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बीच सफ़हे की लड़ाई

भागलपुर दंगा : सज़ा मिली, मगर इनसाफ़?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/09/2007 01:13:00 AM

एक गुजरात ही नहीं है जहां से जले हुए मांस और खून की बदबू आती है- भागलपुर भी उन जगहों में से एक है, जहां के लोगों खास तौर से अल्पसंख्यकों ने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, (भाजपा, विहिप आदि सहित) की नफ़रत की फ़सल की कीमत चुकायी है. भागलपुर दंगा देश के बडे़ दंगों में से एक था, जिसने हज़ारों परिवारों को बरबाद कर के रख दिया था. 07 जुलाई को इस मामले में 14 आरोपितों को उम्रकैद की सज़ा सुनायी गयी. मगर सवाल सबसे बडा़ यह है कि क्या दंगा सिर्फ़ एक सपाट कत्ल भर का मामला होता है जिसमें आरोपितों पर हत्या का मुकदमा चला कर सजा दे दी जाये. क्या किसी भी दंगे में हुआ एक कत्ल केवल एक साधारण कत्ल भर होता है? और क्या उसका आरोपित एक साधारण हत्यारा? और क्यों नहीं इस पर चर्चा होती कि दंगों के सूत्रधारों को भी सजा मिले? और जब किसी मामले में फ़ैसला ही इतनी देर से आये कि पीडि़त ज़ख्म का एहसास तक भूल जायें तो उस फ़ैसले का क्या अर्थ? और जैसा कि इस रिपोर्ट में हम देखेंगे-इस फ़ैसले का अब वैसे भी लौंगाय के लोगों और सकीना के लिए कुछ भी मतलब नहीं. तो एक और सवाल है-वह यह है कि फ़ैसला तो हुआ, सज़ा भी हुई, मगर क्या दंगा के पीड़ितों को न्याय मिला? रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस के जेपी यादव की है, जो उन्होंने आरोपितों को दोषी ठहराये जाने के बाद (सजा सुनाये जाने से पहले) गांव की यात्रा के बाद लिखी थी. इसके कुछ अंश अब अप्रासंगिक हो जाने की वजह से हटा दिये गये हैं. अनुवाद कुमार अनिल ने किया है.

दु:स्वप्न का अंत दु:स्वप्न की शुरुआत

जेपी यादव

कानून ने 1989 के भागलपुर दंगे के कुछेक अपराधियों को दबोच लिया है. 32 में से 14 आरोपितों को दोषी करार दिया गया है. दंगा पीड़ितों के लिए यह दु:स्वप्न के अंत जैसा हो सकता है, जबकि दोषियों के परिजनों के लिए यह बुरे दिनों की शुरुआत.
बीबी सकीना की 53 साल की आंखें उम्र के साथ कमजोर होती गयीं, लेकिन वे आज भी 18 साल पहले अपने पति की हत्या करनेवालों के चेहरे पर हत्या के निशान पढ़ सकती हैं. उन्होंने अपनी यादों से 1989 की भयानक तसवीरों को मिटा देना चाहा, लेकिन जो तसवीर दिलों-दिमाग पर बन जाये, उसे मिटाना आसान नहीं होता. वे इन तमाम वर्षों में उस बुरे सपने के साथ जीती रही हैं.
1989 के दंगे में सब कुछ खत्म हो जाने से पहले उनकी जिंदगी खुशहाल थी. लौंगाय गांव की गरीबी की तुलना में उसकी जिंदगी बेहतर थी. उन्होंने शौहर, ससुर, सास, देवर व गोतनी का भीड़ द्वारा कत्लेआम होते देखा. वे अपने बच्चें के साथ धान के खेत में भाग गयीं. भीड़ उनलोगों को नहीं देख पायी. वे यह नहीं तय कर पा रही थीं कि बचा लेने के लिए वह अल्लाह का शुक्रिया अदा करे या अच्छा होता कि वह भी नहीं बचती.
