हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आंदोलनों की पीड़ा

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/13/2007 11:26:00 PM

इस बार अनिल चमडिया का आलेख आंदोलनों की समस्याओं और उनकी चुनौतियों पर. आलेख देशबंधु से साभार.
अनिल चमड़िया
आंदोलनकारियों की क्या पीड़ा होती है। उन्हें आधार बनाकार यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि राजनैतिक स्थितियां कैसे यथास्थितिवादी होती जा रही हैं। पिछले तीन दिनों में तीन लोंगों ने अपने आंदोलनों पर सवाल खड़े किए। पहले ने बताया कि उन्हाेंने अपने गांव के जिस जमींदार को वर्ग शत्रु बताकर हथियार उठाया था उस जमींदार का बेटा दिल्ली में रिक्शा चला रहा है। हमने वर्ग शत्रु की पहचान ठीक नहीं की थी। दूसरे ने एक दफ्तर में कम्प्यूटर से कामकाज होते देखकर कहा कि हम इसका कितना विरोध करते रहे हैं। आज कई दफ्तरों में तो इसके बिना काम मुश्किल हो गया है। तीसरे ने कहा कि आंदोलन ठेके पर नियुक्ति का विरोध करते रहे और आज लगभग दफ्तरों में ठेके पर नियुक्तियां हो गई हैं। कई यूनियनें समाप्त हो गई। ये तो आंदोलनों की समझ पर सवाल खड़े करने वाली पीड़ाएं हैं। लेकिन इस बातचीत का यह एक पहलू है। इस पहलू का एक विस्तार भी यहां है। आंदोलन में सफलता के बाद भी भिन्न किस्म की पीड़ा होती है। विकास परियोजना के एक इलाके में कार्यरत् एक आंदोलनकारी ने अपना दु:ख व्यक्त करते हुए कहा कि एक तरफ तो उनके सामने वे गांव होते हैं जहां अपनी जान-पहचान बढ़ाते हैं और वे गांव डूब जाते हैं। गांव डूबने का अर्थ वास्तव में डूबने से है। बड़े बांधाें के लिए गांवों को खाली करा लिया जाता है। दूसरी तरफ वे गांव हैं जिन्हें आंदोलन की वजह से मुआवजा मिलता है। उनकी जिंदगी एक मुकाम पर आ जाती है और वह गांव और लोग उन्हें भूल जाते हैं। लेकिन इस शिकायत की प्रवृत्ति विकास परियोजना वाले इलाकों की ही नहीं है। इसका विस्तार खेत-खलिहानों और कल-कारखानों तक होता है। मजदूर यूनियन चलाने वाले कई नेता बताते हैं कि संघर्ष के बाद मजदूरों को जब सुविधाएं और पैसे मिल जाते हैं तो वह यूनियन को भूल जाता है। कई बार तो यूनियन का विरोधी भी हो जाता है। भूमि सुधार आंदोलनों के नेताओं के भी ऐसे ही अनुभव रहे हैं। भूमिहीन को भूमि का पट्टा मिलने के बाद उसके सरोकार और संबंध परिवतत हो जाते हैं। जातीय आधार पर आरक्षण पाने वालों का भी रूख इसी तरह बदल जाता है।

