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बीच सफ़हे की लड़ाई

आज भी आपातकाल : हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/26/2007 12:32:00 AM

आज का दिन कोई ऐसा दिन नहीं है कि हम सिर्फ़ आपातकाल को याद करें, उन काले दिनों को याद करें जो हमारे देश के कथित गौरवशाली लोकतंत्र के ढांचे के भीतर से ही हम पर फ़ासीवादी आतंक के साथ छा गये थे. यह अलग से रेखांकित करनेवाली बात है कि आपातकाल असंवैधानिक नहीं था, उसके भीतर से निकले जुल्म और आतंक भी असंवैधानिक नहीं थे. इसका मतलब यह है कि वह सब संविधान सम्मत था. क्या हम उस आतंक और उन काले दिनों को संविधान सम्मत मानते हैं? हम कुछ भी मानें, सच्चाई तो यही है. यह संविधान उन काले दिनों की भरपूर संभावनाओं को लिये हुए अब भी मौजूद है?
और दूसरी बात है कि अब आपातकाल की देश में बिलकुल ज़रूरत नहीं रही. तंत्र ने वे तरीके विकसित कर लिये हैं कि उसे आपातकाल लागू करने की ज़रूरत ही नहीं रही. हम एक डीफ़ैक्टो इमरजेंसी से गुजर रहे हैं बिना घोषित तौर पर आपातकाल लागू किये आपातकाल लागू है. नौकरी-काम मांगने वालों पर लाठियां बरसायी जाती हैं (अभी नीतीश सरकार ने तीन दिन पहले यह शुभकार्य एक बार फिर दोहराया है) आप सरकारों की आलोचना नहीं कर सकते, जेल में डाल दिये जायेंगे या फिर नक्सली कह दिये जायेंगे. अगर विपक्षी दल में हैं तो आप पर पोटा लाद दिया जायेगा. एक पूरे राज्य को नफ़रत की भट्ठी में झोंक दिया जाता है- इस संविधान के रहते, संसद के रहते, देश के तथाकथित महान लोकतंत्र की हर एक गौरवशाली संस्था के रहते गुजरात में एक खास धर्म के लोगों के लिए घेट्टो बना दिये जाते हैं. अमीरों को ज़मीन नहीं देनेवाले किसान मार कर गड्ढों में फेंक दिये जाते हैं, आदिवासियों को 'शांतिपूर्ण सामूहिक शिकार' (सलवा जुडूम) के ज़रिये सबक सिखा दिया जाता है, फ़िल्मकारों-चित्रकारों पर हमले होते हैं, लेखक अपनी प्रस्थापनाओं के लिए अदालतों में घसीट लिये जाते हैं, पुस्तकालयों को जलाया जाता है और कहीं कुछ नहीं होता, एक युवती सात सालों से अनशन पर है, कोई उसकी नहीं सुनता, नर्मदा आंदोलन के हजारों लोग बार-बार दुत्कारे जा चुके हैं, हजारों के घर डुबा दिये गये हैं और उनका पुनर्वास अब भी बाकी है. और उनकी बातों को सामने लाने के लिए कोई लेखक अगर तैयार होता है तो इसे अदालतें अपना अपमान समझ कर उसे जेल तक भेज देती हैं. किसी को सजा नहीं होती. और फिर आप ब्लाग पर भी कुछ नहीं कह सकते-आपको नैतिकता और भाषा के स्वयंभू ठेकेदार लतिया कर बाहर कर देंगे अपने मंच से. क्या यह आपातकाल नहीं है? क्या हम वास्तव में एक आपातकाल से नहीं गुजर रहे? पेश है एक लेख और एक संस्मरण, प्रभात खबर से साभार.

