हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नक्सलवाद को समस्या नहीं मानें

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/03/2007 12:14:00 AM

नक्सलवादी आंदोलन अपने चालीसवें साल में पहुंच गया है और इसी के साथ देश भर में अनेक तरीकों से इस पर बह्स चल रही है. अभी बिहार में गत एक हफ़्ते से नक्सलवाद सभी अखबारों की लीड खबर बन रहा है. हाशिया पर जारी नक्सलवाद पर बहस की दूसरी कडी़ में अनिल चमड़िया का यह आलेख, देशबंधु से साभार.

अनिल चमड़िया
नक्सलवाद को हमें समस्या के रूप में संबोधित नहीं करना चाहिए। नक्सलवाद को विषय मानकर इस पर विमर्श करना चाहिए। 'नक्सलवाद-समस्या' का संबोधन राजनीतिक हथियार है। 'नक्सलवाद विषय' के संबोधन से इसके सभी पहलुओं पर बातचीत के रास्ते खुले मिलते हैं। समस्या के रूप में स्वीकृति भ्रष्ट वर्ग और उसके पोषक राजनीतिक विचारों के लिए इस्तेमाल की चीज बन जाती है, इसके कुछेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।

इन दिनों बिहार के समाचार पत्रों में मैं रोजाना नक्सलवाद को मुख्य खबर के रूप में छपते देख रहा हूँ। उससे इर्द-गिर्द की ढेर सारी और खबरें भी छपती हैं। इन्हें पढ़कर 'नक्सलवादियों' की एक भयावह तस्वीर बनती है। लेकिन समाचार-पत्रों की खबरों के अलावा जो जानकारियाँ मुझे मिली, वह 'भ्रष्ट वर्ग' की नृशंसा और क्रूर चेहरों को सामने लाकर खड़ कर देती है। ग्रामीण अंचलों में बैंक के अंकेक्षण के दौरान अपने अनुभवों को सुनाते हुए एक अधिकारी ने बताया कि उन्होंने सरकारी योजनाओं के तरह बाँटे गए कार्यों में सौ फीसदी घपला पाया तो बैंक के अधिकारियों ने उन्हें ऐसा करने के लिए नक्सलवादियों और माओवादियों के दबाव का हवाला दिया। आमतौर पर ग्रामीण अंचलों के अधिकारी वस्तुस्थिति की जाँच करने गए लोगों को खतरे की आशंका जताकर फटाफट वहाँ से चले जाने का माहौल बनाने लगते हैं। इन दिनों भारत सरकार की फोर लेन सड़क निर्माण को पूरा करने में कई बड़ी-बड़ी ठेका कंपनियाँ लगी हुई हैं। दूसरी कई योजनाओं का भी ठेका ऐसी कंपनियों के पास है। उन्होंने कई छोटी-छोटी कंपनियों या ठेकेदारों के समूह के बीच अपना ठेका बाँट दिया है। इन्हें एक निर्धारित समय में निर्माण कार्य पूरा करना है, अन्यथा दंड का प्रावधान है। लेकिन आमतौर पर यह देखा जाता है कि ये 'नक्सलवादी समस्या' का संकट दिखाकर इस प्रावधान से खुद को मुक्त करने की जरूरत बताने लगती हैं। इनमें मीडिया की भूमिका उन्हीं के सहायक की होती है। बकायदा घटनाएँ तक घट जाती है। गोली चलवाना और बम फेंकवाने की कार्रवाई की जाँच मीडिया का आम पाठक तो कर नहीं सकता। इसी तरह लूँगी-गंजी वाले न जाने कितने जोनल, एरिया कमांडरों को पुलिस पकड़ने में अपनी कामयाबी दिखाना चाहती है। लगता है कि नक्सलवादी संगठनों ने न जाने कितनी बड़ी फौज खड़ी कर ली है। एक पुलिस अधिकारी बता रहे थे कि कई पुलिस अधिकारियों के लिए 'नक्सलवादी समस्या' एक सुनहला अवसर बन गया है।
किसी विषय को समस्या मान लेने का अर्थ उसके समाधान की जरूरत की स्वीकृति हासिल करना होता है। एक 'समाधान वर्ग' उस विषय की चाहरदीवारी बन जाता है। नक्सलवाद के साथ यही देखा जा रहा है। उसे समस्या मानकर हद से हद यह कहा गया कि इसके राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक कारण है। जागरूकता का यह पैमाना होता है कि किसी विषय को पहले कैसे किस रूप में स्थानांतरित किया जा रहा है, उसे ठीक-ठीक समझ लिया जाए। उसकी पूरी भाषा में जितनी धाराएँ हैं, उन्हें पहचान लिया जाए। नक्सलवाद को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों की उपज समस्या तो बताया गया लेकिन आज उसका कानून एवं व्यवस्था व मशीनरी के जरिये समाधान करने पर सबसे ज्यादा जोर होता है। यही हो सकता था। क्योंकि हमने देखा कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों को दूर करने की योजनाओं में हमने 'समाधान वर्ग' से यह पूछा ही नहीं। राजनीतिक कारण क्या है ? यहाँ सामाजिक कारणों के अर्थ क्या है? आमतौर पर यही देखा गया कि इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए आर्थिक विकास पर जोर दिया गया। लाखों-लाख करोड़ रुपये नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में भेजे गए। किसी भी इलाके में पैसा मँगवाने और पैसा भेजने का यह जैसे एक रास्ता बन गया।