यहां आंदोलन का अर्थ लोगों के संगठित होकर यथास्थितिवाद को तोड़ने से भी है और वैसे परिवर्तन को रोकने से भी है जो सत्ता और उसके आधार वर्ग के ही हितों का विस्तार करता है। लेकिन आंदोलन एक आम अधिकार है। इसका इस्तेमाल अपने-अपने तरीके से किया जाता है। अधिकार का मतलब ही होता है कि उसका समाज की कोई भी ईकाई सामान स्तर पर इस्तेमाल कर सकती है। यह अधिकार बोध लोकतंत्र की ताकत को तो जाहिर करता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता है कि मुक्कमल परिवर्तन की राजनैतिक परियोजना के साथ ही इस अधिकार का इस्तेमाल होना चाहिए। इसीलिए कई बार आंदोलन केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त होती है। वह अचानक संगठित होती है। इस तरह के आंदोलन सत्ता के हितों के विरूद्ध नहीं होते हैं बल्कि उसके तरीकों के खिलाफ होते हैं। चूंकि उसकी कोई तैयारी नहीं होती है इसीलिए वह एक अवधि तक के लिए जारी दिखता है। कम्प्यूटर के आने की सूचना कोई नई नहीं थी। लेकिन कम्प्यूटर के आने के बाद इस आधार पर उसके विस्तार का विरोध किया गया कि इससे लोगों के रोजगार के अवसर कम होंगे। इस तरह से आंदोलन के केन्द्र में लोगों की जीविका यानी मनुष्यता का भाव दिखता है। उस तरह के आंदोलन की यह व्याख्या नहीं की जा सकती है कि वह तकनीकी विकास का विरोधी है। मनुष्यता को केन्द्र में रखने वाला कोई भी परिवर्तनगामी आंदोलन तकनीक के विकास का विरोधी नहीं हो सकता है और इसी तरह तकनीक के विकास के बाद उसके विस्तार के सामने खड़ा नहीं हो सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो वह इसमें सफल नहीं हो सकता। अपने देश में कम्प्यूटर के बाद तमाम तरह के तकनीकी विकास के विस्तार को रोकने में कोई भी आंदोलन सफल नहीं हुआ और ना ही हो सकता है।
दरअसल अपने देश और समाज में आंदोलन एक प्रतिक्रिया के रूप में तो दिखाई देते हैं लेकिन एक राजनैतिक परियोजना के रूप में मुकम्मल दिखाई नहीं देते हैं। प्रतिक्रिया की तैयारी और उसके राजनैतिक विकास की संभावनाएं तलाशने की क्षमता नेतृत्व पर निर्भर करती है। लेकिन नेतृत्व की क्षमता केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया के लिए खुद को तैयार करने की सीमा से बाहर नहीं निकल पाया है। जिन आंदोलनकारियों की शिकायत अपने मुद्दे की गलत पहचान के बाबत् है, ये कोई दो-चार उदाहरणों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि यह एक ऐसी प्रवृत्ति के रूप में दिखाई देती है जो राजनैतिक स्तर पर भिन्नता जाहिर करने वाले तमाम तरह के आंदोलनों के बीच भी मौजूद है। इस प्रवृत्ति को इस तरह से भी देखा जाना चाहिए कि आखिर तमाम तरह के झंडे वाले आंदोलनकारियों के बीच एक समानता यह क्यों देखी जाती है कि उनके चरित्र में दोहरापन होता हैं। आम शब्दावली में दोगलापन होता है। नेतृत्व के कामकाज के तरीके से ही उसका चरित्र निमत होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि आंदोलन अंतवरोधी आधारों और मुद्दों का शिकार हो और उसके नेतृत्व का चरित्र उससे भिन्न हो। यह बात कई स्तरों पर व्यक्तिगत जीवन पर भी लागू होती है। उसका व्यक्तिगत जीवन सामाजिक प्रवृत्तियों को ही प्रतिबिंम्बित करता है।
जिन आंदोलनों की सफलता के दावे किए जाते हैं, उन आंदोलनों में यह दिखाई देता है कि उनमें निरंतरता की कोई परियोजना है ही नहीं। उनका यह मकसद भी दिखाई नहीं देता है। यदि मान लें कि कोई मुआवजे के लिए आंदोलन में शामिल होता है तो वह आंदोलन से मुआवजे के बाद क्यों जुड़े रहना चाहेगा। एक तो मुआवजे का मकसद पूरा होने के बाद वह आंदोलन आंदोलन रह नहीं जाता है। वह एक आंदोलन की विरासत की संस्था बन जाती है। ऐसी संस्थाएं दर्शनीय और अध्धयन की सामग्री भर रह जाती है। फिर इस तरह की आकांक्षा का पलना कि उन्हें भुला दिया जाता है, यह सोच किस तरह के आंदोलन की उपज हो सकती है। निजी महत्वकांक्षा के अलावा और यह क्या है? आंदोलनकारी यदि एक राजनीतिककर्मी है तो वह अपनी एक परियोजना के साथ लोगों को आमंत्रित करता है। लेकिन उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा उसके साथ निरंतर रहती है। देखा जाए तो वह अपने इस तरह के निजी महत्वाकांक्षाओं के कारण ही अपनी पूरी राजनैतिक परियोजना को अंजाम नहीं देता है और उसे समेटे रहने की जगह तलाशता रहता है। राजनैतिक परियोजना यह होनी चाहिए कि यदि मुआवजे के लिए आंदोलन हो रहा है तो मुआवजाजीवी समाज निमत करने वाली सत्ता संस्कृति के खिलाफ स्वामित्व और स्वावलंबन के आधार पर गतिशील रहे समाज को कैसे विकसित किया जाए। ठेके का विरोध इस तरह से नहीं हो सकता है कि ठेके के कामगारों के साथ रिश्ते बनाने में एक दूरी का एहसास लंबे समय तक बना रहें। भूमिहीनता के खत्म होने के बाद श्रमिक किसान के रूप में कैसे आंदोलन की ताकत को जीवित रखा जाए। कैसे कल-कारखाने से संघर्ष के बाद मालिकों से अपने हक हकूक को हासिल करने वाले श्रमिक को एक निरंतरता में कायम रखा जाए। यदि हक हकूक का भाव किसी भी आंदोलन से गायब होता दिखें और वह केवल पैसे पाने के भाव में सिमटते चला जाए तो यह किसका दोष हैं? जबकि आंदोलन का नेतृत्व तो खुद को राजनैतिक परियोजना का मैनेजर मानता है। दरअसल अपने देश में आंदोलनों का मकसद सत्ता में जगह पाना यादा रहा है। इसीलिए बुनियादी परिवर्तन की आकांक्षा का लगातार और तेजी के साथ विस्तार होता चला गया है। मौजूदा स्थिति में क्या देखा जा रहा है कि जो खुद को परिवर्तनगामी आंदोलन जाहिर करते रहे हैं वे सत्ता से भिन्न कतई नहीं हैं। यहां उदाहरण के लिए नंदीग्राम और सिंगूर को ही लिया जा सकता है। आखिर आंदोलन ऐसी सत्ता के रूप में कैसे परिवतत हो गए जो उस तरह की सत्ता के खिलाफ लोगों से संगठित होने की अपील करते रहे हैं। परिवर्तन की बुनियादी शर्त अपनी राजनैतिक परियोजना के लिए आंदोलन के जरिये सतहें तैयार करना होता है। सतहें सामने खड़ी सत्ता के लिए सीढ़ियां नहीं हो सकती हैं। बुनियादी परिवर्तन की राजनैतिक परियोजना की सतहें खड़ी करने वाला अपने अनुभवों को आधुनिकता में ढालने की क्षमता रखता है, ऐसे समाज में यह चुनौती सबसे बड़ी होती है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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