वे उस दिन उत्सव मना सकती थीं, जब एडिशनल जिला जज ने 115 मुसलमानों के कत्लेआम के लिए 14 लोगों को दोषी करार दिया, पर उनके चेहरे पर कोई मुस्कराहट नहीं थी. इन वर्षों में लगातार हत्यारों द्वारा दी जा रही धमकियों के बीच वे जिंदा रहीं. उन्हें बार-बार धमकी दी जाती थी कि -`हत्यारों को मत पहचानो'. लेकिन एक आंतरिक शक्ति उन्हें बराबर ताकत देती रही-`मैं उन चेहरों को किस प्रकार भुला सकती हूं. उन्होंने मुझे व मेरे सपनों को हिला कर रख दिया. उन पुलिसवालों के चेहरे, जो मुझसे बराबर लौंगाय में ही रहने के लिए जोर डालते रहे थे कि वे उनकी मदद करेंगे, लेकिन बाद में खुद ही हत्यारों में शामिल हो गये और मेरे परिवारवालों का कत्लेआम कर दिया'. सकीना कहती हैं,`चुप रहने से मैं मर जाना पसंद करती.'
32 आरोपितों में 14 को दोषी करार दिया गया. ट्रायल के दौरान छह की मृत्यु हो गयी व शेष रिहा कर दिये गये. वे दोषियों को मौत से कम कुछ नहीं चाहतीं. इनमें पुलिसवाले भी शामिल हैं.
बिना किसी सरकारी सहयोग के पांच बच्चें की परवरिश आसान नहीं थी. दंगे ने उनका सब कुछ छीन लिया था. वे कहती हंै-`मैट्रिक के बाद मेरा बड़ा लड़का भागलपुर मुसलिम कॉलेज में दाखिल हुआ. आरोपितों ने कोर्ट में बयान न बदलने पर बेटे की हत्या की धमकी दी. मेरे बेटे की पढ़ाई नहीं हो सकी. आज वह बेरोजगार है.'
यह सकीना बीबी के लिए विनाशकारी बदलाव है. लौंगाय में सबसे अधिक जमीनवाले परिवार की सकीना आज छह किमी दूर बबूरा गांव में रिफ्यूजी की जिंदगी बिता रही हैं. दंगाइयों से बच कर सकीना व उसके बच्चे एक नदी पार करके घंटों चलने के बाद मुसलिम बहुल बबुरा गांव पहुंचे थे.
मेरी छोटी बच्ची नौ महीने की थी. अन्य बच्चे दो से छह साल के बीच थे. मैं आज कल्पना नहीं कर सकती कि मुझमें किस प्रकार इतनी ताकत आ गयी कि मैं अपने बच्चें के साथ भाग रही थी, जबकि पीछे हमलावरों की भीड़ थी. महीनों तक मैं बेसुध थी. गांववालों ने मेरे बच्चें की देखभाल की. उसके बाद से बबुरा ही मेरा घर हो गया.'
सरकारी मशीनरी के आश्वासनों के बावजूद वे लौंगाय वापस जाने की हिम्मत नहीं कर सकीं. पिछले 18 वर्षों से उन्होंने अपने बगीचे के आम का स्वाद नहीं चखा. उन्होंने अपने तालाब की मछलियों को नहीं देखा. उन्होंने लौंगाय की जमीन का एक हिस्सा बेच कर एक घर बनाया और थोड़ी-सी जमीन ली. उन्होंने अपनी तीन में से दो बेटियों व
बेटे की शादी की. गांववालों ने शादी में मदद की. उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था.
लौंगाय में उनके रहने के कोई निशान नहीं हैं. उनका दोतल्ला मकान ध्वस्त कर दिया गया. उनकी 40 बीघे जमीन पर बगल के दामूचक के पूर्व मुखिया सदानंद सिंह ने कब्जा कर लिया.