अप्रत्यक्ष रूप में आज भी जारी है इमरजेंसी
कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इमरजेंसी की घटना एक काला धब्बा थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने चुनाव में अपनी पराजय के फलस्वरूप इसे लागू किया था. करीब एक लाख लोगों की गिरफ्तारी की गयी. संविधान द्वारा प्रदत्त मूलाधिकारों को निलंबित कर दिया गया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी कुचलने का भरपूर प्रयास किया गया. वास्तव में यह एक तरह की तानाशाही थी, जिसके माध्यम से लोकतंत्र का गला घोंटा गया. लेकिन आज की परिस्थिति भी कुछ इससे अलग नहीं है. चेहरे बदल गये हैं और तरीका बदल गया है बाकी सब इमर्जेंसी के समय जैसा ही है. अब संसद में दो तिहाई बहुमत के कारण कानूनी इमरजेंसी से भले ही बच सकते हैं, लेकिन प्रवृत्ति के रूप में आज भी शेष वैसा ही है. आज बिना इमरजेंसी के ही इमरजेंसी जैसी परिस्थिति है. उस समय भी सरकार के अधीन काम करनेवाले अधिकारी ऊपर के दिशा-निर्देंशों के मुताबिक काम करते थे और आज भी कमोबेश स्थिति जस की तस है. सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग सत्ता में बैठे शासकों के हितों के अनुरूप ही किया जाता है. राज्यों में अधिकारी मुख्यमंत्री, मंत्री के इशारों पर काम करते हैं तो केंद्र में बैठे अधिकारियों की प्रवृत्ति भी प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और दूसरे सत्ता प्रतिष्ठानों के मन-मुताबिक काम करते हैं. इसका प्रमाण क्वात्रोच्ची मामले में सीबीआइ की भूमिका से साफ है. जिस तरह से क्वात्रोच्ची को इंटरनल नोटिंग की जानकारी पहले ही दे दी गयी उससे सीबीआइ की सत्तानिष्ठा का प्रमाण ही कहा जायेगा. आइबी और दूसरी खुफिया संस्थानों की भूमिका सत्ता में बैठे शासकों के हितों को पूरा करने में किया जाना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्य है. पुलिस का जुल्म आज भी यथावत जनता को कुचलने और दबाने में किया जाता है. विपक्षी राजनीतिक दलों के लोगों और दूसरे आलोचकों को आज भी तंग किया जाता है. सत्ताप्रतिष्ठान लोकतंत्र के मूल्यों को तोड़ने-मरोड़ने में जरा भी नैतिकता की परवाह शायद ही करते हैं.
राजनीतिक आजादी के इतने वर्षों में अभी तक हम इतिहास से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं दिखते. इमरजेंसी की घटना को पूरा हुए 32 बरस हो गये लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा है. लोकतांत्रिक ढांचा भले ही बना हुआ है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है. संसद में अपराधी छवि के लोग चुन कर पहुंच रहे हैं. यहां तक कि हमारी न्यायपालिका भी स्वतंत्र नहीं है. न्यायपालिका में कार्य की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. उस पर राजनीतिज्ञों का दबाव होता है और फैसलों को अपने अनुसार मोड़ने के लिए सत्ता का प्रभाव उपयोग करते हैं. आज जरूरत है अच्छे नेताओं के सामने आने की जो इस प्रवृत्ति को रोक सके. नैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों में पतन चिंता का विषय है.

लोकेश कुमार भारती से बातचीत पर आधारित

देखिए इंतेसाब (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)




