हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नक्सलवाद : समस्या है या समस्याओं का समाधान

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/04/2007 12:42:00 AM

एक ओर अरुंधति राय का मानना है कि नक्सली देश में अकेले ऐसे लोग हैं जो कुछ सार्थक कर रहे हैं-वे केवल राजसत्ता से ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि सामंती जमींदारों और उनकी सशस्त्र सेना से भी. वे अकेले लोग हैं जो कुछ सार्थक कर रहे हैं. और मैं इसकी प्रशंसक हूं, तो दूसरी तरफ़ भारत सरकार इसे देश की सबसे बडी़ आंतरिक समस्या मानती है. हाशिया पर नक्सल आंदोलन पर दी गयी सामग्री (1, 2) पर जो बात सामने आयी, हम उन्हें यहां रख रहे हैं. आप बतायें कि क्या यह एक समस्या है? कितनी बडी़ समस्या है? इससे कैसे निपटा जाये? या वाकई जितनी बडी़ समस्या मानती है भारत सरकार उतनी बडी़ यह समस्या है? या फिर इसे अरुंधति और चंद्रिका की तरह समस्याओं का समाधान माना जाये?

अनामदास का कहना है...

नक्सलवाद रोग नहीं बल्कि रोग का लक्षण है, उसकी सीधी वजह ग़रीबी, अन्याय और शोषण है. नक्सलवादी आसमान से उतरे हुए शैतान नहीं बल्कि उनका नेतृत्व पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में है जबकि उनकी फौज में शोषित-तिरस्कृत लोग हैं. उन्हें फलने-फूलने के लिए पर्याप्त खाद-पानी दिया जा रहा है, शोषण, अन्याय और भ्रष्टाचार का राज चलाकर, वे राज विरोधी हैं जिन्हें सरकारों ने राष्ट्रविरोधी बना दिया है, आम तौर पर लोग उतना ही जानते-समझते हैं जितना व्यवस्था के लोग और व्यवस्था अभिमुख मीडिया से पता चलता है. नक्सलवादी सही हैं यह कहना उद्देश्य नहीं है लेकिन वे सिर्फ़ बंदूक से या हिंसा से रास्ते पर लाए जा सकते हैं, ऐसा सोचना मूर्खता है. जब तक व्यवस्था न्यायपरक, समतामूलक नहीं होगी, नक्सलवाद और चरमपंथ जैसी समस्याएँ लक्षण के रूप में सिर उठाती रहेंगी. रोग के समाधान की दिशा में काम होना चाहिए, शॉर्ट कट से कुछ नहीं मिलेगा.


notepad का कहना है...

दिनेश महतो जैसे पढे लिखे युवक साफ कह रहे है कि नक्सलाइट सही है कम से कम वे झारख्न्ड के वन्चित् निर्धन लोगो की समस्याएं समझते है ‍।यहां न स्वास्थ्य सुविधाएं है‍ न पोषण और न ही अधिकार । क्या वाकई यह विकसित भारत का अन्ग है ?
वाकई विमर्श के ज़रूरत है ।यह भी सही है कि नक्सलवाद के नाम को भुना कर फायदा कमाने वाला वर्ग कोई और ही है ।


चन्द्रिका ने कहा...

नक्सलवाद समस्या नही कई मायने मे समाधान के रूप मे आया है खासतौर से बिहार की बात ले तो आज बिहार में दलित महिलाओं के साथ उस तरह से व्यवहार नही किये जाते जैसे पहले होते थे या कहीं न कहिं नक्सलवादियों का डर बना हुआ है क ई मायने मे यद्पि जाति आधारित भेद-भाव बढ़े है पर यह संसदीय पार्टियों का ही देन है नक्सल वादियों ने इस गैप को भरने का काफी प्रयास किया है.


विरोध में भी कुछ टिप्पणियां आयीं जैसे कि...

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा...

