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बेईमान लेखकों से भरा समय : बहस वाया मंगलेश डबराल-अरुण कमल

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/30/2007 06:45:00 PM

आजकल नया ज्ञानोदय को लेकर जो भी बहस चल रही है, उसमें हमारा पक्ष जो भी हो मगर यह तो तय है कि वर्तमान में साहित्य के सरोकारों पर युवा और वरिष्ठ लेखकों की चिंताएं सामने आ रही हैं. हम भी यह मानते हैं कि अब साहित्य के सरोकार पहले से कमजोर हुए हैं और इसी के साथ हमारा यह भी मानना है कि इसका दोष सिर्फ़ युवा लेखकों पर डालना हद दरजे की बेईमानी है. जो पुराने हैं, आगे हैं, उनमें यह विकृति कहीं अधिक दिखती है. कर्मेंदु जी के बारे में अब कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं. यह आलेख उनसे प्रभात खबर के लिए की गयी बातचीत पर आधारित है, जो कबीर और बाबा नागार्जुन की याद में विशेष प्रस्तुति के लिए मैने की थी.

देश को जरूरत है ऐसे लेखकों की जो सच को सच और झूठ को झूठ कहें

कर्मेंदु शिशिर
कबीर और नागार्जुन दोनों लीक से हट कर चलनेवाले विद्रोही कवि थे. उन्होंने अपने समाज की प्रचलित काव्य रूढ़ियों को तोड़ा था. दोनों की काव्य भाषा और कथ्य जनता से लिये हुए हैं और वे जनता के लिए ही थे. उनके लेखन में कोई साहित्यिक महत्वाकांक्षा हो, ऐसा नहीं लगता. वे आलोचकों और काव्य रसिकों को ध्यान में रख कर नहीं लिखते थे.
आज की जो परंपरा है, वह वह पूरा साहित्यिक परिदृश्य जिन चीजों के विरोध में खड़ा है उन्हीं का शिकार हो गया है, उनकी गोद में बैठ गया है. वे बाजार के खिलाफ हैं, मगर उनमें सबसे अधिक बाजार और बाजार में स्थान की आकांक्षा भी है. समकालीन परिवेश पर जो भी महत्वपूर्ण विमर्श और विचार हैं, वे उन्हें ही कमोडिटी की तरह पेश करते हैं. अगर आपके विचार आपके जीवन में नहीं दिखते तो वे समाज में कैसे दिखेंगे?

ये दोनों कवि ऐसे थे जो अपने समय के समाज के अनुभवों को अपनी कसौटी पर कसते-जो बात उन्हें अच्छी लगती, वे उनका पक्ष लेते और जो बात उन्हें बुरी लगती उसे छोड़ते नहीं बल्कि उसका डट कर विरोध करते. आज के साहित्य में सरोकारों में सघनता और ईमानदारी नहीं रही. ये चीजें कम हुई हैं और इसी कारण से साहित्यकार इनके अभाव को ढंकने के लिए तराशी हुई भाषा और शिल्प पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं. अगर आप हिंदी साहित्य को देखें तो पिछले कुछ दशकों से कविता केंद्र में है, जबकि गद्य को जीवन संग्राम की भाषा माना गया है. इस कविता में भी कुछ ही लोग केंद्र में हैं, जैसे कि मंगलेश डबराल और अरुण कमल. ये दोनों लगातार कलात्मक भाषा की ओर गये हैं. इनका अपने कथ्य के प्रति सरोकार ढीला हुआ है, इन्होंने अपने सोच को कमोडिटी में बदल दिया है. इनकी इनकी कविताएं पढ़ने में तो बहुत सुंदर लगती हैं, पर दिल को छूती नहीं हैं, इसलिए हमारे भीतर कोई परिवर्तन नहीं करतीं. ये गालिब, मजाज, नजरुल, निराला, नेरुदा आदि से अपने को जोड़ते भी हैं, तो उन्हें कैश करने के लिए, ताकि उन्हें कुछ फायदा हो जाये. वे अपने को त्रिलोचन और गालिब की संतानें कहते हैं, मगर उनकी पहचान उनके रचनाकर्म से नहीं सम्मानों से बनी है. नागार्जुन ने कभी किसी सामान्य आदमी से भी मिलने में कोई अहंकार और ऐंठ नहीं दिखायी. मगर यह बात आज के प्रख्यात कवियों में नहीं दिखती है.
ऐसे में जनता विकल प्रतीक्षा में है ऐसे कवियों, रचनाकारों की जो सच को सच कहें और झूठ को झूठ कहें-पूरी ताकत से, बिना अपना नफा और नुकसान देखे. देश में ऐसे कुछ कवि हुए भी हैं-जैसे श्रीश्री, वरवर राव, गदर, पाश और निखिलेश्वर.
बातचीत के कुछ अंश प्रभात खबर में प्रकाशित
पेंटिंग : कबीर पर आनंदमय बनर्जी की पेंटिंग

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  1. 6 टिप्पणियां: Responses to “ बेईमान लेखकों से भरा समय : बहस वाया मंगलेश डबराल-अरुण कमल ”

  2. By avinash on June 30, 2007 at 7:28 PM

    ये निखिलेश्वर कौन हैं?

  3. By Reyaz-ul-haque on July 1, 2007 at 2:07 AM

    निखिलेश्वर जी के बारे में मुझे भी बहुत पता नहीं था. कर्मेंदु जी से पूछने पर ही पता लगा. वे तेलुगू के बहुत बडे़ कवि थे, श्रीश्री के साथ मिल कर विरसम की स्थापना की थी. एमटी खान द्वारा संपादित किताब वायस आफ़ रिवोल्ट में श्रीश्री और निखिलेश्वर की कविताएं संकलित हैं.