एक काली अंधियारी रात की कहानी

मधुकर
बत्तीस साल पहले की बात है. मैं 20 साल का था. बीएससी कर रहा था. देश में इमरजेंसी लग चुकी थी. अपने कॉलेज के वनस्पतिशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो विश्वनाथ सिंह के यहां कुछ पढ़ने-समझने के अलावा क्रांतिकारी साथी पंकज जी का हाल-चाल लेने पहुंचा था, जो प्रो सिंह के बड़े पुत्र थे और कुछ दिन पहले गिरफ्तार हो गये थे. रात के करीब नौ बज रहे थे. तभी शहर-कोतवाल रामाधार सिंह सदल-बल पहुंचे. कुछ ही दिनों पूर्व प्रोफेसर साहब के यहां चोरी हुई थी. उस चोर को पहचानने के नाम पर उन्होंने मुझे थाना चलने को कहा. मैंने और प्रो साहब ने भी प्रतिकार किया. मैं न तो उस दिन सर के यहां था, न ही कोई कारण ऐसा था कि चोर को मैं पहचान सकूं. सर (अब स्वर्गीय) ने पूछा- आप कॉलेज कैंपस में बिना प्रिंसिपल के परमिशन के कैसे आ गये? लेकिन इमरजेंसी में तो तीन ही की चलती थी- कांग्रेस, सीपीआइ और पुलिस. उन्होंने कहा कि नहीं-नहीं मैं तो आप ही के काम से आया हूं. इनको जाने दीजिए न.
मैं उस समय लुंगी-गंजी में था. मैंने कहा, आप चलिए, मैं थाने आता हूं. लेकिन थानेदार थोड़ी देर में मैं ही छोड़ने की बात कहते हुए साथ चलने पर जोर देने लगे. तब मैं एमजेके कॉलेज, बेतिया से सटे दुर्गा मंदिर में रहा करता था. मैंने पूछा, कपड़े बदल लूं. थानेदार ने कहा हां-हां बदल लीजिए. थानेदार सदल-बल मंदिर तक गये, लेकिन गेट के बाहर ही रुक गये, बोले-आप कपड़ा बदल कर आइए, हम इंतजार कर रहे हैं. छोटे दारोगा ने कहा कि सर भाग जायेगा. थानेदार बोले, मैं जानता हूं न, भागेगा नहीं. मैं कपड़ा बदल कर थानेदार के साथ जीप पर बैठा. हम कोतवाली पहुंचे. मुझे बाहर रखे कुरसी-टेबुल के पास बिठा कर वहां तैनात सुरक्षागार्ड को सौंप दिया और कहा कि मैं राउंड लगा कर आता हूं, फिर आपको छोड़ दूंगा. मैं समझ रहा था कि मैं गिरफ्तार हो चुका हूं. मानसिक रूप से तैयार था. कुछ देर बैठने के बाद मैंने लघुशंका जाने की बात सिपाही से कही. वह बोला कि बैठो चुपचाप, नहीं तो गोली मार देंगे. जितनी बार मैं समझाने की कोशिश करता, वह गोली मारने की बात दुहराता. मैंने तब आजिज आकर कहा, मैं यहीं लघुशंका करता हूं. तब वह मेरी पीठ में राइफल सटा कर मुझे समीप के नाले के पास ले गया. मैं लौट कर इंतजार करने लगा.
थानेदार करीब दो बजे रात को वापस लौटे. पूछा कहां सोना पसंद करेंगे, घर में या हाजत में. मैंने कहा, आप तो मुझे चोर पहचनवाने के लिए लाये थे? वादा किया था कि घर छोड़ देंगे. थानेदार ने कहा- चोर तो पकड़ा गया है. चलिए मिलवाते हैं. हाजत खोला गया. चोर झपकी ले रहा था. जगाने और पूछने पर उसने कहा कि उसी ने प्रोफेसर साहब के यहां चोरी की थी. इसके बाद थानेदार ने फिर मेरे सोने की बाबत पूछा. मैंने अनजान बनते हुए पूछा- क्या आपने मुझे गिरफ्तार कर लिया है? थानेदार बोले- हां. मैंने पूछा-किस दफा में, क्यों? थानेदार ने कहा- मीसा में. बहुत आंदोलन और क्रांति कर लिये, अब कुछ दिन जेल में आराम कीजिए. फिर मुझे उसी चोर के साथ उसी हाजत में बंद कर दिया. दूसरे दिन उसी चोर के साथ रिक्शे में बैठा कर जेल भेज दिया. कहने के लिए हमें अदालत भी ले जाया गया, लेकिन मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया. सीधे जेल भेज दिया गया, जहां कई काली अंधियारी रातें गुजारनी पड़ीं. एक खूबसूरत-बेहतरीन सुबह के इंतजार में. संपूर्ण क्रांति होगी. सबको सम्मानजनक जिंदगी नसीब होगी. इस उम्मीद में कि रात जितनी भी संगीन होगी, सुबह उतनी ही रंगीन होगी. जेल में कई क्रांतिकारी मित्रों से भेंट हुई. सबने जोरदार स्वागत किया. जेल वैचारिक बहसों व अध्ययन का केंद्र बन गया. बहुत कुछ पढ़ा, बहुत कुछ सीखा. जिंदगी को बहुत करीब से देखा. वहीं नक्सली मित्रों से मुलाकात हुई, बात हुई. उनके प्रति एक समझ बनी. वहीं गैरों से अपनापन और दोस्ती का जो गुर सीखा, वह आज भी अमूल्य धरोहर है. जेल में भी बाहर की तरह ही इमरजेंसी थी, वहां भी यही कहता रहा `हिम्मत से सच कहो, तो बुरा मानते हैं लोग; रो-रो कर बात करने की आदत नहीं रही.' जेल तो गया था अकेले, लेकिन `मैं तो चला था अकेला ही जानिबे मंजिल, लोग मिलते गये, कारवां बनता गया.' बीस वर्ष की उम्र में नेताजी बन गया. बड़े से लेकर बूढ़ों तक का भाई और भैया बन गया.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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