सकीना दृढ़ता के साथ कहती हैं-सब कुछ छीन लेनेवाला वह दंगाइयों का नेतृत्व करनेवालों में से एक था. वह भी एक आरोपित था, पर उसकी कुछ वर्षों पहले मृत्यु हो गयी.' सब कुछ लुटा चुकी वे कहती हैं -`एक बार मेरा बेटा अपनी जमीन पर दावा करने गया, तो सदानंद के बेटों ने कहा कि दोबारा आया तो वे उसकी हत्या कर देंगे.'
दंगाइयों का मकसद जमीन पर कब्जा करना था. यह कहना है डीआइजी अजीत दत्त का, जिन्होंने दंगे के दो महीनों बाद एक खेत से लाशों को बरामद किया था, जहां उन्हें गाड़ दिया गया था. जिन मुसलमानों के पास अधिक जमीन थी, उन्हें औने-पौने दाम पर बेच देने को बाध्य कर दिया गया. भाइयों मुहम्मद अमीर, सुहैल व समीर सबके पास दो-दो बीघा जमीनें थीं. आज इमारते शरिया द्वारा दी गयी जमीन के टुकड़े उनके पास हैं और वे दैनिक मजदूर का जीवन बिता रहे हैं. दंगे के कुछ साल बाद उनका जीवन मुश्किल भरा हो गया, क्योंकि उन्हें अपनी जमीन 25 हजार रुपये बीघे के हिसाब से बेचनी पड़ी. कुछेक मुसलिम परिवार गवाही के लिए सामने नहीं आये और किसी प्रकार अपनी जमीन बचा पाने में कामयाब रहे. हालांकि उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.
19 वर्षीय राकेश मंडल एक आम जिंदगी जी रहा था. हालांकि वह जानता था कि उसके पिता व चाचा उसके गांव में हुए दंगे, जिसमें 116 लोग मारे गये थे, में आरोपित हैं. बचे हुए लोगों के लिए यह दु:स्वप्न 19 वर्ष पहले शुरू होता है, राकेश के लिए यह अब शुरू हो रहा है. शिवलाल मंडल का बड़ा पुत्र बी-कॉम का छात्र, भागलपुर से अपने घर पहुंचा. जज ने उसके 50 वर्षीय पिता को अभी-अभी दोषी करार दिया था. यह मंडल का परिवार है, जो भयानक भयग्रस्त हुआ. राकेश का भविष्य चौपट हो सकता है, क्योंकि उसके पिता ही एक मात्र क मानेवाले व्यक्ति हैं. उसके रिश्तेदारों से आर्थिक सहयोग की संभावना कम है. उसके चाचा अजबलाल मंडल व उसके दादा अजबलाल के पिता रामदेव मंडल भी दोषी करार दिये गये हैं.
`मैं नहीं जानता क्या होगा. कोर्ट द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद से मेरी मां बीमार है. मुझे उसकी मदद करनी है. दो छोटे भाइयों को देखना है.' वह कहता है-`बड़ा भाई होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि मैं इस संकट की घड़ी में परिवार के काम आऊं. सजा के बाद मुझे गांव में रहना पड़ेगा और खेती-बाड़ी संभालनी होगी. उस स्थिति में पढ़ाई जारी रखना मुश्किल होगा.' राकेश को उस उन्मादी दिन की याद नहीं है. वह तब लगभग एक साल का था. लेकिन उसने अपने पिता व अन्य लोगों से तब की कहानियां सुन रखी हैं-`मेरे पिता निर्दोष हैं. मेरे पिता का नाम शुरुआती एफआइआर में नहीं था. मेरे पिता ने कहा था कि उसने किसी मुसलमान का कत्ल नहीं किया. यह सब कुछ बाहरी लोगों द्वारा किया गया, जो हजारों की संख्या में आये थे.' वह एक ऐसे परिवार से आता है, जिसके पास एक बिगहा जमीन है. इसका परिवार बंटाइदारी करता है-`जब मैं कॉलेज पहुंचा, तब पढ़ाई के लिए भागलपुर में रहना जरूरी हो गया. इसीलिए मैंने प्राइवेट ट्यूटर का काम शुरू किया, ताकि मेरे खर्च निकल सकें . लेकिन गांव में रह कर मैं इसे कैसे पूरा कर सकता हूं?'