  4. By ravish on July 1, 2007 at 11:13 AM

    हिंदी साहित्य पाठकों को सच की ज़रूरत क्यों हैं? उनकी कविता को सुन कौर रहा है? कविता के असर से अब कोई समाज बन सकता है? अच्छी कविता होगी तो लोग फिल्म बना देंगे। समाज नहीं। कैसेट निकल आएगा। भूखा कवि क्या करे। सच बोलने का कांट्रेक्ट उसी को क्यों देने की बेचैनी है? पाठक समाज क्या ईमानदार है? वरवर राव की कविता का क्या हुआ है? गदर की कविता का क्या हुआ है? मेरा मतलब यह नहीं कि इनकी कविता बेहतरीन या सच के करीब नहीं। कवि हो भी जाए तो और कौन उनके साथ सच के साथ आने वाला है।
    कवि को विद्रोही क्यों होना चाहिए? कवि को विद्रोही क्यों नहीं होना चाहिए? आज के समाज में क्या कविता की कोई भूमिका है? पढ़ने की आदत को बनाए रखने के अलावा। हम पत्रकार भी इस भरम में रहते हैं कि रिपोर्ट देख कर दुनिया बदलेगी। लोग संभलेंगे। कई माध्यमों से सच का उजागर हो रहा है। पहले से अधिक मात्रा में। तो क्या लोग सच के साथ खड़े होने लगे हैं?

  5. By Reyaz-ul-haque on July 3, 2007 at 12:41 AM

    कवि हो भी जाए तो और कौन उनके साथ सच के साथ आने वाला है।

    मगर रवीश भाई, क्या इसी कारण से हम सच का आग्रह छोड़ दें? और क्या वाकई यह आप पूछ रहे हैं कि 'वरवर राव की कविता का क्या हुआ है? गदर की कविता का क्या हुआ है?' क्या आप वास्तव में नहीं जानते उनके बारे में? और अगर कुछ भी नहीं हुआ तो क्यों सरकारें उनके पीछे पडी़ रहती हैं? और यह कि उनके पाठक-श्रोता उनकी भाषा में कितने हैं?
    बेशक एक अच्छी कविता से समाज नहीं बनता है, मगर एक अच्छी कविता एक अच्छे समाज की संभावनाओं को जिलाये रखती है. और एक बुरी और झूठी कविता ज़रूर एक बुरे समाज की नींव रखती है-किसी न किसी स्तर पर.
    और हम इस पर क्यों नहीं सोचते कि कविता या साहित्य की भूमिका क्यों सिकुड़ गयी है? क्या इसके इसी लिजलिजेपन और आडंबरों के कारण नहीं? लोग क्यों साहित्य पढ़्ना छोड़ रहे हैं? क्या इसलिए नहीं कि इसमें अब सच उस तरह नहीं आता?
    और अगर लोग सच के साथ खडे़ नहीं हो रहे तो क्या यह एक अच्छी बात है? अगर गलत है तो उन्हें खडा करने की जिम्मेवारी किस पर है? उन्हें सच के बारे में बताने की जिम्मेवारी किस पर है?
    अगर किसी पर नहीं तो आप इतनी रिपोर्टें क्यों करते हैं?

  6. By Anonymous on April 11, 2013 at 1:11 AM

    ‘’ रीमेक का ज़माना है भाई , ओरिजिनल काहे ढूंढें रे मन ‘’
    रीमेक पे रीमेक , जिसने ओरिजनल देखा उसे रीमेक में आनंद काहे और कैसे आयेगा , या फिर सब कुछ बेच चुकने के बाद अखबार की रद्दी पर आखरी दाँव लगाते से व्यापारी की हालत हो गई है , अरे भाई ऐसा-वैसा कुछ है तो बोलो ना , देश की जनता के चंदे (टैक्स) से बहुतेरे अरबपति हो गए , काहे संकोच करते हैं , भाई देखिये रेणु, महादेवी , प्रेमचंद, निराला, पन्त जैसे मनीषियों के साहित्य पर फिल्म बनाना तो आपके बस की बात नहीं, उसके लिए कलेजा चाहिए ठेठ-हिन्दुस्तानी होने का और वो तो आप पर जमेगा नहीं , स्टैण्डर्ड लो होने के झटके का हृदयाघात में बदलने का डर जो है , अब ‘’नदिया के पार’’ जैसी साफ़-सुथरी फिलम बना के आप काहे हम देशी-ठेठ-गंवारों में अपना नाम लिखवायेंगे , ये बात अलग है की इस देशी फिलम का हर गाना हर एक के मन में आज भी गुनगुनाया जाता है | चलिए जाने दीजिये जादा बातें करेंगे तो आप नाराज हो जायेंगे,,,....राधे-राधे....---चलते-चलते वो तो सेंसर-बोर्ड है वरना @#$%^&***.......?
    क्या कारण है की भारत की प्रत्येक भाषा में साहित्य का विपुल भण्डार होते हुए हमारे माननीयों को कॉपी-पेस्ट पर जिंदगी बितानी होती है ?

  7. By abhay on April 11, 2013 at 1:13 AM

    कवी का कार्य सच लिखना है इसके आगे का कार्य समाज का है सच को सच माने या झूठ को सच

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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