ग्रामीण अंचल का सत्ताधीश वर्ग और प्रदेश और देश की राजधानी का सत्ताधीश इसके जरिये अपनी यात्रा को आसान मान लिया। राजनीतिक, सामाजिक कारणों को स्पष्ट करने और उसके समाधान के पहलू को गौण होना ही था। विषय को समस्या में स्थानांतरित करने का लक्षय ही यही था। आर्थिक विकास के रहस्यमय सूत्र को खोलने की जरूरत महसूस नहीं की गई। यह राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं को भुला देने का ही परिणाम था। 'आर्थिक विकास' के भी अपने अर्थ होते हैं।

नक्सलवादी प्रभावित कहे जाने वाले जहानाबाद इलाके में सक्रिय रहे एक बड़े अधिकारी ने बताया कि उन्हें कभी भी विकास की योजनाओं को समय से पूरा करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। वहाँ पुलिस भी तैनात करने की जरूरत नहीं हुई। क्योंकि उन्होंने योजनाओं को पूरा करने और करवाने के लिए एक समिति गठित कर दी। उनमें आम लोग थे। विकास के सवाल के साथ योजनाओं में भागीदारी का पट्टा सबसे महत्वपूर्ण होता है। योजना किस उद्देश्य के लिए बन रही है, यह भी महत्वपूर्ण होता है। सड़कें यदि पुलिस की जीप दौड़ाने के लिए बनाई जानी है तो वैसी योजना में दिक्कत आएगी। क्योंकि लोगों को लगेगा कि पुलिस 'लूंगी-गंजी' को ले जाने आएगी। यह अध्ययन करें कि 'नक्सलवादी समस्या' की जमीन पर किस वर्ग ने संपन्नता हासिल की है और आम ग्रामीणों को क्या मिला है। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की आर्थिक स्थिति में क्या बेहतरी हुई है? बल्कि यह देखा जा रहा है कि आर्थिक विकास का यह फार्मूला उनकी स्थिति को और बदत्तर बनाने की दिशा में बढ़ चुका है। जंगल-जमीन से उन्हें अलग किया जा रहा है। इस आर्थिक विकास में जन बल की नहीं हथियार बल की भागीदारी प्रमुख है। नक्सलवाद व्यवस्था के घोषित समतामूलक कार्यक्रमों की विफलता को छिपाने और ताकतवरों की अपनी स्थिति को यथावत् बनाये रखने में बाधाओं को दूर रखने के लिए नक्सलवाद को समस्या बताया जाता है तो उसे आमजन क्यों मानें ?

