

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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