राकेश समझ सकता है कि कोर्ट के फैसले का क्या मतलब होगा. लेकिन संजीव कुमार, सिर्फ 13 वर्ष का बच्चा, जो अन्य बच्चों की तरह है, नहीं जानता कि उसके परिवार की किस्मत किस प्रकार उलट गयी है. उसके पिता कुलदीप मंडल (४०) और दादा सुखदेव मंडल (८७) को सजा हो गयी है. उससे उनके दंगे में शामिल होने की बात पूछिए, तो बच्चे के पास मासूम जवाब है-`मैं नहीं जानता कि क्या हुआ.' राकेश व संजीव कोइरी जाति से आते हैं, जिनकी लौंगाय में आबादी अधिक है. कोइरी जाति विनम्र जाति मानी जाती है, पर अर्थव्यवस्था का आयाम लोगों के साथ अजीब खेल खेलता है. लौंगाय के अधिकतर कोइरी छोटी जोतवाले किसान हैं. मुसलमानों के पास अधिक जमीन थी. कोइरी बंटाईदार के तौर पर उनके खेतों में काम करते थे. उनका रोष, अगर कुछ था, दंगे के दौरान सतह पर आ गया. जैसे ही रामलीला पूजन का जुलूस विश्व हिंदू परिषद के नेता कामेश्वर यादव के नेतृत्व में भागलपुर में निकला, दंगा शहर के बाद गांवों में भी फैल गया. लौंगाय उन्हीं मे से एक है, जहां सबसे भयानक घटनाएं हुईं.
हिंदू उन्मादियों ने कोइरियों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया. एक ग्रामीण पर, जिसने जनसंहार करने से इनकार कर दिया, दंगाइयों ने व्यंग्य किया-`तुम सब हिंदुओं के नाम पर कलंक हो. तुम मुसलमानों के खेत में काम करते हो, जो गाय का मांस खाता है. क्या यह पाकिस्तान है?'
हिंसा के तुरंत बाद कांग्रेसी सरकार गिर गयी और लालू प्रसाद ने सत्ता संभाली. लालू को मुसलमानों, जो अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, व पिछड़ों का समर्थन प्राप्त था. लेकिन जिस प्रकार दो दशकों तक भूल-भुलैयावाले रास्ते पर मुकदमा चलता रहा, उसके लिए लोग वोट बैंकवाली राजनीति को जिम्मेदार बता रहे हैं. वे कहते हैं, राजद पिछड़ों को नाराज करने का खतरा मोल लेना नहीं चाहता था और इसीलिए बीच का रास्ता चुना गया. लालू प्रसाद पिछड़ों के सशक्तीकरण की बात करते थे. उन्होंने मुसलमानों से वादा किया कि दंगे अब नहीं होंगे.
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील भागलपुर आज उस चौराहे से बाहर निकल आया है. आज हिंदुओं और मुसलमानों की अगली पीढ़ी यह महसूस करती है कि यह समय भविष्य के बारे में सोचने का है, न कि बदला लेने के बारे में विचार करने का. राकेश कहता है `मैं नहीं जानता उस समय क्या हुआ. सांप्रदायिक हिंसा ने मुसलमानों-हिंदुओं दोनों को बरबाद किया. दंगा पीड़ित मुसलमानों के बच्चे भी यही व्यक्त करते हैं. बीबी सकीना का बेटा मो अंसार कहता है `मेरे लिए जीने का स्रोत ढूंढ़ना ज्यादा अहम है. सरकार मेरी जमीन मुक्त कराये या मेरे लिए काम की व्यवस्था करे, जिससे मैं अपने परिवार की देखभाल कर सकूं. पिछले 18 वर्षों ने लोगों को जीवन के बहुत से पाठ पढ़ाये हैं. इंडियन एक्सप्रेस से साभार

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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