प्रभाकर जी,

कभी कभी लगता है कि
" क्रांति के नाम पर जो बाँटते बंदूख हैं
अब उन्हीं का घर जलाना सीख लेना चाहिये"

यथास्थितिवादिता गलत है, यकीनन गलत है किंतु अंध-उत्साह शर्मनाक। आज कल की पत्रकारिता क्रांति केवल इसी लिये नही कर सकती क्योंकि गुमराह स्वयं है। आपकी वरिष्ठता आपकी सोच पर मुहर लगाये जाने का कारण नहीं हो सकती। एक व्यवस्था का विरोध दूसरी व्यवस्था का आरोपण ही तो है, पूछ तो लें हम बस्तरियों से कि उन्हें क्या चाहिये? आंध्रप्रदेश से आये चंद आतंकवादी बस्तर के बिलों में चुप कर क्रांति कर सकते हैं तो धन्य हैं भई वे..और एसी आशावादिता को भी नमन।
क्रांति एक सकारात्मक विचार है लेकिन मेरी छाती पर चढ कर मुझसे नहीं करवायी जा सकती। क्रांति भगत सिंह के उस बम से आ सकती है जो बहरों को सुनाने के लिये था लेकिन उस बारूदी सुरंग के फटने से नहीं आ सकती जिसमें मरने वाला भी सुकारू ही है। ......???


और
Gaurav Pratap ने कहा...

अनिल भाई, मैं स्वयं बिहार के भोजपुर ज़िले से आता हूँ. नक्सलवाद को मैंने भी देखा है. अगर आप थोड़ा पीछे देखेंगे तो याद आयेगा कि देश का पहला सी.पी. आई.(एम. एल.) साँसद आरा से ही जीता था. आज आप उनका अस्तित्व देख लें. कहाँ से कहाँ आ गये हैं वो. जिन गरीबों की बात वो करते हैं उन्होंने भी देख लिया कि उनका दुःख कोई नहीं समझने वाला. सिर्फ़ नफ़रत फ़ैला कर कोई लक्ष्य नहीं हासिल किया जा सकता है. सी.पी. आई.(एम. एल.) और रणवीर सेना दोनों ही लगभग मित चुके हैं. मैंने गरीबों की प्रतिबद्धता देखी है, सी.पी. आई.(एम. एल.) के प्रति. जब बोरों में पैसे जाते थे...... सिर्फ़ सिक्के.... क्युँकि गरीब रुपये नहीं दे सकते थे. आज वो ही पैसे देने वाला.... सबकी सच्चाई जान चुका है. किताबों में पढ़ने के लिये अच्छा है साम्यवाद..... नक्सलवाद.... ज़मीन पर सब एक ही हैं...

आप क्या मानते हैं?

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ नक्सलवाद : समस्या है या समस्याओं का समाधान ”

  2. By Amit on September 10, 2007 at 10:22 PM

    अगर अपनी बात मनवाने के लिये बन्दूक उठा ली जाये तो उस समस्या की सार्थकता खत्म हो जाती है।
    आज नक्सलवाद खुद एक समस्या बन चुका है। अगर हम इसे सही मानेगे तो ओसामा बिन लादेन के खून खराबे को भी सही मानना पडेगा क्यों कि वो भी बन्दूक के बल पर अपनी बात मनवाना चाहता है। आम जनमानस का विश्वास भी तो जीतना जरुरी होता है, ये केवल आतंकवाद का ही रुप बन कर रह गया है। ये नक्सली हथियार चला रहे है, इसके बाद इनके बच्चे भी चलायेंगे। ये कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया बन गयी है और एक दिन इन नक्सलियो का दमन होकर ही रहेगा।

  3. By Sudhir on October 22, 2007 at 7:24 PM

    ekdm galat pratikriya hai gaurav pratap ki.cpi(ml) ko bore bhar ke paise milte in shriman ne kis tarah aur kaha dekha yh ve hi jane, pr isse yah pata chalta hai ki ve cpi (ml) aur ranvir sena dono ke bare me kuch nahi jante. jativadi jaroor lagte hai ve. cpi ml aaj bhi garibo ke bal pr tiki hai, ranvir sena khatm ho gyi. dono ki ekta ke bare mekoi pagal hi soch sakta hai.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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