हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

...दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/07/2007 01:26:00 AM

इंतेसाब

यह नज़्म बडे मौके से याद आयी. इसे पढ़ते वक्त नहीं लगता कि हम आज भी उस अंधेरी रात से बाहर आ पाये हैं, भले कुछ नेपकिन टाइप लोगों और सरकारों को लगता हो कि यह स्वर्णयुग है. फ़ैज़ ने इस नज़्म में जिन लोगों का नाम लिया है उनमें से कई अब ज़ाहिरा तौर पर इतिहास की वस्तु बन गये हैं. मगर जो बचे हैं वे भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उन्हें खत्म करने या कम से कम आदमी के तौर पर उनकी संवेदना और सम्मान खत्म कर देने की साजिशें हर तरफ़ से हो रही हैं. हालांकि इसके खिलाफ़ लडा़ई भी जारी है. यह हमारे समय में शायद आदमी को बचाने की सबसे संजीदा और सबसे बडी़ पुकार है.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज के नाम
और
आज के गम के नाम
आज का गम कि है ज़िंदगी के
भरे गुलिस्तां से खफ़ा

ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है
दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है
क्लर्कों की अफ़्सुर्दा जानों के नाम
किर्म खुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्टमैनों के नाम
तांगेवालों के नाम
रेलबानों के नाम
कारखानों के भोले जियालों के नाम
बादशाहे जहां, वालीए मासिवा, नइबुल्लाहे फ़िलअर्ज़ दहकां के नाम

सुनें फ़ैज़ को बोलते हुए



जिस की ढोरों को ज़ालिम हंका ले गये
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गये
हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पतवार ने काट ली
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली
जिस के पग ज़ोरवालों के पांव तले
धज्जियां हो गयी है

उन दुखी मांओं के नाम
रात में जिन के बच्चे बिलखते हैं और
नींद की मार खाये हुए
बाज़ूओं से संभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों-ज़ारियों से बहलते नहीं

उन हसीनाओं के नाम
जिनकी आंखों के गुल
चिलमनों और दरीचों की
बेलों पे बेकार खिल-खिल के
मुरझा गये हैं
उन ब्याहताओं के नाम
जिनके बदन
बेमोहब्बत रियाकार सेजों पे
सज-सज के उकता गये हैं
बेवाओं के नाम
कोठरियों, गलियों, मुहल्लों के नाम
जिनकी नापाक खाशाक से चंद रातों
को आ-आ के करता है अकसर वज़ू
जिनकी सायों में करती है आहो-बुका
आंचलों की हिना
चूडि़यों की खनक
काकुलों की महक
आरज़ूमंद सीनों की अपने
पसीने में जलने की बू

पढ़नेवालों के नाम
वो जो असहाबे तब्लो अलम
के दरों पर किताब और कलम
का तकाज़ा लिये, हाथ फैलाये
पहुंचे, मगर लौट कर घर ना आये
वो मासूम जो भोलेपन में
वहां अपने नन्हे चिरागों में
लौ की लगन
लेके पहुंचे जहां
बंट रहे थे घटाटोप, बेअंत
रातों के साये
उन असीरों के नाम
जिन के सीनों में फ़र्दा के शबताब गौहर
जेल खानों की शोरीदा रातों की सर-सर में
जल-जल के अंजुमनुमा हो गये हैं

आनेवाले दिनों के सफ़ीरों के नाम
वो जो खुशबू-ए-गुल की तरह
अपने पैगाम पर खुद फ़िदा हो गये हैं

फ़ैज़ द्वारा अधूरी रह गयी नज़्म.

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ ...दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है ”

  2. By Nasiruddin on July 7, 2007 at 8:27 AM

    हाल ही में इस नज्‍़म को बिहार इप्‍टा के सम्‍मेलन में संगीतमय सुनने का मौका मिला था। आपने यहां पोस्‍ट करके अच्‍छा किया। इस नज्‍़म को नैयरा नूर ने काफी अच्‍छा गाया है। कहीं से वो मिले तो पोस्‍ट करें।

  3. By Reyaz-ul-haque on July 7, 2007 at 8:59 AM

    भाई कुछ दिन पहले एक पोस्ट में एक वीडियो डाला था,मैं नहीं जानता कि उसे किसने गाया था, पर वह अधूरी नज़्म थी. उसे फिर से डाल रहा हूं, कोशिश है कि वह पूरा मिल जाये.
    शुक्रिया.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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