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ नक्सलवाद को समस्या नहीं मानें ”

  2. By अनामदास on July 3, 2007 at 4:02 AM

    नक्सलवाद रोग नहीं बल्कि रोग का लक्षण है, उसकी सीधी वजह ग़रीबी, अन्याय और शोषण है. नक्सलवादी आसमान से उतरे हुए शैतान नहीं बल्कि उनका नेतृत्व पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में है जबकि उनकी फौज में शोषित-तिरस्कृत लोग हैं. उन्हें फलने-फूलने के लिए पर्याप्त खाद-पानी दिया जा रहा है, शोषण, अन्याय और भ्रष्टाचार का राज चलाकर, वे राज विरोधी हैं जिन्हें सरकारों ने राष्ट्रविरोधी बना दिया है, आम तौर पर लोग उतना ही जानते-समझते हैं जितना व्यवस्था के लोग और व्यवस्था अभिमुख मीडिया से पता चलता है. नक्सलवादी सही हैं यह कहना उद्देश्य नहीं है लेकिन वे सिर्फ़ बंदूक से या हिंसा से रास्ते पर लाए जा सकते हैं, ऐसा सोचना मूर्खता है. जब तक व्यवस्था न्यायपरक, समतामूलक नहीं होगी, नक्सलवाद और चरमपंथ जैसी समस्याएँ लक्षण के रूप में सिर उठाती रहेंगी. रोग के समाधान की दिशा में काम होना चाहिए, शॉर्ट कट से कुछ नहीं मिलेगा.

  3. By notepad on July 3, 2007 at 8:47 AM

    दिनेश महतो जैसे पढे लिखे युवक साफ कह रहे है कि नक्सलाइट सही है कम से कम वे झारख्न्ड के वन्चित् निर्धन लोगो की समस्याएं समझते है ‍।यहां न स्वास्थ्य सुविधाएं है‍ न पोषण और न ही अधिकार । क्या वाकई यह विकसित भारत का अन्ग है ?
    वाकई विमर्श के ज़रूरत है ।यह भी सही है कि नक्सलवाद के नाम को भुना कर फायदा कमाने वाला वर्ग कोई और ही है ।

  4. By Gaurav Pratap on July 3, 2007 at 11:40 AM

    अनिल भाई, मैं स्वयं बिहार के भोजपुर ज़िले से आता हूँ. नक्सलवाद को मैंने भी देखा है. अगर आप थोड़ा पीछे देखेंगे तो याद आयेगा कि देश का पहला सी.पी. आई.(एम. एल.) साँसद आरा से ही जीता था. आज आप उनका अस्तित्व देख लें. कहाँ से कहाँ आ गये हैं वो. जिन गरीबों की बात वो करते हैं उन्होंने भी देख लिया कि उनका दुःख कोई नहीं समझने वाला. सिर्फ़ नफ़रत फ़ैला कर कोई लक्ष्य नहीं हासिल किया जा सकता है. सी.पी. आई.(एम. एल.) और रणवीर सेना दोनों ही लगभग मित चुके हैं. मैंने गरीबों की प्रतिबद्धता देखी है, सी.पी. आई.(एम. एल.) के प्रति. जब बोरों में पैसे जाते थे...... सिर्फ़ सिक्के.... क्युँकि गरीब रुपये नहीं दे सकते थे. आज वो ही पैसे देने वाला.... सबकी सच्चाई जान चुका है. किताबों में पढ़ने के लिये अच्छा है साम्यवाद..... नक्सलवास.... ज़मीन पर सब एक ही हैं....

  5. By चन्द्रिका on July 3, 2007 at 12:48 PM

    नक्सलवाद समस्या नही की मायने मे समाधान के रूप मे आया है खासतौर से बिहार की बात ले तो आज बिहार में दलित महिलाओं के साथ उस तरह से व्यवहार नही किये जाते जैसे प हले होते थे या कहीं न कहिं नक्सलवादियों का डर बना हुआ है क ई मायने मे यद्पि जाति आधारित भेद-भाव बढ़े है पर यह संसदीय पार्टियों का ही देन है नक्सल वादियों ने इस गैप को भरने का काफी प्रयास किया है...........dakhalkiduniya.blogspot.com

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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